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अकेली रानी ने अकबर के मंसूबों पर पानी फेर दिया

महोबा नरेश की मृत्यु हो चुकी थी, जिसके बाद अकबर ने महोबा और कालिंजर पर कब्ज़ा कर लिया था। उधर महोबा नरेश की पुत्री और गोंडवाना की रानी दुर्गावती, अभी इस गम से पूर्ण रूप से उभर भी नही पाई थी, की एक 3 वर्ष के बच्चे को उसकी गोद में छोड़ उसके पति राजा दलपति शाह की भी मृत्यु विवहा के मात्र 4 साल बाद हो गई। परन्तु इस विपदा की घडी में वो हिम्मत नही हारी और उसने अपने राज्य को बहुत खूबी के साथ चलाया। और मात्र 10 साल में उसने अपने राज्य गोडवाना (आज का जबलपुर) को हर तरफ से मजूबत कर दिया।

ये देख अकबर ने अपने एक सेना पति आसफ खान को रानी दुर्गावती के राज्य पर चढ़ाई करने भेजा। उसे लगा की एक स्त्री ज्यादा समय नही टिक पायेगी। पर युद्ध के मैदान में रानी दुर्गावती को सैनिको की वेशभूषा में देखा, तो आसफ खान, चकित रह गया। युद्ध भयानक था, रानी की तलवार के मुगलिया सेना को काट कर रख दिया, बड़ी मुश्किल से जान बचा कर आसफ खान अकबर के पास पहुँचा। ये देख अकबर खुद घबरा गया और करीब 1.5 साल बाद फिर एक विशाल सेना के साथ, उसने रानी दुर्गावती के राज्य पर हमला कर दिया। इस बार मुगलिया सेना तोपों के साथ आई थी। पर रानी की धारदार तलवार ने तोपचियों के सर कलम कर के रख दिए। और एक बार फिर, आसफ खान, अपनी हारी हुई शक्ल लेकर भाग खड़ा हुआ।

इस जीत का जश्न सारे गोडवाना में मनाया गया, रानी जिस वक़्त इस जश्न को मानते हुए, अपनी प्रजा के साथ थी, दुर्गावती के एक सेनापति, ने गद्दारी कर इसकी खबर असाफ खान को देदी। फिर अकबर की सेना ने फिर से गोडवाना पर आक्रमण कर दिया। जिसका मुकाबला करने के लिए रानी का 15 वर्षीया पुत्र वीर नारायण एक सेना की टुकड़ी लेकर निकल पड़ा। और दूसरी टुकड़ी के साथ रानी दुर्गावती, खुद। इस युद्ध में रानी का पुत्र बुरी तरह घायल हो गया, जिसे सैनिक एक सुरक्षित स्थान पर ले गए। और रानी को सन्देश भेजा गया की, उनका पुत्र अब कुछ ही पल का मेहमान है, एक बार उसके अंतिम दर्शन कर ले। पर रानी ने कहा की “मैं अपने पुत्र को देवलोक में ही मिल लुंगी” अभी अपनी मात्रभूमि का ऋण चूका लूँ। और इतना कहते ही रानी की तलवार ने अपनी गति बढ़ा दी, जिस से , मुगलिया सैनिको के सर धड से पत्तो की तरह गिरने लगे।
और तभी एक तीर रानी की आँख में आकर लगा और दूसरा गर्दन में, ये देख रानी समझ गई, की अगर जीवित अकबर के सैनिको ने गिरफ्तार किया तो अच्छा नही होगा, इसलिए अपनी अस्मत को बचने के लिए, रानी ने अपना खंजर आपने सीने में दाग लिया।

24 जून 1564 को रानी दुर्गावती ने अंतिम साँस ली।

उनकी पुण्यतिथि पर नमन रहेगा इस वीरांगना रानी दुर्गावती को, जिसने मातृभूमि की रक्षा के लिए, अपना जीवन तक त्याग दिया।

साभार- सोशल मीडिया से



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