Friday, April 19, 2024
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वर्ष 2024 के निर्वाचन में मतदाताओं का रुख क्या रहेगा

वर्ष 2024 के लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव भारत के लोकतंत्र के इतिहास में महापर्व की यात्रा में एक फलदाई, जाति विहीन मतदान एवं नूतन राजनीतिक यात्रा को प्रदर्शित करेंगे। भारत के लोकतंत्र में यह चुनावी वर्ष अतिनूतन प्रकल्पों को सिद्ध करेंगे अर्थात यह चुनाव निर्धनता, बेरोजगारी और बीमारी के उन्मूलन पर लड़े जाएंगे। 2024 का निर्वाचन विकास के पहिए को लेकर होने जा रहा है।

वैश्विक स्तर की रेटिंग एजेंसियों का मानना है कि भारत के नेतृत्व की पहल और दूरदर्शिता के कारण भारत की अर्थव्यवस्था (आर्थिकी) अत्यधिक मजबूत स्थिति में है और रहेगी। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मामले में भारत का बेहतर प्रदर्शन है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार अगले 5 वर्षों के दौरान भारत का विकास दर निरंतर 6.3 फीसदी के आसपास रहेगी। इसी तरह रेटिंग एजेंसी S &P ने भी अनुमान जताया है की जीडीपी में यह समृद्धि जारी रहती है, तो 2030 में भारत दुनिया के तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगा। जनता सरकार के राजनीतिक मोर्चे पर अर्थव्यवस्था की मजबूती, स्थिर राजनीतिक नेतृत्व और सरकार का बाजार पर पूर्ण नियंत्रण के कारण अपने मतदान का प्रयोग करती है जो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में अक्षरशः दिखाई दे रहा है।

वर्तमान में स्मार्टफोन की प्रत्येक घरों में उपलब्धता और प्रत्येक घरों में टेलीविजन की उपलब्धता के कारण मतदाताओं के व्यवहार में परिपक्वता का स्तर बढ़ रहा है। बदलते परिवेश में लोकतंत्रीकरण एवं चुनावी राजनीति पर भारतीय सामाजिक संरचना में भी रूपांतर का प्रभाव बढ़ रहा है। विगत वर्षों में भारतीय जनता पार्टी के मतदाताओं की सामाजिक रूपरेखा में अत्यधिक परिवर्तन हुआ है। राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में भाजपा को विभिन्न हिंदू सामाजिक समूह से मिलने वाले मतदाता समर्थन में अत्यधिक वृद्धि हुई है ।

2019 की तुलना में 2024 में भाजपा ने समाज के हिंदू वर्ग के निचले स्तर के बीच अपने मत संभाव्यता को बढ़ा दिया है। राजनीतिक स्तर पर और मतदान व्यवहार से स्पष्ट हो रहा है कि भाजपा ने अपने पक्ष में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के समर्थन में 16 फीसदी की वृद्धि कर ली है। वर्ष 2019 के चुनाव में लगभग 52 फीसदी उच्च जाति/सवर्ण, 44 फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग, 34 फीसदी अनुसूचित जाति और 44 फीसदी अनुसूचित जनजातियों ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किया था।

विगत वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम राज्य की विधायिकाओं का चुनाव संपन्न हुआ था। इस चुनावी महासमर में भाजपा को मध्य प्रदेश में 163 सीट (71 फीसदी) प्राप्त हुआ, वहीं कांग्रेस को 66सीट (29 फीसदी) जनादेश प्राप्त हुआ और अन्य दलों को एक सीट (जीरो फीसदी) प्राप्त हुई। छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए 90 सीटों पर चुनाव हुआ जिसमें भारतीय जनता पार्टी को 54 सीट (60 फीसदी ) जनादेश प्राप्त हुआ वहीं कांग्रेस को 35 सीट (39 फीसदी) और अन्य दलों को एक सीट (जीरो प्रतिशत) प्राप्त हुआ था। राजस्थान विधानसभा के 200 सीटों को मतदान हुआ जिसमें भारतीय जनता पार्टी को 115(58 प्रतिशत) प्राप्त हुआ, जबकि कांग्रेस को 69 सीट(35 फीसदी) और अन्य राजनीतिक दलों को 15 सीट( आठ प्रतिशत) प्राप्त हुआ था। आंकड़ों के आधार पर पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के आधार पर हम कह सकते हैं कि जिन तीन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ है। प्रचंड बहुमत की स्थिति में जनता ने सरकार के कार्यों पर स्वीकृति दी है और जन समर्थन दिया है, जबकि अन्य दो राज्यों में भी भारतीय जनता पार्टी ने अपनी बढ़त बना ली है।

रेडियो टेलीविजन ने अपने पोल के जरिए इस पर जनमत का नब्ज टटोला है कि क्या पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आगामी लोकसभा चुनाव पर राजनीतिक प्रभाव डाल सकते हैं?

इस पोल में जनता ने बढ़ चढ़कर सहभागी बनी। टेलीविजन ने कुल 31108 लोगों की राय जानने का मौका मिला। इस पोल के जरिए पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव का परिणाम का प्रभाव वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। 74 फीसदी लोगों का राय है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में रहेगा।

एक क्षेत्र अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर 55 फीसदी उच्च जाति/सवर्ण (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में आने के कारण नौकरी प्राप्त करना और मेडिकल शिक्षा में अखिल भारतीय कोटे के तहत सीटों पर पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण को क्रियान्वित करने के कारण), 44 फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग (अखिल भारतीय स्तर पर ओबीसी का प्रतिनिधित्व और अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान करना), 47.51 करोड़ जन धन खाते खोले गए ,2.8 करोड़ लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना में अपना घर/ छत मिला है, 23.8 लाख करोड़ लोगों को सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में धन हस्तांतरण होने के कारण, 35 फीसदी अनुसूचित जाति, 45 फीसदी अनुसूचित जनजातियों का भारतीय जनता पार्टी के प्रति रुझान बड़ा है।

लोगों के क्षेत्र अध्ययन (केस स्टडी) से ज्ञात होता है कि विगत वर्षों में भारतीय जनता पार्टी का सवर्ण मतदाताओं के प्रति निर्भरता कम हुई है, क्योंकि भाजपा द्वारा संगठनों में अन्य वर्गों को पदासीन करना, जबकि अन्य पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से मिलने वाले जन समर्थन में बढ़ोतरी आई है। जातियों का सामाजिक अभियांत्रिक (सोशल इंजीनियरिंग) के कारण इन जातियों के सम्मान, सरकार तक पहुंच और उनके वर्गों के नेताओं का गंभीरता से लिया जाना है।वर्तमान चुनावी परिपेक्ष्य में भारतीय जनता पार्टी के सांगठनिक ढांचे में उचित प्रतिनिधित्व एवं विचार संस्थाओं (थिंक टैंक) के सिफारिश के आधार पर भारतीय जनता पार्टी के दो-तिहाई जमीनी मतदाताओं ने पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं महिला मतदाताओं से हैं।

भारतीय राजनीति में प्रतिस्पर्धी माहौल के कारण ग्रामीण मतदाता कृषि संबंधी संकट में सहयोग( प्रधानमंत्री कृषि सम्मान निधि, प्रत्येक किसान को सालाना ₹6000 का सहयोग), बेरोजगारी पर निराशा (केंद्र सरकार एवं भाजपा शासित राज्यों में नौकरियां सृजित करने के कारण) मतदाता जुड़े हैं। भाजपा का तीन चौथाई मतदाता ग्रामीण क्षेत्र (2014 के पश्चात) आता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी के जन उभार और राजनीतिक सहभागिता का संकेत है। वर्ग के आधार पर निर्धन और निम्न आय वर्ग में भाजपा का विस्तार हो रहा है (कोरोना महामारी में सहयोगी नेतृत्व की महत्ता के कारण)। वर्ष 2019 के चुनाव में निर्धन और निम्न आय वर्ग के 39 फीसदी, मध्यम वर्ग के 41 फीसदी और धनाढ्य वर्ग के 44 फीसदी ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया है। इन वर्गों में भाजपा के प्रति स्वीकार्यता बढ़ रही है, इनके पीछे उत्तरदाई कारण मोदी जी के करिश्माई व्यक्तित्व, भाजपा द्वारा नूतन कार्य योजना/ रोड मैप को क्रियान्वित करना, भाजपा का सूक्ष्म प्रबंधन की कार्य योजना प्रस्तुत करना, इसके विपरीत कांग्रेस में व्यावसायिक प्रबंधन नहीं है।

कांग्रेस का आम चुनाव में चुनावी दृष्टिकोण का अभाव है। ऊपरी नेतृत्व और निचले नेतृत्व में सजातीयता नहीं है। भारतीय राजनीति में सहयोगी संघवाद की अपेक्षा प्रतियोगी संघवाद की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसके कारण भाजपा का जन उभार बड़ रहा है। भारतीय जनता पार्टी के राज्यों के मुख्यमंत्री अपने मुख्यमंत्री कार्यालय में अधिकतम समय देते हैं और जनता दरबार लगाकर पीड़ितों की समस्याओं का समाधान करते हैं, जबकि अन्य दलों के मुख्यमंत्री हाई कमान को प्रसन्न करने में ही अधिकांश समय व्यतीत करते हैं। तेलंगाना के भूतपूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव अपने मुख्यमंत्री कार्यालय से लगभग समय नदारद रहते थे।

शैक्षणिक स्तर पर देखा जाए तो भाजपा के 62 फीसदी मतदाता विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और कॉलेज के हैं। व्यवसाय के आधार पर व्यापारी वर्ग और स्व अनुदानित महाविद्यालयों के प्रबंधक और उनके इकाई भाजपा के समर्थन में नहीं है, क्योंकि भाजपा नकल विरोधी अभियान का कड़ाई से पालन करती है। स्व अनुदानित महाविद्यालय प्रबंधन और उनके इकाई शिक्षा के गुणवत्ता से ज्यादा निजी राजस्व के स्रोत के लिए महाविद्यालय का प्रबंध करते हैं।

(लेखक राजनीति विश्लेषक हैं)

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