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सरोज त्रिपाठी का संसार से जाने का अर्थ : पत्रकारिता के एक जुनून का चले जाना

कोरोना का कहर मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार सरोज त्रिपाठी को भी अपनी आगोश में समेटकर ले गया। पिछली 23 अप्रैल को कोरोना उनसे मिलने आया था, लेकिन जाने का नाम ही नहीं ले रहा था। बहुत कोशिशें की उससे पिंड छुड़ाने की, अस्पताल में भी भर्ती हुए, लेकिन कोरोना माना ही नहीं। मुंबई में मीरा रोड़ के वॉकहार्ट अस्पताल से ही 17 मई 2020 की सुबह 8.30 बजे उन्हें सीधे उठा ले गया और सरोजजी की देह शांत हो गई। कोरोनाकाल में दुर्भाग्य की भयावहता का आलम यह है कि अपन जैसे बहुत सारे और तुर्रमखां पत्रकार जो हर कहीं घुस जाने की हैसियत रखते हैं, वे भी अपने साथियों के अंतिम दर्शन तक न करने को ही अपना भाग्य मानने को बाध्य है। लगने लगा है कि ईश्वर ने अब प्रार्थनाएं सुनना बंद कर दिया है। सुनता होता, तो सरोजजी के शुभचिंतक तो उनके शीघ्र स्वस्थ्य होने की प्रार्थना कर ही रहे थे। मुंबई के मीडिया जगत को सरोजजी के निधन की पहली उनके करीबी मित्र वरिष्ठ पत्रकार विमल मिश्र से मिली, तो सारे साथी सन्न रह गए।

आहत भाव से नवभारत टाइम्स के राजनीतिक संपादक अभिमन्यु शितोले ने कहा – सरोजजी का जाना हिंदी पत्रकारिता के जुनून का जाना है। वे एक अच्छे शिक्षक, विचारक, अभ्यासक थे। किताबें उनकी करीबी मित्र थीं। कानून की बारीकियों को जानना और समझना और फिर साथियों को समझाना उन्हें भाता था। एक दीर्घकाल तक नवभारत टाइम्स में उनके साथी रहे विमल मिश्र यादों के समंदर में डूबते हुए बोले – हमेशा प्रगतिशील सुधारों के समर्थक रहे सरोज त्रिपाठी ब्रिटिश भारतीय इतिहास के एक अत्यंत उत्सुक छात्र थे और आपातकाल के बाद के दिनों में वे क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए छात्र आंदोलन का हिस्सा भी थे। पत्रकारिता शायद वहीं से खींचकर उन्हें अपने यहां ले आई थी। राजकुमार सिंह ने लिखा – मुंबई में पत्रकारिता के अनगिनत छात्रों को पत्रकारिता का ककहरा सिखानेवाले सरोजजी सदा याद रहेंगे। मुंबई हिंदी पत्रकार संघ के अध्यक्ष आदित्य दुबे ने यह कहते हुए श्रद्धांजलि दी कि – मुंबई विश्वविद्यालय के गरवारे इंस्टिट्यूट में वे पत्रकारिता के गुर सीखा रहे थे, उनका जाना पत्रकारिता जगत को अपूर्णीय क्षति हुई है। दैनिक जागरण के ब्यूरो प्रमुख ओमप्रकाश तिवारी बोले – सरोजजी का जाना बहुत दुखी कर गया। दरअसल, सरोजजी शांत चरित्र के थे और सहज व्यक्तित्व के थे, इसीलिए वे सदा सभी की समृतियों में रहेंगे।

दौर उदासियों का है, सो नवभारत टाइम्स के पन्ने भी अब शायद उदास होंगे, क्योंकि सरोज त्रिपाठी वहीं से हाल ही में सेवा समापन के पश्चात निवृत्त जीवन बिता रहे थे, और आज जीवन से भी न चाहते हुए भी निवृत्ति लेनी पड़ी। माहौल मुसीबतों का है, सो स्वयं के संक्रमित होने के डर से सरोजजी के शुभचिंतक और साथी भी सपाट चेहरों और एक से भावों के साथ अकेले ही उन्हें श्रद्धांजलि देने को विवश हैं। वे समृद्ध भाषा के धनी थे, और जानते थे कि भाषा का अपना एक अलग व्याकरण होता है। किंतु इस बात से संभवतया अनभिज्ञ थे कि मृत्यु का भी अपना एक अलग व्याकरण होता है और उसमें अवरोधों के अलंकारों के लिए कोई जगह नहीं होती। इसीलिए लाख कोशिशों और हजारों प्रार्थनाओं के बावजूद वे रुक नहीं पाए, चल दिए कोरोना के साथ। लेकिन अपरिचित आख्यानों के अत्यंत आहत करनेवाले इस अरण्य में भले ही हम जिंदा है, तो भी मर रहे हैं, तिल तिल, पल पल भीतर से, बाहर से, हर तरफ से। कोई नहीं जानता कि आगे कब, किसका, क्या होगा? इसलिए हम सभी, सबके सुखी रहने की कामना तो कर रहे हैं, किंतु सुख के गरीब सपनों की विडंबना यह है कि वे अक्सर दगा दे जाते हैं!

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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