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गीतों के मसीहा और इन्सानियत की आवाज़

जब मोहम्मद रफी साहब हम सब को छोड़ कर बहुत कम उम्र में चले गये तो लगता था हम और हमारा संगीत तन्हा हो गये हैं। ये सोच काफी अर्से तक मन खिन्न रहा कि वो कभी सशरीर दिखायी नहीं देंगे और उनके नये गीत हमें सुनने को नहीं मिलेंगें।बहुत दिनों तक संगीत से नाता टूटा सा रहा लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते गये और मन शान्त हुआ तो पाया कि रफी साहब तो कभी हम से दूर हुए ही ना थे। उनके शरीर छोड़ने के बावजूद, रफी साहब के तसव्वुरात, रूहानी आवाज़ और उनके गीत कभी हम से अलग नहीं हुए क्यूंकि वो हमारी कायनात का हिस्सा बन चुके थे।हमने अपनी आत्मा में रफी साहब को मुस्कुराते हुए पाया जो अपने गीतों की नर्म छॉव से हमें जीने का जज़्बा दे रहें थे। यकीन जानिये, एक सुकून है कि समय कैसा भी रहा, रफी साहब कभी हम से अलग नहीं हुए, हमेशा हमारे सुख­दुख में शरीक रहे, हमारे आस पास बने रहे।

सैंतीस साल के अन्तराल के बावजूद उनकी आवाज़ का जादू आज भी हमारी नस­नस में बरकरार है, फर्क है तो सिर्फ इतना कि अब नये गीतों को उनकी सुरमई आवाज़ का सहारा नहीं मिलता, सम्बल नहीं मिलता। नये गीतों के अल्फाज़, लावारिस बच्चों की तरह आज बुलन्द सहारा ढूंढते हैं पर अफसोस, उन्हें कोई मेहरबान नहीं मिलता जो उन्हें सुरों के एक महफूज़ मकाम पे पहुँचा सके। गुज़रे ज़माने का संगीत व काव्य भाग्यवान थे कि उन्हें रफी साहब की आवाज़ का साथ मिला क्यूंकि उनकी अनूठी गायन शैली से वो रचनाऐं अमर हो गई। एक मसीहा खुद रोशनी बन कर, भटके हुए मुसाफिरों को रास्ता दिखाता है, उनके दुख­दर्द मिटा कर मंज़िल तक पहुँचाता है। हर लिहाज़ से सुर­लय­ताल व शब्द की दुनिया के रफी साहब मसीहा थे जिन्होंने अपनी गायकी से करोड़ों लोगों का जीवन प्रशस्त कर उन्हें आनन्द का प्रसाद दिया ।

संगीत के सच्चे उपासक जानते हैं कि रफी साहब की गायकी का जादू आज भी सब के सिर चढ़ कर क्यूँ बोल रहा है। कारण सीधा सादा है। दुनिया में पीर­पैगम्बर या मसीहा हर रोज़ नहीं आते पर जब आते है तो अपने रहमो­कर्म से, अपनी इबादत से और अपनी सच्चाई से, लोगों के लिये मिसाल बन जाते हैं। वो जो कार्य करते हैं, उसमें हमेशा सच्चाई तथा आध्यात्म का समावेश होता है जिससे उनके सम्पर्क में आने वालों को एक आलौकि अनुभूति हो जाती है। चाहे कबीर हों या नानक, मीरा बाई रही हों या केवट, सब में एक समानता थी; वो सब सांसारिक होते हुए भी निश्छल, निषकपट, सीधे­सरल इंसान थे जिनका प्रत्येक कार्य परमात्मा के चरणों में समर्पित था। कबीर अगर जुलाहा थे तो नानक दुकानदार, मीरा गृहस्थ थीं तो केवट सिर्फ एक गरीब नाविक, लेकिन उन्होंने जो कुछ भी किया वो सम्पूर्ण भाव से किया। इसी कारण जनता­जनार्दन ने उन्हें शिरोधार्य किया और वो सब की श्रृद्धा के पात्र हो गये।उनकी कथनी और करनी की एकता के कारण उनकी वाणी लोगों के दिलों को मोह लेती थी और आत्मा में बस जाती थी।

रफी साहब का जीवन विश्लेषण करें तो हम पायेंगे कि फिल्म उद्योग की मटमैली दलदल में वो ऐसे विराट वट­वृक्ष थे जो अहंकार, लोभ या द्वेष से सर्वथा अछूता रहा। फकीरों की तबीयत वाले इस इन्सान की नेक­नीयती और दानवीरता की कहानियॉ आज भी फिल्मी दुनिया में आदर पूर्वक सुनाई जाती हैं। फूलों की पंखुड़ियों सी संवेदना वाला ये शख्स, बहुत ही ज़हीन तहज़ीब का मालिक था तथा स्नेह और मुस्कुराहट की इस विभूति का पर्याय थी इसकी मदमस्त आवाज़।

ये वो आवाज थी जिसमें ओस की बूंदो की पवित्रता के साथ­साथ वादियों से आने वाली हवा के झोंकों की रूहानी ताकत और शोखीयॉ रची बसी थीं। ईश्वर की करूणा से झंकृत इस आवाज में एक ओर जहॉ चॉदनी की बारिश थी तो वही आसमान में कड़कने वाली बिजली की थिरकन भी। हिमालय की बुलन्दी व सागर की गहराई में गुंथी इस आवाज़ की मखमली अदायगी, दिव्य अमृत्त का आर्शिवाद थी। रफी साहब ने जो कुछ गाया, पूरी तन्मयता से गाया, भाव विभोर हो कर गाया जैसे कोई संत अपना सर्वस्व न्योच्छावर कर वन्दना में लीन हो गया हो। गुणीजन जानते हैं कि रफी साहब के गीत में भाव है, प्रवाह है, पात्र है, एहसास है पर रफी खुद कहीं नहीं है। यही वजह है कि रफी साहब का गीत, गीत ना हो कर ज़िन्दगी का अफसाना बन जाता है, हरेक इन्सान का अपना निजी एहसास बन जाता है।

अमीर हो या गरीब, शहरी हो या ग्रामीण, चंचल हो या गंभीर, मज़दूर हो या बाबू, बूढ़ा हो या जवान, सैनिक हो या किसान, सभी के लिये रफी साहब की आवाज़ उपयुक्त थी क्यूंकि इसमें योगेश्वर का भाव बरसता था। स्त्री ­ पुरूष की परिधि से परे, ये आवाज कभी भी किसी एक इन्सान की न हो कर सारी कायनात की रूह की आवाज़ है, सारे मज़हबों की तासीर है, मंदिर­ मस्जिद के झगड़ों से परे यह सब के लिये परमात्मा की पहचान है। इसीलिये चाहे कोई आये या कोई जाये, संगीत जगत में गीतों के मसीहा की यह आवाज़ हमेशा तरोताज़ा रहेगी, अजर रहेगी, अमर रहेगी।

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