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जज को बदलवाकर अपने ही जाल में फँस गई सोनिया गाँधी

नैशनल हेरल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भेजे गए समन पर दिल्ली हाई कोर्ट के मुहर लगाने से नाराज कांग्रेस संसद में हंगामा कर रही है। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के ही लोगों ने केस नई बेंच को ट्रांसफर किए जाने का विरोध भी किया था।

जस्टिस सुनील गौर, जिन्होंने ट्रायल कोर्ट के समन के खिलाफ सोनिया, राहुल और अन्य कांग्रेस नेताओं की याचिका खारिज कर दी थी, रोस्टर में बदलाव के चलते अक्टूबर में केस छोड़ चुके थे। दस्तावेज के मुताबिक सुनवाई के लिए याचिकाएं दूसरी बेंच को गईं तो सोनिया, राहुल व अन्य आरोपियों ने हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस जी रोहिणी से गुहार लगाई कि केस वापस जस्टिस गौर को दे दिया जाए क्योंकि वह केस से पूरी तरह वाकिफ हैं।

अपनी ऐप्लिकेशन में सोनिया, राहुल और पांच अन्य आरोपियों ने लिखा कि क्योंकि जस्टिस गौर ने कई दिनों तक मामले की सुनवाई की है, इसलिए केस जस्टिस पीएस तेजी से वापस लेकर जस्टिस गौर को दे देना चाहिए।

रेकॉर्ड्स बताते हैं कि तब तक जस्टिस तेजी केस स्वीकार कर चुके थे और उन्होंने सुनवाई के लिए 15 अक्टूबर की तारीख तय की। सोनिया गांधी के वकील कपिल सिब्बल ने जस्टिस तेजी से अपील की कि केस वापस जस्टिस गौर को दे दिया जाए, लेकिन अपील ठुकराते हुए जस्टिस तेजी ने कहा कि रोस्टर में हुए बदलाव के तहत उन्हें केस दिया गया है।

इसके बाद कांग्रेस ने चीफ जस्टिस को फिर से एक ऐप्लिकेशन लिखी और कहा कि उनके साथ अलग व्यवहार किया जा रहा है और फिर से अपील की कि केस जस्टिस गौर को ही दे दिया जाए। हालांकि, जस्टिस तेजी इसके लिए तैयार नहीं थे लेकिन किसी तरह कांग्रेस ने केस वापस जस्टिस गौर की बेंच पर पहुंचा दिया।

केस पर वापस लौटने के बाद जस्टिस गौर ने ज्यादा वक्त बर्बाद नहीं किया। एक महीने से भी कम वक्त में उन्होंने पांच सुनवाई कीं और फैसला सुरक्षित रखने के 48 घंटे के दौरान ही 7 दिसंबर को फैसला सुना दिया। कांग्रेस को जरा भी अंदाजा नहीं था कि कोर्ट फैसला सुनाने वाली है। कांग्रेस की लीगल टीम ने सोनिया और राहुल को कोर्ट के सामने पेश होने से रोकने के लिए जस्टिस गौर से अपील की लेकिन इसे भी खारिज करके वह अपने चैंबर में चले गए।

साभार- टाईम्स ऑफ इंडिया से

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