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हरिवंश जी का सवाल- क्षेत्रीय अख़बारों का यह ताक़तवर हथियार कैसे जंग खा गया?

दिल्ली में प्रेस क्लब के ऑडिटोरियम में शुक्रवार की शाम अरसे तक याद रहेगी। भाई हरीश पाठक का एक दशक से चल रहा शोध एक ग्रन्थ की शक़्ल में हम सबके सामने आ गया। आंचलिक पत्रकारिता और राष्ट्रीय पत्रकारिता के अंतर्संबंध को रेखांकित करने वाली पहली पुस्तक। हरीश भाई के जज़्बे को सलाम कि उन्होंने आधी सदी के दरम्यान आंचलिक और प्रादेशिक पत्रकारिता की अनेक प्रतिनिधि कथाओं को स्थान दिया। ये समाचार कथाएं हिन्दुस्तान की ज़मीन से निकलीं और राष्ट्रीय सरोकारों में शामिल हो गईं।

हरीश इनके बारे में लिखते हैं, ‘भूमंडलीकरण, उदारीकरण और बाज़ारवाद के इस महा दौर में आंचलिक पत्रकारिता से जुड़े बड़े सवाल इस शोध की आधारभूमि हैं। इन्हें हल करने की तत्परता सब तरफ से दिखनी चाहिए। सवाल उठाने भर से कोई भूमिका ख़त्म नहीं हो जाती। वह शुरू होती है उस क्षण से, जब ये सवाल उभरते, उफ़नते और उबलते हैं। जो उत्तर इन उफनते सवालों के मिले हैं, वे मेरी संतुष्टि का कारण हो सकते हैं, पर मेरी यात्रा का अंतिम सच नहीं’। क्या बात है हरीश भाई! सब कुछ कह दिया। इसी वजह से आप सत्य के प्रतिनिधि हैं। संदर्भ के तौर पर बता दूं कि यह किताब राजेन्द्र माथुर शोध परियोजना के तहत आई है ।

बहरहाल, समारोह में जिन कथाओं का ज़िक्र है, उनमें से दो का संबंध मेरे सफ़रनामे से भी है। इस कारण मुझे तो वहां होना ही था। इसके अलावा रायपुर के आसिफ़ इक़बाल, जम्मू की स्मिता मिश्रा और पंजाब से रंजू बेरी से मिलना सुखद अनुभव रहा। यहां अपनी ज़िंदगी से जुड़े दो वाक्यों का ज़िक्र सिर्फ कुछ पंक्तियों में। एक बलात्कार के विरोध में प्रदर्शन पर पुलिस ने गोली चलाई। इसकी मजिस्ट्रेटी जांच हुई। रिपोर्ट गोपनीय थी। इसमें माना गया था कि पुलिस और प्रशासन की ग़लती थी। कलेक्टर आरोपियों को बचाना चाहते थे। हम पत्रकारों को रिपोर्ट की गोपनीय प्रति मिल गई। तय हुआ कि स्थानीय दैनिक ‘शुभभारत’ में रिपोर्ट छपेगी। संपादक श्यामकिशोर अग्रवाल के समर्थन से साथी शिव अनुराग पटेरिया ने अनेक किस्तों में रिपोर्ट छापी। इससे कलेक्टर बौखला गए।

इसके बाद हम लोगों का दमन शुरू हो गया। अंगरेज़ी हुकूमत की तरह प्रशासन हमारे साथ बरताव करने लगा। हम लोग यानी शहर के सारे पत्रकारों का दल-सुरेंद्र अग्रवाल, जगदीश तिवारी, अजय दोसाज, विभूति शर्मा, श्याम अग्रवाल, शिव अनुराग (कुछ और भी साथी थे। नाम रह गए हों तो माफ़ करिएगा) उनतालीस साल पहले भोपाल की सड़कों पर कई दिन भटके। एक-दो दिन तो पेट भरने के लिए भी पैसे न बचे थे। आंचलिक पत्रकार संघ के संयोजक श्री विजयदत्त श्रीधर हमारे लिए फ़रिश्ते की तरह आए, जबकि बड़े-बड़े पत्रकार सरकार-प्रशासन से रार नहीं ठानने का सुझाव दे रहे थे। श्रीधर जी के प्रयासों से ही विधान सभा में सात-आठ घंटे इस मामले पर बहस चली। मुख्यमंत्री को ज्यूडीशियल इंक्वायरी का ऐलान करना पड़ा। भारत की आज़ादी के बाद यह अब तक पहला और संभवतः आख़िरी मामला है, जिसमें जांच आयोग ने हमारे सभी आरोप सच माने। इसके अलावा प्रेस काउंसिल ने भी इस मामले की जांच कराई। उसमें भी हम लोगों को न्याय मिला। हम जीते। फिर भी सरकार कमबख़्त कलेक्टर को बचा ले गई।

इस मामले में महान संपादक राजेंद्र माथुर और उन दिनों ‘रविवार’ के संपादक एसपी सिंह ने बेहद मदद की। मेरी ज़िन्दगी की दिशा मुड़ गई। आज जो भी आपके सामने हूं-इसी कांड की बदौलत हूं। दूसरा मामला 1991 का है। मुल्क़ के बड़े जुझारू श्रमिक नेता शंकरगुहा नियोगी की ह्त्या हुई। मैंने सप्रमाण अपनी समाचार कथा अपने अख़बार में प्रकाशित की। मैं उसका विशेष संवाददाता/समाचार संपादक था। इससे ख़लबली मच गई। मैंने हत्या के सभी आरोपियों को उजागर किया था। अख़बार के संपादक पूंजीपतियों के हाथों बिक गए। वे जीते, मैं हार गया। हालांकि बरसों बाद मेरी समाचार कथा अक्षरशः सत्य साबित हुई। फिर भी उस समय तो आठ अक्टूबर, 1991 की मनहूस सुबह 9 बजकर बीस मिनट पर अख़बार मालिक को अपना इस्तीफ़ा मुझे सौंपना पड़ा। वे खंडन छापने का दबाव डाल रहे थे। मुझसे माफ़ीनामा लिख कर देने को कहा जा रहा था। संघर्ष के वे दिन कैसे भूलूं, जब 400 रूपए का टेलिफोन बिल नहीं चुका पाने के कारण कनेक्शन काट दिया गया था। संघर्ष की ये दो कहानियां एकदम फ़िल्मी हैं और मेरी ज़िंदगी में हर पल नए नाटकीय दृश्य के साथ उपस्थित होते रहे।

लौटता हूं हरीश भाई के ग्रन्थ के लोकार्पण पर। आयोजन में रविवार के दिनों के साथी वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश बतौर ख़ास मेहमान थे। वे इन दिनों राज्य सभा के उप सभापति थे। अपनी बिरादरी में पहुंचते ही उनकी आँखों में चमक आ जाती है। हम सब लोगों ने इसे महसूस किया। हरिवंश जी ने ‘रविवार’, ‘धर्मयुग’, ‘नई दुनिया’ और ‘प्रभात ख़बर’ की पत्रकारिता का उल्लेख किया। उनका सवाल था कि क्षेत्रीय अख़बारों का यह ताक़तवर हथियार कैसे जंग खा गया? भाषाई पत्रकारिता की असली ताकत तो उनके मुद्दे थे, जो समय-समय पर हमें झकझोरते रहे।

हरिवंश जी भी राजेन्द्र माथुर से प्रेरित रहे। उन्होंने कहा,‘अच्छे अख़बार के लिए आज पाठक भी ख़र्च करना चाहते हैं। हज़ारों करोड़ रुपए सरकार के खजाने से निकलते हैं, पर समाज के काम नहीं आते। अखबारों की आर्थिक सोच और दबाव से पत्रकारिता चरमरा गई। आर्थिक उदारीकरण में पूंजी और तकनीक प्रभावी हो गए। विचारधारा हाशिए पर चली गई। गांधी के रास्ते पर होते तो आज पत्रकारिता संकट का सामना नहीं करती। इन दिनों हर कीमत पर मुनाफ़ा ज़रूरी हो गया है। पूंजी ने सारा गणित बिगाड़ दिया है। अब मिलकर काम करने की आवश्यकता है। गांधी की आर्थिक सोच पर काम होना चाहिए।‘ वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा, ‘क्षेत्रीय पत्रकारिता को ही वैकल्पिक पत्रकारिता माना जाए। राजेन्द्र माथुर जैसे विचार पुंज आज नहीं हैं। यह चिंता की बात है। हिंदी पत्रकारों पर आरोप लगता है कि हम भावना प्रधान होते हैं। तथ्यपरक कम होते हैं। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।‘

इंदिरा गांधी कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय और वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी भाषा के लिए दिल की गहराइयों से प्रयास करने वाले राहुल देव भी इसमें मौजूद थे। उन्होंने भी आंचलिक पत्रकारिता का हौसला बढ़ाने पर ज़ोर दिया। हमारी पीढ़ी के लिए प्रेरणापुंज पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने आज की पत्रकारिता का समग्र विश्लेषण किया। उन्होंने कहा, ‘टिमटिमाता दीया है। रौशनी के प्रयास जारी हैं। आज़ादी के बाद सभी भाषाओं की पत्रकारिता पर सप्रे संग्रहालय में काम हो, इस पर विचार करेंगे। उन्होंने बताया कि आज समाचारपत्र का वर्गीकरण इस आधार पर होगा कि एक तरफ़ बाज़ार है दूसरी तरफ आदर्श और सरोकार हैं। सौ बरस पहले भी इंडिया और भारत का अंतर था। आज भी वही है। बाज़ार की जकड़न बढ़ी है। मीडिया मानसिक गुलामी से ग्रस्त है। उन्माद का शिकार है। किसान मीडिया में नहीं है। गांव उसमें नहीं हैं। सामाजिक सरोकार गायब हैं। अखबार न प्रोडक्ट है न उसे साबुन की तरह बेच सकते हैं। आज उन्माद का माहौल है। इससे बचें। मानसिक गुलामी से बचें। भाषा के कॉकटेल से बचें। उन्होंने उमा भारती की शादी की ग़लत ख़बर दिखाने का उदाहरण बताया। बाद में उस चैनल को किस तरह लगातार माफीनामा दिखाना पड़ा था। साथी पत्रकार डॉक्टर राकेश पाठक का संचालन चमत्कृत करने वाला था। इस आयोजन के बहाने श्रीमती कमलेश पाठक से करीब तीस-पैंतीस बरस बाद मिलने का अवसर मिला। कमलेश और मैं बीएससी में साथ पढ़ते थे। इन दिनों वे मुंबई आकाशवाणी में अपनी स्वर लहरी बिखेरती हैं। हरीश पाठक जी की अर्धांगिनी हैं।

राजेश बादल वरिष्ठ पत्रकार हैं और राज्यसबा टीवी के सीईओ रह चुके हैं

साभार http://www.samachar4media.com से



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