Tuesday, April 16, 2024
spot_img
Homeदुनिया मेरे आगेराजस्थान निर्माण की गाथा- कुछ किस्से कुछ यादें

राजस्थान निर्माण की गाथा- कुछ किस्से कुछ यादें

राजस्थान दिवस 30 मार्च 2024 पर विशेष

राजस्थान निर्माण से पूर्व राजपूताने ने विभिन्न भाग भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते थे। जैसलमेर क्षेत्र को प्राचीन समय में मांड प्रदेश के नाम से जाना जाता था। आज भी यहॉ का मांड गायन पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध हैं। जोधपुर का प्राचीन नाम मरू या मरू प्रदेश के रूप में ऋग्वेद, महाभारत, वृहद संहिता आदि प्राचीन ग्रन्थों, रूद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख तथा पाल अभिलेखों में मिलता है। उस समय मरू प्रदेश के अन्तर्गत जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर आदि का रेगिस्तानी क्षेत्र शामिल था। मरू प्रदेश की भाषा मरू भाषा के रूप में जानी गई जिसका सर्वप्रथम उल्लेख 8वीं 9वीं शताब्दी में उद्योतन सूरी रचित कुवलयमाला में मिलता है। जोधपुर को मारवाड़ प्रदेश के नाम से भी जाना जाता है। आज भी जोधपुर की भाषा मारवाड़ी भाषा कहलाती है।

मरू के बाद जांगल क्षेत्र का नाम आता है। महाभारत में प्रयुक्त कुरू जांगल एवं मद्र जांगल के उल्लेख से प्रतीत होता है कि जांगल के अन्तर्गत केवल राजस्थान का उत्तरार्द्ध भाग ही नहीं बल्कि पंजाब का दक्षिण-पूर्वी भाग भी सम्मलित था। राजस्थानी इतिहास व साहित्य ग्रन्थों में जांगल क्षेत्र का प्रचुर उल्लेख मिलता है। जांगल प्रदेश के अन्तर्गत वर्तमान के बीकानेर और जोधपुर शामिल थे। इसकी राजधानी अहि छत्रपुर थी जिसे वर्तमान में नागौर के नाम से जाना जाता है। इसी जांगल प्रदेश के अधिपति होने के कारण बीकानेर के राजा को जांगल का बादशाह के नाम से जाना जाता था। राजस्थान का पूर्वी भाग (वर्तमान जयपुर, दौसा, अलवर, तथा भरतपुर का कुछ भाग) मत्स्य प्रदेश कहलाता था। इसका उल्लेख सर्वप्रथम हमें ऋग्वेद में मिलता है, जिसमें मत्स्य निवासियों को सुदास का शत्रु कहा गया है। महाभारत में मत्स्य राज्य की राजधानी विराट नगर (आधुनिक बैराठ-जिला जयपुर) बताई गई है। जिसमें बताया गया है कि मत्स्य राज्य पांड़वों का प्रबल पक्षधर था। उनके अज्ञातवास के अनेक प्रसंग इस भू-भाग से जुडे़ हुए हैं। मत्स्य प्रदेश से जुड़ा हुआ साल्व प्रदेश था जिसका समीकरण प्रसिद्ध पुरात्ववेत्ता जनरल कनिंघम ने अलवर से किया है।

वर्तमान जयपुर तथा उसका समीपवर्ती प्रदेश ढूंढाड़ के नाम से प्रसिद्ध रहा है। इसीलिए आज भी इस प्रदेश की भाषा ढूढ़ाडी कहलाती है। शूरसेन जनपद के अन्तर्गत मथुरा सहित अलवर, भरतपुर, धौलपुर व करौली का सीमावर्ती क्षेत्र सम्मिलित था। रणथम्भौर के प्रसिद्ध चौहान शासक राव हम्मीर का मंत्री रणमल शूरवंशीय क्षत्रिय था। इसी प्रकार राजस्थान का दक्षिणी भू-भाग शिवि मेदपाट, बागड़, प्राग्वाट आदि नामों से जाना जाता था। उदयपुर का सबसे प्राचीन नाम शिवि मिलता हैं। शिवि जनपद चितौड़ का समीपवर्ती क्षेत्र था। इसकी राजधानी मध्यमिका थी जिसे आजकल नगर के नाम से जाना जाता है। नगरी चितौड़ से लगभग 7 मील उत्तर पूर्व में स्थित एक प्राचीन गांव हैं। यहां उपलब्ध मुद्राओं पर अंकित मज्झिमनिकाय शिवि जनपदस्य से इसकी पुष्टि होती है।

उदयपुर को ही बाद में मेवाड़ के नाम से जाना गया। मेदपाट मेवाड़ का ही पुराना नाम था। मेवाड़ के गुहिल राजवंश की स्थापना से पहले यहॉ संभवतया मेरों या मेदों का शासन था इसिलिए इसका प्राचीन नाम मेदपाट था। मेदपाट को ही प्राग्वाट भी कहा जाता था। जैसा कि जय सिंह कलचूरि के अभिलेखों में मेवाड़ के राजाओं को प्राग्वाट नरेश लिखा होना ज्ञात होता है। राजस्थान के दक्षिणी-पश्चिमी भू-भाग जिसमें सिवाणा और जालौर क्षेत्र शामिल हैं को गुर्जर अथवा गुजरत्रा नाम से जाना जाता था। इसकी प्राचीन राजधानी भीनमाल थी जैसा कि प्रसि़द्ध चीनी यात्री हेनसांग के यात्रा विवरण से संकेत मिलता है। डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र को पहले बांगड़ प्रदेश के नाम से जाना जाता था। आज भी प्रदेश की भाषा बागड़ी भाषा के नाम से प्रसिद्ध है।

चौहान नरेशों के राज्य शाकम्भरी (सांभर) एवं अजमेर को पूर्व में सपादलक्ष के नाम जाना जाता था। इसी प्रकार राजस्थान के विविध भू- भागों के लिए और अनेक नाम समय – समय पर प्रचलित रहे हैं। उदाहरण के लिए खींची चौहानों द्वारा अधिकृत होने के कारण गागरोन और उसका समीवर्ती क्षेत्र खींचींवाडा़, झालाओं द्वारा शासित झालावाड़ रावशेखा के वंशजों द्वारा अधिकृत प्रदेश शेखावटी, तंवर क्षत्रियों के अधीन नीमका थाना तथा कोटपूतली का निकटवर्ती प्रदेश तोरावाटी या तंवर वाटी कहलाया। इसके अलावा मेव बाहुल्य प्रदेश मेवात (वर्तमान के अलवर और भरतपुर जिले), मेरों की अधिकता के कारण अजमेर और उसका निकटवर्ती प्रदेश मेरवाड़ा प्रदेश कहलाया। आदिवासी भीलों की अधिकता के कारण भीलवाड़ा को यह नाम प्राप्त हुआ।

कई नाम ऐसे हैं जो प्राचीन काल में प्रचलित रहे हैं और आज भी लोक व्यवहार में प्रचलन में हैं जैसे कोटा- बूंदी, झालावाड़, बांरा का क्षेत्र आज भी हाड़ौती के नाम से प्रचलित है। इसी प्रकार चितौड़ को पूर्व में खिज्रराबाद, धौलपुर को कोठी तथा करौली को गोपालपाल आदि नाम से जाना जाता था। इस प्रकार राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्र या अंचल को प्राचीन संदर्भ के अनुसार विविध नामों से पहचाना गया है।

सात चरणों में बना राजस्थान
राजस्थान का वर्तमान स्वरूप 1 नवम्बर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 के अन्तर्गत अस्तित्व में आया है। भारत में रियासतों के एकीकरण का महान कार्य तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के हाथों से सम्पन्न हुआ। जब भारत आजाद हुआ उस समय राजपूताना में 19 रियासतें और 3 ठिकाने (निमराना,लावा,और कुशलगढ़)शामिल थे तथा अजमेर -मेरवाड़ा केन्द्र शासित प्रदेश था। सात चरणो में इन सभी प्रशासनिक इकाईयों का राजस्थान में विलय हुआ। इसी प्रक्रिया को राजस्थान का राजनीतिक एकीकरण कहा जाता हैं। राजनैतिक एकीकरण के सात चरण इस प्रकार हैं।

मत्स्य संघ
प्रथम चरण में 27 फरवरी,1948 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली के तत्कालीन नरेशों के समक्ष दिल्ली में केन्द्रीय सरकार की ओर से चारों रियासतों के विलीनीकरण का प्रस्ताव रखा गया जिसे चारों ने स्वीकार कर लिया। इस नए राज्य संघ का नाम श्री कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुंशी के सुझाव पर ‘‘मत्स्य’’ रखा गया। प्रथम चरण में निमराना ठिकाने का विलय भी मत्स्य संघ में कर दिया गया। इसका क्षेत्रफल 7,536 वर्गमील जनसंख्या 1.83,000 तथा वार्षिक आय 18 करोड़ 30 लाख 86 हजार रूपए थी। तत्कालीन केन्द्रीय खनिज एवं विद्युत मंत्री श्रीनरहरि विष्णु गाडगिल ने इसका उद्घाटन किया। अलवर मत्स्य प्रदेश की राजधानी तथा धौलपुर नरेश राजप्रमुख एवं अलवर नरेश प्रधानमंत्री बनाए गए। श्री युगल किशोर चतुर्वेदी और श्री गोपीलाल यादव (दोनों भरतपुर) उप प्रधानमंत्री तथा श्री मास्टर भोलाराम (अलवर), डॉ. मंगलसिंह (धौलपुर) और श्री चिरंजीलाल शर्मा (करौली) मंत्री नियुक्त किए गए।

राजस्थान संघ
राजस्थान के एकीकरण का दूसरा महत्वपूर्ण चरण 25 मार्च,1948 को पूरा हुआ जब कोटा, बूंदी, झालावाड़, बांसवाड़ा डूंगरपुर, प्रतापगढ़, किशनगढ़, टोंक और शाहपुरा रियासतों के शासकों ने मिलकर ‘‘राजस्थान संघ’’ का निर्माण किया लावा और कुशलगढ़ ठिकानों का विलय भी इसी समय हुुआ। इसका उद्घाटन भी श्री गाडगिल के हाथों ही सम्पन्न हुआ इसकी राजधानी कोटा को बनाया गया तथा कोटा के महाराव और डूंगरपुर के महारावल क्रमशः राजप्रमुख और उप राजप्रमुख बनाए गए। श्री गोकुललाल असावा ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उनकी मंत्री-परिषद के गठन की प्रक्रिया चल ही रही थी कि महाराणा उदयपुर ने भी तीन दिन बाद भारत सरकार के रियासती मंत्रालय को एक पत्र लिखकर इस नए राज्य में शामिल होने की इच्छा प्रकट की।

संयुक्त राजस्थान
तीसरे चरण में18 अप्रैल,1948 को उदयपुर रियासत का राजस्थान संघ में विलीनीकरण होने पर ‘‘संयुक्त राजस्थान’’ का निर्माण हुआ। जिसका उद्घाटन इसी दिन उदयपुर में भारत के प्रधानमंत्री पं0जवाहर लाल नेहरू ने किया। इसका क्षेत्रफल 29,977 वर्ग किलोमीटर , जनसंख्या 42 लाख 60 हजार 918 तथा वार्षिक आय तीन करोड़ 16 लाख 67 हजार 918 रूपए थी। उदयपुर को इस नए राज्य की राजधानी, वहां के महाराणा भूपालसिंह को राजप्रमुख, कोटा महाराव भीमसिंह को उप राजप्रमुख तथा श्री माणिक्यलाल वर्मा को प्रधानमंत्री बनाया गया। उनकी मंत्री परिषद में श्री गोकुल लाल असावा (शाहपुरा) उपप्रधानमंत्री तथा सर्वश्री अभिन्न हरि (कोटा),मोहन लाल सुखाड़िया,भूरेलाल बया, प्रेमनारायण माथुर (तीनों उदयपुर) और बृजसुंदर शर्मा (बूंदी) मंत्री के रूप में शामिल किए गए। वस्तुतः वर्तमान राजस्थान का स्वरूप इसी समय बना और यहीं से इसके निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

वृहद् राजस्थान
इस समय जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और सिरोही की पांच रियासतें ही ऐसी बची थी जो एकीकरण में शामिल नहीं हुई थी। इनके अलावा 19 जुलाई 1948 को केन्द्रीय सरकार के आदेश पर लावा चीफशिप को जयपुर राज्य में शामिल कर लिया गया जबकि कुशलगढ़ की चीफशिप पहले से ही बांसवाड़ा रियासत का अंग बन चुकी थी। उपरोक्त रियासतों में जयपुर, जोधपुर ओर बीकानेर अपने को स्वतंत्र रखना चाहती थी लेकिन एकीकरण की प्रक्रिया के तीव्र गति से चलने के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा था।

देश के उप प्रधानमंत्री और तत्कालीन रियासती मंत्रालय के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल की कल्पना इन चारों रियासतों को भी संयुक्त राजस्थान में विलीन कर वृहद् राजस्थान बनाने की थी। अतः रियासती मंत्रालय के सचिव श्री. वी.पी. मेनन को तत्सम्बन्धी बातचीत के लिए महाराजा मानसिंह के पास जयपुर भेजा गया साथ ही बीकानेर और जोधपुर के महाराजाओं के पास भी वृहद् राजस्थान के निर्माण का मसविदा भेज कर उसी दिन उनसे स्वीकृति मंगवा ली गई। इसके परिणामस्वरूप 14 जनवरी, 1949 को उदयपुर की एक सार्वजनिक सभा में सरदार पटेल ने जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, और जैसलमेर रियासतों के वृहद् राजस्थान में जोधपुर में सैद्धान्तिक रूप से सम्मिलित होने की घोषणा की।

इस ऐतिहासिक निर्णय को चैत्र शुक्ला प्रतिपदा,बुधवार,संवत् 206, तदनुसार 30 मार्च, 1949 को नव वर्ष की प्रभात बेला, रेवती नक्षत्र, इन्द्र योग में 10.40 बजे सरदार पटेल ने जयपुर के ऐेतिहासिक दरबार में आयोजित एक भव्य समारोह में मूर्त रूप दिया। इसमें जयपुर, जोधपुर, कोटा, झालावाड़, बांसवाड़ा, अलवर, जोधपुर, और शाहपुरा, के नरेश टोंक के नवाब कुशलगढ़ के राय हरेन्द्रसिंह, सौराष्ट के राजप्रमुख जाम साहब नवानगर, भारत के प्रथम भारतीय प्रधान सेनापति जनरल करिअप्पा,एयर चीफ मार्शल एम. मुखर्जी, केन्द्रीय खनिज एवं विद्युत मंत्री श्री एन.वी. गाडविल मणिबेन पटेल एम.के वैलोडी,रियासती मंत्रालय के सचिव श्री. वी.पी. मेनन और प्रतिनिधि श्री डी.आर. प्रधान सहित राजपूताना प्रातीय राज्यों राजस्थान कमेटी कमेटी के अध्यक्ष श्री गोकुल भाई भट्ट, अजमेर के सुप्रसिद्ध नेता श्री हरिभाऊ उपाध्याय, जोधपुर के श्री जयनारायण व्यास, मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री श्री शोभाराम, अन्य प्रमुख कांग्रेस नेता, उद्योगपति और गणमान्य नागरिक शामिल हुए।

इस समारोह में सरदार पटेल ने जयपुर महाराजा श्री मानसिंह को राजप्रमुख, कोटा महाराव श्री भीमसिंह को उप राजप्रमुख तथा श्री हीरालाल शास्त्री को नए राज्य के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। श्री शास्त्री की मंत्रिपरिषद में सर्वश्री सिद्धराज ढड्ढा (जयपुर), प्रेमनारायण माथुर और भूरेलाल बया (दोनों उदयपुर), वेदपाल त्यागी (कोटा), फूलचंद बापना, नृसिंह कछवाहा और राव राजा हणूतसिंह (तीनों जोधपुर) और रघुवर दयाल गोयल (बीकानेर) को मंत्रियों के रूप में शामिल किया गया। इसका उद्घाटन सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 30 मार्च 1949 को किया और वृहत राजस्थान के निर्माण की तिथि 30 मार्च को राजस्थान का स्थापना दिवस कहा जाता है।

मत्स्य संघ का विलय
वृहद् राजस्थान का निर्माण हो जाने के बावजूद मत्स्य संघ का अभी तक पृथक अस्तित्व था जिसने रियासतों के एकीकरण की दिशा में पहल की थी। इसका कारण यह था कि इसकी दो घटक रियासतें-अलवर और करौली तो एकमत से राजस्थान में शामिल होने के लिए तैयार थी लेकिन धौलपुर और भरतपुर इस असमंजस में थी कि वे उत्तर प्रदेश में शामिल हों अथवा राजस्थान में। श्री वी.पी. मेनन ने इसके नरेशों से बातचीत भी की लेकिन कोई निर्णय नहीं हो सका। फलत: श्री शंकर राव देव की अध्यक्षता में श्री प्रभुदयाल हिम्मतसिंह और श्री. आर.के. सिधवा की समिति गठित की गई जिसने गांव-गांव में घूमकर तथा सार्वजनिक संस्थाओं से साक्षियां एकत्रित कर रियासती मंत्रालय को राजस्थान के पक्ष में सिफारिश प्रस्तुत की। इस आधार पर 15 मई, 1949 को मत्स्य संघ राजस्थान का अंग बन गया। इस परिवर्तन के फलस्वरूप मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री श्री शोभाराम शास्त्री को मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में शामिल कर लिया गया।

राजस्थान ’ब’ श्रेणी का राज्य (सिरोही का विलय)
मत्स्य संघ की तरह सिरोही के विलय के प्रश्न पर भी राजस्थानी और गुजराती नेताओं के मध्य काफी मतभेद थे। अप्रैल 1948 में हीरा लाल शास्त्री ने मांग की कि सिरोही का राजस्थान में विलय जरूरी है। हमारे लिए सिरोही का अर्थ है गोकुल भाई और बिना गोकुल भाई के हम राजस्थान नहीं चला सकते। अत: जनवरी, 1950 में सिरोही का विभाजन करने और आबू व देलवाड़ा तहसीलों को बम्बई प्रांत और शेष भाग को राजस्थान में मिलाने का फैसला लिया गया। इसकी क्रियान्विति 7 फरवरी, 1950 को हुई। लेकिन आबू और देलवाड़ा को बम्बई प्रांत में मिलाने के कारण राजस्थान-के पुनर्गठन के समय इन्हें वापस राजस्थान को देना पड़ा।

सातवां चरण राजस्थान (वर्तमान स्वरूप) (1 नवम्बर, 1956) भारत सरकार द्वारा श्री फजल अली की अध्यक्षता में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर एक नवम्बर, 1956 को तत्कालीन अजमेर-मेरवाड़ा राज्य को भी राजस्थान में विलीन कर दिया गया जो अब तक केन्द्र शासित “सी” श्रेणी का राज्य था और जिसकी अपनी पृथक मंत्रिपरिषद और विधानसभा कार्यरत थी। इसी के साथ मध्य भारत के मंदसौर जिले की मानपुरा तहसील का सुनेलटप्पा ग्राम राजस्थान में शामिल किया गया जबकि राजस्थान के कोटा जिले का सिरोंज नए मध्यप्रदेश को स्थानांतरित कर दिया गया।

इस प्रकार 18 मार्च 1948 को आरम्भ हुई राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया 1 नवम्बर 1956 को 7 चरणों में जाकर सम्पन्न हुई और वर्तमान राजस्थान अस्तित्व में आया। गुरूमुख निहाल सिंह राजस्थान के प्रथम राज्यपाल और। मोहन लाल सुखाड़िया प्रथम मुख्यमंत्री बने। राजस्थान में समय-समय पर प्रशासनिक दृष्टि से नए जिलों का गठन होता रहा और वर्तमान में राजस्थान में 10 संभाग और 50 जिले अस्तित्व में हैं।

(लेखक मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं और कोटा में रहते हैं)

image_print

एक निवेदन

ये साईट भारतीय जीवन मूल्यों और संस्कृति को समर्पित है। हिंदी के विद्वान लेखक अपने शोधपूर्ण लेखों से इसे समृध्द करते हैं। जिन विषयों पर देश का मैन लाईन मीडिया मौन रहता है, हम उन मुद्दों को देश के सामने लाते हैं। इस साईट के संचालन में हमारा कोई आर्थिक व कारोबारी आधार नहीं है। ये साईट भारतीयता की सोच रखने वाले स्नेही जनों के सहयोग से चल रही है। यदि आप अपनी ओर से कोई सहयोग देना चाहें तो आपका स्वागत है। आपका छोटा सा सहयोग भी हमें इस साईट को और समृध्द करने और भारतीय जीवन मूल्यों को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए प्रेरित करेगा।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -spot_img

वार त्यौहार