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सीएसआर नहीं केवल परोपकार ला सकता है जिंदगियों में सुधार

कॉफी टेबल बुक बहुत तेजी से संग्रहणीय वस्तु के रूप में अपनी जगह बनाती जा रही हैं। अगर आपको एक ऐसी कॉफी टेबल बुक मिलती है जिसमें एक ऐसे भारत की शानदार तस्वीरें हों जिसे आपने देखा भी न हो तो शायद अपनी पहली प्रतिक्रिया में आप उसे लेकर निराश होंगे और उसे कारोबारी जगत की महंगी जनसंपर्क कवायद का एक और उदाहरण भर मानेंगे। लेकिन यह एक गलती होगी। टाटा स्टील द्वारा प्रस्तुत और दीपा अधिकारी द्वारा लिखित पुस्तक 'ऑन द रोड टु इनीशिएटिव्स ऑफ चेंज' सामुदायिक जीवन के साथ कारोबारी रिश्ते की अप्रत्याशित गाथा है। 

दिग्गज इस्पात कंपनी देश के कुछ दूरदराज इलाकों में युवा नेतृत्व कार्यक्रम चलाती रही है। शुरआत में इसे मॉरल रिआर्मामेंट (नैतिक हथियारबंदी) का नाम दिया गया, हालांकि अब इसे इनीशिएटिव ऑफ चेंज के नाम से जाना जाता है। पिछले चार साल में यह 3,500 युवाओं तक पहुंच चुका है। ग्रामीण युवाओं में बदलाव की कथा बहुत रोचक है। झारखंड और ओडिशा के दूरदराज इलाकों के युवाओं के जीवन में आया बदलाव हमें यह बताता है कि आखिर क्यों कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) को एक कारोबारी प्रक्रिया की तरह भी देखा जाना चाहिए, न कि केवल परोपकार के रूप में। 

ऐसे में टाटा स्टील ग्रामीण विकास सोसाइटी (टीएसआरडीएस) जो कर रही है वह है लोगों को परियोजनाओं का स्वामित्व लेने के लिए प्रोत्साहित करना और उसका अनुकरण कर दूसरे समुदायों के जीवन को बेहतर बनाना। हमारे सामने इसके 35 उदाहरण हैं और उनमें से प्रत्येक अपने समुदाय में बदलाव का वाहक सिद्घ हुआ है। हम ओडिशा के जाजपुर जिले के रनसोल गांव की सश्मिता मोहंतो का उदाहरण लेते हैं। अधेड़ उम्र की सश्मिता एक प्राथमिक शिक्षक की पत्नी हैं। वह तब घर से बाहर निकलीं जब उनको लगा कि अकेले एक व्यक्ति की आय में परिवार चला पाना मुश्किल है। मोहंतो को जानकारी मिली कि टीएसआरडीएस महिलाओं के स्वयंसहायता समूह को वित्तीय मदद मुहैया कराता है। जो ग्रामीण महिलाएं अपना कारोबार शुरू करना चाहती हैं वे साथ आकर ऐसे समूह बनाती हैं। हर महीने वे एक निश्चित राशि फंड में डालती हैं जिसे बाद में स्थानीय बैंक में जमा कर दिया जाता है। एक बार जब वह राशि पर्याप्त हो जाती है तो वे टीएसआरडीएस अथवा किसी बैंक या किसी अन्य फंडिंग एजेंसी से संपर्क करती हैं और अपनी कारोबारी योजना उनके सामने पेश करती हैं। अगर वह योजना स्वीकृत हो जाती है तो उन्हें अपना कारोबार शुरू करने के लिए धन मिलता है। 

मोहंतो ने स्वयंसहायता समूह तो बना लिया लेकिन उनको यह अंदाजा हो गया कि अगर कारेाबार को बचाए रखना है तो उसका दायरा बढ़ाना होगा। चूंकि गांव में पहले से ही महिलाओं के पांच स्वयंसहायता समूह (10 सदस्यों वाले) थे और वे सभी पोल्ट्री के धंधे में थे इसलिए मोहंतों ने उन सबको एक बड़े संस्थान के दायरे में लाने का उपक्रम किया और तब टीएसआरडीएस से संपर्क किया। यह संपर्क एक ऐसी पोल्ट्री योजना के लिए किया गया था जिसमें शुरुआती बुनियादी ढांचा, कच्चा माल और परिचालन लागत आदि की मुफ्त पेशकश की जा रही थी। 

टीएसआरडीएस ने सभी 50 सदस्यों के बीच गहन पोल्ट्री प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किया। मोहंतो को गांव की आंगनबाड़ी और प्राथमिक विद्यालय के रूप में बाजार भी मिल गया। स्वयं सहायता समूह के हर सदस्य के पास 20 चिकन वाली पोल्ट्री है। मोहंतो ने अब अपनी नजर कहीं अधिक बड़े लक्ष्य पर केंद्रित कर दी है और वह एक सहकारी संस्था बनाना चाहती हैं ताकि कारोबार का आकार और बढ़ाया जा सके। वह पोल्ट्री के अलावा मशरूम उत्पादन जैसे नकदी कमाने वाले उद्योग में प्रवेश करना चाहती हैं। महज 10वीं तक पढ़ी एक महिला ने टीएसआरडीएस के जरिये अपने गांव की 50 महिलाओं को आर्थिक रूप से संपन्न बनाया है और वह खुद उद्यमी बनने की राह पर है। 

नरेश चंद्र प्रधान नामक किसान की बात करें तो टीएसआरडीएस ने उनको ओडिशा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय तथा केंद्रीय चावल शोध संस्थान कटक में अध्ययन में सहायता दी। प्रधान ने पहली बार केले की हाइब्रिड जी9 किस्म बोई जो लंबी चलती है और तीन साल तक फलती है। उधर विष्णु कुमार नामक व्यक्ति जो पहले देसी शराब पीने के अलावा कोई काम नहीं किया करते थे, वह टीएसआरडीएस से अभिनय का प्रशिक्षण लेने के बाद शराब के खिलाफ जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं। 

जो बात इन कहानियों को हकीकत के करीब बनाती है वह यह है कि अधिकारी इस परियोजना की एकदम गुलाबी तस्वीर नहीं पेश करतीं। टीएसआरडीएस के एक युवा प्रतिनिधि रवींद्र कुमार ओडिशा के केंदुझर जिले के जोड़ा में लेखिका से बताते हैं कि अगर संस्था भाग्यशाली हुई तो वहां चलने वाले कार्यक्रम में 30 में से 5-10 लड़कियों को सामुदायिक शिक्षक और स्वास्थ्य कर्मी के रूप में आजीविका मिल जाएगी। शेष गरीबी और सामाजिक जटिलताओं की भेंट चढ़ जाएंगी। इस किताब का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह आपको सीएसआर के बारे में जुबानी जमाखर्च से आगे बढऩे के लिए मजबूर करती है। जुबानी जमाखर्च में तदर्थ बुनियादी ढांचा और मोबाइल एंबुलेंस सेवा जैसी सेवाएं शामिल हैं। लेकिन अधिकांश कारोबारी घराने यह भूल जाते हैं कि सीएसआर का अर्थ है लोगों के जीवन के साथ गहराई तक जुडऩा और पिछड़े समुदायों और तबकों को सशक्त बनाना।

साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से 

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