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हमारी शिक्षा हमें कहाँ ले जा रही है?

इस विषय के विभिन्न पहलुओं पर विचार करना चाहे तो बहुत अधिक विस्तार के साथ इसमें बातें हो सकती ही विषय बहुत ही समयपरक व समस्या मूलक है ऐसा प्रतीत होता है।।

शिक्षा व्यक्ति को एक संयमित सुगढ व्यक्तित्व के निर्माण मे सहायक होने के साथ ही व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक स्वरूप के अन्तर्गत परिवार की जिम्मेदारी को वहन करने की क्षमता के अनुरूप ढालने मे सहायता प्रदान करते हुए .समाज मे अन्य लोगों के साथ समन्वय निर्धारण का अतिआश्यक मूलमंत्र भी देता है।शिक्षित होने की जिम्मेदारी अशिक्षित लोगों की तुलना मे हमेशा बहुत अधिक होती है।’

शिक्षा प्राप्त करने की आवश्यकता का आगमन ही मानव की मानवता का आगमन भी होता है, यही उसकी उन्नति की शुरुआत होती है।

व्यक्तिगत रुप से हमारे देश मे आज की स्थिति मे आजादी के आठवें दशक मे भी हमने शिक्षा के उस स्तर को हर क्षेत्रों मे पूरी तरह नहीं पाया है..जरूर कुछ क्षेत्र विश्व मे हमारे आगे कुछ भी नहीं। जिसके कारण युवा पीढी अपनी उच्च आकांक्षाओं व महत्वाकांक्षाओं को अपने देश मे रहकर स्पर्श न कर पाने के भय से ग्रसित तो है।रास्ते भी तलाश रहे है..पर कुछ न हो पाने की स्थिति में मजबूर होकर उन्हें विदेश का रुख करना पडता है। यही से इस यात्रा की शुरुआत होती है।

सामाजिक स्वरूप मे .कुछ बच्चों के माता पिता विदेशों मे जाकर बस जाते है और बच्चों के लालन पालन व उनकी प्रारंभिक शिक्षा के लिए अपने बुढे माता पिता के पास छोडकर चले जाते हैं, उस दौरान उनका लगातार संपर्क भी रहता है । फिर बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए अपने पास लेकर चले जाते है। इसी क्रम मे कुछ घनाड्य परिवार जो अपने बच्चों को विदेश मे ही उच्च शिक्षा का मनसूबा बना कर जीते है, जीवन के नये स्वरूप मे ढलने के बाद ये बच्चे वापस आने से डरते ही नहीं वरण अगली पीढी को भी नहीं भेजना चाहते।।अपवाद भी है,पर इनसे कभी संसार नहीं बनता।।

प्रश्न विदेश जाने का हमारे भारतीय परिवार के परिवेश मे कई बार हलचल मचा देता है। हमारी शिक्षा का सही माप-दण्ड हमारे देश मे नहीं होता साथ ही प्रगति के रास्ते भी दिखाई नहीं देत इसके कारण जो भी रहे हो ..ये तर्क हर शिक्षित युवा जो विदेश मे बस गया है..और उसका लाभ उस देश को मिलता है। नये वातावरण सारी सुख सुविधाओं से सुसज्जित जीवन के अभयस्त होने लगते है..परिणामस्वरूप वे अपने पालकों को आर्थिक रूप से बेहतर जीवन देने मे सक्षम तो होते है, पर अपनी उपस्थिति नहीं दे पाते.।।

इस तरह परिवार के व आस पडोस के वातावरण मे भी उनके प्रति लगाव कम होने लगता है..सगे संबंधी मे भी डर व्यापत हो जाता है।उनके बच्चों के प्रति ..ऐसी स्थिति मे भी बहुत ही अलग भयानक परिस्थितियों के निर्माण के आसार पनपते है।।

इसके साथ सभी के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण हमारे देश मे हो जाए तो ये विध्या पलायन शिक्षित युवा क्यों करेगा प्रश्न जितना सरल है। हमारे देश की लगभग 140 करोड आबादी के लिए उतना कठिन भी है। प्रकृतिक संसाधनों के लगातार हो रहे दोहन से वर्तमान मे जो स्थिति निर्मित होती जा रही सभी इससे अवगत है।।वर्तमान व्यवस्था मे सुअवसर विगत कठिन वर्षों मे हमनें अनुभव किया है।।अगर हम हमारी आबादी मे उपस्थित युवाओं को काम मे लगा दे तो हमारे देश मे खेती के उत्पादन को छोड़कर अन्य सभी कल कारखानों आदि के उत्पादन की अधिकतम क्षमता को भी पाने मे हमे मात्र एक वर्ष से ज्यादा का समय नहीं लगेगा पर हमारे कल कारखानो मे इतना भार वहन करने की क्षमता नहीं है।।आज परिवार का एक व्यक्ति/सदस्य औसतन पाँच से छः सदस्यों का भरण पोषण कर रहा है..कहीं कहीं ये आठ से दस सदस्यों तक भी है, यह हमारी वर्तमान दशा के आँकड़े है।

हमारी आवश्यकताएँ हमारे देश मे ही पूरा होना क्या संभव है,रोजगार रोटी का प्रश्न है।सांस लेते हुए जीने का प्रश्न है ।अन्य देशों के संसाधन का उपयोग हम कर रहे है,यह एक आदान प्रदान है.। पलायन नहीं होना चाहिए इसके कई विचारणीय पहलू तो है पर क्या हम इसे रोक पाने मे सक्षम है।।केवल इसे हमारी भारतीय संस्कृति संस्कार के दायरे मे रख कर मत तौले परिवार के बुजुर्गो के साथ या साथ रख लेने से बात समस्या का हल नहीं, नयी पीढी को नये मूल्यों के साथ जीना भी होता है.।।

अगर हमारी युवा बेरोजगारी की अवस्था व अशिक्षा की अवस्था मे हमारे देश मे रह जाए तो .निर्माण की स्थिरता की जगह एक अस्थिरता का वातावरण अस्तित्व मे आने लगेगा क्या हम ये चाहेंगे?कदाचित नहीं।

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