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क्या दुनिया का ग्लोबल एजेंडा तय करने में भारत की भूमिका बढ़ेगी?

दुनिया भर में भारत की द्विपक्षीय और बहुपक्षीय साझेदारी बढ़ रही है। इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में एजेंडा तय करने का मौका मिला है

कोविड-19 महामारी से तबाह दुनिया हमारे सामने है. चीन का उभार, क्षेत्रीय संतुलन और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर उसका असर भी साफ दिख रहा है. ऐसे में भारत को वैश्विक मुद्दों को लेकर अपनी आवाज फिर से ज़ोरदार तरीके से उठाने की ज़रूरत है. अंतरराष्ट्रीय एजेंडा तय करने में उसकी क्या भूमिका रहती है, इसी से तय होगा कि वह अपने आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा हितों को किस तरह से सुनिश्चित कर पाता है.

अंतरराष्ट्रीय एजेंडा तय करने में भारत उसी वक्त शिखर पर पहुंच गया था, जब वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में तुलनात्मक तौर पर कमजोर माना जाता था. यह सन 1947 में आजादी मिलने के बाद की बात है. इसके बावजूद उसने एशिया और अफ्रीकी-एशियाई देशों की एकता, गुटनिरपेक्षता जैसे बड़े आइडिया पेश किए. उसने नस्लीय भेदभाव, औपनिवेशिक राज तेजी से खत्म करने, निरस्त्रीकरण जैसे अभियान चलाए और ताकतवर देशों के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखा. इस तरह से भारत ने एक वैकल्पिक विमर्श पेश किया, जिनकी गूंज 21वीं सदी में भी सुनाई दे रही है. इन सबके बावजूद उसने अपनी अर्थव्यवस्था में विदेशी कंपनियों के लिए दरवाजे बंद कर रखे थे. जान-बूझकर उसने वैश्वीकरण से खुद को अलग रखने का फैसला किया था. इसलिए भारत अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में वह जगह हासिल नहीं कर पाया, जो उसे मिलना चाहिए था.

नब्बे के दशक में जब भारत की इकॉनमी बर्बादी की कगार पर पहुंची, तब उसे मजबूरन आर्थिक रणनीति में बदलाव करना पड़ा. तब उसने जो आर्थिक सुधार किए, उससे देश में विकास की रफ्तार तेज़ हुई. लिहाज़ा, उसका आर्थिक दबदबा भी पहले की तुलना में बढ़ने लगा. 21वीं सदी के शुरुआती बरसों में उभरते भारत की चर्चा अक्सर सुनाई देने लगी. कहा जाने लगा कि भारत जल्द ही दुनिया की शीर्ष ताकतों में शामिल हो जाएगा. लेकिन इन सबके बीच भारत की अंतरराष्ट्रीय नीतियां रक्षात्मक बनी रहीं.

अंतरराष्ट्रीय एजेंडा तय करने में भारत उसी वक्त शिखर पर पहुंच गया था, जब वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में तुलनात्मक तौर पर कमजोर माना जाता था.

असल में इस दौर में एक के बाद एक गठबंधन सरकारें बनीं, जो आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की चुनौतियों से तालमेल बिठाने में संघर्ष करती दिखीं. तब देश भर में राजनीतिक बेचैनी भी दिख रही थी, ख़ासतौर पर सीमा के साथ लगे इलाकों में. इतना ही नहीं, ये सरकारें देश के अंदरूनी मामलों में (पश्चिम की ओर से) दख़ल रोकने को भी जूझती नजर आईं.

आज भारत राजनीतिक तौर पर मजबूत है. उसमें बड़े आर्थिक सुधार करने का दमखम है. आज का भारत आत्मविश्वास से भरा हुआ है. वह दुनिया भर में द्विपक्षीय और बहुपक्षीय साझेदारी बढ़ा रहा है. इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भारत के लिए एजेंडा तय करने का मौका बना है. इस मामले में तीन बातों का जिक्र करना मुनासिब होगा.

सबसे पहले भारत को एशिया और उसके बाहर आधिपत्य जमाने की नए सिरे से की जा रही कोशिश के खिलाफ़ आवाज उठानी होगी. चीन की ज़ोर-ज़बरदस्ती वाली नीतियों से उभरने वाली चुनौतियों की ओर लगातार दुनिया का ध्यान दिलाने को लेकर भारत में एक झिझक रही है. लेकिन जिन मामलों को लेकर उसने आवाज उठाई, वहां उसका रुख़ सही और सटीक रहा. इस सिलसिले में बेल्ड एंड रोड इनीशिएटिव का ज़िक्र किया जा सकता है, जिसके खिलाफ़ मई 2017 में भारत ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. जिस तरह से भारत ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपनिवेशवाद के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद की थी, उसी तरह से वह चीन के वर्चस्ववाद के खिलाफ़ आवाज़ उठा और वैकल्पिक रास्ते सुझा सकता है. ये उपाय राष्ट्रीय संप्रुभता के विचारों को ध्यान में रखकर सुझाए जाने चाहिए. यह भारत के लिए एजेंडा तय करने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण स्तंभ का काम करेगा.

जिस तरह से भारत ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उपनिवेशवाद के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद की थी, उसी तरह से वह चीन के वर्चस्ववाद के खिलाफ़ आवाज़ उठा और वैकल्पिक रास्ते सुझा सकता है

दूसरा, आज दुनिया वैश्वीकरण को लेकर सशंकित है. ऐसे में भारत वैश्वीकरण, लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच नया संतुलन तलाशने की पहल कर सकता है. वह इस तरह की पहल में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है. यह तीन-तरफा द्वंद्व है. हार्वर्ड के अर्थशास्त्री डेनी रॉड्रिक ने कहा है कि इन तीनों को साथ लेकर चलना संभव नहीं है. अगर आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में धुर-वैश्वीकरण से बचा जाए तो इससे लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर देशों को संवेदनशील विकल्प चुनने में मदद मिलेगी. भारत की गरीब और विकासशील देशों में अच्छी साख है और पश्चिमी देशों के साथ उसके रिश्ते मज़बूत हो रहे हैं. ऐसे में वह सीमित वैश्वीकरण का खाका तैयार कर सकता है और इससे दूसरे देशों को जोड़ सकता है. इस तरह का वैश्वीकरण उन देशों को ठीक लगेगा, जो नागरिकों के प्रति अपनी जवाबदेही को अच्छी तरह समझते हैं.

भारत चाहे तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक के वैश्विक विकास में ‘इसमें सक्षम और इच्छुक देशों के समूह’ के साथ मिलकर मददगार की भूमिका निभा सकता है

तीसरा, उभरती हुई तकनीक का ग्लोबल गवर्नेंस. भारत कई उभरती हुई तकनीकों के मामले में अच्छी स्थिति रखता है. भारत चाहे तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक के वैश्विक विकास में ‘इसमें सक्षम और इच्छुक देशों के समूह’ के साथ मिलकर मददगार की भूमिका निभा सकता है. इसी तरह से अंतरिक्ष में इंसानी गतिविधियों के लिए नए नियम बनाने और उसे बढ़ावा देने, नई डिजिटल तकनीक के खतरों से लोकतांत्रिक देशों की रक्षा में भी उसकी भूमिका हो सकती है. अगर किसी देश के हाथ ऐसी तकनीक लग जाती है, जो किसी और के पास न हो. और वह उसके दम पर अपने यहां तानाशाही व्यवस्था कायम करता है और दुनिया पर दबदबे के लिए उसका हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है तो उसके खिलाफ भी भारत को आवाज उठानी चाहिए.

साभार- https://www.orfonline.org/ से

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