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1857 की क्रांति को जन-जन तक इन साहित्यकारों ने पहुँचाया

1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की विफलता के कारण कुछ भी रहे हों, लेकिन अंग्रेज शासक उस क्रांति से बौखला उठे थे। इस बौखलाहट का ही नतीजा था कि उन्होंने देशवासियों पर इतने जुल्म ढाए कि हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग एक दशक तक सन्नाटा छाया रहा। एक पुस्तक जो अंग्रेज सरकार की ओर से प्रकाशित हुई है, उसमें 1857 के स्वाधीनता संग्राम की बाबत दर्ज है, ‘सड़कों के चौरस्तों और बाजारों में जो लाशें टंगी हुई थीं, उनको उतारने में सूर्योदय से सूर्यास्त तक मुर्दे ढोने वाली आठ-आठ गाड़ियां तीन-तीन महीने तक लगी रहीं और इस प्रकार एक स्थान पर छह हजार मनुष्यों को झटपट खत्म करके परलोक भेज दिया गया। बूढ़े आदमियों ने हमें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था, असहाय स्त्रियों से जिनकी गोद में दूध पीते बच्चे थे, हमने उसी तरह बदला लिया जिस तरह से बुरे से बुरे आदमियों से।’

महाकवि गालिब ने क्रांति के बाद दिल्ली की तबाही और बर्बादी का हाल चन्देक खतों में यूं दर्ज किया है,
‘दिल्ली की बस्ती मुन्हसिर कई हंगामों पर थी। (लाल) किला, हररोज मजमा जामा मस्जिद का,
हर हफ्ता सैर जमना के पुल की, हर साल मेला फूल वालों का।

ये पांचों बातें अब नहीं। …दिल्ली वल्लाह अब शहर नहीं है। कैम्प है। न किला है, न शहर, न बाजार, न नहर।’

1857 के संग्राम का हमारी लोक-संस्कृति पर जो असर पड़ा, उसकी एक झलक हम अमृतलाल नागर की अमरकृति ‘गदर के फूल’ में देख सकते हैं। साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में वैसे तो राष्ट्रीय मुक्ति की प्रतिध्वनि 1857 के दौरान ही ‘पयाम-ए-आबादी’ और ‘सुधावर्षण’ आदि पर्चों में दर्ज होने लगी थी। लेकिन हिंदी में उस आकांक्षा की पहली अभिव्यक्ति भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट आदि की रचनाओं और ‘ब्राह्मण’, ‘हिंदी प्रदीप’ में दो-तीन दशक बाद ही दिखाई दी।

भारतेंदु हरिश्चंद्र एक युगान्तकारी व्यक्तित्व के साथ हिंदी के साहित्यिक क्षितिज पर उदित हुए। उन्होंने मात्र 17 वर्ष की अल्पायु में 15 अगस्त, 1867 को काशी से एक काव्य-पत्रिका ‘कविवचन सुधा’ का प्रकाशन शुरू किया। ‘भारत दुर्दशा’ भारतेंदु जी की एक अमर कविता है, जिसमें उन्होंने तत्कालीन भारत की वास्तविक एवं सामाजिक स्थिति का खूब सच्चा और खरा चित्रण किया है :-
अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी।
पै धन विदेश चलि जात इ है अतिख्वारी।
भारतेंदु जी ने ‘कवि वचन सुधा’ के अलावा ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ (1873) ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ (1874) तथा ‘बालबोधिनी’ का भी संपादन किया। ‘अंधेर नगरी चौपट राज’ भारतेंदु जी का प्रसिद्ध नाटक है, जो अंग्रेज राज की दुर्दशा का व्यंग्यात्मक चित्र उपस्थित करके स्वाधीनता का आह्वान करता है। पं. सुंदरलाल के ‘कर्मयोगी’, कृष्णकांत मालवीय के ‘अभ्युदय’ और गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रभा’ आदि पत्रों ने इस परंपरा को समृद्ध और संपन्न किया। इसी सिलसिले में आगे चलकर इलाहाबाद के मासिक पत्र ‘चांद’, कलकत्ता के ‘हिंदू पंच’ और गोरखपुर के ‘स्वदेश’ के नाम भी जुड़े। इसके बाद ‘चांद’ और ‘हिंदू पंच’ के अत्यत चर्चित विशेषांक ‘फांसी अंक’ (1928) और ‘बलिदान अंक’ (1930) अंक प्रकाशित हुए।

‘चांद’ के ऐतिहासिक महत्व के ‘फांसी अंक’ (1928) का संपादन आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने किया था। विश्वंभरनाथ कौशिक की ‘फांसी’, आचार्य चतुरसेन की ‘फंदा’, पांडेय बेचन शर्मा उग्र की ‘जल्लाद’ आदि कालजयी कहानियां इसी अंक में छपी थीं। रामचरित उपाध्याय की कविता ‘प्राणदंड’, प्रभात की कविता ‘शहीद’ रसिकेश की कविता ‘डायर’ तथा एक राष्ट्रीय आत्मा की कविता ‘फांसी’ जैसी उस युग की बहुचर्चित कविताएं इसी अंक में प्रकाशित हुई थीं। 1857 के स्वाधीनता संग्राम के दौरान तथा उसके बाद अंग्रेजों ने दिल्ली तथा देश के विभिन्न हिस्सों में जो कहर बरपा किया, उसे उद्घाटित करने वाले कई सचित्र लेख ‘चांद’ के फांसी अंक में हैं। ‘चांद’ का फांसी-अंक प्रकाशित होते ही जब्त कर लिया गया। 1928 में ही आगरा से निकलने वाली पत्रिका ‘सैनिक’ तथा कानपुर से निकलने वाली ‘क्रांति’ पत्रिका के सितंबर और अक्तूबर 1939 को दो अंक भी जब्त हुए।

यहां यह बात गौरतलब है कि ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों का जबरदस्त विरोध करने वाली प्रतिबंधित हिंदी साहित्य की एक पूरी परंपरा हमारे यहां मौजूद है, जिसमें प्रेमचंद का ‘सोजेवतन’ पहला कहानी-संग्रह, पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का कहानी-संग्रह ‘चिंगारियां (1924),’ ऋषभचरण जैन का कहानी-संग्रह ‘हड़ताल’ (1932) और मुनीश्वर दत्त अवस्थी का ‘बागी की बेटी’ कहानी-संग्रह प्रतिबंधित हुए। हिंदी में ब्रजेन्द्रनाथ गौड़ का ‘पैरोल पर’ और ऋषभचरण जैन का ‘गदर’ जैसे उपन्यास भी प्रतिबंधित हुए। जाने-पहचाने कवियों में केवल हरिकृष्ण प्रेमी की काव्य-नाटिका ‘स्वर्ण विद्वान’ ही प्रतिबंधित हुई। ‘क्रांति गीतांजलि-भाग 2’ भी प्रतिबंधित हुई, जिसमें माखनलाल चतुर्वेदी की प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से छपी थी। माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ और श्याम नारायण पांडेय ने न केवल अपनी कविताओं में राष्ट्रीय भावना को व्यक्त किया, बल्कि स्वयं भी स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया। प्रसाद, निराला और दिनकर आदि तथा अन्य कवियों की कविताओं में भी राष्ट्रीय भावना का उत्कर्ष दिखाई देता है। सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी थी’ अंग्रेजी हुकूमत ने जब्त कर ली थी। श्यामलाल पार्षद द्वारा रचित कविता ‘कौमी झंडा’ भी प्रतिबंधित हुई, जिसकी तान राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व होम करने वाले राष्ट्रभक्तों के होंठों पर रहा करती थी :-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर केंद्रित जितना साहित्य हिंदी में लिखा गया, वह स्वयं में एक मिसाल ही है। 1857 पर हिंदी में संभवत: सर्वाधिक चर्चित और प्रामाणिक किताब डॉ. रामविलास शर्मा की ‘सन‍् सत्तावन की राज्यक्रांति और मार्क्सवाद’ है, जो अपने संशोधित रूप में 1990 में प्रकाशित हुई थी। पं. सुंदरलाल की ‘भारत में अंग्रेजी राज (तीन खंड)’ भी एक प्रामाणिक पुस्तक है जिस पर अंग्रेजों ने पाबंदी लगा दी थी। वृंदावन लाल वर्मा कृत ‘झांसी की रानी’ के अतिरिक्त राही मासूम रज़ा कृत काव्य ‘क्रांति कथा’ व कमलापति त्रिपाठी कृत उपन्यास ‘पाहीघर’ व ‘बेदखल’ के साथ-साथ भगत सिंह के साथी डॉ. भगवान दास माहौर का शोध प्रबंध ‘1857 के स्वाधीनता संग्राम का हिंदी साहित्य पर प्रभाव’ उल्लेखनीय हैं।

समग्रत: 1857 के स्वाधीनता संग्राम का हिंदी साहित्य पर प्रभूत मात्रा में प्रभाव पड़ा है। यह साहित्य हमारी अनमोल विरासत भी है और धरोहर भी। आवश्यकता एक अभिलेखागार बनाकर इसे सुरक्षित रखने की है।

साभार – http://dainiktribuneonline.com/ से



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