Wednesday, April 24, 2024
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अक्षर_वनम्-वैकल्पिक शिक्षा की प्रयोगशाला

#हैदराबाद से जब आप #श्रीशैलम की ओर बढ़ेंगे तो लगभग 70 किमी की दूरी पर एक गांव पड़ता है जिसका नाम है #कलवाकुर्ति। यहां एक बड़े कैंपस में आपको ढेर सारे बच्चे कुछ न कुछ काम करते हुए दिखाई देंगे। एक बार आप को लग सकता है कि यहां बाल श्रम कानून का उल्लंघन हो रहा है। लेकिन ऐसा है नहीं। वास्तव में यह स्थान अक्षर वनम् का परिसर है जिसे आप शिक्षा की एक प्रयोगशाला कह सकते हैं। इस परिसर में पढ़ाई तो होती है लेकिन यहां पारंपरिक अर्थों में कोई स्कूल नहीं चलता।
अक्षर वनम् की कहानी में दो मुख्य पात्र हैं। पहले हैं #श्रीपति_रेड्डी जबकि दूसरे का नाम है #माधव_रेड्डी। अक्षर वनम् से जुड़ने के पहले श्रीपति रेड्डी एस.पी.आर. ब्रांड के नाम से स्कूलों की अपनी एक चेन चला रहे थे। वे व्यवसायिक रूप से सफल थे लेकिन उनके मन में बेचैनी थी। वे शिक्षा व्यवस्था में कुछ बुनियादी बदलाव चाहते थे जो व्यवसायिक स्कूलों के ढांचे में उनसे नहीं हो पा रहा था।
माधव रेड्डी की बात करें तो वे भी वंदेमातरम् फाउंडेशन के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे थे। लेकिन उनके पास वैकल्पिक शिक्षा का कोई संतोषजनक माडल नहीं था। इस दिशा में गंभीर शोध और अध्ययन न कर पाने की कमी उन्हें साफ तौर पर महसूस हो रही थी।
                           (चित्र में श्रीपति रेड्डी और माधव रेड्डी सबसे आगे की पंक्ति में बैठे हैं)
यह सन् 2007 की बात है जब अपने-अपने अधूरेपन के साथ माधव रेड्डी और श्रीपति रेड्डी पहली बार एक-दूसरे से मिले। धीरे-धीरे उनके बीच मिलकर काम करने की जमीन बनती गई और अंततः वर्ष 2015 में उन्होंने एक साथ मिलकर काम करने का फैसला किया। इसके लिए वन्देमातरम् रिसर्च सेंटर, अक्षर वनम् की स्थापना की गई।
अक्षर वनम् की स्थापना के लिए माधव रेड्डी ने अपनी 25 एकड़ पैतृक जमीन दान में दी और इसके प्रबंधन में पूरी तरह जुट गए। इसी के साथ श्रीपति रेड्डी ने भी बड़ा निर्णय लिया। वे अपने स्कूलों की मोह-माया छोड़ अक्षर वनम् के परिसर में ही परिवार के साथ रहने लगे।
शुरुआत में अक्षर वनम् में केवल 20 बच्चे और कुछ आधी-अधूरी इमारतें ही थीं। लेकिन समय के साथ हालात सुधरते गए। आज यहां का बुनियादी ढांचा बहुत ही उन्नत अवस्था में है और बच्चों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है।
अक्षर वनम् की ख्याति आज इतनी है कि बड़े-बड़े उद्योगपति, नेता और अफसर, यहां अपने बच्चों का एडमीशन करवाना चाहते हैं। लेकिन यह अवसर बहुत कम को ही मिल पाता है। चूंकि अक्षर वनम् की कल्पना एक शैक्षणिक शोध संस्थान के रूप में की गई है, इसलिए यहां सामान्य स्कूलों की तरह हर साल बच्चों का प्रवेश नहीं लिया जाता। यहां संस्थान अपनी जरूरत के अनुसार बीच-बीच में नए बच्चों को लेता रहता है।
मोटे तौर पर अक्षर वनम् में शिक्षा ग्रहण कर रहे बच्चों की तीन श्रेणियां हैं। पहले में अनाथ या बेहद गरीब मां-बाप के बच्चे हैं। दूसरी श्रेणी सामान्य या आर्थिक रूप से समृद्ध परिवारों के बच्चों की है। ये दोनों श्रेणियां लगभग सभी संस्थानों में मिलती हैं, लेकिन तीसरी श्रेणी आपको शायद अक्षर वनम् के अलावा कहीं और न मिले। यह तीसरी श्रेणी उन बच्चों की होती है जिनके बारे में मान लिया जाता है कि उन्हें पढ़ाना-लिखाना असंभव है।
इसे अक्षर वनम् की विशेष शिक्षा पद्धति का कमाल ही कहेंगे कि आज यहां तीनों तरह के बच्चे अपना सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन दे रहे हैं। जिन्हें पढ़ाई में पूरी तरह नाकारा बताया गया था, वे आज किसी भी तेज लड़के की बराबरी कर सकते हैं। जो बच्चे नौकर-चाकर और बंगला-गाड़ी के परिवेश में पले-बढ़े थे, वे आज हर तरह का छोटा-बड़ा काम खुद कर रहे हैं। अक्षर वनम् के माहौल का असर मध्यवर्गीय बच्चों पर भी हुआ है। अब वे अपने परिवेश की झूठी महत्वाकांक्षा और आडंबर से मुक्त होकर खुद को पहचानना और तराशना सीख रहे हैं।
अक्षर वनम् में पढ़ने वाले बच्चों के मां-बाप चाहे अमीर हों या गरीब उनसे किसी भी प्रकार की फीस नहीं ली जाती। उनसे किसी प्रकार का दान भी नहीं लिया जाता है। मां-बाप के अनावश्यक दबाव से अक्षर वनम् को मुक्त रखने के लिए यह नियम बनाया गया है।
अक्षर वनम् के प्रयोग कितने प्रभावी हैं, इसे जानने के लिए आपको कुछ दिन यहां रहना होगा। यहां रहते हुए आप महसूस कर पाएंगे कि देशभर में लागू स्कूली व्यवस्था और यहां की व्यवस्था में कितना अंतर है। हो सकता है कि इस अंतर को देखकर आपको कुछ नए सूत्र मिल जाएं, कुछ ऐसे सूत्र जिनसे देश की शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की राह आसान हो जाए।
अक्षर वनम की वेबसाईट –https://www.aksharavanam.org
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