Thursday, April 25, 2024
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Homeधर्म-दर्शनअद्भुत है श्रीनाथजी की नगरी नाथद्वारा

अद्भुत है श्रीनाथजी की नगरी नाथद्वारा

होए वही जो राम रची रखा उक्ति हर वक्त, हर जगह सब पर खरी उतरती हैं। ऐसे ही प्रभू की इच्छा से ही उनके दर्शन संभव है। श्रीनाथ जी की नगरी नाथद्वारा में मैं अपने दो साथियों विजय जोशी और कृष्णा कुमारी के साथ 5 जनवरी 24 को सांय 7.30 बजे पहुंच गए। सोचा पहले श्रीनाथ जी के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त कर लिया जाएं। एक होटल पर समान रख कर मालूम किया तो ज्ञात हुआ की अब तो दर्शन कल ही होंगे। अगले दिन सुबह 9 बजे दर्शन करने का निश्चय कर भोजन कर सो गए।

सुबह दैनिक नित्यक्रम से फारिक हो कर जब होटल से बाहर आए तो पता चला की किसी वजह से इस समय के दर्शन बंद कर दिए गए हैं। क्या कर सकते थे। दिन भर दूसरे कामों में रात के 8 बज गए। नाथद्वारा जाएं और श्रीनाथ जी के दर्शन करे बगैर लोट आएं संभव नहीं था। अतः अगले दिन सुबह तड़काव में मंगला के दर्शन करने का तय कर सो गए। सुबह जल्दी उठे और मंगला दर्शन के लिए रवाना हो गए।

मंदिर हमारे होटल से कोई 500 मीटर दूरी पर ही था। दर्शन के लिए भक्तजनों का सैलाब मंदिर की ओर जा रहा था। हम भी मंदिर के सामने चार-पांच रैलिंग में से एक कतार में खड़े हो गए। मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर कुछ लोग भजन कीर्तन कर रहे थे और बड़ी संख्या में लाइनों में लग कर द्वार खुलने का शांत भाव से इंतजार कर रहे थे। जैसे समय हुआ द्वार के कपाट खुले भक्तों में उत्साह का संचार हुआ और इशारा होने पर कतारों में दर्शनार्थी आगे बढ़ने लगे। लंबी लाइन में चल कर हम भी मंदिर के गर्भगृह के सामने के दर्शक मंडप में पहुंच गए। पूरी मनोभवाना के साथ श्रीनाथ जी के मंगला दर्शन किए। श्रीनाथ जी की मनोहर छवि रजाई ओढ़ हुए थी ओर श्यामवर्णीय मुख रजाई से बाहर झांक रहा था। मंडप में कर्मचारी दर्शन करने वालों को बार-बार आगे बढ़ने के लिए निर्देशित कर रहे थे। मन भर कर श्रीनाथ जी की मनोहारी छवि मन में बसा कर दर्शन कर और प्रसाद ले कर हम बाहर आ गए। मंदिर में फोटो लेने की मनाही होने से बाहर का चित्र ले कर ही संतोष किया।

मंदिर परिसर के बाहर लजीज व्यंजनों के नाश्ते की कई दुकानें सजी थी और यात्री अपनी अपनी पसंद के नाश्ते का लुत्फ उठा रहे थे। गुजराती जायके से भरपूर पोहा, फाफड़ा, खम्मन, दूध, जलेबी के स्वाद के चटकारे हर और थे। मैंने अपनी आदत के अनुरूप मसाले वाली चाय ली और मित्रों में मन नहीं भरा तो दो – दो गिलास केसर वाले दूध का लुत्फ उठाया। मंदिर बाज़ार पूरा खुल गया था। यात्री श्रीनाथ जी की छवि वाली तस्वीर, पिछवाई पेंटिंग, मिट्टी से बनी सजावटी आइटम आदि की खरीदारी करते नजर आए। पूरा माहोल एक दम धार्मिक रंगों में रंगा था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रतिवर्ष गंगा दशमी को मन्दिर का पाटोत्सव (स्थापना दिवस) मनाया जाता हैं। प्रति दिन प्रातः मंगला आरती 8.30 श्रंगार दर्शन 9.15 तथा राजभोग दर्शन 10.15 तथा सायंकाल 6.15 पर उत्थापन 6.30 पर संध्या भोग एवं 7.00 पर शयन दर्शन होते हैं।
मंदिर के बारे में

कहा जाता है कि श्रीनाथ जी गोकुल, मथुरा और वृन्दावन से यहां नाथद्वारा में आए थे। श्रीनाथ जी मंदिर परिसर काफी विशाल है। मंदिर में श्रीनाथ जी की श्याम वर्ण की संगमरमर से बनी सुंदर एवं मनमोहक प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। प्रतिमा के मुख के नीचे ठोड़ी में एक बड़ा हीरा जड़ा हुआ है। श्रीनाथ जी के प्रत्येक दर्शन के अलग-अलग श्रृंगार किए जाते हैं। श्रृंगार के लिए सलमे-सितारों से सजे-धजे नए कपड़े बनवाए जाते हैं। नक्कारखाना दरवाजे पर भगवान के वस्त्र सिलाई का कार्य भी किया जाता है।

मंदिर के कमान चाैंक के पूर्व में श्रीनाथ जी का प्रसाद मिलता है। यह प्रसाद काफी स्वादिष्ट होता है। यहां का प्रसाद पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। यह मंदिर पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय की प्रधान पीठ है। यहां श्रीनाथ जी का भव्य मंदिर करोड़ों वैष्णवों की आस्था का प्रमुख केन्द्र है। श्रीनाथ जी का यह मंदिर करीब 337 वर्ष पुराना है। मंदिर में सर्वाधिक भीड़ भोग एवं मंगलता आरती के समय होती है तथा भोग एवं मंगला का श्रीनाथ जी श्रृंगार भी अत्यन्त दर्शनीय होता है। मंदिर का मोती महल दरवाजा प्रमुख प्रवेश द्वार है। यह दरवाजा चौपाटी की तरफ खुलता है, जो नाथद्वारा की हृदय स्थली कहा जाता है। करीब 100 फुट लंबा ढलान चौपाटी को मुख्य प्रवेश द्वार से जोड़ता है। मुख्य प्रवेश द्वार के अंदर एक बड़ा चौंक आता है, जिसे मोती महल कहा जाता है। इस चौंक के मध्य में एक फव्वारा लगा हुआ है। मोती महल से होकर एक संगमरमर की गली से गुजरकर श्रीलालन तक पहुंचते हैं। श्रीलालन श्रीनाथ जी का बाल स्वरूप है। यहां लालन के दर्शन कर बांयी तरफ श्रीनाथ जी बैठक एवं मुखिया आदि की पुरानी तस्वीरें बैठक में लगी हुई दिखाई देती हैं। लालन जी के दर्शन के बाद श्रीनाथ जी के दर्शन के लिए इंतजार चौंक में पहुंचते हैं। यह नक्कारखाना दरवाजे से जुड़ा है। जब भी श्रीनाथ जी के पट दर्शनार्थ खुलते हैं, उस समय शहनाई और नगाड़ा बजाया जाता है।

नाथद्वारा में यूं तो देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग श्रीनाथ जी के दर्शन करने आते हैं, परंतु गुजराती समाज के लोग यहां हर वक्त बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। श्रीनाथ जी मंदिर में मुख्य उत्सव श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का आयोजित किया जाता है। इस दिन रात 12 बजे मंदिर प्रशासन 21 तोपें दाग कर सलामी देता है। श्रीनाथ जी की दीवाली भी प्रसिद्ध है तथा इसके दूसरे दिन खेकरा महत्वपूर्ण त्यौहार मनाया जाता है। नाथद्वारा में कई गौशालाएं भी हैं, जिनमें श्रीनाथ जी मंदिर की भी एक गौशाला है, जहां करीब 400 गायों को रखने की व्यवस्था मंदिर प्रशासन की ओर से की जाती है।

नाथद्वारा की गणेश टेकरी पर बनी विश्व की सबसे ऊंची 369 फीट ऊंची महादेव प्रतिमा ध्यान मुद्रा में देखते ही बनती है। यह परिसर बहुत खूबसूरत है।

श्रीनाथ जी की छवि अर्थात तस्वीर, कपड़े पर बनी पिचवाई शैली की पेंटिंग और अन्य प्रकार के पूजा के समान प्रमुख है।

सैलानियों को ठहरने के लिए हर बजट के होटल और धर्मशालाएं उपलब्ध है। धार्मिक नगर होने से शुद्ध शाकाहारी भोजन ही आपतौर पर मिलता है। यहां का प्रसाद दूर – दूर तक प्रसिद्ध है। गुजराती पर्यटक बड़ी संख्या में आने से भोजन में गुजराती स्वाद मिलता है।

नाथद्वारा उदयपुर से करीब 50 किलोमीटर दूरी पर राजसंमद जिले में स्थित है। उदयपुर से हर समय यहां के लिए बसें उपलब्ध हैं। नजदीकी हवाईअड्डा उदयपुर के डबोक में उपलब्ध है। निकटतम रेलवे स्टेशन करीब 20 किमी पर मावली और 50 किमी पर उदयपुर हैं। श्रीनाथद्वारा राजसमन्‍द से 17 किमी, कोटा से 183 किमी,अजमेर और जोधपुर से 225, पुष्‍कर 240, जयपुर 385, देहली 625, हमदाबाद से 300, बडौदा ,450, सूरत 600 और मुम्‍बई से 800 किमी दूरी पर स्थित हैं।

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