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कुछ गपशप, कुछ किस्से, कुछ यादें, कुछ पन्ने पुस्तकों के राजकमल के मंच पर

कोविड 19 से पूरा देश लड़ रहा है। हम नए सिरे से सामाजिक परिभाषाएं गढ़ रहे हैं। हम थक रहे हैं, निराश हो रहे हैं लेकिन जीवन के भीतर की लयात्मकता हमें हौसला दे रही है। बीमारी है, बीमारी का ख़तरा है, बीमारी से लड़ना है, समझदारी से नियमों का पालन करके। फ़िलहाल, ठहरे हुए को चलाना है नई समझ के साथ…

11 मई अफसानानिग़ार सआदत हसन मंटो की जन्मतिथि भी है। मंटो ने कहा था, ”हक़ीकत से इंकार क्या हमें बेहतर इंसान बनने में मददगार साबित हो सकता है? हरग़िज नहीं।“

हकीक़त है कि एक इंसान के तौर पर, एक समाज के तौर पर हमें प्रकृति के साथ अपने रिश्तों को समझना होगा और विकास की अपनी अंधाधुंध दौड पर सोच-समझ कर आगे बढ़ना होगा।

मंटो ने समाज की सच्चाइयों को अपने अफ़सानों में हू-ब-हू उतार दिया था। आज हम बार-बार उन्हें पढ़ते हैं, उनके लिखे में अपने समय को समझने के सूत्र ढूँढते हैं। यही सूत्र राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर लाइव बातचीत में लेखक पंकज चतुर्वेदी ने कवि कुँवर नारायण की कविताओं से निकालकर लोगों से साझा किए।

राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर पंकज चतुर्वेदी ने एक कवि के रूप में कुँवर नारायण को याद करते हुए कहा, “अमर्त्य सेन ने कभी कहा था कि महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सवाल आज के समय के लिए बहुत प्रासंगिक हैं। इस पर कुँवर नारायण का मानना था कि अर्जुन अगर अच्छे सवाल पूछते तो बेहतर जवाब पा सकते थे। सही सवाल पूछना भी एक हुनर है। कुँवर नारायण सबसे ज्यादा राजा जनक के चरित्र से प्रभावित थे।“

“मैं ज़रा देर से इस दुनिया में पहुँचा”

फ़ेसबुक लाइव के जरिए कुँवर नारायण के निधन के बाद प्रकाशित उनके संपादित काव्य-संग्रह ‘इतना सब असाप्त’ की कविताओं पर विस्तार से चर्चा की। यह कविता संग्रह राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है।

पंकज चतुर्वेदी ने कहा, “कुँवर नारायण के भीतर एक संवेदनशील मनुष्य बनने की चाहत थी। उनकी रचनाशीलता और व्यक्तित्व में बुद्ध का सा स्वभाव झलकता है। वो बहुत ज्यादा लिखने में विश्वास नहीं करते थे। यह उनके व्यक्तित्व की केन्द्रीय विशेषता थी। दुनिया में रहते हुए, दुनिया से अलग रहना, अलहदा रहना, उससे कोई अपेक्षा न रखना… यही उनको विशिष्ट भी बनाती है।“

उनकी कविता की पंक्तियां हैं-

मैं ज़रा देर से इस दुनिया में पहुँचा / तब तक सारी दुनिया सभ्य हो चुकी थी / सारे जंगल काटे जा चुके थे / सारे जानवर मारे जा चुके थे / वर्षा थम चुकी थी / और आग के गोले की तरह तप रही थी / पृथ्वी…..”

कुँवर नारायण सांसारिक सफलताओं को सारहीन समझते थे। उनकी कविताएं इसका प्रमाण हैं। लाइव बातचीत में पंकज चतुर्वेदी ने लोगों के साथ अपनी कविताओं का पाठ कर उसे साझा किया।

बातें और कहानियों के फ़ेसबुक लाइव की श्रृंखला में राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव पेज से जुड़कर चर्चित लेखक अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपने उपन्यास “कुठाँव” से अंश पाठ कर अपने पाठकों और फ़ेसबुक यूज़र्स को आनंदित कर दिया। अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह नया उपन्यास मुस्लिम समाज में फैले जातिगत भेदभाव और कुरीतियों को उजागर करता है। उन्होंने उपन्यास से कई छोटे-छोटे अंश पढ़कर उपन्यास के प्रति उत्सुकता को जगा दिया। यह उपन्यास राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है।

बना रहे बनारस

बनारस हिन्दुस्तान का ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे पुराने शहरों मे से एक है। कहते हैं कि अगर दुनिया के सभी ऐतिहासिक शहरों की उम्र जोड़ ली जाए, तो उसका जोड़ बनारस की उम्र से कम ही होगा।

राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से लाइव जुड़कर ‘स्वाद सुख’ के कार्यक्रम में भारत के शहरों और वहाँ के तमाम व्यंजनों की जानकारी हमारे सामने लाते हैं इतिहासकार एवं खान-पान विशेषज्ञ पुष्पेश पंत। सोमवार की सुबह ग्यारह बजे आभासी दुनिया के मंच से पुष्पेश पंत के साथ लोगों ने सैर की बनारस की ज़ायकेदार गलियों की। वैसे, तो बनारस के स्वाद का नाम लेते ही चाट, कचौड़ी -जलेबी, मिठाईयां या ठंडाई की याद आती है। लेकिन, इस चक्कर में बनारसी खाना बेचारा मारा जाता है।

‘मूँग की पकौड़ियां’, ‘बनारसी दम आलू’, ‘छर्रा आलू’, ‘देसी परवल की सब्ज़ी’, ‘मटर की कचौड़ी’, ‘काली मिर्च और अर्बी’, उड़द की दाल में साग मिलाकर बनाई गई दाल का स्वाद सालों-साल याद रहता है। दरअसल, बनारस सिर्फ़ बनारस वालों का नहीं है। वो भोजपुर वालों का है, मैथिल वालों का भी और जौनपुर वालों ने इसके स्वाद में बहुत योगदान दिया है।

बनारसी मिठाइयां स्वाद में जितनी जबरदस्त होती हैं उतना ही अपने नाम में नज़ाकत से भरी होती हैं – लौंगलता, बनारसी मलइयो और अस्सी घाट का एप्पल पाई। इन तीनों की ख्याति बनारस से बाहर देश और विदेश में फैली हुई है। फ़िलहाल हम लॉकडाउन में हैं लेकिन, स्थितियां सामान्य होने के बाद हम क्या-क्या करेंगे उस सूची में बनारस जाकर उसके ज़ायकों का स्वाद लेना शामिल कर सकते हैं।

लॉकडाउन के तीसरे फ़ेज में भी लगातार जारी फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम में अबतक 172 लाइव सत्र हो चुके हैं जिसमें 128 लेखकों और साहित्य प्रमियों ने भाग लिया है।

राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम में अब तक शामिल हुए लेखक हैं – विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल, अशोक वाजपेयी, सुधीर चन्द्र, उषा किरण खान, रामगोपाल बजाज, पुरुषोत्तम अग्रवाल, अबदुल बिस्मिल्लाह, हृषीकेश सुलभ, शिवमूर्ति, चन्द्रकान्ता, गीतांजलि श्री, कुमार अम्बुज, वंदना राग, सविता सिंह, ममता कालिया, मृदुला गर्ग, मृणाल पाण्डे, ज्ञान चतुर्वेदी, मैत्रेयी पुष्पा, उषा उथुप, ज़ावेद अख्तर, अनामिका, नमिता गोखले, अश्विनी कुमार पंकज, अशोक कुमार पांडेय, पुष्पेश पंत, प्रभात रंजन, राकेश तिवारी, कृष्ण कल्पित, सुजाता, प्रियदर्शन, यतीन्द्र मिश्र, अल्पना मिश्र, गिरीन्द्रनाथ झा, विनीत कुमार, हिमांशु बाजपेयी, अनुराधा बेनीवाल, सुधांशु फिरदौस, व्योमेश शुक्ल, अरुण देव, प्रत्यक्षा, त्रिलोकनाथ पांडेय, कमलाकांत त्रिपाठी, आकांक्षा पारे, आलोक श्रीवास्तव, विनय कुमार, दिलीप पांडे, अदनान कफ़ील दरवेश, गौरव सोलंकी, कैलाश वानखेड़े, अनघ शर्मा, नवीन चौधरी, सोपान जोशी, अभिषेक शुक्ला, रामकुमार सिंह, अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी, तरूण भटनागर, उमेश पंत, निशान्त जैन, स्वानंद किरकिरे, सौरभ शुक्ला, प्रकृति करगेती, मनीषा कुलश्रेष्ठ, पुष्पेश पंत, मालचंद तिवाड़ी, बद्रीनारायण, मृत्युंजय, शिरीष मौर्य, अवधेश प्रीत, समर्थ वशिष्ठ, उमा शंकर चौधरी, अबरार मुल्तानी, अमित श्रीवास्तव, गिरिराज किराडू, चरण सिंह पथिक, शशिभूषण द्विवेदी, सारा राय, महुआ माजी, पुष्यमित्र, अमितेश कुमार, विक्रम नायक, अभिषेक श्रीवास्तव, प्रज्ञा रोहिणी, रेखा सेठी, अजय ब्रह्मात्मज, वीरेन्द्र सारंग, संजीव कुमार, आशुतोष कुमार, विभूति नारायण राय, चित्रा देसाई, पंकज मित्र, जितेन्द्र श्रीवास्तव, आशा प्रभात, दुष्यन्त, अनिता राकेश, आशीष त्रिपाठी, पंकज चतुर्वेदी एवं विपुल के रावल

राजकमल फेसबुक पेज से लाइव हुए कुछ ख़ास हिंदी साहित्य-प्रेमी : चिन्मयी त्रिपाठी (गायक), हरप्रीत सिंह (गायक), राजेंद्र धोड़पकर (कार्टूनिस्ट एवं पत्रकार), राजेश जोशी (पत्रकार), दारैन शाहिदी (दास्तानगो), अविनाश दास (फ़िल्म निर्देशक), रविकांत (इतिहासकार, सीएसडीएस), हिमांशु पंड्या (आलोचक/क्रिटिक), आनन्द प्रधान (मीडिया विशेषज्ञ), शिराज़ हुसैन (चित्रकार, पोस्टर आर्टिस्ट), हैदर रिज़वी, अंकिता आनंद, प्रेम मोदी, सुरेंद्र राजन, रघुवीर यादव, वाणी त्रिपाठी टिक्कू, राजशेखर. श्रेया अग्रवाल, जितेन्द्र कुमार, नेहा राय अतुल चौरसिया, मिहिर पंड्या, धर्मेन्द्र सुशांत एवं जश्न-ए-कल़म

सुमन परमार

सीनियर पब्लिशिष्ट राजकमल प्रकाशन समूह

फोन – 9540851294

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