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मेघ बरस रहे थे बाहर, भीतर बरस रहे थे आखर

इंसान को अतीतजीवी नहीं होना चाहिए पर अतीत को विस्मृत करना भी अपनी जड़ों से कटने जैसा है। आगे बढ़ने के लिए पीछे लौटना स्वाभाविक क्रिया है। धनुष को प्रत्यंचा पर चढ़ाने से पहले बाण को पीछे खींच कर ही लक्ष्य साधा जाता है धावक भी लंबी दौड़ या ऊंची कूद से पहले कुछ कदम पीछे लेकर वांछित गति प्राप्त करता है, हम भी आज ‘चौपाल’ पर बात करने से पहले कुछ पिछले वर्क पलट लेते हैं।

चौपाल में बरसा संगीत और सुरों का जादू
महिला शक्ति की चौपाल ने जमाया रंग
गाय, गाँव और गांजे की खुशबू से महकी चौपाल
चौपाल में स्वास्थ्य, संगीत और साहित्य की त्रिवेणी

25 जून 1998 में मुंबई जैसे महानगर में, गांवों में जमने जैसी ही चौपाल की परंपरा का श्रीगणेश हुआ था राजेंद्र गुप्ता जी के आंगन में। पेड़ के नीचे चबूतरा और उसके चारों तरफ हरियाली छायी थी। पेड़ों पर पखेरुओं का कलरव था। चबूतरे को घेर कर बैठे थे शहर के ख्यातनाम लोग, जो भिन्न-भिन्न कला- कार्यों में संलग्न थे। उस दिन संस्कृत के प्रकांड विद्वान और नाटककार कालिदास की जयंती थी। उसी विषय पर चौपाल का आयोजन तय हुआ । विषय खासा गूढ़ था। भले यह संयोगवश हुआ हो किंतु नियति ने चौपाल की ऊंचाइयों का पूर्वानुमान उस दिन ही तय कर दिया था। तभी तो उस दिन नागार्जुन की कविता के स्वर गूंजे थे वहां-

आषाढ़ का एक दिन जैसे कालजयी नाटक के अंश पढ़े गए।

चौपाल नाम धरने से लेकर उसे सार्थक रूप देने तक जिन पांच- सात लोगों ने जो कल्पना की उससे कहीं अधिक उसे साकार होते देखा उस पहली चौपाल में ही और तब से निरंतर चौपाल सजती रही, संवरती रही, अपने ही बनाए मानकों को तोड़कर नए नए मानक गढ़ती रही।

साहित्य, संगीत, सिनेमा, रंगकर्म से लेकर, राष्ट्रीय स्तर की घटनाएं, सामाजिक विषय, ख्यातनाम व्यक्तित्व, लोक कलाएं, लोक परंपराएं ,राष्ट्रीय त्योहार, सामाजिक त्योहार, अथार्थ चौपाल में मानव जीवन के हर ओने- कोने को परखा- पड़ताला- खंगाला और उस पर विचारोत्तेजक तथा रोचक विमर्श हुआ। लंबे 22 वर्ष तक बिना किसी व्यतिक्रम के चौपाल का सफर निरंतर गतिमान रहा यह बात बड़े हैरत की है, जबकि इतने वर्षों तक तो व्यावसायिक प्रतिष्ठान, सामाजिक संस्थाएं, या फिर वैवाहिक गठबंधन सभी में उलट-फेर, टूट-फूट होना अस्वाभाविक नहीं। फिर यह एक संस्था मुंबई जैसे व्यस्ततम शहर में टिकी रही तो किस तरह? क्या कोई गंडा ताबीज साधा था या फिर टोना टोटका या अमरत्व का वरदान लेकर जन्मी थी?
ऐसा कुछ भी नहीं था दोस्तों! जो बहुत निकट से चौपाल को जानते हैं और निरंतर वहां जाते रहते हैं वे इसके स्थायित्व का मूल स्रोत बखूबी जानते हैं। संक्षेप में कहूं तो विघटन के मूल कारक तीन तत्व, पद प्रचार और पैसे से दूर रहना, इसके नियंताओं की निस्वार्थ निष्ठा और तीसरा और जरूरी कारण रहा एक दूसरे का सम्मान करना। किसी को भी अपने से कम नहीं समझने की मनोवृति का होना। बस यही तो था, जिसके कारण चौपाल न केवल भारत में बल्कि विदेशों तक में चर्चित हो गयी।

धीरे- धीरे चौपाल आयोजन न रहकर अनुष्ठान का स्वरूप धरने लगी थी। किसी भी अनुष्ठान का मूल भाव समर्पण ही तो होता है और वह यहां भरपूर था।

पिछले दो ढाई वर्ष में ‘समय’ का सर्वाधिक विकराल स्वरूप संसार भर के सामने आया महामारी के रूप में और चौपाल को भी विराम लेना ही पड़ा। पन्द्रह मार्च दो हजार की वह अंतिम चौपाल की रिपोर्टिंग करते वक्त लिखा था मैंने कि ‘घर वालों से रार ठान कर, अपनी प्रतिरोधक क्षमता को शान पर चढ़ा कर, नीति नियमों को अंगूठा दिखा कर, और दिनों से भी ज्यादा बड़ी संख्या में इकट्ठे हुए थे हम और रंगकर्म पर हुई उस अद्भुत चौपाल का शरूर अभी तारी ही था कि शहर भर में ‘लॉक डाउन’ हो गया। आफत की दस्तक तो पहले ही सुनाई पड़ ही रही थी, उस दिन चौपाल में आना हमारा दुस्साहस ही था।

हमने सोचा था कि लात मारकर दीवार तोड़ देने की चौपाल की बाईस वर्ष की बाली उम्र किसी विदेशी वायरस- फायरस से डरकर घर बैठने की कहां होती है। वैसे भी हम इस मुगालते में थे कि हर महीने चौपाल से भरपूर ऑक्सीजन लेकर हमारे फेफड़े पर्याप्त सक्षम हैं किसी भी वायरस से निपटने के लिए, पर यह भ्रम था हमारा और भ्रम को तो टूटना ही था। उस भयावह मंजर का जिक्र करना तो फिर से अंधेरी खोह में जाने जैसा तकलीफ देह होगा।

बहरहाल चौपाल को भी बंद करना पड़ा। कुछ हालात ठीक हुए तब चौपाल के स्तंभों ने ‘ई चौपाल’ की कोशिश की। मुखा-मुखम संवाद का ध्येय लेकर चलने वाली ‘ऊ चौपाल’ की लत लगी थी हमें , तो ‘ई चौपाल’ रास कैसे आती।
अंततः हालात सुधरे।जाहिर था चौपाल का जो सिलसिला पिछले बाईस वर्षों से चल रहा था उसे जारी रखने से ज्यादा कष्ट- साध्य था, लंबे विराम के बाद फिर से उसे गतिमान करना। पर हुआ दोस्तों! यह भी हुआ। इसलिए भी हुआ की चौपाल ना होने की छटपटाहट हर सच्चे चौपाली ने बड़ी शिद्दत से भुगती और इसके स्तंभों के जेहन में निरंतर दर्ज करवाते रहे कि ‘चौपाल कब शुरु कर रहे हो’ । इससे भी क्या होता, यदि उसे फिर से शुरू करने के पीछे निष्ठा और निस्वार्थ भावना नहीं होती । उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है अशोक बिंदल जी की कार्य संयोजन कुशलता और दिनेश गुप्ता कविता गुप्ता जी की उदारता। यकीनन प्रेरणा व पीठ पर हाथ उन अप्रत्यक्ष स्तंभों का भी जरूर है जो उस दिन भले ना दिखें हो पर दृष्टि व सुझाव साथ थे ।उन सभी का आभार मानना वाजिब पावना है उनका। अब मैं आती हूं सत्रह सितंबर दो हजार बाईस की चौपाल पर,जो पूरी धज के साथ सजी थी कविता गुप्ता जी के भव्य प्रांगण में ।

बाहर जमकर बरस रहे थे मेघ और गुप्ता दंपति के भाग्यशाली आंगन में आखर गीतों नजमा गजलों कविता व दोहों का रूप धरकर अद्भुत रस वृष्टि कर रहे थे। व्यंग्य रचनाएं मीट्ठी चिकोटियां काट रही थी, हंसा रही थी। बड़ी संख्या में सुधि श्रोताओं का जमावड़ा था। संचालन की बागडोर सुपरिचित सुभाष काबरा जी कुशलता से थामे हुए थे। तमाम आगंतुकों के चेहरे खुशी से दमक रहे थे, यह पल एक मुद्दत के बाद जो हासिल हुए थे।

सुभाष काबरा जी ने चौपाल पर लिखी ताजातरीन हास्य व्यंग की रचना से कार्यक्रम का आगाज किया जिस की कुछ पंक्तियां गुदगुदाने वाली थी।उनका कहना था कि
‘ चौपाल नाम का रायता फैला रहे हो तो
हर बूंदी को मैसेज तो जाना ही चाहिए’

‘कुछ लोगों के लिए अपनी ‘मैं’ को घर पर रखकर आना बड़ा मुश्किल होता है’

मनजीत सिंह कोहली नियमित चौपाली है। उन्होंने अपनी रचना पढ़ी।
‘पास होते हुए भी कभी कोई पास नहीं होता
हर कोई किसी के लिए खास नहीं होता
कोई तो सबब होगा इन आंसुओं का
यूं ही कोई उदास नहीं होता’
साथ ही
‘मैं चिड़िया ही भली’ एक छोटी सी कहानी सुनायी जो इंसानी फितरत पर बड़ी सूक्ष्मता से सच्चाई बयान कर गई।
चौपाल में पुराने लोगों के साथ हर बार नए लोगों की आमद भी होती रहती है। विजेंद्र आएं भले पहली बार पर उनकी रचनाओं ने मुग्ध कर दिया सभी श्रोताओं को।
‘पहरेदारी मुल्क की सौंपें हमारे हाथ
सारा भारत चैन से सोए सारी रात’

‘गज़लें लगती फूल सी दोहे जैसे तीर
दो मिसरों में दास्तां दोनों की तासीर’

‘स्टेशन पर रह गए हम लहराते हाथ
कोई हमको ले गया खुद को छोड़कर साथ’
अंतिम पंक्तियों ने खूब तालियां बटोरी।

अगली बारी शैलजा पाठक की थी जो कमाल का लिखतीं हैं और अक्सर चौपाल में आती हैं बड़ी दूर नवी मुंबई से। ‘मम्मीयां’ कविता की कुछ मारक पंक्तियां यह थी
‘मम्मीयों की दोस्त मम्मीयां होती है
मम्मी का साथी पिता होता है
पिता के साथिन कोई भी हो सकती है
चाबुक से लहुलुहान रही मम्मीयों की पीठ’

रवि यादव बहुरंगी प्रतिभा के धनी है। वे लेखक व अभिनेता होने के साथ-साथ फिल्मों की अनेक विधाओं से भी संलग्न है। उनकी भारी व दमदार आवाज रचनाओं को और भी ग्राह्य बना देती है उन्होंने सुनाई कविता-
आज हैं जब हमसफर जान
तो क्यों है तल्ख़ियां हावी
क्यों है दूरियां हावी
करें कद मोहब्बत का और भी जरा ऊंचा
हर एक ‘मैं’ के ऊपर हम
मोहब्बत का वजन रख दें’

रवि यादव दोहे भी खूब कह लेते हैं
‘बिन बोले वह जान ले या तो मन की बात
वरना फिर बेकार है शब्दों की बारात’

प्रशांत बेबार का चेहरा भी चौपाल में नया था। वे नज्में कहते हैं कहानियां गढ़ते हैं कविताएं करते हैं। उनकी कविताओं की पंक्तियां कुछ यूं रही-
‘अगर खबर खैरियत का कोई रंग होता तो
यकीनन आसमानी होता’
कविता के बाद प्रशांत ने यादों का पिटारा ऐसा खोला कि पुराने टीवी शो के दिनों का स्वाद और आनन्द सबके जेहन में तैर गया और काबरा जी कह उठे ‘पगले रुलाएगा क्या’
वाकई उन्होंने तमाम दूरदर्शन के दुर्लभ कार्यक्रमों को बड़ी खूबसूरती से अपनी रचना में गूंथकर एक यादों की माला बना दी थी।

विवेक सिंह कई बार चौपाल में आते रहते हैं उन्होंने दो-तीन कविताएं ऐसी पढ़ी कि सभी श्रोता चित्र लिखित से रह गए।

यूनुस खान की दमदार खनकती आवाज से रेडियो के कारण पूरा भारत परिचित है ।उन्होंने ‘व्यंग्य की पाठशाला’ हरिशंकर परसाई जी की एक व्यंग्य रचना ‘एक मध्यमवर्गीय कुत्ता’ सुनाई। यशस्वी लेखक की नुकीली कलम का तेवर, उस पर पढने वाले की आवाज का जादू दोनों ही मिलकर सिर चढ़कर बोले और खूब बोले।
रीता रामदास प्रतिष्ठित कवियत्री हैं और चौपाल में अक्सर आती हैं। जरा सी संजीदा किस्म की कविताएं करती हैं जो दिमाग पर दस्तक देती हैं। झंझोड़ती भी हैं। बानगी देखें-
‘बहुत ईमानदारी से जीवन जीने की सजा मिलती है
हम सही गलत की पहचान जो खो चुके हैं
या फिर पहचानना ही नहीं चाहते’
उनकी दूसरी कविता थी ‘जानवर’

देवमणि पांडेय मुंबई के जाने पहचाने मंच के कवि हैं खूब लिख लेते हैं।
‘पढ़ लिख कर क्या करेंगे राम श्याम रहमान वगैरह
यह भी एक दिन बन जाएंगे चपरासी दरबान वगैरह’

दूसरी कविता थी
‘वक्त के सांचे में ढल कर हम लचीले हो गए
रफ्ता रफ्ता जिंदगी के पेंच ढीले हो गए’

अर्चना जौहरी टीवी और मंच पर समान रूप से सक्रिय हैं।उनकी ग़ज़ल का मतला था
मैंने अपना नजरिया ही बदला जरा
कि फिर सारा नजारा यूं बदला की बस
और दूसरी थी
‘मैं कविता नहीं लिखती
किस पर लिखूं कविता
कोई विषय मिला ही नहीं
मुझे पुरुषों से गिला ही नहीं’

संजीव निगम अगले वक्ता थे जो हिंदुस्तानी प्रचार सभा में कार्यरत हैं तथा हिंदुस्तानी जबान पत्रिका का संपादन भी करते हैं। उन्होंने जेलों में पुस्तकालय खुलवाने का बड़ा महत्वपूर्ण काम किया है। संजीव जी ने ‘अंगुलिमाल की अहिंसा का नया फंडा’ नाम की एक सशक्त रचना पढ़ी।
दीप्ति मिश्र बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवियत्री हैं। उनके हाथ में कलम है कंठ में सुर और अभिनय भी खूब कर लेती हैं। सबसे खूबसूरत है उनका कविता पढ़ने का अंदाज नई ताजा ग़ज़ल सुना कर बड़ी तालियां बटोरी उन्होंने।
‘जिस्म से रूह तक मुझमें गमकता क्या है
नूर किसका है मेरे रुख पर दमकता क्या है’

मुंबई में पधारे हुए कवि श्री बनज कुमार बनज चौपाल की उस दिन की सर्वाधिक मूल्यवान उपलब्धि रहे। जिन्होंने तरन्नुम में अपने दोहे और एक गीत प्रस्तुत किया।
‘किस-किस की पूरी करें यहां जुलाहा आस
हर चरखे को चाहिए हंसती हुई कपास
जब सागर को था जीत का पूरा विश्वास
तभी अचानक ले लिया नदिया ने वनवास’

गीत की पंक्तियां थी
‘पाप मुक्त है नदी में एक रुपैया उछाल कर
प्यार तक को पी रहा आदमी उबालकर’

वॉइस एकेडमी से पहली बार आई वंदना ने अपनी विलक्षण और तराशी आवाज में ‘भारती जी’ की ‘कनुप्रिया’ सुना कर मोह- विष्ट कर लिया। आभार ज्ञापित किया मेजबान कविता जी ने। इस तरह चौपाल का रुका हुआ सिलसिला फिर से शुरू हुआ इस कामना के साथ ही अब इसकी गति कभी बाधित ना हो यह सदा सदा के लिए जारी रहे।
(निर्मला जी सामाजिक विषयों पर स्वांतः सुखाय लिखती हैं

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