Thursday, February 22, 2024
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मध्यप्रदेश में भाजपा की लगातार जीत – विश्वास और रिश्तों का परिणाम

समाज की आम धारणा है कि चुनौती अपने साथ सफलता लेकर आती है और इस धारणा को परखें तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सौ फीसदी खरे उतरते हैं। 2023 का विधानसभा चुनाव उनके लिए चुनौती भरा था। राज्य में आम आदमी के बीच वे लोकप्रिय और विश्वसनीय चेहरा रहे हैं। ऐसे में उन्हें असफलता हाथ लगती तो यह धारणा ध्वस्त हो जाती लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शिवराज सिंह चौहान ना केवल चुनौती का डटकर सामना किया बल्कि पांचवीं बार भाजपा को विजय दिलाकर इस बात को स्थापित कर दिया कि उनके जैसा दूजा कोई नहीं है। 1956 में मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ तब मध्यप्रदेश की राजनीति में पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र राजनीति के चाणक्य कहे गए थे। इसके बाद इसी रूप में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी छाप छोड़ी। इसके इतर अन्य मुख्यमंत्री अपनी-अपनी कार्य-शैली से पहचाने गए लेकिन सबसे जुदा रहे शिवराज सिंह चौहान। राजनीति में सौहाद्र को तो बनाये रखा बल्कि अपनी विनयशीलता के कारण वे मध्यप्रदेश के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री के रूप में अपना स्थान बनाया। एक राजनेता की तरह वे चाणक्य के रूप में खुद को तो स्थापित नहीं किया लेकिन जनता की नब्ज पहचानने में उन्होंने कोई भूल नहीं की।

2005 में जब वे मुख्यमंत्री बने तब उन्हें किसी ने सीरियस नहीं लिया था। भाजपा के पहले जनता पार्टी शासनकाल में मैं गया, तू आया की राजनीति चल रही थी। 2003 में यही जनता पार्टी भाजपा बनकर दस वर्ष पुरानी कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर रिकार्ड सीटों से सरकार बनायी। तब की फायरब्रांड एवं मध्यप्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री उमा भारती का कार्यकाल महज एक वर्ष के आसपास ही रहा। इसके बाद बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने लेकिन वे भी एक वर्ष तक ही मुख्यमंत्री रह सके। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी हुई लेकिन उन्हें भी शार्ट टर्म सीएम माना गया। पार्टी के भीतर और विपक्षी दलों ने उन्हें बहुत गंभीरता से नहीं लिया। तीन वर्ष मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने के बाद पहली चुनौती के रूप में 2008 का विधानसभा चुनाव था। इसमें जय मिलती तो शिवराज सिंह के लिए रास्ता आसान होता और पराजय मिलती तो नेपथ्य में चले गए होते। वे प्रदेश और जनता की नब्ज पहचानते थे और 2008 में उन्होंने पहला प्रयोग किया मुख्यमंत्री पंचायत की। इस बहाने मुख्यमंत्री निवास का कपाट आम आदमी के लिए खोल दिया गया। इसके पहले यह कपाट एक तिलस्म की तरह था। यहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह समाज के हर वर्ग की पंचायत करते हैं और उनके साथ बैठकर थाली में खाना खाते हैं। शिवराज सिंह की इस अदा पर जनता फिदा हो गई और तमाम कयासों पर पानी फेरते हुए वे सत्ता में वापसी करते हैं।

अब 8 वर्ष बाद फिर उनके सामने चुनौती थी कि सत्ता में वापसी कैसे हो? क्योंकि यह धारणा बना ली गई थी कि एंटीइनकमबैंसी के चलते भाजपा की सरकार में वापसी संभव नहीं होगी। लेकिन दूरदृष्टि वाले शिवराज सिंह चौहान की रणनीति को राजनीतक विश्लेषक भी समझ नहीं पाए। इस बार वे लाडली लक्ष्मी लेकर आए। यह योजना अपने आपमें एकदम अलग थी। लोगों, खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में इसका असर ऐसा हुआ कि सबको धता बताते हुए शिवराज सिंह सत्ता में लौट आते हैं। 13 वर्ष के लंबे कार्यकाल के बाद 2018 उनके लिए अग्रिपरीक्षा के भांति होता है और इस बीच वे प्रदेश के बुर्जुगजनों के लिए मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना लेकर आते हैं। सत्ता विरोधी व्यवहार और थोड़ी विपक्षी दल की आक्रमता के साथ बहुत मामूली अंतर से चुनाव हार जाते हैं। कोई 15 महीने के छोटे से कार्यकाल में सत्तासीन दल आपसी दंगल में सत्ता गंवा बैठते हैं और शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता की बागडोर संभालते हैं।

वर्ष 2018 से आगे चलकर 2023 का विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह के लिए अग्रिपरीक्षा की तरह होता है। तमाम पूर्वानुमानों में शिवराज सिंह सरकार की पराजय की भविष्यवाणी की जाने लगी। एकबारगी तो लगा कि यह पूर्वानुमान सच साबित हुआ तो 18 वर्ष के मुख्यमंत्री को नेपथ्य में जाना पड़ सकता है लेकिन एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान का जादू चल गया। इस बार प्रदेश की हजारों बहनों के लिए उन्होंने ‘लाडली बहना’ स्कीम लांच की। पहले एक रुपये नेग के दिए और उसके बाद एक हजार और फिर 1250 रुपये हर महीने महिलाओं के खाते में जमा होता रहा। शिवराज सिंह चौहान स्वयं कहते हैं कि यह पैसा इमदाद नहीं है बल्कि बहनों के आत्मविश्वास और उनके सशक्तिकरण का एक नेग है। भाई-बहन के विश्वास और मामा-भांजी के रिश्तों की डोर इतनी मजबूत हो चुकी थी, इसका कोई पूर्वानुमान नहीं लगा सका। वो सारे पूर्वानुमान धराशायी हो गया जो शिवराज सिंह को सत्ता से बेदखल कर रहे थे। 2023 के चुनाव परिणाम में रिकार्ड सीटों से जीतकर शिवराज सिंह चौहान ने बता दिया कि उनकी टक्कर में कोई नहीं।

शिवराज सिंह ने स्वयं को कभी भी मध्यप्रदेश की जनता के बीच मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। किसी का बेटा, तो किसी का मामा तो किसी का भाई बनकर एक परिवार के रूप में प्रदेश को चलाने की कोशिश की। चुनाव के दरम्यान झाबुआ से लेकर मंडला तक रोज कई-कई सभा कर रहे थे। वे कोई कोर-कसर नहीं छोडऩा चाहते थे। वे कुशल संचारक हैं और अपनी बात पहुंचाने में कामयाब रहे। लोगों को लगा कि एक बार शिवराज सिंह को खो दिया तो उनकी चिंता करने वाला दूसरा कोई नहीं मिलेगा। इस एक विश्वास ने शिवराज सिंह चौहान को घर-घर का चहेता बना दिया। इस बात के लिए भी शिवराज सिंह चौहान बधाई के पात्र हैं कि वे महिलाओं की इतनी चिंता करते रहे हैं कि अपनी योजनाओं के माध्यम से सामाजिक कलंक भू्रण हत्या पर भी नियंत्रण पा लिया। ताजा आंकड़ें बताते हैं कि मध्यप्रदेश एकमात्र राज्य है जहां लिंगानुपात की जो खाई बढ़ रही थी, वह सिमट रही है। यह कहना फिजूल की बात होगी कि उनकी योजनाएं लोकप्रिय हैं लेकिन यह बात दावे से कही जा सकती है कि उनकी योजनाओं में सामाजिक सरोकार की बुनियाद है जो नए मध्यप्रदेश की संरचना में योगदान कर रही हैं।

हिंदी पट्टी में रिकार्ड शिवराज के नाम

हिंदीपट्टी राज्यों में आमतौर पर पांच वर्ष में सत्ता परिवर्तन का व्यवहार देखने को मिलता है। एक पांच साल यह तो एक पांच साल वह का रिवाज रहा है। छत्तीसगढ़ में रमन सरकार ने 15 साल सत्ता में रहने का रिकार्ड बनाया तो बिहार और यूपी में दस वर्ष का कार्यकाल रहा है। बंगाल और उड़ीसा जो गैर-हिंदीभाषी राज्य हैं वहां सरकार लम्बे समय तक चलती रही हैं। लेकिन मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह सरकार ने इन सारे रिकार्ड को ध्वस्त करते हुए आगे निकल गए हैं।

अपने ही विरोधी बन गए थे

शिवराज सिंह चौहान की यह जीत अनेक मायनों में उपलब्धि भरा है। चौथी बार सीएम की कुर्सी सम्हालते ही उनके अपने उनके विरोधी हो चले थे। अनेक बार यह अफवाह उड़ायी गई कि शिवरासिंह को कभी भी सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। विनयशील शिवराज सिंह इन सबसे बेखबर नहीं थे लेकिन जवाब पलटकर नहीं दिया। वे अपनी उपलब्धियों का सारा श्रेय पार्टी, अपने नेता नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा को देते रहे। मोदी और शाह की टीम में शिवराज सिंह ने अपनी विनम्रता के चलते ऐसा स्थान बना लिया जिसे आप विश्वास का रिश्ता कह सकते हैं। पांचवीं बार शिवराज सिंह की ताजपोशी होती है या नहीं, इसका फैसला पार्टी करेगी लेकिन भरोसा किया जाना चाहिए कि वाजिब हकदार शिवराज सिंह चौहान हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवँ वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

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