Sunday, July 14, 2024
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Homeअध्यात्म गंगाशंकराचार्य रचित महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का मूल पाठ और इसका हिंदी अनुवाद

शंकराचार्य रचित महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का मूल पाठ और इसका हिंदी अनुवाद

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्य शिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 1
अयि — हे
गिरिनन्दिनि — गिरि की नन्दिनि अर्थात् हे हिमालायराज की कन्या
नन्दितमेदिनि — जो मेदिनी (धरा/भूमि) नंदित (प्रसन्न) हो
विश्वविनोदिनि — विश्व का विनोद करने वाली (आनंद देने वाली)
नन्दिनुते — नंदी आदि गण जिनके सामने नत हो (जिंका नमन करे)
गिरिवरविन्ध्य — गिरिवर विन्ध्य (विंध्य पर्वत का मानवीकरण क्योंकि पार्वती पर्वत की पुत्री हैं)
शिरोऽधिनिवासिनि — शिरः + अधिनिवासिनी (के शीश/शिखर पर रहने वाली)
विष्णुविलासिनि — जिनसे विष्णु का विलास हो, अर्थात भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाली
जिष्णुनुते — जिनको जिष्णु (अर्थात सदैव विजय प्रपट करने वाले विष्णु, कुछ प्रसंगों में इन्द्र) नमन करे
शितिकण्ठकुटुम्बिनि — शिति (नीला) है जिनका कण्ठ, उनके कुटुम्ब की सदस्या [भगवान् नीलकंठ (शिव) के परिवार की सदस्या (पत्नी)]
भूरिकुटुम्बिनि — भू (धरती) की कुटुम्बिनि
भूरिकृते — भू जिनकी कृति (रचना) है
महिषासुरमर्दिनि — महिशासुर का मर्दन (वध) करने वाली
रम्यकपर्दिनि — जिनकी कपर्दिनि (घुँघराले, जटाओं वाले, चोटी में बंधे बाल) रम दे (आकर्षित करे)
शैलसुते — शैल (पर्वत) की सुता (पुत्री)

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 2
सुरवर — सुरों (देवताओं) पर वर की वर्षा करने वाली
दुर्धरधर्षिणि — जिन्हें धरा न जा सके (असुर), उनका धर्षण (वध) करने वाली
दुर्मुखमर्षिणि — दुः + मुख, जिनकी वाणी में पाप हो, उनका भी मर्षण करने वाली (उनको भी क्षमा करने वाली)
हर्षरत — जो हर्ष (प्रसन्नता) में रत (व्यस्त) रहे
त्रिभुवनपोषिणि — त्रिभुवन (तीनों लोकों) का पोषण करने वाली
शङ्करतोषिणि — शङ्कर का तोषण (को प्रसन्न) करने वाली
किल्बिषमोषिणि — किल्बिष (अन्याय या पाप) का मोषण (हरण) करने वाली
घोषरत — जो (विजय)घोष में रत रहती हों (जो गरजती हों)
दनुजनिरोषिणि — जो दनुज (दानव) पर रोष (क्रोध) करती हैं
दितिसुतरोषिणि — दिति के पुत्रों (दैत्यों) पर रोष करने वाली
दुर्मदशोषिणि — दुः + मद (अनुचित मद अर्थात दंभ) का शोषण करने वाली (घमंड समाप्त करने वाली)
सिन्धुसुते — सिन्धु की सुता (पुत्री, ऋग्वेद के देवीसूक्त 10.125.3 – 10.125.8 में माँ शक्ति को सिन्धु अर्थात सागर की पुत्री बताया गया है)

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते
शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते।
मधुमधुरेमधुकैटभ गञ्जिनि कैटभ भञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 3
जगदम्ब — जगत की अम्ब/अम्बा (माता)
मदम्ब — मत + अम्ब या मद + अम्ब अर्थात हमारी मति और हमारे मद को दिशा देने वाली
कदम्बवनप्रियवासिनि — कदम्ब के वन में वास करना (रहना) जिनको प्रिय है
हासरते — हास्य में रत
शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालय — हिमालय के शिरोमणि (सर्वोच्च) शिखर पर स्थित
शृङ्गनिजालय मध्यगते — उस शृङ्ग तक पहुँचने की यात्रा में जिंका आलय (गृह) पड़ता हो
मधुमधुरे — मधु (शहद) की भाँति मधुर (मीठा/मीठी)
मधुकैटभ गञ्जिनि — मधु एवं कैटभ का गञ्जन (तिरस्कार) करने वाली
कैटभ भञ्जिनि — कैटभ दैत्य का भञ्जन करने वाली (को तोड़ने वाली)
रासरते — सदैव रास में रत

शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुंड गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 4
शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित — शत (सौ) खण्डों में रुण्ड (धड़ विहीन शरीर) का वितुण्डन करने वाली (को काटने वाली)
शुंड गजाधिपते — इसी प्रकार गज (हाथी) के अधिपति (प्रमुख) की सूंड को काटने वाली
रिपुगजगण्ड — रिपु (शत्रु) के गजों के गण्ड (दल)
विदारणचण्ड — चण्ड (अत्यंत) विदारण (टुकड़े टुकड़े) करने वाला
पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते — हालांकि “मृग” को प्रायशः केवल हिरण माना जाता है, शब्द का वृहत अर्थ है “पशु”; पशु के अधिपति अर्थात शेर, यह माँ के सिंह की ओर संकेत है
अब एक साथ “रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते” को पढ़ें तो अर्थ यह निकलता है — शत्रु के हथियों की वाहिनी को उनकी शक्तिशाली सूँड़ों समेत छिन्नभिन्न करने वाले शेर की सवारी करने वाली माता
निजभुजदण्ड — निज (अपनी) भुजाओं के अस्त्रों से
निपातितखण्ड — निपातित (नीचे पड़े हुए) खण्ड (टुकड़े) चण्ड
विपातितमुण्ड — विपातित (कट कर गिरा हुआ) मुण्ड (सिर)
भटाधिपते — भट (योद्धा) के अधिपति (सेनापति)
यहाँ तक पढ़ लेने के पश्चात युक्त संदर्भ में चण्ड और मुंड नामक दैत्यों के दलन का अर्थ भी निकलता है, वहीं इन शब्दों के शाब्दिक अर्थ भी बताए जा चुके हैं

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 5
रणदुर्मद — रण (युद्ध के) दुः (बुरे) मद वाले
शत्रुवधोदित — शत्रु के वध से उदित (उभरी हुई)
दुर्धरनिर्जर — दुः + धर (जो पकड़ में न आए) ऐसे निः + जर (वृद्ध) युवा, अर्थात माता ऐसी हैं जिनको प्राप्त करना असंभव है और वे सदैव यौवनावस्था में रहती हैं, उनको बुढ़ापा नहीं आता
शक्तिभृते — शक्ति जिनका भृत (नौकर) है या जो शक्ति को धारण करती हैं
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते — प्रमथ + अधिपति (शिव) के चतुर विचार जान कर जो उन्हें अपना दूत बना लेती हैं
दुरितदुरीह — असहज व बुरे विचार वाला
दुराशयदुर्मति — दुः + आशय (जिनका आशय बुरा हो)
दुर्मति — दुः + मति (जिनकी मति मारी गई हो)
दानवदूत — दानव के दूत
कृतान्तमते — के कृत (कार्य या कर्म) का अंत करने वाली

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे।
दुमिदुमितामर दुंदुभिनाद महोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 6
शरणागत — शरण में आगत (आया हुआ)
वैरिवधुवर — वैरि (शत्रुओं) के वधुवर (के पतियों और पत्नियों)
वीरवराभय दायकरे — वीरवर को अभयदान देने वाली (अर्थात भले ही राक्षसियों के पति या राक्षसों की पत्नियाँ धर्म के शत्रु हों, शत्रुओं के स्वजन से माता का कोई बैर नहीं)
त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे — त्रिभुवन (तीनों लोकों) के शूल (पीड़ा) का कारण बनने वाले दैत्यों के सिरों को अपने त्रिशूल द्वारा अधिकृत (अपने अधिकार में लेकर या उनकी स्वामिनी बन कर उनका वध) करने वाली
दुमिदुमितामर दुंदुभिनाद — ‘दुमि दुमि’ की ध्वनि करने वाले दुंदुभि वाद्य (एक प्रकार का drum)
महोमुखरीकृत दिङ्मकरे — (जब) प्रत्येक दिक् (दिशा) में महा मुखर हो

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणित बीजलते।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 7
निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते — मात्र निज (अपनी) हुङ्कृति (हुंकार) से धूम्रलोचन राक्षस का धुआँ उड़ाकर निः + आकृत (निराकरण) करने वाली
शोणित बीजलता — रक्त के बीज से समुद्भव — सम + उद्भव (पुनर्जीवित होने वाले) शोणितबीज (रक्तबीज, शोणित — ख़ून) को समर (युद्ध द्वारा) विशोषित (सुखाने) वाली
शुम्भ और निशुम्भ (के दलन के समय हुए) महाहव (महायुद्ध) में शिवशिव के भूत पिशाच का तर्पण करने वाली

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हतावटुके।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥


श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 8

धनुरनुषङ्ग — धनुष व अनुषङ्ग (अन्य आयुध) सहित
रणक्षणसङ्ग — रण (युद्ध) के समय
परिस्फुरदङ्ग — अद्भुत दिखती हैं
नटत्कटके — उनके धनुष की टंकार ऐसी है मानो युद्ध नहीं, नाटक का मंचन हो रहा हो
कनकपिशङ्ग — (शत्रु उनपर) स्वर्णिम व लाल रंग के तीरों (से आक्रमण करता है)
पृषत्कनिषङ्ग — पृषत्क (बाण) व निषङ्ग (तलवार)
रसद्भटशृङ्ग — योद्धाओं के सिर का रसास्वादन करते हुए
हतावटुके — मायावी राक्षसों का वध करने वाली
कृतचतुरङ्ग — चतुरंगी सेना (गजारूढ़, घुड़सवार, रथी व पदातिक) को रचने वाली
बलक्षितिरङ्ग — (बलक्ष अर्थात सफ़ेद) शत्रु को हतप्रभ करने वाली
घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके — बहुरंगी (बहुरूपिये) राक्षसों के घट व रट (ध्वनि) से विचलित न होने वाली

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 9
सुरललना — सुर की ललना (स्त्री)
ततथेयि तथेयि — नृत्य की अभिव्यक्ति
कृताभिनयोदर (कृत+अभिनय+उदर) नृत्यरते — अभिनय करता नृत्य में रत (व्यस्त) उदर (शरीर या पेट)
कृत कुकुथः कुकुथो — विशेष ताल में
गडदादिकताल — ग-ड-धा ताल में
कुतूहल गानरते — कौतूहल जागृत करने वाली संगीत के साथ
धुधुकुट धुक्कुट ताल में धिंधिमित (एक विलंबित ताल की) ध्वनि धीर मृदंग समेत निनादरते (आवाज़ करती हुई)

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुर शिञ्जितमोहित भूतपते।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 10
जय जय जप्य (जपता हुआ) जयेजयशब्द (जयकारा लगता हुआ) परस्तुति (अन्य की स्तुति/प्रशंसा) में तत्पर समग्र विश्व
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत (इस प्रकार झंकार करता हुआ) नूपुर भूतपति (महादेव को) शिञ्जित (रस में डुबोकर) मोहित करता है।
नटित (नाटकीय रूप में) नटार्ध (आधा नट करती) नटी (नाटक करने वाली/अभिनेत्री) नट के नायक नाटितनाट्य (नाटक के द्वारा) सुगानरते (संगीतमय करती है)

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 11
अयि (हे) सुमनःसुमनःसुमनः (सौम्य मन द्वारा) सुमनःसुमनोहरकान्तियुते (सुंदर मन को अपने सुंदर मन की आभा से आलोकित करती हुई)
श्रित रजनी (रात जिसके अधीन हो ऐसी) रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते (अपनी उस आभा से प्रकाशमय करती हुई)।
सुनयन विभ्रमर (सुंदर नैनों वाला भंवर) भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते (भँवरों को सम्मोहित करने वाली)

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 12
सहित महाहव (महायुद्ध) मल्लमतल्लिक (उत्तम मल्लयोद्धा) मल्लितरल्लक (बेली के फूल की डालियों समान कोमल होते हुए भी) मल्लरते (मल्लयुद्ध कर रही है)
विरचितवल्लिक (फूल की डालियों समान कोमल परंतु एक दूसरी में लिपटी) झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते (भील समाज की स्त्रियॉं) पल्लिकमल्लिक (की नेत्री बेली)
शितकृतफुल्ल (प्रसन्नता से चेहरा खिला हुआ) समुल्लसितारुण (उल्लासित तरुणी) तल्लजपल्लव (अंकुरित) सल्ललिते (क्रीड़ा करती हुई)

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 13
अविरलगण्ड (गालों से लगातार बहता हुआ) गलन्मदमेदुर (मद में चूर करता प्रवाह) मत्त मतङ्ग (मदमाते हाथी के समान) जराजपते (ऐसे हाथी के वदन से चूता हुआ)
त्रिभुवनभुषण (तीनों लोकों का भूषण) भूतकलानिधि (कलाओं की अधिष्ठात्री) रूपपयोनिधि (रूप जिंका आलय हो) राजसुता (राजपुत्री)
अयि सुदतीजन (सुंदर मुस्कान वाली) लालसमानस (मन की इच्छा) मोहन मन्मथराजसुते (सौन्दर्यराज मन्मथ की पुत्री)

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 14
कमलदलामल (बिना दोष के कमाल के फूल की पंखुड़ी जैसी) कोमलकान्ति (कोमल तेजमाय) कलाकलितामल भाललते (जिंका कपाल ऐसे सुंदर आकृति का हो)
सकलविलास (समग्र ऐश्वर्य की प्रतिमूर्ति) कलानिलयक्रम (सभी कलाओं के विद्यालय) केलिचलत्कल हंसकुले (हंस के दल समान कोमल चालों वाली)
अलिकुलसङ्कुल (मधुमक्खियों के समूह से आवृत्त) कुवलयमण्डल (नीलकमल जैसी) मौलिमिलद्बकुलालिकुले (लंबी चोटी)

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।
निजगुणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 15
करमुरलीरव (हाथ में जो बांसुरी है, उसकी धुन) वीजितकूजित (से ध्वनिमय) लज्जितकोकिल (शरमाये कोयल की तरह) मञ्जुमते (सुंदरता)
मिलितपुलिन्द (पुलिंद जाती के समूह के साथ) मनोहरगुञ्जित (मन को हरने वाली ध्वनि करती हुई) रञ्जितशैल (लाल रंग की पहाड़ी) निकुञ्जगते (के गृह की ओर प्रस्थान करती हुई)
निजगुणभूत (अपने लोगों से घिरी हुई) सद्गुणसम्भृत महाशबरीगण (अच्छे गुणों वाली कबीले की स्त्रियॉं समेत) केलितले (खेलती हुई)

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे।
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 16
कटि तटपीत (कमर तक गीली) दुकूलविचित्र (कई रंगों के रेशमी धागे) चन्द्ररुचे (चाँद समान) मयुखतिरस्कृत (प्रकाशमय)
प्रणतसुरासुर (सुर व असुर जिसे प्रणाम करे) मौलिमणिस्फुर (जिनके मुकुट का माणिक चमक रहा हो) दंशुलसन्नख (जिनके पैर के नाख़ुन चमक रहे हों) चन्द्ररुचे (ऐसे चंद्र समान)
जितकनकाचल मौलि मदोर्जित (जिन्होंने सोने के पर्वत जीत लिए हों अर्थात जो अभिमानी हों) निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे (ऐसे दीप्त वक्षों वाली)

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।
[३]सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 17
विजितसहस्रकरैक (सहस्र से अधिक भुजाओं पर विजय प्राप्त करने वाली) सहस्रकरैक (सहसरों भक्तों के हाथों से जिनकी प्रार्थना होती हो) सहस्रकरैकनुते (सहसरों जिनके आगे नतमस्तक हों)
कृतसुरतारक (देवताओं की रक्षा करने वाली) सङ्गरतारक (तारकासुर से लड़ने वाले) सूनुसुते (कार्तिक की माँ)
सुरथसमाधि (सांसारिक सभी वस्तुओं के स्वामी सुरथ राजा को) समानसमाधि (जो सम्मान मिलता है उतने सम्मान की अधिकारिणी) समाधिसमाधि (समाधि नामक व्यापारी जिनकी पूजा करता है) सुजातरते (उनकी भक्ति से प्रफुल्लित)

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 18
पदकमलं (कमल रूपी पैर) करुणानिलये (जिस निवास पर पड़े ऐसी करुणा के भंडार) योऽनुदिनं (प्रतिदिन) वरिवस्यति (का भक्ति समेत जो उनका वरण करते हैं) सुशिवे (उनके लिए अत्यंत शुभ होता है)
अयि कमले (हे कमला) कमलानिलये (कमल के आवास वाली, लक्ष्मी) कमलानिलयः स कथं न भवेत् (जो आपकी पूजा करे उसके लिए क्या नहीं संभव है?)
तव पदमेव (आपके पद के गृह पर पड़ते ही) परम्पदमित्यनुशीलयतो (या हमारे घर की ओर आपके चल पड़ते ही) मम किं न शिवे (वह कौन सा शुभ कार्य है जो कि नहीं होता?)

कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनु षिञ्चति ते गुण रङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भ तटीपरिरम्भ सुखानुभवम्।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 19
कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनु (सोने के समान चमकने वाले नदी का पानी जहां प्रवाहित हो) षिञ्चति ते गुण रङ्गभुवम् (ऐसे गृह में रहने वाली)
भजति स किं न शचीकुचकुम्भ तटीपरिरम्भ सुखानुभवम् (आपकी अनुकंपा का अनुभव करते हुए आपका भजन करते हैं)
तव चरणं शरणं करवाणि (आपके चरणों का ही शरण है) नतामरवाणि (साष्टांग प्रणाम करते हैं) निवासि शिवम् (शुभ आलय वाली)

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 20
तव विमलेन्दुकुलं (सम्पूर्ण पवित्रता वाली) वदनेन्दुमलं (चन्द्र समान मुख) सकलं ननु कूलयते (जो सभी अशुद्धियों का दमन करता है)
किमु पुरुहूतपुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते (मेरा मन इन्द्र के महल में उपस्थित चन्द्रमा जैसी सुन्दर ऐसे मुख से क्यों विमुख हो?)
मम तु मतं शिवनामधने (शिव के नाम से जो धन्य हो) भवती कृपया किमुत क्रियते (मेरा मानना है कि आपकी कृपा के बिना हमारे भीतर शिव के नाम का धन कैसे समाहित हो सकता है?)

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।
यदुचितमत्र भवत्युररी कुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् 21
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव (इस दरिद्र पर दया और कृपा) त्वया भवितव्यमुमे (आपको करना ही पड़ेगा)
अयि जगतो जननी (हे जगत कि माता) कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते (जिस प्रकार आपके बाण प्रत्येक दिशा में चलते हैं, उसी प्रकारा हर दिशा में अपने आशीर्वाद की वर्षा करें)
यदुचितमत्र (इस समय इस स्थान पर जो भी उचित ओ) भवत्युररी कुरुतादुरुतापमपाकुरुते (मेरे दुखों और कष्टों को समाप्त कीजिये)

इति श्रीश्रीआदिशंकराचार्यविरचितम् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम्॥

साभार https://swadharma.in/ से

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