Thursday, April 25, 2024
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जीवन के कई रंग का गुलदस्ता हैं अर्चना गुप्ता की कुंडलियाँ

सातवें दशक में काका हाथरसी की कुंडलियाँ जब हिंदी भाषी घर घर में लोकप्रिय हुईं तो लोगों को इनकी ताक़त का एहसास हुआ. भूतपूर्व प्रधान मंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने भी कुंडलियों में हाथ आज़माया. उनकी कुंडलियाँ भी साहित्यिक अभिरुचि के लोगों के बीच सराही गईं.

कुंडली छन्द की विशेषता यह है कि ये जिस शब्द पर शुरू होता है उसी पर पूर्ण होता है. इस छन्द की प्रकृति ऐसे सर्प जैसी होती जो कुंडली मार कर अपना फन पूँछ पर रख लेता है. दरअसल यह दो छंदों का मिला हुआ रूप है, पहला चंद दोहा तो दूसरा रोला, दो पद का एक दोहा और फिर चार पद का एक रोला. सुनने में यह आसान लगता है लेकिन इसमें अपनी बात कहना काफ़ी ट्रिकी सा है. अर्चना गुप्ता के नये कुंडली संग्रह को पढ़ कर लगा कि वे इस विधा में निष्णात हो चुकी है.

आज की मानवीय प्रवृति पर उनका यह छन्द गौर तलब है:
गिरगिट तो मशहूर है बदले अपने रंग
पर मानव को देख कर आज वही है दंग
आज वही है दंग सोचता है यह मन में
बैठा है शैतान, मनोहर मानव तन में
करे अर्चना रार, कपट-छल कितनी गिटपिट
अंदर बाहर एक भले इससे हम गिरगिट

उनके मन में पर्यावरण के विनाश को ले कर चिंता भी है:
मानव ने निज हित किया वृक्षों का संहार
धरती पर होने लगी जल की कमी अपार
जल की कमी अपार, कुँए, तालों, नदियों में
जंगल भी वैचारिक बड़ी मुश्किल गाँवों में
तभी अर्चना फैल रहा सूखे का दानव
सुख सुविधा का दास हो गया है अब मानव

इसी मुद्दे पर एक और कुंडली:
गौरैया दिखती नहीं लगे गई है रूठ
पेड़ काट डाले हरे, बचे रह गए ठूंठ
बचे रह गए ठूंठ देख दुखता उसका मन
कहाँ बनाये नीड़ नहीं अब मिलते आँगन
कहीं अर्चना शुद्ध नहीं पुरवाई मिलती
तभी चहकती आज नहीं गौरैया दिखती

यही नहीं साधारण शब्दों में जीवन का दर्शन भी है:
रावण का भी कर दिया, अहंकार ने नाश
धरती पर रख पाँव ही छुओ सदा आकाश
छुओ सदा आकाश उठो जीवन में इतना
लेकिन नम्र स्वभाव साथ में सबके रखना
कहे अर्चना बात ज़िंदगी भी है इक रण
अपने ही है हाथ राम बनना या रावण

इसी का एक और नमूना:
रिश्ते कच्चे रह गये बस पैसे की भूख
आपस के अब प्रेम की बेल गई है सूख़
बेल गई है सूख सभी अनजाने से हैं
रहते तो हैं साथ मगर बेगाने से हैं
कहे अर्चना आज समय के हाथों पिसते
दिल को देते दर्द बहुत कच्चे से रिश्ते

गाँव का जीवन जो अब पुस्तकों या फिर पेंटिंग में ही बचा रह गया है:
पीतल की थी गगरी कितनी मोटी डोर
पनघट पर रौनक़ भरी होती थी तब भोर
होती थी तब भोर कुएँ पर सब जाते थे
मिल कर सारे काम वहीं सब निबटाते थे
कहे अर्चना बात हुई अब ये तो कल की
पनघट की वो छाँव, न है गागर पीतल की

चुनाव नज़दीक आ रहे हैं उसे ले कर एक सशक्त व्यंग देखिए:
कुर्सी पाने के लिए छिड़ी चुनावी जंग
पाले बदले देख कर जनता भी है दंग
जनता भी है दंग देख दल बदलू नेता
थाम रहे वो हाथ बने बस रहें विजेता
नए अर्चना राग अलग सबके गाने के
सारे है ये ढोंग सिर्फ़ कुर्सी पाने के

यही नहीं आजकल के बाबाओं की भी अर्चना ने जम कर खबर ली है:
चाहे आशा राम हों या कोई गुरमीत
बाबाओं की चल रही ख़त्म करो यह रीत
ख़त्म करो यह रीत भक्तजन आँखें खोलो
छोड़ अंध विश्वास हक़ीक़त को बस तोलो
करे अर्चना ढोंग दिखाते बड़ा तमाशा
करते बड़े निराश नाम हो चाहे आशा

अर्चना गुप्ता पेशे से मुरादाबाद में पोस्ट ग्रेजुएट कक्षाओं की प्राध्यापक रही हैं, कविता करना उनका पैशनहै और वे उस को लेकर बेहद गंभीर है. यही नहीं इन दिनों वे अपने साहित्यपीडिया ऐप के कारण भी चर्चित हैं, यह प्लेटफार्म नवोदित रचनाकारों और स्थापित साहित्यकारों की रचनाओं का सोर्स बनता जा रहा है।

अर्चना की कुंडलियाँ: अर्चना गुप्ता
साहित्यिकपीडिया पब्लिशिंग, नोएडा

 

(लेखक स्टेट बैंक से सेवा निवृत्त अधिकारी हैं और सामाजिक व सांस्कृतिक विषयों पर लेखन करते हैं।) 

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