Sunday, March 3, 2024
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मणिपुर का मणि काला चावल, स्वाद और सेहत का राजा

अनेक शताब्दियों तक यूरोप में भारतीय मसाले काली मिर्च को काला सोना के समान तवज्जो दी जाती रही है।  उसके औषधीय गुणों के कारण| भारत की विविधता पूर्ण जलवायु विविध प्रकार के फल फूल अन्न धान दाल आदि के सर्वाधिक अनुकूल है। अनादि काल से भारत के पूर्वोत्तर राज्य आसाम मणिपुर सिक्किम आदि में पोष्टिक बलवर्धक रोग नाशक काले चावल की खेती की जा रही है। यह चावल इतना गुणकारी है मधुमेह के जिन रोगियों को सफेद चावल का परहेज होता है वह भी इसका सेवन कर सकते हैं ब्लड शुगर को कंट्रोल रखता है।  मधुमेह नाशक है, सफेद चावल यदि मधुमेह रक्त में ग्लूकोज के स्तर को बढ़ाता है तो यह उसे घटाकर नियंत्रित करता है।
 
 विटामिन बी , विटामिन ई प्रोटीन आयरन जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व इसमें साधारण सफेद या ब्राउन राइस से 2 से 3 गुना अधिक है| काले चावल में में एंथोसायनिन नामक एंटी ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में मौजूद होता है जो कार्डियोवेस्कुलर और कैंसर जैसी बीमारियों से बचाने में सहायक है तमाम चिकित्सा शोध से यह सिद्ध हो चुका है| यह प्रतिरोधक क्षमता में भी इजाफा करता है| इनमें मौजूद विशेष एंटी ऑक्सीडेंट तत्व ,त्वचा व आंखों के लिए फायदेमंद होते हैं।  रक्त की धमनियों से संबंधित रोगों में यह रामबाण है। 
 
पूर्वोत्तर की जनजातियों पर तमाम चिकित्सीय शोध हुए हैं उनके उत्तम स्वास्थ्य के पीछे इसी चावल के सेवन का मुख्य योगदान माना गया है| दुनिया में कुपोषण के विरुद्ध लड़ाई में यह चावल प्रमुख हथियार बन गया है।  काले चावल में कार्बोहाइड्रेट स्टार्च white/ brown rise से बहुत कम होती है।  इस कारण यह है ओबेसिटी की समस्या नहीं करता| काली चावल में पर्याप्त मात्रा में सफेद चावल से अधिक फाइबर पाया जाता है जिसके कारण है कब्ज आदि में भी लाभदायक है| काले चावल की खेती अभी पूर्वोत्तर के राज्यों तक ही सीमित है उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश बिहार में कुछ जागरूक किसान इसकी खेती कर रहे हैं| काले चावल का बाजार मूल्य 200 से लेकर 1800 रुपए किलो है। ऑनलाइन कंपनियां इसकी सीधे पूर्वोत्तर से डिलीवरी करती है मैनुअल परंपरागत उत्तर भारत के बाजारों में यह बहुत कम उपलब्ध है…भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के साथ-साथ इसकी खेती दक्षिण पूर्वी एशिया के देश वियतनाम कंबोडिया थाईलैंड ब्रूनेई चीन आदि में भी की जाती है| बांग्लादेश में भी इसका उत्पादन होता है| 
 
 
बौद्ध मत कि जन श्रुतियों के अनुसार महात्मा बुद्ध काले चावल की खीर का ही सेवन करते थे। चीन जैसे देश में कम्युनिस्ट शासन से पूर्व जब राजतंत्र था आम आदमी को काले चावल खाने की अनुमति नहीं थी राज परिवारों में ही इसका सेवन किया जाता था।  साधारण सफेद चावल से इसका मूल्य अधिक है। भारत में कुपोषण के विरुद्ध लड़ाई में यह निर्णायक हथियार साबित हो सकता है | मिड डे मील के तौर पर यदि इसे शामिल किया जना चाहिए।   
 
कुपोषण के खात्मा के नाम पर सरकार भोले भाले बच्चों को मांसाहारी बना रही है पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है| कहीं अंडे तो कहीं चिकन परोसा जा रहा है। काला चावल उत्तम विकल्प हो सकता है पोस्टिक खाद्यान्न का| काले चावल की पूर्वोत्तर में बहुत सी वेराइटी है मणिपुर की चाक-हाओ काले धान की वैरायटी अधिक प्रसिद्ध है इसी का मूल्य ₹1800 प्रति किलो तक चला जाता है..हम उत्तर मध्य भारत के धान उत्पादक किसान से अनुरोध करते है वह काले चावल की खेती पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर करें। इसमें जबरदस्त मुनाफा है| भारत सरकार इसे विदेशों से आयात कर रही है| दिल्ली एनसीआर मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों के फाइव स्टार रेस्टोरेंट में इसकी जबरदस्त मांग है। 
 
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