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लोकसेवा परीक्षाओँ में भारतीय भाषाओं के अभ्यर्थियों के साथ अन्याय क्यों?

संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के आधुनिकीकरण की आड़ में यूपीपीएससी अध्यक्ष प्रभात कुमार प्रक्रियाओं से छेड़छाड़ कर अंग्रेजी माध्यम के छात्रों को बेजा लाभ पहुंचा रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूपीपीएससी में फार्म भरते समय यूपीएससी की तरह फॉर्म में माध्यम भरने का कोई विकल्प नहीं होत। इसका परिणाम यह होता है कि एक ही मूल्यांकनकर्ता दोनों माध्यमों की कॉपियां चेक करता है। हमारे देश में अंग्रेजी भाषा के बजाय बौद्धिकता का पर्याय बन गई है। अंग्रेजी के आकर्षण से अभिभूत मूल्यांकनकर्ता हिंदी भाषा के साथ न्याय नहीं कर पाते। जबकि दूसरी तरफ मूल प्रश्न पत्र अंग्रेजी में बनाया जाता है, जिसका हिंदी या वर्नाकुलर भाषाओं में अनुवाद बेहद अप्रचलित व क्लिष्ट शब्दों में किया जाता है।

हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों को प्रश्नों को समझने में समस्याएँ आती हैं। इस भेदभाव का परिणाम यह है कि क्षेत्रीय भाषाओं से सिविल सेवा/ लोक सेवाओ की परीक्षा देने वाले अभ्यार्थियों की संख्या निरंतर प्रशासन में कम होती जा रही है। इससे प्रशासन का भाषाई व क्षेत्रीय समावेशी चरित्र बिगड़ रहा है। भारत की जनसंख्या में शहरी जनसंख्या 32% है। शहरी क्षेत्रों में ही अधिकतर पब्लिक स्कूल है जहा पर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाती है ।जबकि ग्रामीण जनसंख्या 67.7% है जहां शिक्षा का मुख्य माध्यम हिंदी या वर्नाकुलर भाषाएँ है। भारत की अधिकतर जनसंख्या की शिक्षा दीक्षा इन्हीं भाषाओं में होती है। इससे भेदभाव आधारित प्रणाली का जन्म हो रहा है जो निकट भविष्य में भारतीय प्रशासन के समक्ष अनेक चुनौतियां पैदा कर सकती है।

भारत में प्रशासनिक सेवा काडर आधारित है जिसमें तमिलनाडु या कर्नाटक का कोई व्यक्ति उत्तर भारत या पूर्वोत्तर में जिले में प्रशासन के महत्वपूर्ण पद धारण करता है। उसके सहयोग के लिए प्रदेश लोक सेवा आयोग के अधिकारी होते हैं, जिन्हें स्थानीय परंपरा एवं भाषा का ज्ञान होता हैं। अतः प्रशासन संचालन में बाधा नहीं आती। परंतु वर्तमान समय में प्रशासन का समावेशी चरित्र बिगड़ता जा रहा है। निरंतर यूपीएससी एवं राज्य लोक सेवा आयोगों द्वारा पूर्वाग्रह से युक्त होकर केवल अंग्रेजी माध्यम के अभ्यर्थियों का चयन किया जा रहा है। जबकि प्रशासन के अधिकारी के रूप में उनका सामना यहां की 67% जनसंख्या से तथा उनके मुद्दों से होता है। अलग पृष्ठभूमि तथा भाषा होने के कारण दोनों में संवाद नहीं बन पाता। जिससे प्रशासन को नई-नई समस्याओं से जूझना पड़ता है। आज भारत संचार क्रांति युग में जी रहा है। जहाँ विभिन्न सोशल मीडिया माध्यमों पर जाति, क्षेत्र एवं धार्मिक ग्रुप सक्रिय है। संसाधनों पर नियंत्रण व अस्मिता की रक्षा के लिए ऐसे ग्रुप कानून तथा नैतिकता की किसी सीमा को स्वीकार नहीं करते ।

भारत में सोशल मीडिया पर नियंत्रण और जागरूकता की कमी है। ऐसे में छोटे-छोटे मुद्दे विस्फोटक रूप धारण कर लेते हैं, चाहे वह मोबलिंचिग हो या जानबूझ कर घृणा फैलाने की की गई कोशिश। प्रशासनिक अधिकारी इन मुद्दों से निपटने जाते हैं तो भाषा एवं स्थानीय परंपराएँ प्रशासन एवं हितधारकों के बीच संवाद कायम करने में बाधा उत्पन्न करती है। ऐसे में आवश्यकता है प्रशासन की भाषायी प्रवृत्ति को मजबूत किया जाए। इसमें सबसे बड़ी बाधा जागरूकता एवं तथ्यों का अभाव है। यदि प्रदेश लोक सेवा आयोगों में भी फार्म में माध्यम भरने का विकल्प होगा तो इसके दो लाभ होंगे। पहला यह कि क्षेत्रीय भाषाओं की कॉपियों को क्षेत्रीय भाषा के मूल्यांकनकर्ता से चेक कराया जाएगा तथा परीक्षा परिणाम के बाद विभिन्न लोक सेवा आयोग के पास यह तथ्य होंगे कि किस किस भाषा के अभ्यर्थियों का अंतिम चयन में प्रतिशत कितना रहा। तत्पश्चात सूचना के माध्यम से ऐसे तथ्यों को समाज के सामने लाया जा सकता है तथा इसे बौद्धिक विमर्श का केंद्र बना कर सरकारी नीतियाँ एवं भाषाई भेदभाव के प्रति जागरूकता उत्पन्न की जा सकती है तथा नई शिक्षा नीति में वर्नाकुलर भाषाओं में अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के सरकारी प्रयासों के परिणाम का मूल्यांकन किया जा सकता है।

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा निरंतर सुधार के नाम पर किए जा रहे बदलाव की आड़ में व्याप्त अनियमितता और भ्रष्टाचार से क्षुब्ध होकर अभ्यर्थियों ने उत्तर प्रदेश प्रतियोगी छात्र मंच के बैनर तले लोक सेवा आयोग के समक्ष शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से धरना प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में प्रतियोगी छात्र लोक सेवा आयोग पहुंचे। उन्होंने अध्यक्ष एवं सचिव पर आरोप लगाया है कि एक्ज़िक्यूटिव पदों पर चहेते लोगों को चयन दिलाने के लिए सुधार के नाम पर प्रक्रियाओं के साथ खिलवाड़ कर उन्हें लाभ पहुचाया जा रहा है। अभ्यार्थियों का आरोप है कि आयोग ने विज्ञापन की शर्तों का पालन नहीं किया है। 2018 की पीसीएस की भर्ती में स्केलिंग नहीं की गई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि मानविकी तथा हिंदी माध्यम के अधिकतर विषयों के परीक्षार्थियों को चयन से वंचित होना पड़ा है। इसीके साथ प्रारंभिक परीक्षा के बाद जारी होने वाले अंक-पत्र एवं संशोधित उत्तर-कुंजी को जारी करना बंद कर दिया गया है।

प्राथमिक यानी प्रिलिमिंस के लिए 18 गुना एंव साक्षात्कार के लिए 3 गुना अभ्यर्थियों को बुलाया जाता था । इसमें बदलाव करके मुख्य परीक्षा (मेंस) के लिए 13 गुना एवं साक्षात्कार के लिए 2 गुना अभ्यर्थियों को ही बुलाया जाने का फैसला किया गया है। इसी क्रम में अंतिम परिणाम के बाद जारी होने वाले अंक-पत्र में केवल स्केल्ड नंबर दिखाने का निर्णय आयोग में pcs2017 के परिणाम से ही लागू कर दिया है। विदित हो कि 2015 के परिणाम में सुहासिनी बाजपेई का प्रकरण इसलिए पकड़ में आया था कि स्केल्ड और नॉन स्केल्ड दोनों नंबर आयोग अंतिम परिणाम के अंक पत्र के साथ जारी करता था। इस पर इस प्रकरण का जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बनारस की अपनी चुनावी रैली में किया था तथा आश्वासन दिया था कि आयोग में व्याप्त भ्रष्टाचार की जांच सीबीआई से संपन्न करवाकर आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार किया जाएगा। 3 वर्षों से जारी सीबीआई जांच अभी तक किसी परिणाम पर नहीं पहुंच पाई है।

महत्वपूर्ण मुद्दा हिंदी माध्यम के अभ्यार्थियों के साथ अनुवाद एवं मूल्यांकन में हो रहे भेदभाव का है। उपरोक्त के संदर्भ में अभ्यर्थियों का प्रतिनिधिमंडल आयोग उपसचिव से मिला तथा स्पष्ट कर दिया कि एक सप्ताह में विभिन्न मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें नहीं तो आंदोलन को और बड़ा किया जाएगा तथा यह लड़ाई तब तक लड़ी जाएगी जब तक आयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित न हो जाए। आंदोलन का नेतृत्व संदीप सिंह ने किया तथा उन्हें अनुज द्विवेदी सर, सौरभ सिंह, राजेश मौर्य, पंकज सिंह, शिवम सिंह इत्यादि अभ्यर्थियों का सहयोग मिला।

संदीप सिंह
अध्यक्ष
उत्तर प्रदेश प्रतियोगी छात्र मंच
मोबाइल- 09453352829

वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
[email protected]

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