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अमर बलिदानी पंडित तुलसीराम

स्वामी दयानंद सरस्वती एक निर्भीक संन्यासी, सत्यवक्ता और सत्य वचन बोलते समय वह आने वाले संकट यहाँ तक कि जीवन तक की भी चिंता नहीं करते थे| इस सत्य के कारण ही उन्हें जीवन में सत्रह बार विषदिया गया, उन पर सर्प व पत्थरों आदि फैंक कर उन्हें मारने का प्रयत्न किया गया| अंत में इस सत्य के लिए ही उन्होंने अपना जीवन धर्म की वेदी पर बलिदान कर दिया| यह उनके बलिदान का ही प्रभाव था कि आर्य समाजियों में बलिदानियों की एक न टूटने वाली श्रृंखला आरम्भ हो गई| इस बलिदानी श्रृंखला की ही एक कड़ी हैं हमारे बलिदानी पंडित तुलसीरास जी!

हमारी प्रेरणा के स्रोत पंडित तुलसीराम जी का जन्म आर्य समाज की स्थापना से मात्र तीन वर्ष पूर्व डेरा बाबा नानक ( वर्त्तमान में पाकिस्तान) के निकटवर्ती गाँव रुडा में हुआ| इस गाँव के पंडित हरीराम जी अपने क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित ब्राहमण थे| इन्हीं के यहाँ ही आपका जन्म हुआ किन्तु अभी आप छोटे ही थे कि आपकी माता जी का निधन हो गया| आपके मात्र बारह वर्ष की आयु में आते आते आपके पिताजी भी आपको छोड़ कर इस संसार से विदा हुए| हाँ! यहाँ एक बात का उल्लेख आवश्यक हो जाता है कि आपके जन्म से मात्र तीन वर्ष पूर्व ही हुआ था, इस कारण बाल्यकाल से ही आपके जीवन में ऋषि दयानंद के प्रति अनुराग का उदय होना आवश्यक ही था|

पंडित तुलसीराम जी आरम्भ से ही मेधावी बुद्धि के स्वामी थे| राजाकीय स्कूल गुरदासपुर में पढ़ते हुए आपका संपर्क मास्टर मुरलीधर जी से हुआ| जैसे ऊपर लिखा गया है कि आपका जन्म आर्य समाज की स्थापना से मात्र तीन वर्ष पूर्व होने के कारण आप पर आर्य समाज का प्रभाव होना आवश्यक हो गया था और यह मास्टर मुरलीधर जी ही इस प्रभाव का कारण बने| धीरे धीरे मास्टर मुरलीधर जी के विचारों का प्रभाव आप पर दिखाई देने लगा और उनके प्रभाव से आप आर्य समाजी बन गए| जब मास्टर मुरलीधर जी आपको प्रेरणा दे रहे थे इन्हीं दिनों पंडित लेखराम आर्य मुसाफिर जी के द्वारा किये जा रहे आर्य समाज के प्रचार की भी खूब धूम मची हुई थी| अत: पंडित लेखराम जी का भी आपके जीवन पर प्रभाव पड़ने लगा| सन् १८९५ ईस्वी में पंडित तुलसीराम जी को रेल की सेवा में प्रवेश मिला गया| आपकी नियुक्ति लोधरा स्टेशन पर हुई| सन् १९०० ईस्वी में आप सनावा में सहायक स्टेशन मास्टर के रूप में कार्य कर रहे थे| इन्हीं दिनों आपका विवाह बटाला निवासी श्रीमती लाजवंती जी से हुआ| उन दिनों बाल विवाह की परम्परा थी किन्तु आपने २७-२८ वर्ष की आयु में विवाह करके वास्तव में महर्षि दयानंद जी के सच्चे अर्थों में अनुगामी होने का सन्देश दिया|

आप कर तो रेल की सेवा रहे थे किन्तु अपने सेवाकाल के अतिरिक्त दिन भर जो समय बचता, इसे आप आर्य समाज की सेवा में ही लगा देते| आप की नियुक्ति जहाँ जहाँ भी हुई, वहां वहां रहते हुए भी आपने आर्य समाज की खूब सेवा की| यदि वहां आर्य समाज की शाखा न होती तो आप अपने प्रयास से वहां आर्य समाज स्थापित कर देते थे| आर्य समाज की इस धुन के धनी बनकर आर्य समाज का प्रचार और प्रसार करते हुए अनेक बार रात्रि के दो बजे घर पर लौटते थे| आप एक अच्छे गायक होने के साथ ही साथ अनुभवी सितार वादक भी थे| आपकी इस कला का लाभ भी आर्य समाज को मिला| मुजफ्फरढ़ के क्षेत्र में लोग आर्य समाज का नाम तक न जानते थे, जो आपके प्रभाव से आया| सनावा में रहते हुए आर्य समाज के प्रचार के कारण आपकी प्रेरणा से लोगों ने अपने दुर्व्यसनों को त्याग कर स्वयं को सच्चे अर्थों में आर्य बनाया|

यहाँ से समय समय पर विभिन्न स्थानों से होते हुए अंत में आपकी नियुक्ति सन् १९०३ ईस्वी में पंजाब के नगर फरीदकोट के रेलवे स्टेशन पर हो गई| पंजाब का यह छोटा सा कस्बा उन दिनों सिक्ख राज्य था किन्तु इस छोटे से कस्बे में जैनियों का अत्यधिक प्रभाव था| जैनियों को एक आर्य समाज के प्रचारक की नियुक्ति अपने क्षेत्र में होना उनके लिए सिरदर्द बनी हुई थी|

पंडित तुलसीराम जी न तो किसी भी रूप में किसी से घूस ही लेते थे और न ही किसी से डरते अथवा दबते थे| इतना ही नहीं वह अपनी सरकारी ड्यूति में किसी प्रकार का प्रमाद तक भी नहीं आने देते थे| उनकी इस इमानदारी ने ही उनके बहुत से शत्रु पैदा कर दिए| एक दिन फरीदकोट के ही एक व्यक्ति गोपीराम ने रेल के महिला डिब्बे के सामने अभद्र व्यवहार किया तो पंडित जी ने उसे डांट दिया| इसी गोपीराम को अपना सहारा बना कर जैनियों ने स्टेशन मास्टर पंडित तुलसीराम जी की ह्त्या की योजना बना डाली| इस कार्य के लिए फरीदकोट के जैनियों ने अपने शासक को भी अपने साथ मिला लिया| कुछ ही दिनों में वहां पर आर्य समाज का वार्षिक उत्सव होने वाला था| इस उत्सव के अवसर को ही इस योजना को पूरा करने के लिए चुना गया|

वार्षिक उत्सव में प्रचार के लिए पंडित तुलसीराम जी के बुलावे पर आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब ने पंडित हरनामसिंह जी को फरीदकोट भेजा| पंडित तुलसीराम जी की प्रचार के लिए की गई व्यवस्था का फरीदकोट के लोगों पर बहुत प्रभाव हुआ किन्तु खेद इस बात का है कि अहिंसा को अपने जीवन का सब कुछ समझने वाले मतान्ध वहां के जैन लोगों ने आर्य समाज के फरीदकोट में नित्य बढ़ रहे प्रभाव को देखा तो उनमें जलन पैदा हो गई| उन्होंने आर्य समाज का प्रचार कार्य बंद करवाने का प्रयास किया किन्तु पंडित तुलसीराम जी के प्रभाव के कारण यह वार्षिक उत्सव तथा इसमें हो रहा आर्य समाज के प्रचार का कार्य अबाधित रूप से चलता रहा| हाँ! अब यह प्रचार का कार्य सार्वजनिक सथान पर न होकर आर्य समाज के उस समय के मंत्री जी के निवास पर होने लगा| जिस दिन से प्रचार की व्यवस्था मंत्री जी के यहाँ हुई तो उससे अगले ही दिन पंडित तुलसीराम जी अपनी सेवा के कार्य से निवृत होकर जब स्टेशन से किसी व्यक्ति के साथ किसी अन्य व्यक्ति को लेने नगर में गए तो मार्ग में अकस्मात् किसी एक दुष्ट व्यक्ति ने पंडित जी की आँखों में पिसी हुई लाल मिर्च फैंक दीं| ज्यों ही पंडित जी अपनी ओंखों को मलने लगे तो कातिल ने अपनी पूर्व नियोजित योजना के अनुसार छुरे का वार करके पंडित जी का सीना लहु लुहान कर दिया|

पहले मिर्च और फिर छुरे से हुए घाव से पीड़ित होते हुए भी पंडित तुलसीराम जी ने हिम्मत न हारी और कुछ दूर तक उस कातिल का पीछा भी किया किन्तु अत्यधिक गहरे घाव के कारण कुछ दूर पीछा करने के पश्चात् वह भूमि पर गिर गए| वहां से उठा कर उन्हें रेलवे स्टेशन पर लाया गया| स्टेशन पहुँचने पर रेलवे तथा फरीदकोट राज्य के डाक्टरों ने उनकी चिकित्सा आरम्भ की ही थी कि सूचना मिलते ही आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब ने उस समय के सर्वोत्तम डाक्टर चिरंजीवलाल जी को दो सहयोगियों सहित उनके उपचार के लिए भेज दिया| डाक्टर तो आ गए किन्तु उस समय किसी के पास भी घावों के उपचार के लिए आवश्यक यंत्र न थे| केस की गंभीरता को देखते हुए उन्हें उपचार के लिए फिरोजपुर भेज दिया गया| अगले दिन फिरोजपुर के अस्पताल में ही हंसते हुए आपने अपना बलिदान दे दिया| मृत्यु के समय पंडित तुलसीराम जी के साहस, दृढ़ता, धर्म प्रेम तथा शौर्य को देख तथा मुख से हाय रूपी पीडादायक शब्द को न सुनकर लोग दंग रह गए|

जीवन के अंतिम क्षणों तक आपके माथे पर कोई शिकन तक नहीं आई तथा ब्यान देते हुए बड़ी दृढ़ता से कहा कि“ मेरी हत्या केवल एक हत्यारे ने ही नहीं की प्रत्युत इसके पीछे एक गहरा षड्यंत्र है| जनता की जानकारी तथा शासन से न्याय पाने के लिए, निष्पक्ष जांच के लिए मैंने घटना की वास्तविकता लिखवा दी है|” पंडित जी के बलिदान के पश्चात् आत्मग्लानि के कारण तथा आने वाले भय से भयभीत हत्यारा स्वयं ही पुलिस के सामने आया तथा अपना अपराध उसने स्वीकार कर लिया|

पंडित तुलसीराम जी के बलिदान के पश्चात् हुई श्रद्धांजलि सभा में अपनी श्राद्धांजलि अर्पित करते हुए आर्य समाज के विद्वान् नेताओं ने कहा कि यदि इस प्रकार बलिदान होने वाले वीरों के सिरों के ऊपर सिर जोड़े जाते रहे तो भी आर्य समाज के बलिदान की यह लड़ी टूटने वाली नहीं है| असत्य के सामने आर्य मर तो सकते हैं किन्तु झुक नहीं सकते| सब प्रकार के बलिदान देकर भी आर्य लोग वेद का नाद बजाते ही रहेंगे| इस प्रकार यह काव्यांश सत्य ही कह रहा है:-
वीर मंदिर
दशों दिशाए गूंजी टन टन टन टन की टंकारों से
कानों शब्द न आ पाता है भक्तों के जयकारों से|
यह वह मंदिर है जिस में नित .सभी समय का मेला है
प्रतिपल आता जय जय गाता नव भक्तों का रेला है||

इस मंदिर में धर्मदेव का पूजन युग युग से होता
इसकी वेदी पर बहता है पावन लोहू का सोता|
यहाँ पुजारी धूप दीप या अक्षत कभी न लाते हैं
जो भी आते हैं अपने हाथों में अपना सर लाते हैं ||
भवन बना है इसी भाँति यह ईंट न चूना पानी से
किन्तु जान के निर्मोही दीवानों की कुर्बानी से|
जब यह मंदिर बना न आया यहाँ ईंट चूना पानी
इसे बनाने में भक्तों ने अपना तन मन है वारा ||

ईंटों के स्थानों पर अपने हाथों से अपने सर
सर के ऊपर सर फिर उस पर सर सर रखकर…………..

कविता बहुत लम्बी है| इसे गाने के लिए कम से कम आधे घंटे का समय लगता है| इसलिए मैं इसे यहीं छोड़ रहा हूँ|

डॉ. अशोक आर्य
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२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र.भारात
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