Wednesday, September 27, 2023
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‘पूर्ण पुरूष’ नाटक में ‘कला एवं कलाकारों में पनपती विसंगतियों का स्वरुप’

हाल ही में विजय पंडित द्वारा लिखित ‘पूर्ण पुरुष’ नाटक का लोकार्पण दिल्ली के पुस्तक मेले में वाणी प्रकाशन द्वारा संपन्न हुआ। सोशल मीडिया पर इस नाटक की बहुत चर्चा हो रही है। विजय जी एक मीडियाकर्मी होने के साथ-साथ रचनाकार भी है। कई फिल्मों और धारावाहिकों का लेखन कार्य आपने बड़े बैनरों के लिए किया है। नाटकों का निर्देशन व मंचन भी आपके द्वारा समय-समय पर होता रहा है। फिलहाल वे ‘पूर्ण पुरुष’ के लिए इन दिनों सुर्ख़ियों में हैं। ‘पूर्ण पुरुष’ नाटक का मंचन कई संस्थानों द्वारा अलग-अलग शहरों में निरंतर होता रहा है। इस नाटक के लिए उन्हें दिल्ली सरकार के ‘साहित्य कला परिषद’ द्वारा ‘मोहन राकेश सम्मान’ से सम्मानित भी किया गया है।

रचनाकार ने इस नाटक का मंचन लगातार कई मंचों पर किया है। इस नाटक में संशोधन करके, २० वर्षों बाद इसे एक किताब का स्वरूप दिया है। पाठकों के लिए यह बड़ी खुशी की बात है कि नाटक को यदि वे नहीं देख सकें तो कम से कम यह किताब जरूर पढ़ सकते हैं। नाटककार ने जीवन के यथार्थ को, ‘कला’ की वास्तविकता को, एक ‘कलाकार’ के माध्यम से नाटक में विश्लेषित किया है। ‘कलाकार’ चाहे किसी भी क्षेत्र से जुड़ा हो अन्य लोगों की अपेक्षा उसे अत्याधिक कठिन संघर्षों द्वारा गुजरना पड़ता है। मान लीजिए कि वह संघर्ष करके एक ऊँचे शिखर पर प्रस्थापित हो जाता है, जहाँ वह यश, कीर्ति, तो प्राप्त कर लेता है किंतु आर्थिक रूप से वह सुदृढ़ नहीं हो पाता।

नाटक का मुख्य पात्र समग्र है। आज उसके पास नेम, फेम है, लोग उसे उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं, समाज के लिए वह एक आदर्श है, किंतु एक पिता की भूमिका का निर्वाह, एक पति की भूमिका का निर्वाह करने में वह अपने आपको बहुत पीछे खड़ा पाता है। अपने परिवार को एक बेहतर जीवन नहीं दे सकता उसे इस बात का पश्चाताप है। जो व्यक्ति अपने पुरुषार्थ के साथ जीवन को न जी सके, अपने परिवार को सुखी न रख सके, ऐसे इंसान को जीने का कोई हक नहीं है। इस तरह की कई बातें उसके मस्तिष्क में आती हैं।

जब पहली बार शाश्वती ने समग्र के पेंटिंग की एग्जीबिशन देखी थी उसने विजिटर बुक में लिखा था, “टुडे आई सां अ लिविंग गॉड ऑन द अर्थ हु हैज क्रिएटेड लाइफ ऑन द कैनवास”। हिंदी में अनुवाद है- मैंने कैनवास पर जीवन की रचना करने वाले एक देवता को आज पृथ्वी पर देखा…। जिस समग्र की पेंटिंग को देखकर शाश्वती ने उससे प्रेम किया था, उस पर मोहित हुई थी, जो समग्र दुनिया की दुनियादारी से बेहद अलग इंसान था, जो सच्चाई और ईमानदारी से अपना जीवन जी रहा था, जिसे दुनियादारी की समझ नहीं थी, जिसकी आँखों में एक बच्चे सी मासूमियत, पवित्रता, झलकती थी, जिसके हाथ जब कैनवास पर चलते थे तो शाश्वती को लगता था कि जैसे ब्रह्मा सृष्टि का निर्माण कर रहे हो। आज उसी शाश्वती को लगता है कि, एक पेंटर की लाइफ सिक्योर नहीं है। समग्र अपने आपसे ही प्रश्न करता है, जो कुछ उसके साथ हो रहा है? उसकी जिंदगी के साथ हो रहा है? उसके लिए सिर्फ वही जिम्मेदार है? क्या कला की दुनिया इतनी भयावह है?

हम देखते हैं कि कई कलाकार ऐसे हुए जो इतिहास के पन्नों में कहीं न कहीं दब कर रह गए। सिर्फ इसलिए कि पात्रता होते हुए भी उनकी कला को पहचान नहीं मिली। कुछ कलाकार ऐसे हुए जिनकी आयु अत्यल्प रही परंतु आने वाले इतिहास का वो आदर्श बनें। अपितु ऐसा बहुत कम होता है जिन्हें नाम पहचान मिली हो, अधिकतर कलाकार गुमनामी के अंधेरों में भटकते हुए अपना दम तोड़ देते हैं। ऐसा लगता है कि, नाटककार ने बहुत ही नजदीकी स्तर पर कला और कलाकारों की स्थिति का जायजा कर उसे नाटक में उतारा है। दुनिया में बहुत कम लोग ही हैं जिन्हें कला और कलाकार की परख है। हाँ, धनाढ्य घरों में कीमती से कीमती वस्तुओं को अपने ड्राइंग रूम में रखकर उनके ऊँचे स्तर को जरूर दर्शाता है। गरीबी में रह रहे लोग अपने लिए दो जून की रोटी जुटाने में इतने व्यस्त हैं कि ‘कला’ और ‘कलाकार’ उनकी समझ से परे हैं।

समग्र का, आस्था को यह कहना कि, हम जैसे लोग हमेशा सपने में ही जीते हैं। हम लोग यानी ‘कलाकार’, कलाकार यथार्थ को महसूस ही नहीं करते वरन काल्पनिक दुनिया में जीते हैं, यथार्थ से भागते हैं। कलाकार चाहे कोई भी हो, वह हमेशा यथार्थ को अपने कला के माध्यम से समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है। परंतु जीता वह काल्पनिक दुनिया में ही है। एक कलाकार, समाज और स्वयं के बीच संतुलन नहीं बना पाता। अंत में स्वयं ही अपने आपको अवसाद के अंधकार में झोंक देता है।

आस्था की टेबल पर ‘इरविंग स्टोन’ (अमेरिकी लेखक) की किताब देखकर समग्र पूछता है कि तुम इसे पढ़कर मरना चाहती हो? आस्था का यह कहना, सर यह किताब मेरे जीवन का एक भाग बन गई है। ‘वाँन गाँग’ ने सैंतीस साल के छोटे से जीवन में कितना कुछ किया। यूरोपियन चित्रकला की परंपरा को तोड़कर जिंदगी भर प्रयोग करते रहे उनको मिला क्या? क्या सभी कलाकारों की यही नियति होती है? समग्र, पाब्लो पिकासो (स्पेनिश पेंटर) वाँन गाँग (डच पेंटर), राफेल (इटली के महान चित्रकार एवं वास्तुशिल्पी) को पुकारते हुए कहता है क्या तुम भी मेरी सहायता नहीं कर सकते?

समग्र, बीथोवन महान संगीतकार के बारे में जानकारी देते हुए आस्था से कहता है, एक समय ऐसा आया कि उसे प्यार और पत्नी में से किसी एक का चुनाव करना था परंतु उसने प्यार को चुना और दुनिया में महान बन गया यदि वह पत्नी चुनता तो संसार को कुछ न दे पाता। एक कलाकार समाज को बहुत कुछ देना चाहता है और देता भी है, परंतु समाज उसके एवज में उसे कुछ भी लौटा नहीं पाता।

समग्र अतिरेक को अप्रत्यक्ष रूप से लताड़ता है। अतिरेक कहता है, आप जैसे पेंटर मेरी कंपनी के पब्लिसिटी डिपार्टमेंट में नौकरी किया करते हैं। आस्था को अपने आइडियल के बारे में ऐसी बातें नागवार लगती हैं। बीच में हस्तक्षेप करते हुए वह कहती है, पैसों से हर चीज नहीं खरीदी जा सकती। रैम्ब्रा, माइकल एंजेलो (इटली के महान चित्रकार, मूर्तिकार एवं वास्तुशिल्पी) को खरीद सकते हैं? शाश्वती, आस्था से बीच में हस्तक्षेप नहीं करने के लिए कहती है, आस्था उत्तर देते हुए कहती है, यह मामला केवल आपका नहीं है। यह मामला हम सबका है, सर आपके साथ ही साथ, पूरे समाज, पूरी दुनिया के हैं। हम सभी को सर पर गर्व है।

किसी भी कलाकार के लिए उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अभिलाषा बहुत बड़ी चीज होती है। कलाकार को उसके रंग और उसकी आजादी से दूर कर दिया जाए तो वह अपनी कला को पूरी तरह से उभार नहीं पाएगा। वर्तमान समय में ‘संघर्ष’ शब्द कलाकारों के लिए पैसों और असुविधाओं की कमी को दर्शाता है। नाटककार ने ‘पूर्ण पुरूष’ नाटक द्वारा कला और कलाकारों की समाज में क्या दशा है, दर्शाते हुए उनके संघर्ष का बखूबी विश्लेषण किया है।

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