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मलबे में दबी तीन सौ साल पहले की पेशवाई काष्ठ कला जीवंत हो रही है

पेशवाओं ने 104 साल के शासनकाल (सन 1714 से 1818) के दौरान देश को बहुत कुछ ऐसा दिया जो आज हमारी थाती है। उन्हीं थातियों में से एक है गंगा किनारे स्थित बालाजी का मंदिर जिसे उसके मूल रूप में बचाने की पुरजोर कोशिश इंटैक की स्थानीय इकाई कर रही है। उन्हीं कोशिशों की कड़ी में तीन सौ साल से अधिक पुराने काष्ठ कला के अद्वितीय नमूनों को संजोया जा रहा है।

नेपाली साखू की लकड़ी से बने खंभे चौदह वर्ष से अधिक समय तक मलबे में दबे रहने के बाद एक बार फिर दर्शनीय हो गए हैं। इसके लिए कुशल कारीगरों की टीम ने मुन्ना जायसवाल के नेतृत्व में पांच साल से अधिक समय तक कड़ी मेहनत की है। फिलहाल इन नमूनों को नट-बोल्ट के सहारे कसकर अस्थाई रूप से बालाजी मंदिर की छत पर रेलिंग की तरह लगा दिया गया है। इस रेलिंग में कुल 13 खम्भे और 14 खिड़कियां हैं। इन खिड़कियों को भी मलबे से निकाली गई लकड़ियों से तैयार किया गया है।

इंटैक के सूत्रों के अनुसार काष्ठ कला के अद्भुत नमूनों को स्थाई रूप से संरक्षित करने के लिए भी परमिशन का पेंच फंसा है। वाराणसी विकास प्राधिकरण और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की अनुमति के बिना इसे स्थाई रूप से नहीं लगाया जा सकता। प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटर अजय रतन बनर्जी का कहना है कि हम अपने स्तर जो कुछ भी कर सकते हैं कर रहे हैं। यदि हमें समय से परमिशन मिल गई होती तो हम इस समय अगले चरण की कार्ययोजना पर काम कर रहे होते।

1998 से 2012 तक दबे थे मलबे में
सन 1998 में कार्तिक माह महोत्सव के दौरान एक रात बालाजी मंदिर पूर्वी हिस्सा ध्वस्त हो गया था। इस हादसे के बाद घाट पर गिरा कुछ मलबा तो अविलंब हटवा दिया गया लेकिन मंदिर के ऊपरी हिस्से का मलबा 2012 तक पड़ा रहा। 2012 में इंटैक ने इस मंदिर के मूल रूप में जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी लेने के बाद पहले दो वर्षों में सावधानी पूर्वक मलबा हटाया। उनमें दबे लकड़ी के नक्काशीदार खंभों को अलग किया गया। उनके बुरी तरह जर्जर हो चुके हिस्सों को अलग कर उन्हें पुन: इस्तेमाल के योग्य बनवाया गया।

पेशवाओं ने बनवाया था रंग महल
वर्तमान बालाजी मंदिर का मूल निर्माण पेशवाओं ने रंगमहल के रूप में वर्ष 1787 से 1795 के बीच कराया गया। इस रंगमहल का अधिकत हिस्सा लकड़ियों से बना था। खिड़की, दरवाजे, धरन और खंभे ही नहीं बल्कि सीढ़ियां तक लकड़ी की थीं। इस रंगमहल में 365 खिड़की और दरवाजे थे। 1857 की गदर के बाद पेशवाओं ने इस रंगमहल को नीलाम कर दिया। नीलामी में इसे ग्वालियर स्टेट की शिंदे सरकार ने खरीद लिया।

ग्वालियर स्टेट ने दिया मंदिर का स्वरूप
ईश्वरीय प्रेरणा से कालांतर में शिंदे सरकार ने इसे बालाजी मंदिर के रूप में परिवर्तित कर दिया। कहते हैं उन्हें स्वप्न में बालाजी ने मंदिर बनवाने और स्वयं के काशी में गंगा किनारे पीपल के पेड़ के नीचे होने का संकेत दिया था। उन्होंने अपने अधिकारियों को भेजा। स्वप्न की बात सच होने की पुष्टि होने पर उन्होंने अविलंब इस रंग महल को आवश्यक परिवर्तनों के साथ बालाजी का मंदिर बनवा दिया।

साभार- https://www.livehindustan.com/ से

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