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करें राष्‍ट्र का पुनर्निमाण : इंडिया हटाओ, भारत लौटाओ , रीते कुएं प्‍यासे हम

आज ई. सन् २०१५ की पहली तारीख को मैं यह लेख लिख रही हूं। चारों तरफ से पागल शुभकामनाओं ने धावा बोला हुआ है। तथाकथित नया साल २०१५ आज से प्रारंभ जो हो गया है। बाहर चुभने वाली शीत और सर्दी में जकड़ने वाली बरसात दोनों का खासा प्रकोप है। आज ऐसा कोई काम भी नहीं है जो कंपकंपाते हाड़ सहित घर से बाहर निकलने के लिए मुझे बाध्‍य करे। मेरे लिए साल के बदलने का भी ऐसा कोई खास अर्थ नहीं है जो हाड़ को घर पर ही रखकर मुझे होटल में जाकर न खाने योग्‍य चीजें खाने और दारू पीकर सड़क पर नाचने के लिए उकसा सके। इसलिए शुभकामनाओं के प्रत्‍यक्ष आक्रमण से तो बची हुई हूं पर मोबाइल फोन की कर्ण कटु ध्‍वनि आज इतनी सुननी पड़ी है कि सुबह का भोजन प्रात: ग्‍यारह बजे की बजाय बड़ी मुश्‍किल से एक बजे नसीब हुआ है। अंतर्तंत्र(इंटरनेट) पर उपलब्‍ध भांति-भांति की संदेश सेवाओं के माध्‍यम से प्राप्‍त शुभकामना संदेशों को तो मैंने अभी प्रतीक्षारत ही रख छोड़ा है। एक संदेश खोलकर देखा था तो वहां भी एक ऊंटपटांग सा छोरा मुंह में सिगार और हाथ में शेम्‍पेन की बोतल लिए नाचता दिखा। अब बाकी संदेशों को खोलकर देखने की हिम्‍मत ही नहीं पड़ रही है। उन्‍हें उनके हाल पर छोड़ दिया है। समय आने पर वे स्‍वत: सद्‍गति को प्राप्‍त होंगे।  

शुभकामना संदेश भेजने वालों का भला, न भेजने वालों का दोगुना भला। "भारतीय भाषा अभियान समूह के सदस्‍य’’ भी आज आधी रात से इसी आदान प्रदान में व्‍यस्‍त हैं। अत: मुझे थोड़ा समय मिला है अपने शुभभावों को शब्‍दबद्‍ध करने का। तो नये साल के पहले दिन निकम्‍मेपन की इस शुभ वेला में पहली शुभकामना चित्त पटल पर यह रूपायमान हुई है कि मेरे गुरुवर आचार्य विद्‍यासागर जी और उनके जैसे वीतरागी श्रमण संत युगों-युगों तक जीवन्‍त रहें और उनकी दिव्‍य देशना का लाभ हम पशुवत्‍ मनुष्‍यों को मिलता रहे, मिलता ही रहे। नव वर्ष के प्रथम दिन यह मेरी ओर से सृष्‍टि के जीव मात्र को दी जा रही शुभकामना है क्‍योंकि जब तक वे रहेंगे तब तक दूरदर्शी भारतीय संस्‍कृति की बची खुची पावन परंपराएं भी बची रहेंगी और मृत, मृतप्राय: परम्‍पराओं के पुनर्जीवित होने की आस भी बनी रहेगी। इस दिशा में उनका अतुल्‍य पुरुषार्थ सेना के जवानों को भी लज्‍जित करने में समर्थ है। गौ रक्षा का प्रकल्‍प दयोदय, कलिकाल के अभागे मानव की भाग्‍य रक्षा का प्रकल्‍प भाग्‍योदय, भारतीय भाषा अभियान, इंडिया हटाओ : भारत लौटाओ आदि अन्‍य बहुतेरे ऐसे प्रकल्‍पों के माध्‍यम से भारतीय संस्‍कृति की रक्षा का उनका प्रयास अनुपम है। उनकी प्रेरणा से ऐसे उपक्रमों में गतिशील लाखों चैतन्‍य आत्‍माएं अपने अस्‍तित्‍व की सार्थकता पाकर स्‍वयं को धन्‍य अनुभव कर  रही  हैं।

इस अवसर पर मैं प्रत्‍येक भारतीय का ध्‍यान भारतीय संस्‍कृति की ऐसी परंपराओं की ओर आकर्षित करने की धृष्‍टता कर रही हूं जिनके होने के और न होने के भी दूरगामी प्रभाव हैं। जो  हमारी अदूरदर्शी, सुविधाभोगी जीवन शैली के कारण विलोपन की कगार पर हैं। याद कीजिए कभी हमारे देश में लगभग हर घर में और खेतों में मीठे पानी से लबालब भरे हुए कुएं हुआ करते थे जो गर्मी में भी सूखते नहीं थे। बड़ी-बड़ी बावडि़यां और तालाब भी होते थे। ये कुएं, बावडि़यां और तालाब पूरी आबादी को न केवल बारहों महीने पीने का पानी उपलब्‍ध कराते थे अपितु सिंचाई के भी महत्‍वपूर्ण साधन थे। ये कुएं जल स्रोतो की ऐसी अटूट श्रृंखला का सृजन करते थे जिससे धरती हमेशा तृप्‍त रहती थी और बदले में अपने पेट से सोने जैसी फसलें उगल कर हमें भी तृप्‍त रखती थी। उसे आज की भांति पुनर्भरण के महंगे कृत्रिम साधनों की आवश्‍यकता नहीं थी। कुओं, तालाबों, बावडि़यों के जल से धरती के पुनर्भरण का स्‍वचालित चक्र चलता रहता था। 

कुएं की चौपाल पर एक हौज बना दी जाती थी। कुएं से पानी भरने वाला हर व्‍यक्‍ति स्‍वप्रेरणा से ही इस हौज में एक दो बाल्‍टी पानी डाल कर जल दान का पुण्‍य कमाता था। इस हौज का पानी पालतू पशुओं की प्‍यास बुझाता था। कुआं हो और उसके पास पानी का कोर्इ्‍ छोटा-मोटा डबरा न हो, ऐसी दुर्घटना भारत में घटना तो संभव नहीं थी। इन डबरों के जल से कुत्ते, बंदर, गधे, चिडि़यों, कबूतरों, तोतों, गोरैयों, कौओं, कोयलों, मैनाओं की तृष्‍णा मिटती थी। कुएं के होने मात्र से उसके आसपास की भूमि पर पंछियों के पैरों से, पंखों से चिपक कर आने वाले पराग कणों के गिरने से नीम, पीपल, कनेर, वट आदि वृक्ष ऊगकर अपनी भव्‍य छांव का विस्‍तार करते रहते थे। इस छांव में थके राहगीर तो विश्राम पाते ही थे, बड़ों को गोष्‍ठी का और बच्‍चों को खेलने का मैदान इस छांव में सहज ही मिल जाता था। जेठ की दोपहरी में भी नौनिहाल इन वृक्षों की छांव में खेल रहे हों तो उनकी मांओं को लू लगने की चिंता नहीं रहती थी। छोटे-मोटे पारिवारिक, सामाजिक कार्यक्रम भी इसी छांव तले संपन्‍न हो जाते थे। रस्‍सी बंधी बाल्‍टी से पानी खींचने वालों का शरीर सौष्‍ठव और लोच काबिले तारीफ होता था। हाथ, पैर, पेट, पीठ और फेफडों के स्‍वाभाविक व्‍यायाम के कारण महंगे जिम में जाकर अन्‍य किसी व्‍यायाम की कोई जरूरत न थी। एक कुएं के होने का मतलब था उसके आसपास के लगभग पांच सौ मीटर के दायरे में एक स्‍वस्‍थ, सुखद पर्यावरण चक्र का निर्माण और पर्यावरण के हर अंग की स्‍वचालित सुरक्षा। वसुधैव कुटुम्‍बकम्‍ का अनुपम उदा‍हरण। 

 
देश के दुर्भाग्‍य से अंग्रेज हमारे देश में आए। हम गुलाम हो गए। इस गुलामी के साथ आयी अंग्रेजों की सुविधाभोगी जीवन शैली, जिसने महान प्रतिभाशाली लोगों के शोध, निरीक्षण, परीक्षण, अनुभव और परिणाम पर आधारित हमारी महान परंपराओं को एक-एक कर विस्‍थापित कर दिया। स्‍थानीय निकायों से जल प्रदाय की नल प्रणाली के आते ही कुएं उपेक्षित हो गए और एक-एक कर मर गए। उपेक्षित होकर कोई कबतक जी सकता है भला? मरते हुए कुओं के साथ ही मरता गया वह स्‍वस्‍थ, सुखद पर्यावरण का चक्र। मर गए हमारे नीम, पीपल, वट और कनेर के पेड़। बड़ों की गोष्‍ठी के स्‍थान और बच्‍चों के खेल के मैदान मर गए। हमारे पशुओं और पंछीयों की कई नस्‍लें विलुप्‍त हो गईं प्‍यास से तड़प-तड़प कर, छांव के अभाव में, अनुकूल पर्यावरण के अभाव में। पुनर्भरण के इस स्‍वाभाविक चक्र के मर जाने से धरती का जल स्‍तर गिरता चला गया। लाचार, विवश धरती माता प्‍यासी हो गई पर चुपचाप सहती गई।

उसकी इसी सहनशीलता की परीक्षा लेने के लिए बोरिंग के नाम से एक और प्रणाली आई जिसने अपनी नुकीली नोक से जहां तहां छेद-भेद कर के धरती के कलेजे को छलनी कर दिया। चूस डाला धरती को। आज हालात यह हैं कि पांच-पांच सौ फीट बोर करने पर भी पानी नहीं है क्‍योंकि मां धरती के आंचल में जल के पुनर्भरण की कोई सुव्‍यवस्‍थित प्रणाली नहीं  है। धरती मरुस्‍थल होने की ओर अग्रसर है और हम सुविधाओं के नशे में गाफिल मरुस्‍थल की इस पदचाप को सुन नहीं पा रहे हैं।

प्रज्ञावान लोगों को इस परंपरा के विलुप्‍त होने के नुकसान अब समझ में आ रहे हैं। तभी तो सरकारें भी अब खेतो में कुएं बनाने के लिए अनुदान प्रदान कर प्रोत्‍साहित कर रही हैं और घरों में जल वपन तंत्र(वाटर हार्वेस्‍टिंग सेस्‍टम) लगाने की समझाइश दे रही है। घरों के कुओं के लिए भी ऐसे ही प्रोत्‍साहन की व्‍यवस्‍था होना चाहिए। पुराने सूख चुके कुओं, बावडि़यों, तालाबों को पुनर्जीवित करने के पुरजोर प्रयास होना चाहिए।

घर-घर कुएं होने का एक और बहुत बड़ा लाभ यह है कि संकटकाल के अलावा, सामान्‍य काल में पीने के लिए, निस्‍तार के लिए और कुछ हद तक सिंचाई के लिए भी पानी की व्‍यवस्‍था का भार सरकार पर नहीं रहता। न जलप्रदाय के महंगे तामझाम खड़े करने की झंझट, न कर वसूली का त्रास।  कई बार पेयजल की पाइप लाइन में गंदे पानी की निकास नाली का जल मिल जाने से पेय जल के दूषित होने की घटनाएं भी सुनने में आयी हैं। किसी कारण से कोई कुआं दूषित भी हो जाए या गर्मी में कुछ कुएं सूख भी जाएं पर सामान्‍यत: सारे कुएं एक साथ असफल नहीं होते। अत: जल की उपलब्‍धता कुछ खास प्रभावित नहीं होती। लोग आपसी सहयोग से पानी का बंटवारा कर लेते हैं। पानी का अपव्‍यय भी नहीं होता। लोग बूंद-बूंद पानी की कीमत जानते हैं। पारस्‍परिक निर्भरता रहने के कारण आपसी भाईचारा भी बना रहता है। स्‍थानीय निकायों पर जल प्रदाय का भार न हो तो वे बचे हुए समय और संसाधन का अन्‍यत्र उपयोग कर बेहतर प्रशासन दे सकते हैं। पानी के लिए होने वाले झगडों का अभाव हो तो पुलिस पर काम का भार भी कम हो और समाज में पुलिस और प्रशासन की अनावश्‍यक दखलंदाजी के अवसर भी कम हो जाएं। इस तरह घर-घर कुओं की परंपरा सभी के लिए, हर दृष्‍टि से हितावह है।

हमें कृतज्ञ होना चाहिए आचार्य विद्‍यासागर जी जैसे उन ॠषियों, मुनियों, संतों का जो आज इस विपरीत काल में भी अपने भोजन में कुएं के पानी का आग्रह पाले हुए हैं। सतही सोच रखने वालों को यह एक कष्‍टदायी आग्रह लगता है क्‍योंकि उनकी दृष्‍टि हिंसा की उस श्रृंखला को देख नहीं पाती जो ऐसे जल स्रोतों के न होने से घटती है और होने मात्र से बचायी जा सकती है। आचार्य विद्‍यासागर जी नाम के संत नहीं हैं। उन्‍होने सच्‍चे अर्थों में महावीर की अहिंसा को आचरण में धारण किया है। बोरिंग मशीन से धरती के कलेजे का छेदन-भेदन होते देख जिनकी आंखें रोती हैं। सूखती धरती की पीडा से जिनके नयन नम हो जाते हैं। प्‍यासे पशु-पक्षियों की तड़प को जो अपने हृदय में अनुभव करते हें। वे देख पाते हैं नलजल प्रणाली और बोरिंग प्रणाली में होने वाले पंचेन्‍द्रिय से लेकर सूक्ष्‍मातिसूक्ष्‍म अनन्‍त जीव घात को जिसके कारण वह जल, जल न रहकर वस्‍तुत: रक्‍त रूप हो जाता है और श्रमण तो क्‍या श्रावक के पीने योग्‍य भी नहीं रह जाता। ऐसे महान संत जबतक धरा पर विराजमान हैं और हाथ से खींचे गए कुएं के पानी से बने भोजन का आग्रह रखते हैं तबतक कुओं की परंपरा भी चलती रहेगी और उसके पुनर्जीवित होने की आस भी बनी रहेगी। यह आस बची रही तो धरती को मरुस्‍थल होने से बचाया जा सकेगा। जनजीवन के लिए उपयोगी पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों की नस्‍लों को बचाया जा सकेगा। सुखद्‍ पर्यावरण चक्र को बचाया जा सकेगा।

अत: मेरा सभी भारतीयों से आग्रहपूर्ण निवेदन है कि वे अपने घरों में, खेतों में, खलिहानों में जहां भी संभव है एक कुएं की व्‍यवस्‍था अवश्‍य रखें। यह सच है कि आजकल स्‍थान का अभाव है लेकिन तकनीक की मदद से आज दो-ढाई फुट व्‍यास के कुओं का निर्माण भी संभव हो गया है। इसका लाभ उठाएं, स्‍वयं स्‍वच्‍छ जल पिएं, पड़ोसियों को पिलाएं, सच्‍चे संतों को नवघा भक्‍ति से  मन, वचन, काय की शुद्‍धता पूर्वक शुद्‍ध आहार-जल का दान कर उत्तम पूण्‍य का वरण करें। धरती को मरुस्‍थल बनने से बचाएं, यही शुभकामना है।                                                                                                                                                                                                                                        
हम अपने देश की खातिर इतना भी नहीं कर सकते?
                                                    विजयलक्ष्‍मी जैन     
सेवानिवृत्त उपजिलाधीश        
फोन नं. ०९४२५३-५६७२४  
ईमेल-matrubhashahindi@gmail.com                    
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भाषा देश की पहचान, भारतीय भाषा अभियान, दीदी का पन्‍ना।
ट्‍विटर: @swabhasha 

शब्दों की फिजूलखर्ची से बिगड़ते माहौल से सावधान

इन दिनों जितना बोला जा रहा है, उतना शायद इतिहास में कभी नहीं बोला गया. कौन बोल रहा है, क्यों बोल रहा है, क्या बोल रहा है, समझ में नहीं आ रहा. बोला जाना एक शौक में, चीख में बदल चुका है.लोग माइक में चिल्ला रहे हैं कि बोला जाना ध्वनि प्रदूषण की श्रेणी में आ गया है. कोई खास वजह नहीं है, फिर भी बोला जा रहा है. कोई सुनने वाला नहीं है,फिर भी बोला जा रहा है.शब्दों की इतनी फ़िज़ूलख़र्ची कभी नहीं की गई, जितनी आज की जा रही है. चुनावी सभाओं में खिलाड़ी और अभिनेता बोल रहे हैं, साहित्यिक गोष्ठियों में नेता बोल रहे हैं, पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में उद्योगपति बोल रहे हैं। लोग अगर किसी को सुनते भी हैं तो सिर्फ सुनने के लिए नहीं बाद में बोलने के लिए सुनते हैं। बोलना एक अहम जिम्मेदारी है पर अफ़सोस कि अब वह बीमारी की शक्ल में ढल सा गया लगता है। 

वाणी की महिमा कौन नहीं जानता। मनुष्य के जीवन में सुख और दुख के जो प्रमुख कारण हैं, उनमें वाणी भी एक है। इसलिए वाणी की शक्ति को जानना और उसे जीवनोपयोगी बना लेना वास्तव में बड़ी बात है। 

संत कबीर कहते हैं- 
एक शब्द सुखरास है, एक शब्द दुखरास
एक शब्द बंधन करै, एक शब्द गलफांस।

संत कबीर ने एक पद में बताया है कि कब, किससे, क्या बोलना चाहिए-

बोलत बोलत बाढ़ विकारा, 
सो बोलिए जो पड़े विचारा।
मिलहिं संत वचन दुइ कहिए, 
मिलहिं असंत मौन होय रहिए।
पंडित सों बोलिए हितकारी, 
मूरख सों रहिए झखमारी।

क्या आप भी बोलने की कला सीखना चाहते हैं ? तो .बोल-चाल में शब्दों का सही चयन करें। आपको महत्वपूर्ण शब्दों को चुनना होगा और महत्वहीन शब्दों को छोड़ना होगा, क्योंकि शब्द ही आपके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। बोलने की आदत डालिए, क्योंकि बोलने से आत्मविश्वास पैदा होता है, लेकिन बोलने से पहले अपने शब्दों को रचनात्मक विचारों की तराजू में तोलिए। यदि आप एक शब्द बोलने से पहले दो बार सोच लेंगे, तब आप हमेशा अच्छा बोलेंगे। जिन्हें बातचीत करना नहीं आता, वही लोग सबसे अधिक बोलते हैं। लेकिन जिन्हें बातचीत करनी आती है, वे कम बोलते हैं। 

कन्फ्यूसियस ने कहा है-‘शब्दों को नाप तौल कर बोलो, जिससे तुम्हारी सज्जनता टपके।‘ कबीर ने भी यही कहा है- 
बोली तो अनमोल है,जो कोई बोले जान। 
हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आन।।

संयमित वाणी को विद्वानों ने अधिक महत्व दिया है। ऋषि नैषध कहते हैं-‘मितं च सार वचो हि वाग्मिता‘ अर्थात, थोड़ा और सारयुक्त बोलना ही पाण्डित्य है। जैन और बौद्ध धर्मों में वाक्संयम का महत्वपूर्ण स्थान है।

तुलसीदास जी की यह व्यंग्योक्ति बहुत बड़ी सीख देती है- 

पेट न फूलत बिनु कहे, कहत न लागत देर। 
सुमति विचारे बोलिए, समझि कुफेर सुफेर।।

भारतीय दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति ने कहा है-‘कम बोलो, तब बोलो जब यह विश्वास हो जाए कि जो बोलने जा रहे हो उससे सत्य, न्याय और नम्रता का व्यतिक्रम न होगा।‘ इसलिए बोलते समय सतर्क रहना चाहिए। 

कबीर के अनुसार-
शब्द संभारे बोलिए, शब्द के हाथ न पांव
एक शब्द औषध करे, एक शब्द करे घाव। 

फ्रांसीसी लेखक कार्लाइल ने कहा है कि मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति है। गांधीजी ने भी मौन को सर्वोत्तम भाषण कहा है। सुकरात कहा करते थे-‘ईश्वर ने हमें दो कान दिए हैं और मुंह एक, इसलिए कि हम सुनें अधिक और बोलें कम।

अंत में देखिये कि संत कबीर ने बोलते समय मध्यम मार्ग अपनाने का सटीक सुझाव दिया है-
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

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लेखक राष्ट्रीय ख्याति के वक्ता और 
शासकीय दिग्विजय पीजी ऑटोनॉमस 
कालेज, राजनांदगांव में प्रोफ़ेसर हैं। 
मो.9301054300 

आओ चले, जीवन के प्रश्नों का डटकर सामना करें

एक सफल और सार्थक जिंदगी जीने के लिए मनुष्य के पास उन रास्तों का ज्ञान होना बहुत जरूरी है जो उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचाते हैं। इन्हीं रास्तों पर आगे बढ़ते हुए हर मनुष्य की ‘सर्व भवन्तु सुखिनः’-सब सुखी हांे-यह भावना होनी चाहिए। हम अपने कर्म और वाणी से ऐसा एक भी शब्द न निकालें एवं कृत्य न करें जो दूसरों को कष्ट पहुंचाता हो। यह वाणी के संयम और कर्म के विवेक से ही संभव हो सकता है लेकिन हमारी स्थिति आज उस सुंदरी की तरह है जो चाहती है कि सारी दुनिया उसे प्यार करे परन्तु वह किसी को प्यार न करे। अक्सर हम भूल जाते हैं कि यह संसार आदान-प्रदान पर चलता है जैसा हम बोएंगे वैसा फल हमे मिलेगा, जो जैसा देता है वैसा ही पाता है। मैं किसी से अच्छा करूं क्या फर्क पड़ता है, लेकिन मैं किसी का अच्छा करूं- बहुत फर्क पड़ता है। इसलिये हमें अच्छा बनने, अच्छा करने और अच्छा दिखने की कामना करनी चाहिए। हेलन केलर ने बहुत ही मर्म की बात कही है कि दुनिया में सबसे अच्छी और सबसे खूबसूरत चीजों को देखा नहीं जा सकता और न ही छूआ जा सकता है। उन्हें तो दिल से महसूस ही किया जा सकता है।

समाज में सभी सुखी रहना चाहते हैं लेकिन यह हो कैसे? इसका एक सूत्र है-प्रेम। वस्तुतः प्रेम वह तत्त्व है, जो प्रेम करने वाले को सुखी तो बनाता ही है, जिससे प्रेम किया जाता है वह भी सुखी होता है। याद रखें सुख और सुविधा दो भिन्न चीजें हैं जो शरीर को आराम पहुंचाता है वह सुख नहीं, सुविधा है लेकिन सुख का संबंध आत्मा से होता है। आप अच्छे घर में रहते हैं, अच्छी कार में बैठते हैं, एयरकंडीशन आॅफिस में काम करते हैं उससे आपके शरीर को सुविधा प्राप्त होती है परन्तु आप सत्य बोलते हैं, सबको प्रेम करते हैं, ईमानदारी और नैतिकता का व्यवहार अपनाते हैं, सच्चाई और संवेदना दर्शाते हैं, अहिंसा के मार्ग पर चलते हैं, उससे आपको जो सुख मिलता है वह आत्मिक सुख कहलाता है। यही सुख व्यक्ति और समाज को सुखी बनाता है। महात्मा गांधी ने कहा है कि प्रेम कभी दावा नहीं करता, वह तो हमेशा देता है। प्रेम हमेशा कष्ट सहता है, न कभी झुंझलाता है, न बदला लेता है।

संसार में जितने भी संत मनीषी हुए हैं उन्होंने सदा दूसरों के सुख और परोपकार के लिए प्रयत्न किया है। वे उस मां के समान है जो सबको पुत्रवत मानती है और सबको खिला पिलाकर स्वयं खाती पीती है और सबको सुलाकर स्वयं सोती है। उसके सामने ‘पर’ पर का महत्त्व होता है, ‘स्व’ का नहीं। यही वह तत्त्व है जिसके कारण वह स्वयं गीले में सोती है और अपनी संतान को सूखे मंे सुलाती है। मां स्वयं कष्ट सहन करके भी अपनी संतान को सुख सुविधा पहुंचाने के लिए लालायित रहती है। जीवन को ऊंचाई देनी है, इसलिए गहराई भी जरूरी है, बुनियाद जितनी गहरी होती है मकान उतना ही ऊंचा और मजबूत बनता है। सब सुखी हों कि आदर्श स्थिति स्थापित करने के लिए एक साथ बहुत सी अच्छाइयों का अभ्यास करना होता है। इस कठिन साधना और जीवन मूल्यों की श्रेष्ठता से जुड़कर ही हमारा व्यक्तित्व आदर्श बनता है। हैरी एस. ट्रूमेन ने जीवन की सफलता के रहस्य बहुत ही सहज करते हुए कहा है कि यदि आप इस बात की चिंता न करें कि आपके काम का श्रेय किसे मिलने वाला है तो आप आश्चर्यजनक कार्य कर सकते हैं। 
 
जिंदगी के सफर में ऐसे उद्देश्यों के प्रति मन में अटूट विश्वास होना जरूरी है। कहा जाता है-आदमी नहीं चलता, उसका विश्वास चलता है। आत्मविश्वास सभी गुणों को एक जगह बांध देता है यानी कि विश्वास की रोशनी में मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व और आदर्श उजागर होता है। जैसा कि जोहान वाॅन गोथे ने कहा था-‘‘जिस पल कोई व्यक्ति खुद को पूर्णतः समर्पित कर देता है, ईश्वर भी उसके साथ चलता है।’’ जैसे ही आप अपने मस्तिष्क में नए विचार डालते हैं, विश्वास के हमसफर बनते हैं, सारी ब्रह्माण्डीय शक्तियां अनुकूल रूप में काम करने लग जाती हैं।
 
दुनिया में कोई भी व्यक्ति महंगे वस्त्र, आलीशान मकान, विदेशी कार, धन-वैभव के आधार पर बड़ा या छोटा नहीं होता। उसकी महानता उसके चरित्र से 
बंधी है और चरित्र उसी का होता है जिसके पास अपने आप के होने का विश्वास है। बंद प्रगति के रास्तों को खोल देने का संकल्प है। 
पाश्चात दार्शनिक वेंडल विल्की ने ‘एक विश्व’ यानी सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे सन्तु निरामया की योजना बनाकर इसी नाम से एक पुस्तक लिखी थी, बड़े गंभीर चिंतन के बाद उसने अपने विचार दिये थे लेकिन वे क्रियान्वित न हो सके क्योंकि सबको मिलाकर एक करने के लिए जिस प्रेम, सहिष्णुता, परदुखकातरता, परोपकार, संवेदना और भाईचारे की जरूरत थी उसका लोगों में अभाव था। विल्की का स्वप्न अधूरा ही रह गया। यह स्वप्न कोरा विल्की का ही नहीं महावीर, बुद्ध, गांधी, आचार्य तुलसी जैसे महापुरुषों का भी अधूरा ही रह गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि आपसी प्रेम और आपसी मेल का अपना महत्व है और उससे वह शक्ति उत्पन्न होती है, जो और किसी चीज से पैदा नहीं हो सकती लेकिन आज का मानव व्यापक हितों को नजरअंदाज करके अपने निजी स्वार्थों को देख रहा है। वर्तमान समय की सारी व्याधियां इन्हीं क्षुद्र स्वार्थों और संकीर्ण मानसिकता के कारण हैं। 

मनुष्य के भीतर देवत्व है तो पशुत्व भी है। देव है तो दानव भी तो है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का पुरातन भारतीय मंत्र संभवतः दानवों को नहीं सुहाया और उन्हांेने अपने दानव रूप दिखाया। आज हम दानव का वही करतब हर घर में, हर चैखट पर, हर गली में, हर शहर में देख रहे हैं। हम इस सनातन सत्य को भूल गये हैं, जहां प्रेम है आपसी मेल है, भाईचारा है वहां ईश्वर का वास है। जहां घृणा है वहां शैतान का निवास है, इसी शैतान ने आज दुनिया को ओछा बना दिया है और आदमी के अन्तर में अमृत से भरे घट का मुंह बंद कर दिया है। पूरखों के लगाये पेड़ आंगन में सुखद छांव और फल-फूल दे रहे थे लेकिन जब शैतान जागा और दानवता हावी हुई तो भाई-भाई के बीच दीवार खड़ी हो गई। बड़े भाई के घर में वृक्ष रह गए और छोटे भाई के घर में छांव पड़ने लगी। अधिकारों में छिपा वैमनस्य जागा और बड़े भाई ने सभी वृक्षों को कटवा डाला। पड़ोसियों ने देखा तो दुःख भी हुआ। उन्होंने पूछा इतने छांवदार और फलवान वृक्ष आखिर कटवा क्यों दिए? उसने उत्तर दिया क्या करूं पेड़ों की छाया का लाभ दूसरों को मिल रहा था और जमीन मेरी रूकी हुई थी। 

तब हम किस मुंह से कहंे कि सब सुखी हो? वर्तमान युग में हमनें जितना पाया है, उससे कहीं अधिक खोया है। भौतिक मूल्य इंसान की सुविधा के लिए है, इंसान उनके लिए नहीं है। जैसाकि किसी ने जीवन की सफलता का सूत्र देते हुए कहा है- ‘‘जीवन प्रश्न उत्पन्न करता है, हमें बस उत्तर लिखना चाहिए।’’ तो चलिए, जीवन के प्रश्नों का डटकर सामना करें और अपनी अधिकतम क्षमता से उनके जवाब लिखें। 

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

छोटे तालाबों झीलों एवं पहाड़ियों के पर्यावरणीय संरक्षण को बनाए प्रमुख प्राथमिकता

उदयपुर 3 मई, पुरोहितो के तालाब सहित उदयपुर के समस्त छोटे तालाबों को बचाने के लिए वर्ष 2007 में उच्च न्यायालय ने निर्देश दिए थे। छोटे तालाबों की जल भराव सीमा का सीमांकन कर उन्हें पुनः मूल स्वरूप में लौटाना  उदयपुर की पर्यावरणीय एवं जल विज्ञानीय सुरक्षा के लिए जरुरी है। झील मित्र संस्थान , झील संरक्षण समिति व डॉ मोहन सिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित रविवारीय संवाद में उभरे।

संवाद में जलविज्ञानी डॉ अनिल मेहता ने नए जिला कलेक्टर से छोटे तालाबों एवं झीलों सहित उदयपुर को घेर रही पहाड़ियों  के पर्यावरणीय  संरक्षण को प्रमुख प्राथमिकता बनाने का आग्रह किया।

झील मित्र संस्थान के तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि छोटे तालाब बाढ़ की तीव्रता को काम करते थे तथा भू जल का पुनर्भरण करते थे। इनमे से कई तालाब तथा कथित  विकास  की भेंट चढ गए है।

ट्रस्ट सचिव नन्द किशोर शर्मा ने कहा  कि उदयपुर घाँटी की पहाड़ियों को बेतहाशा काटा जा रहा है। यह शहर के लिए आपदा लेकर आएगा।  समय है कि  प्रशासन इसे रोकने में कठोरता बरते एवं नागरिक छोटे स्वार्थो व लालच को तिलांजलि दे।

संवाद से पूर्व झील मित्र संस्थान , झील संरक्षण समिति व डॉ मोहन सिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित रविवारीय श्रमदान में रंगसागर झील से प्लास्टिक, थर्मोकोल,पॉलिथीन ,सड़ांध युक्त खाद्य सामग्री , घरेलु कचरा , शराब की बोतले व जलीय घास निकाली। श्रमदान में दीपेश स्वर्णकार,हर्षुल कुमावत,शुभम,भेरू लाल,अजय सोनी,कुलदीपक पालीवाल, दुर्गा शंकर पुरोहित,भी एल पालीवाल, ,प्रताप सिंह राठोड,बंशी लाल मीणा,अनिल मेहता,तेज शंकर पालीवाल , नन्द किशोर शर्मा ने भाग लिया।

अनिल मेहता
नन्द किशोर शर्मा

नकल से नहीं असल किरदार से फिल्मों को सँवारें – मनु नायक

हमारे नए राज्य के दूसरे दशक के मध्य में छालीवुड की खुशियों में चार चाँद लगाते हुए छत्तीसगढ़ी फिल्मों को 50 बरस पूरे हो गए.14 अप्रैल 1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘ कहि देबे संदेश’  रिलीज़ हो गई थी. छत्तीसगढ़ी फिल्मों के जनक मनु नायक ( मुम्बई ) ने इस लेखक की दूरभाष पर हुई आत्मीय चर्चा में बड़ी पते की बात कही। श्री नायक ने कहा कि मौजूदा दौर में छत्तीसगढ़ी फिल्मों में नक़ल ज्यादा जारी है। आज की फिल्मों में संवाद तो छत्तीसगढ़ी में होते हैं, किन्तु किरदार और परिवेश में बाहरी असर साफ़ नज़र आता है। यही कारण है कि दर्शक उन्हें आसानी से अपना नहीं पाते हैं। श्री नायक ने कहा कि पहले की छत्तीसगढ़ी फिल्मों में कैरेक्टर्स को देखने और सुनने पर दर्शकों को महसूस होता था कि उनमें वे स्वयं भी हैं, उनका जीवन भी है, समस्याएं  हैं, सपने हैं, जिसका आज सर्वथा अभाव है। इसलिए, श्री नायक का कहना है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों में माटी की महक लाने के लिए जागरूकता अभियान चलायें। सेमीनार,कार्यशाला आदि आयोजित करें। छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़ के जानकार लोगों से मार्गदर्शन लिया जाये तो कुछ सकारात्मक नतीजे मिल सकते हैं। 

छत्तीसगढ़ी फिल्मों की आधी सदी पूरी होने के सौभाग्यशाली पल को और यादगार बनाने के लिए तीन दिन पूर्व रायपुर में एक समारोह का आयोजन किया गया. समारोह में छत्तीसगढ़ी फिल्मों के जनक मनु नायक को सम्मानित किया गया. छत्तीसगढ़ी फिल्मों के जाने-माने व्यक्तित्व मोहनचंद सुंदरानी सहित अनेक महत्वपूर्ण व्यक्ति इस पल के गवाह बने.

बहरहाल गौरतलब है कि इस अवसर पर मनु नायक ने अपने पहली फिल्म के निर्माण का अनुभव बताते हुए कहा "माटी का कर्ज चुकाने के लिए मैंने फिल्म बनाई थी. उस समय फिल्म बनाना बड़ी चुनौती थी, फिर भी मैंने ये साहस किया. छत्तीसगढ़ी फिल्म को मैंने मुंबई से जोड़ा. गायक, कैमरामैन, कलाकार सब मुंबई से लेकर आया था. आज तो बहुत संसाधन हैं, फिर भी अच्छी फिल्म नहीं बन पा रही है. मेरी फिल्म छुआछूत पर आधारित थी.”

श्री मोहनचंद सुंदरानी ने इस ऐतिहासिक पल के किए सभी को बधाई दी. छत्तीसगढ़ी फिल्मों को प्रोत्साहित करने में सबसे आगे रहने वाले एडीजी राजीव श्रीवास्तव ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों के सफर को याद करते हुए बताया, “पहली फिल्म ‘ कहि देबे संदेस’ को मां की गोद में बैठकर देखा था जो आज भी मेरे लिए अविस्मरणीय है और आज 50 साल बाद उनके निमार्ता के साथ हूं, ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है.” विधायक श्रीचंद सुंदरानी ने कहा कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों को बढ़ावा मिले इसके लिए सब मिलकर प्रयास करें. छोटे-छोटे जगहों में थिएटर बने और इसके लिए सरकार की मदद लेनी चाहिए.

जब बात माटी महतारी की रजत पट की दुनिया की आधी सदी के महोत्सव की चल पड़ी है तो क्यों न हम थोड़ी सी चर्चा पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म  देबे संदेस की कर लें. चित्रपट संसार के लोगो के साथ पार्श्व ध्वनि में सुप्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ की पंक्ति निर्माता-निर्देशक मनु नायक की आवाज में गूंजती है –

इस पथ का उद्देश्य नहीं है
श्रांत भवन में टिक रहना
किंतु पहुंचना उस सीमा तक
जिसके आगे राह नहीं है।

सम्मानित पत्रकार मोहम्मद ज़ाकिर हुसैन के मुताबिक पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले मनु नायक की कहानी भी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। उन्होंने लिखा है कि 11 जुलाई 1937 को रायपुर तहसील के कुर्रा गांव (अब तिल्दा तहसील) में जन्मे श्री नायक 1957 में मुंबई चले गए थे कुछ बनने की चाह लेकर। यहां शुरूआती संघर्ष के बाद उन्हें काम मिला निर्माता-निर्देशक महेश कौल के दफ्तर में। आज शायद बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि गोपीनाथ, हम कहां जा रहे हैं, मुक्ति, दीवाना, प्यार की प्यास, सपनों का सौदागर, तलाक और पालकी जैसी सुपरहिट फिल्में देने वाले कश्मीरी मूल के फिल्मकार महेश कौल का रायपुर से भी रिश्ता था।

खैर,स्व.महेश कौल की सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक पं.मुखराम शर्मा के साथ व्यवसायिक साझेदारी में अनुपम चित्र नाम की कंपनी थी। इसी अनुपम चित्र के दफ्तर में मुलाजिम हो गए मनु नायक अनुपम चित्र कंपनी के मुलाजिम के तौर पर 350 रूपए मासिक पगार पाने वाले मनु नायक के सामने चुनौती थी कि छत्तीसगढ़ी में फिल्म बनाएं तो बनाएं कैसे ? फिर चला संघर्ष और चुनातियों का सामना करते हुए अपने स्वप्न को साकार करने की अंतहीन कोशिशों का ईमानदार सिलसिला और एक अनुबंध के अनुसार श्री नायक अपनी टीम लेकर 12 नवंबर 1964 को मुंबई से रायपुर के लिए रवाना हो गए। बाद की कहानी कुछ ऎसी है कि लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया। फिल्म की शूटिंग का रास्ता साफ हो गया. रामकृष्ण मिशन आश्रम में जाकर उन्होंने स्वामी आत्मानंद से मुलाकात की और धूम्रपान की पाबंदी की शर्त पर उन्होंने आश्रम के भीतर एक दृश्य फिल्माने की इजाजत ले ली। कुछ दृश्य रायपुर और भिलाई में भी शूट किए गए। 

मोहम्मद रफी साहब की आवाज में रिकार्ड हुआ पहला गीत। श्री हुसैन खुद मनु नायक की जबानी इसकी कहानी कुछ इस तरह सुनाते हैं  – “वहां जैसे ही रफी साहब रिकार्डिंग पूरी कर बाहर निकले, मैनें उनके वक्त की कीमत जानते हुए एक सांस में सब कुछ कह दिया। मैनें अपने बजट का जिक्र करते हुए कह दिया कि मैं छत्तीसगढ़ी की पहली फिल्म बना रहा हूं, अगर आप मेरी फिल्म में गाएंगे तो यह क्षेत्रीय बोली-भाषा की फिल्मों को नई राह दिखाने वाला कदम साबित होगा। चूंकि रफी साहब मुझसे पूर्व परिचित थे, इसलिए वह मुस्कुराते हुए बोले – कोई बात नहीं, तुम रिकार्डिंग की तारीख तय कर लो। और इस तरह रफी साहब की आवाज में पहला छत्तीसगढ़ी गीत -‘झमकत नदिया बहिनी लागे’ रिकार्ड हुआ। इसके अलावा रफी साहब ने मेरी फिल्म में दूसरा गीत ‘तोर पैरी के झनन-झनन’ को भी अपना स्वर दिया। इन दोनों गीतों की रिकार्डिंग के साथ खास बात यह रही कि रफी साहब ने किसी तरह का कोई एडवांस नहीं लिया और रिकार्डिंग के बाद मैनें जो थोड़ी सी रकम का चेक उन्हें दिया, उसे उन्होंने मुस्कुराते हुए रख लिया। मेरी इस फिल्म में मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, मीनू पुरूषोत्तम और महेंद्र कपूर ने भी गाने गाए लेकिन जब रफी साहब ने बेहद मामूली रकम लेकर मेरी हौसला अफज़ाई की तो उनकी इज्जत करते हुए इन दूसरे सारे कलाकारों ने भी उसी अनुपात में अपनी फीस घटा दी। इस तरह रफी साहब की दरियादिली के चलते मैं पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म में इन बड़े और महान गायकों से गीत गवा पाया।”

आउटडोर शूटिंग के बाद मुंबई में सुआ गीत सहित कुछ अन्य दृश्यों की इनडोर शूटिंग हुई। पोस्ट प्रोडक्शन के बाद अंतत: 4 अप्रैल 1965 को फिल्म रिलीज हुई दुर्ग की प्रभात टाकीज में। जब फिल्म टैक्स फ्री हो गई तो रायपुर के राजकमल में प्रदर्शित हुई। कही देबे सन्देश और घर द्वार जैसी फिल्मों के दौर से लेकर आज इक्कीसवीं सदी में सूचना क्रान्ति की असीम दस्तक के बीच छत्तीसगढ़ी फिल्मों को बहुत कुछ नया गढ़ना है. मंज़िलें अभी और भी हैं।
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लेखक छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण से 
सम्मानित और शासकीय दिग्विजय पीजी 
ऑटोनॉमस कालेज, राजनांदगांव में प्रोफ़ेसर हैं। 

रेल की पटरियों पर चलता है ये ट्रेक्टर

महू-इंदौर ब्रॉडगैज कन्वर्जन के चलते ट्रैक को मजबूती देने तथा सेट करने के लिए गिट्‌टी डालने का सिलसिला चालू हो गया है। इसके चलते एक जुगाड़ वाहन (रेलवे की भाषा) को उपयोग में लिया जा रहा है जो दिनभर इस पर दौड़कर पटरियों के आसपास गिट्‌टी डालने लगा है।
महू-इंदौर के बीच 21 किमी के ब्रॉडगैज ट्रैक डालने का काम पूरा होते ही इस पर ट्रैक्टर में कोच के पहिये लगाकर एक जुगाड़ वाहन बनाया गया है। यह जुगाड़ वाहन एक बड़ी ट्रॉली लगाकर उसमें निर्धारित मापदंड की गिट्‌टी भरे इस नए ट्रैक पर दौड़ने (10 से 15 फेरे) लगा है। वर्तमान में राऊ से महू तक आठ किमी लंबे नवीन ट्रैक के दोनों ओर गिट्‌टी डालकर पटरियों को सेट करने की मशक्कत शुरू हो गई है। स्लीपरों के दोनों ओर पटरियों के बाहर गिट्‌टी के ढेर निर्धारित दूरी पर लगाकर उसे दोनों ओर सेट करने का काम चलने लगा है।

रेलवे तकनीकी विभाग के सूत्रों के मुताबिक आगामी पखवाड़े के दौरान गिट्‌टी सेटिंग का काम पूरा होते ही इंदौर से महू तक डले ब्रॉडगैज ट्रैक पर मटेरियल ट्रेन भी चालू कर दी जाएगी। इसके माध्यम से यहां चल रहे प्लेटफार्म व पैदल पुल सहित स्टेशन मास्टर के दो मंजिला नए भवन के निर्माण में लगने वाली सामग्री पहुंचाने के साथ ही ट्रैक की टेस्टिंग का काम भी शुरू कर दिया जाएगा। हालांकि अभी किशनगंज पुल पर गर्डर सेटिंग का काम जारी है। इसके दोनों ओर के ट्रैक पर गिट्‌टी डाली जा रही है।

साभारृ दैनिक भास्कर से 

पृथ्वी दिवस पर गूगल के डूडल की सचेतक साझेदारी

अंतरजाल की दुनिया के सबसे चहेते और चर्चित सर्च इंजन गूगल ने पृथ्वी दिवस को अपने निराले अंदाज़ में 'सेलिब्रेट' किया। धरती के बढ़ते तापमान और बिगड़ती तस्वीर के प्रति लोगों को जागरूक करने के मद्देनज़र गूगल ने एक खूबसूरत सा डूडल बनाकर अपने असंख्य चाहने वालों को खुश कर दिया। उन्हें जगाया और अपनी धरती, अपने पर्यावरण के लिए संजीदगी से सोचने और समय निकालने की प्रेरणा भी दी। पर्यावरण संरक्षण के सन्देश का वाहक बना यह डूडल धरती के अवदान को समर्पित किया गया। 

गूगल का होम पेज आज सचमुच बेहद आकर्षक और विश्व प्रथ्वी दिवस मनाने की मूल भावना का जीवंत प्रतीक बन गया। इस डूडल को इतना मनोहरी और अर्थपूर्ण बनाया गया कि उसने एकबारगी पूरी कहानी खुद बयां कर दी। यह डूडल नेट और अखबारों की डिजिटल दुनिया में भी तुरंत चर्चित हो गया तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पृथ्वी दिवस एक सलाना जश्न है जिसे गूगल ने जानदार तोहफे की तरह पेश कर दिखाया। कुछ इस अंदाज़ में कि उसके हम जैसे अनगिनत उपयोगकर्ता भी गर्व की अनुभूति कर सकें कि जिससे हम जुड़े हैं लगातार वो खुद वास्तव में कितना सजग और रचनात्मक है। याद रहे कि हर साल दुनियाभर में 22 अप्रैल का दिन धरती के नाम पर ख़ास तौर पर मनाया जाता है, लेकिन इसे मनाने की के पीछे की कहानी कुछ अलग है। उसकी चर्चा हम बाद में करेंगे। 

बहरहाल, आइये अब  गूगल के इस डूडल की कारीगरी की थोड़ी सी चर्चा पहले कर लें। सर्च इंजन गूगल ने पृथ्वी दिवस को ध्यान में रखकर अपने होम पेज पर उकेरे जाने वाले छह वर्णो यानी 'जी', 'ओ', 'ओ', 'जी', 'एल', व 'ई' को पूरी तरह पर्यावरणमय बना दिया। डूडल के  दूसरे 'ओ' के स्थान पर नीले गृह यानी पृथ्वी को  बड़ी खूबसूरती से दर्शाया गया। यही नहीं उसे अपनी धुरी पर लगातार घूमते देखना भी बहुत सुखप्रद और रोमांचक था। गूगल के बाकी वर्णो में अंतरिक्ष, वनस्पतियों व अन्य वन्य जीव-जंतुओं, जिनके संरक्षण की दुहाई हम  हैं,को जगह दी गई। 

अब बात की जाये पृथ्वी दिवस की कहानी की। स्मरण रहे कि कि 22 अप्रैल का पृथ्वी पृथ्वी दिवस की पृष्ठभूमि में युवाओं का एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन था। जी हाँ ! वियतनामी युद्ध विरोध में उठ खड़े हुए विद्यार्थियों के संघर्ष की इसमें भूमिका थी। 1969 में सान्ता बारबरा (कैलिफोर्निया) में बड़े पैमाने पर बिखरे तेल से क्षुब्ध विद्यार्थियों को देखकर अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेलसन ने सोचा कि यदि इस आक्रोश को पर्यावरण चेतना और प्रकृति के सरोकारों की दिशा में मोड़ दिया जाय तो बात बन सकती है। मालूम हो कि नेलसन,विसकोंसिन से अमेरिकी सीनेटर थे। उन्होंने बड़ी समझदारी से इसे देश को पर्यावरण शिक्षा देने के अनोखे अवसर के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने इसमें लोगों को सहभागी बनाया। अपने इस ख्याल पर मीडिया से बातचीत की। अमेरिकी कांग्रेस के पीटर मेकेडलस्की ने भी इसमें यादगार भागीदारी की। डेनिस हैयस राष्ट्रीय समन्वयक बनाये गए। 

गौरतलब है कि पृथ्वी दिवस का विचार देने वाले गेलॉर्ड नेलसन ने एक बयान में कहा था, ''यह एक जुआ था, जो काम कर गया।'' सचमुच ऐसा ही है। आज यह चमत्कार से कम नहीं है कि दुनिया के करीब 184 देशों के हजारों अंतर्राष्ट्रीय समूह इस दिवस के सन्देश को आगे ले जाने का काम कर रहे हैं। तो बात ऎसी है कि यह पृथ्वी दिवस दरअसल दूसरे अर्थ में पर्यावरण चेतना दिवस है। ये अलग बात है हमने विश्व पर्यावरण दिवस के लिए जुड़ा तारीख तय कर रखी है, किन्तु ऐतिहासिक आंदोलन और घटनाक्रम के लिहाज़ से 22 अप्रैल पर्यावरण के लिए बेहद मौज़ूं मालूम पड़ता है। 

मशहूर लेखक और पर्यावरणविद् वरुण तिवारी बताते हैं कि गेलॉर्ड नेलसन की युक्ति का नतीजा यह हुआ कि 22 अप्रैल,1970 को संयुक्त राज्य अमेरिका की सड़कों, पार्कों, चौराहों, कॉलेजों, दफ्तरों पर स्वस्थ-सतत पर्यावरण को लेकर रैली, प्रदर्शन, प्रदर्शनी, यात्रा आदि आयोजित किए। विश्वविद्यालयों में पर्यावरण में गिरावट को लेकर बहस चली। ताप विद्युत संयन्त्र, प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयाँ, जहरीला कचरा, कीटनाशकों के अति प्रयोग तथा वन्यजीव व जैवविविधता सुनिश्चित करने वाली अनेकानेक प्रजातियों के खात्मे के खिलाफ एकमत हुए दो करोड़ अमेरिकियों की आवाज़ ने इस तारीख को पृथ्वी के अस्तित्व के लिये अहम बना दिया। तब से लेकर आज तक यह दिन दुनिया के तमाम देशों के लिये खास ही बना हुआ है। वर्ष 1970 के प्रथम पृथ्वी दिवस आयोजन के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के दिल में भी ख्याल आया कि पर्यावरण सुरक्षा हेतु एक एजेंसी बनाई जाए। 

लिहाज़ा  श्री तिवारी के मुताबिक वर्ष 1990 में इस दिवस को लेकर एक बार उपयोग में लाई जा चुकी वस्तु के पुर्नोपयोग का ख्याल व्यवहार में उतारने का काम विश्वव्यापी सन्देश का हिस्सा बना। 1992 में रियो डी जेनेरियो में हुए पृथ्वी सम्मेलन ने पूरी दुनिया की सरकारों और स्वयंसेवी जगत में नई चेतना व कार्यक्रमों को जन्म दिया। एक विचार के इस विस्तार को देखते हुए गेलॉर्ड नेलसन को वर्ष 1995 में अमेरिका के सर्वोच्च सम्मान ‘प्रेसिडेन्सियल मेडल ऑफ फ्रीडम’ से नवाजा गया। नगरों पर गहराते संकट को देखते हुए अन्तरराष्ट्रीय माँ पृथ्वी का यह दिन ‘क्लीन-ग्रीन सिटी’ के नारे तक जा पहुँचा है।इस दिवस के नामकरण में जुड़े सम्बोधन अन्तरराष्ट्रीय माँ ने इस दिन को पर्यावरण की वैज्ञानिक चिन्ताओं से आगे बढ़कर वसुधैव कुटुम्बकम की भारतीय संस्कृति से आलोकित और प्रेरित होने का विषय बना दिया है। 22 अप्रैल अपने अस्तित्व के लिये जागने और लोगों को जगाने का दिन है। 

प्रकृति की महत्ता और पर्यावरण की महान सत्ता के हक़ में गूगल के नायाब डूडल को सलाम करते हुए मुझे बस यही कहना है कि –

जागते रहिये,जमाने को जगाते रहिये 
की आवाज़ में आवाज़ मिलते रहिये। 
हम अगर सो गए तो तकदीर भी सो जायेगी 
अब कोई सो न सके, गीत वो गाते रहिये। 
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लेखक शासकीय दिग्विजय पीजी 
ऑटोनॉमस कालेज, राजनांदगांव 
के हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर हैं। 

कैसे बनती है काम की चीजें, देखिये डिस्कवरी साईंस पर

विज्ञान और तकनीक से जुड़े विषयों को आम लोगों के लिए सुगम और मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत करने वाला चैनल 'डिस्कवरी साइंस' अब दर्शकों के लिए एक  नया कार्यक्रम लाया है, जो रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली चीजों की निर्माण प्रक्रिया से आपको परिचित कराएगी। बता दें कि  इस कार्यक्रम का नाम ‘हाउ इट्ज मेड’ है।  ‘हाउ इट्ज मेड’ का प्रसारण डिस्कवरी साइंस पर हर रात 8 बजे किया जाएगा।  ‘हाउ इट्ज मेड’ में जींस, एल्युमीनियम फॉयल और अनाज के अलावा मोम की बनी प्रतिमाओं, ब्रेल टाइपराइटर्स और पिन बॉल मशीनें जैसे साधारण और रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली चीजों के निर्माण से जुड़ी प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी जाएगी।  

कार्यक्रम के हर एपिसोड में 3 उत्पादों को शामिल किया जाएगा और उनके निर्माण के लिए कच्चे माल से लेकर उन्हें उत्पाद की शक्ल देने तक की पूरी प्रक्रिया पर रोशनी डाली जाएगी।  यह सीरीज किसी उत्पाद के इतिहास और उनके सामान्य इस्तेमाल के अलावा हमारे दैनिक जीवन में उनकी भूमिका के बारे में भी बताएगी।  इतना ही नहीं, यह सीरीज कंप्यूटर्स, ट्रकों और फाइबर ऑप्टिक्स जैसे जटिल उत्पादों के रहस्य पर से भी परदा उठाएगी और साथ ही दर्शकों को यह समझाएगी कि उन्हें तैयार करने के पीछे कितनी मेहनत लगी है।    कच्चे माल से लेकर कल पुर्जों के निर्माण और उनकी असेंबली तक की पूरी प्रक्रिया पर प्रकाश डालने वाली यह सीरीज सही मायने में दर्शकों को शिक्षित करने के साथ-साथ उन का मनोरंजन भी करेगी।

होठों पर मुस्कान लिये बनाओ जीवन सुहाना.. अर्पिता बंसल के प्रयास से खिली चेहरों पर मुस्कान!!

नई दिल्ली। महिला सशक्तिकरण, नारी उत्थान, कन्या भ्रूण हत्या व शिक्षा सम्बन्धी मुद्दों के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से सामाजिक कार्यकर्ता अर्पिता बंसल द्वारा आयोजित किये जाने वाले विभिन्न कार्यक्रमों के बीच हाल ही में मुस्कान के.के. मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। ली-पेसिफिक बैंक्वेट, पश्चिम विहार में आयोजित इस कार्यक्रम में अर्पिता बंसल के नेतृत्व में नारी उत्थान, कन्या भ्रूण हत्या व शिक्षा सम्बन्धी मुद्दे प्रमुख रहे, इसके अतिरिक्त बच्चों ने भी जमकर मस्ती की और उनके चेहरों पर खिली मुस्कान, मुस्कान के.के. मेमोरियल ट्रस्ट के प्रमुख उद्देश्य को पूरा करती नज़र आयी। कार्यक्रम की विशेष बात रही कि भारतीय लोगों सहित विदेशी मेहमान भी इससे जुड़े। मौके पर ले. रीटा गंगवानी बतौर मुख्यातिथि उपस्थित थीं।

मौके पर अर्पिता बसल ने कहा कि मेरा मानना है कि जीवन में होठों पर मुस्कान खिलाये रखना और लगातार संघर्ष करते रहना बहुत जरूरी है। हताश होने या हिम्मत हार जाने अथवा उदास होने से समस्या का समाधान नहीं होता। हर किसी के जीवन में समस्यायें आती हैं और जो इनसे लड़ने का प्रयास करता है उसे सफलता अवश्य मिलती है। 

प्रोग्राम में लगभग 100 आॅरफन बच्चों ने भी शिरकत की और जमकर मस्ती की व विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से मुस्कान बिखरने वाले पलों का भरपूर लुत्फ उठाया।

इस दौरान अर्पिता बंसल व ले. रीटा गंगवानी ने मोटीवेशन सत्र के दौरान जीवन में बदलाव लाने, अपने सपनो का सच कर दिखाने, खुश रहने, स्वस्थ व हाईजीनिक जीवन शैली आदि जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किये और उपस्थित मेहमानों को भी इस सत्र से जुड़ने का अवसर प्रदान किया।

कार्यक्रम के दौरान आमेर जाकिर, डाॅ. गगनप्रीत, पूजा मोटवानी, विवेक मिश्रा, डाॅ. वरूण कत्याल, ऋतु व सिद्धार्थ अगीचा, टेरो रीडर विमी पुरी, पुनीता, अमिताभ श्रीवास्तव, जीतेन्द्र पदम जैन और विदेशी मेहमानों में डोगो बर्नाड्स (मि. ब्राजील), विक्टर जनाटा (मि. माॅडल इन्टरनेशनल), प्रेशियस अन्ना (डायरेक्टर आॅफ मिस्टर्स आॅफ फिलीपिंस), पावी वेन्चुरा (मिसोलाॅजी आॅर्गनाईजेशन) सहित विभिन्न गणमान्य अतिथि भी उपस्थित रहे और प्रोत्साहित करने वाले इस उत्सव का हिस्सा बने।

रेल्वे की नई पहल

प्रीमियम स्पेशल ट्रेनों की तर्ज पर रेलवे तत्काल स्पेशल ट्रेनें चलाने जा रही है। रिजर्वेशन की मांग के अनुसार सभी जोन मुख्यालय में चीफ कॉमर्शियल मैनेजर पहले से चल रही स्पेशल ट्रेन को तत्काल ट्रेन घोषित कर सकेंगे।

रेलवे बोर्ड की ओर से जारी निर्देश के मुताबिक अगर ट्रेन में दोनों दिशाओं में मांग ज्यादा हुई तो दोनों तरफ का तत्काल चार्ज लिया जाएगा, लेकिन एक तरफ कम मांग होने पर उसका सामान्य किराया लिया जाएगा। यात्री कम से 10 दिन और अधिक से अधिक 60 दिन पहले आरक्षण करा सकेंगे। इस अवधि में तत्काल का किराया समान रहेगा।