Home Blog Page 1929

श्री अमरनाथ जी यात्रा – आस्‍था का प्रतीक

जम्‍मू-कश्‍मीर में श्री अमरनाथ जी की पवित्र यात्रा हिन्‍दू तीर्थ यात्रियों की आस्‍था का प्रतीक है। यह यात्रा हर वर्ष सावन के महीने में शुरू होती है। इस बार ये यात्रा 2 जुलाई से 29 अगस्त तक रहेगी।  

देश के विभिन्‍न भागों से आए लाखों श्रद्धालु दक्षिण कश्‍मीर स्‍थित श्री अमरनाथ जी की गुफा में प्राकृतिक रूप से बर्फ से बने शिवलिंग की अराधना करते हैं। इस यात्रा का काफी महत्‍व है इसलिए यह जरूरी है कि प्रत्‍येक श्रद्धालु को यात्रा के इतिहास के बारे में सतही जानकारी हो। यात्रा के दौरान बालटाल और पहलगाम के रास्‍ते पवित्र गुफा तक जाने वाले मार्ग पर स्‍थित विभिन्‍न धार्मिक स्‍थलों की जानकारी लेना भी जरूरी है।
      यहां यह बताना उचित होगा कि बहुत कम लोग अनंतनाग जिले में भगवान शिव के एक अन्‍य तीर्थ स्‍थल छोटा अमरनाथ जी के बारे में जानते होंगे जो बिजबेहरा कस्‍बे से करीब सात किलोमीटर दूर छोटे से गांव थजवार में स्‍थित है। यहां पहाड़ की चोटी पर भगवान शिव की एक गुफा है जहां सावन की पूर्णिमा के दिन भक्‍तों की भारी भीड़ उमड़ती है। इसी दिन दो महीने तक चलने वाली वार्षिक अमरनाथ यात्रा समाप्‍त हो जाती है।
     
पवित्र अमरनाथ गुफा से जुड़ी पौराणिक कथा

      ऐसा माना जाता है कि बूटा मलिक नाम के एक मुस्‍लिम चरवाहे को एक ऋषि ने कोयले का एक बोरा दिया। घर पहुंचने के बाद मलिक ने पाया कि बोरे में सोना भरा हुआ है। वह इतना खुश हो गया कि खुशी के मारे ऋषि का आभार व्‍यक्‍त करने के लिए वापस  उनके पास पहुंचा। वहां उसने एक चमत्‍कार देखा। उसे एक गुफा देखकर अपनी आंखों पर विश्‍वास नहीं हुआ। तभी से पवित्र गुफा वार्षिक तीर्थ यात्रा का स्‍थान बन गई।

      एक पौराणिक कथा के अनुसार इस गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को समस्‍त सृष्‍टि की रचना और मानवता के लिए मोक्ष के तरीकों का रहस्‍य बताया था। कबूतरों के एक जोड़े ने उनकी बातचीत सुन ली और तभी से वे अमर हो गए। कबूतरों के इस जोड़े ने गुफा को अपना चिरकालिक स्‍थान बना लिया और आज भी गुफा में श्रद्धालुओं को दो कबूतर बैठे हुए दिखाई देते हैं।
 
बालटाल मार्ग

      श्री अमरनाथ जी की यात्रा का सबसे छोटा मार्ग कश्‍मीर घाटी के गंदेरबल जिले में बालटाल के रास्‍ते है। बालटाल गर्मियों की राजधानी श्रीनगर से करीब 60 किलोमीटर दूर और प्रसिद्ध पर्यटन स्‍थल सोनमर्ग से करीब 15 किलोमीटर दूर है। बालटाल के रास्‍ते जाने वाले श्रद्धालुओं को खड़ी चट्टानों के साथ संकरे रास्‍तों से गुजरना पड़ता है। तीर्थयात्रियों को पवित्र गुफा तक पहुंचने से पहले करीब तीन किलोमीटर बर्फीले रास्‍ते से जाना पड़ता है। अकसर देखा गया है कि इस रास्‍ते पर मौसम खराब हो जाता है और वर्षा के कारण श्रद्धालुओं के लिए परेशानी खड़ी हो जाती है। खराब मौसम के बावजूद श्रद्धालुओं का दृढ़ विश्‍वास नहीं डगमगाता। हालांकि इस मार्ग से कम लोग जाते हैं। अधिकतर श्रद्धालु पहलगाम के रास्‍ते जाने का विकल्‍प चुनते हैं। बालटाल के रास्‍ते जाने पर श्रद्धालुओं को गंदेरबल जिले में स्‍थित माता खीर भवानी मंदिर में स्‍थित पवित्र झरने का दर्शन करने का अवसर मिल जाता है। ऐसा माना जाता है कि यदि कोई अप्रिय घटना होनी हो तो इस झरने का रंग बदल जाता है। पिछले वर्ष जून 2014 में ऐसी घटना देखने को मिली जब झरने का रंग बदलकर लाल हो गया और इसके बाद सितम्‍बर 2014 के पहले सप्‍ताह में कश्‍मीर घाटी में बाढ़ आई।

पहलगाम मार्ग

      पहलगाम के रास्‍ते से श्रद्धालुओं को रघुनाथ जी मंदिर के दर्शन करने के साथ-साथ अनंतनाग जिले में स्‍थित मार्तंड के सूर्य मंदिर को देखने का अवसर मिलता है। विश्‍व प्रसिद्ध पहाड़ी स्‍थल, पहलगाम यात्रा का आधार शिविर है जो श्रीनगर से 100 किलोमीटर दूर है। यहां से श्रद्धालु सड़क के रास्‍ते अथवा पैदल जा सकते हैं। श्रद्धालु प्रसिद्ध लिड्डर नदी के तट पर स्‍थित भगवान शिव के मंदिर तक पहुंचते हैं। भगवान शिव का एक अन्‍य प्राचीन मामल मंदिर लिड्डर नदी के साथ लगे पहाड़ पर स्‍थित है और देखने लायक है। पहलगाम बर्फ से ढके पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने अपने वाहन नंदी को यही छोड़ दिया था और वे पवित्र गुफा की ओर प्रस्‍थान कर गए थे। इस स्‍थान का नाम बेल गांव था जो समय बीतने के साथ पहलगाम बन गया।

पहलगाम से श्री अमरनाथ जी के रास्‍ते के पड़ाव

      आधार शिविर पहलगाम से यात्रा शुरू होने पर पहला पड़ाव 16 किलोमीटर दूर चंदनवाड़ी में है। चंदनवाड़ी जाने वाली सड़क पर गाड़ियां जा सकती है। इस स्‍थान तक पहुंचने के लिए तीर्थयात्री उचित दरों पर उपलब्‍ध सार्वजनिक वाहनों का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। लिड्डर नदी के किनारे का दृश्‍य बेहद रमणीक है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने इस स्‍थान पर अपने माथे पर चंदन पाउडर मला था इसलिए इसका नाम चंदनवाड़ी पडा। चंदनवाड़ी पहुंचने के बाद यात्रा काफी कठिन और चुनौती भरे मार्ग से पिस्‍सू टॉप की तरफ बढ़ती है। हर हर महादेव का जाप करते हुए इस कठिन मार्ग से गुजरते हुए किसी का भी मन आनंदित हो उठता है और कठिन रास्‍ता भी आसान लगने लगता है। खड़ी चढ़ाई वाले यात्रा के इस दौर को पूरा करने के बाद श्रद्धालु कहीं रूककर आराम करते हैं।

      शेषनाग अगला पड़ाव है जहां तीर्थयात्री पवित्र झरने में स्‍नान करते हैं और एक रात रूकते हैं। ऐसा माना जाता है कि शेषनाग के पवित्र झरने में स्‍नान करके सभी पाप धुल जाते हैं। माना जाता है कि भगवान शिव ने पवित्र गुफा की ओर जाते समय अपने शेषनाग को इसी झरने पर छोड़ दिया था। यह स्‍थान वास्‍तव में बर्फ की चोटियों से घिरी झील है जिसकी शक्‍ल सांप के सिर की तरह दिखाई देती है।

      पवित्र यात्रा का अगला चरण महागुन टॉप की तरफ टेढ़ा-मेढ़ा खड़ी चढ़ाई वाला मार्ग है। अधिक ऊँचाई और ऑक्‍सीजन की कमी होने के कारण इस स्‍थान पर श्रद्धालुओं को सांस लेने में दिक्‍कत होती है। कुछ श्रद्धालुओं को उबकाई आने लगती है। सूखे मेवे और खट्टी-मीठी वस्‍तुएं जैसे नींबू ऐसी स्‍थिति में लाभदायक हो सकता है। पूरे रास्‍ते पर श्रद्धालुओं के लिए चिकित्‍सा सुविधाएं मुफ्त में उपलब्‍ध है। आगे बढ़ने पर रास्‍ता नीचे की तरफ पोष पथरी के घास के मैदानों की ओर चला जाता है जो जंगली सुगंधित फूलों और जड़ी बूटियों से घिरा हुआ है। लेकिन कहा जाता है कि जो भी यहां कुछ समय रूक जाता है वह सुगंध के कारण गहरी नींद में सो जाता है। अत: यह सलाह दी जाती है कि इस स्‍थान पर अधिक समय नहीं बिताए और अगले पड़ावपंचतरणी की तरफ बढ़े। पंचतरणी बर्फ से ढकी पाँच चोटियों से घिरा है जहां तीर्थयात्री आराम करते हैं और रात गुजारते हैं। अगले दिन यात्रा पवित्र अमरनाथ गुफा के लिए शुरू होती है यहां अमरावती और पंचतरणी का संगम होता है। श्रद्धालु पवित्र गुफा में दर्शन से पहले अमरावती में स्‍नान करते हैं।

साधुओं और तीर्थयात्रियों की छड़ी मुबारक यात्रा

      साधु और तीर्थयात्री श्रीनगर में दशनामी अखाड़े से पैदल छड़ी मुबारक यात्रा शुरू करते हैं। आवश्‍यक अनुष्‍ठानों के बाद छड़ी मुबारक पवित्र गुफा की तरफ बढ़ने से पहले प्रसिद्ध शंकराचार्य मंदिर और दुर्गानाग मंदिर जाती है। पैदल यात्रा के दौरान अवंतीपुरा मंदिर, बिजबेहरा के शिव मंदिर, रघुनाथ जी मंदिर और अनंतनाग में मट्टन स्‍थित मार्तंड सूर्य मंदिर पर धार्मिक अनुष्‍ठान किए जाते हैं। इन अनुष्‍ठानों के बीच श्रद्धालुओं को भजन-कीर्तन करते देखा जा सकता है और पूरा वातावरण जीवंत हो उठता है।
      छड़ी मुबारक सावन पूर्णिमा (रक्षा बंधन) के दिन श्री अमरनाथ जी के दर्शन करती है। इसी के साथ पवित्र यात्रा का समापन हो जाता है। 2014 में करीब 3,72,909 यात्रियों ने श्री अमरनाथ जी की यात्रा की थी।
 
तीर्थयात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों द्वारा किए जाने वाले एहतियाती उपाय
      तीर्थयात्रियों को यात्रा करते समय कुछ एहतियाती उपाय करने चाहिए। कठिन मार्ग होने के कारण तीर्थयात्री संतुलन बनाए रखने के लिए अपने हाथ में एक छड़ी रखें और स्‍पोर्ट्स शूज़ पहनें। यात्रा की चुनौतियों का सामना करने के लिए यात्री अपने पास कम समान रखें और एक प्राथमिक उपचार किट लेकर जाएं। ठंडे मौसम से बचने के लिए गर्म कपड़े ले जाना जरूरी है क्‍योंकि रास्‍ते में मौसम बदलता रहता है। पिछले कुछ वर्षों में अमरनाथ यात्रियों की जो जन-हानि हुई हैं उसका एकमात्र कारण यात्रियों के पास पर्याप्‍त गर्म कपड़ों का नहीं होना था।
 
यात्रा के लिए पंजीकरण और आवश्‍यक उपायों की जानकारी श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड ने अपनी वेबसाइट www.shriamarnathjishrine.com पर दी हुई है। वेबसाइट में आवेदन फॉर्म और बैंक की शाखाओं की पूरे पते के साथ राज्‍यवार सूची है जिस पर यात्री अपना पंजीकरण करा सकते हैं।

साभार- पीआईबी फीचर्स 

खबर लिखने की कितनी अकल होती है पत्रकारों में!

बचपन में सड़क के किनारे फुटपाथ पर मजमा लगाने वालों को देखने में बहुत मजा आता था। उनके करतबों से कहीं ज्यादा कौतुहल उनकी बातचीत के तरीके में होता था। वे मुहावरेदार बेतुकी बातें सुनाते थे। जैसे कि एक बार एक मदारी टाइप आदमी ताकत की दवा बेच रहा था। सर्दी की सुबह थी। उसने मेहनत करके भीड़ इकट्ठा की। बादाम और दूसरे मेवों से तैयार वह अपनी कथित दवा जो कि हलवे जैसी दिख रही थी भीड़ को चटाई। उसे लग रहा था कि कोई न कोई तो उसे जरुरी खरीदेगा पर वहां सभी मुफ्तखोर थे। जब किसी ने दवा नहीं खरीदी तो उसका नाराज होना स्वाभाविक था। इतने में एक आदमी वहां भीड़ देखकर रुक गया। उसने अंदर झांका। मजमे वाले से दवा चखने के लिए मांगी। उसने घूरते हुए उसकी हथेली पर थोड़ा सा वह रख दिया।
 
उस आदमी ने उसे खाया और फिर कुछ देर तक स्वाद के जरिए उसका अनुमान लगाने की कोशिश करने के बाद उससे पूछा, ‘भैया क्या यह च्यवनप्राश है?’ यह सुनते ही मजमे वाला जो कि एक अफगानी था, बौखला गया। उसने उसे मजमे के केंद्र में बुलाया और उसकी हथेली पर वहां रखी एक हथोड़ी देने के बाद बोला ‘देखों अंधे के हाथ में दे दो हथोड़ा, तो वो बोलता पकौड़ा।’ भीड़ हा, हा करके हंसने लगी और मजमे वाले का गुबार निकल गया।
 
अभी जब चंद दिन पहले एक बड़े अंग्रेजी दैनिक में छपी एक धमाकेदार खबर और बाद में उसे लेकर छपी सफाई को पढ़ा तो यह घटना याद आ गई। खबर में खुलासा किया गया था कि पिछले साल दिल्ली के लोकनायक अस्पताल में अपनी किडनी का आपरेशन करवाने वाले एक मरीज को जब लगातार दर्द बना रहने लगा तो वह डाक्टरों के पास गया। उन्होंने उसका एक्स-रे किया तो पता चला कि उसके पेट में 8 इंच लंबी तार जैसी कोई चीज़ है। डाक्टरों ने उसे 28 अप्रैल को आपरेशन की तारीख दे दी। डाक्टरों की इस लापरवाही की खबर को एक्स-रे समेत छाप दिया। पढ़कर लगा कि राजधानी के प्रतिष्ठित सरकारी अस्पतालों के डाक्टर भी कितने लापरवाह हैं पर दो दिन बाद ही इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की तरफ से जारी वह खंडन पढ़ने को मिल गया कि, जिसे रिपोर्टर ने तार समझ लिया था वह वास्तव में कैथेडर था जो कि किडनी के आपरेशन के बाद पेशाब की थैली खुली रखने के लिए रोगी के पेट में डाला जाता है। वह कोई भूल से रह गई चीज़ नहीं थी।
 
यह पढ़कर लगा कि अक्सर हम लोग कितनी अक्षम्य गलतियां कर देते हैं। मुझसे भी ऐसी ही गलती हुई थी जबकि मैंने सरोदवादक अमजद अली से उनकी प्रेस कान्फ्रेंस में दो पैग लगाने के बाद यह पूछ लिया था कि आप यह सितार कब से बजा रहे हैं? ऐसा ही एक बार तब हुआ जब कि एक नामी-गिरामी विदेशी अखबार के ब्यूरो चीफ मुझसे अनुरोध करने लगे कि मैं मिजो नेशनल फ्रंट के प्रमुख लालडेंगा के साक्षात्कार के दौरान उन्हें साथ ले जाऊं। तब वे एक बड़े प्रकाशन समूह के डेस्क पर थे। मुझसे काफी जूनियर थे। उन दिनों लालडेंगा ने लंबे अरसे तक सशस्त्र संघर्ष करने के बाद केंद्र सरकार से समझौता वार्ता करने के लिए हथियार डाल दिए थे व महादेव रोड पर उन्हें ठहराया गया था।
 
पहले मैंने लालडेंगा का लंबा चौड़ा साक्षात्कार किया। उनसे उनके विद्रोहियों, हथियारों आदि के बारे में पूछा। इस बीच चाय आ गई और हम लोग अनौपचारिक बातचीत करने लगे। मैंने उसे इशारा किया कि तुम भी कुछ पूछ लो। उसने उनसे पूछा ‘डू यू हैव नेवी आलसो?’ (क्या आपकी नौसना भी है)। इस पर लालडेंगा ठहाका मार कर हंसने लगा। उसने कहा कि ‘डू हेव नेवी, वी विल हैव टू डिग ए बिग पांड इन मिजोरम (नौसेना के लिए हमें मिजोरम में बहुत बड़ा तालाब खोदना पड़ेगा)। उसे मिजोरम की भौगोलिक स्थिति तक का ज्ञान नहीं था हालांकि उनका दावा था कि वे पत्रकारिता में आने के पहले जेएनयू में रहकर सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे थे।
 
ऐसे ही एक बार किसी संवाददाता ने श्रीनगर में टैंक आने की खबर दे दी थी। उसने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि हालात इतने ज्यादा खराब हो चुके हैं कि कभी भी देश के इस सीमावर्ती इलाके में पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ सकता है। बाद में पता चला कि वे टैंक नहीं बल्कि बख्तरबंद गाड़ियां थीं जो कि प्रदर्शनकारियों के पथराव से बचाव करने के लिए लाई गई थी। बाद में रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने मजाक में कहा कि भाई कम से कम यह तो देख लेते कि उनमें हाथी की तरह सूंड (नली) थी या नहीं! टैंक की सबसे बड़ी पहचान यही होती है कि उसमें एक बड़ी नली भी होती है। इसीलिए रक्षा मंत्रालय संवाददाताओं को वार युद्ध की रिपोर्टिंग करने के लिए विशेष कोर्स करवाता है। कई बार इस भ्रम के कारण कुछ लोगों को फायदा भी हो जाता है। काफी पहले जब पंजाब में जगदेव सिंह तलवंडी नामक चर्चित अकाली नेता हुआ करते थे तो दिल्ली की अकाली राजनीति में बलविंदर सिंह तलवंडी नामक लंबे चौड़े छुटभैया नेता थे। वे अपनी दाढ़ी खोलकर रखते थे।  उन्होंने रिवाल्वर का लाइसेंस ले रखा था। कमर में रिवाल्वर लगाने के बाद अपना कुरता इस तरह से पहनते थे कि वह दिखाई देती रहे। उन दिनों पंजाब समस्या चरम सीमा पर थी। वे वीपी सिंह के शासनकाल में उनके व रामविलास पासवान के बेहद करीब हो गए। इतना करीब की पासवान ने उन्हें रेलवे की तमाम समितियों में डाल दिया व जनसभाओं में उन्हें साथ ले जाने लगे।
 
वीपी सिंह उन पर इतना मोहित हो गए कि प्रधानमंत्री बनने के बाद तिलकनगर की गलियों में स्थित ‘तलवंडी साहब’ के घर पर आयोजित गुरु ग्रंथ साहब के पाठ में हिस्सा लेने पहुंच गए। यह पाठ उनके कूलर बनाने के कारखाने में रखा गया था। प्रधानमंत्री के आने के बाद उनके हौसले इतने बढ़ गए कि पहले बिजली के मीटर में गड़बड़ी करते थे पर जिस दिन प्रधानमंत्री उनके घर आए, उन्होंने उनसे सीधे तार जुड़े होने का प्रदर्शन करते हुए कटिया डालकर बिजली के खंबे से सीधे अपनी फैक्टरी के तार जोड़ लिए।
 
(साभार: नया इंडिया)

मुस्लिम जगत – पश्चिम एशिया में उथल-पुथल यमन का अमन खतरे में

एक बार फिर यमन का अमन खतरे में पड़ गया है। दुनिया को यह चिंता सताने लगी है कि अदन से मिलने वाले खनिज तेल का प्रवाह रुक गया तो विश्व के आर्थिक मोर्चे पर भूचाल आ सकता है। दुनिया के कई देश मंदी से जूझ रहे हैं, ऐसी स्थिति में खनिज तेल की पूर्ति न हो पाना और भी चिंता उपजा देने वाली बात है। इस क्षेत्र की दो बड़ी ताकतें सऊदी और ईरान की मिलीभगत से यह युद्ध चल रहा है। जब से दुनिया अस्तित्व में आई तब से पश्चिमी एशिया में केवल दो ही भौगोलिक इकाइयों की चर्चा हुआ करती थी उनमें एक था अरब और दूसरा था ईरान। समय के साथ अरब का क्षेत्र अनेक देशों में बंटता चला गया जिसका सबसे बड़ा क्षेत्र जो आज सऊदी अरब कहलाता है, प्रारंभ से उसका अधिकांश भाग यमन का ही प्रदेश था। यहां की जलवायु अत्यंत शुष्क थी। पश्चिम एशिया में इस क्षेत्र के मूल निवासी अरब कहलाए। इसके अधिकांश भागों में मानव जीवन के लिए अनेक चुनौतियां थीं। लेकिन उसका पड़ोसी क्षेत्र हरा-भरा और खेती बाड़ी वाला प्रदेश था। जिसे ईरान का नाम दिया गया।
 
ईरान में मुख्यत: जरथ्रुष्ट के अनुयाई थे जिन्हें आज पारसी कहा जाता है। लेकिन जहां भी कहीं मरुभूमि वाले प्रदेश थे उनमें अनेक नगर बसे और मानव सभ्यता वहां की आबोहवा के अनुसार विकसित हुई। आज तो इस अरब प्रदेश में लगभग 16 देशों का समावेश होता है। जिसमें क्षेत्रफल के आधार पर सऊदी सबसे बड़ा है। इसी सऊदी में पश्चिमी एशिया के तीन बड़े पंथ जन्मे जिन्हें यहूदी, ईसाइयत और इस्लाम के नाम से जाना जाता है। समय-समय पर तीनों पंथ के अनुयाई अपने रिेगस्तानी प्रदेश से बाहर निकले और तीनों बड़े पंथों के प्रचारक बन गए। इनमें सबसे पुराना पंथ यहूदियत है उसके पश्चात ईसाइयत आता है। अंत में मक्का नगर में पैगम्बर मोहम्मद साहब का जन्म हुआ। जिन्होंने इस्लाम को प्रतिपादित किया। तीनों पंथों की जन्मभूमि का परिसर रेगिस्तान ही है। इन तीनों के पास अपनी मजहबी पुस्तकें हैं। जिन्हें हम जबूर, बाइबिल और कुरान कहते हैं।
 
ईसामसीह का जन्म यरुशलम के निकट हुआ लेकिन मोहम्मद साहब के जन्म की नगरी होने का सौभाग्य मक्का को हुआ। एक ही पिता आदम की संतानें अनुयायी होने का दावा करती हैं। लेकिन तीनों के बीच भारी अंतर और मतभेद हैं। बड़े पैमाने पर इस्लाम के प्रचार-प्रसार के कारण इन तीनों मजहब-पंथों के बीच हमेशा टकराव रहा। ये संघर्ष ही अब तक युद्ध के रूप में चले आए हैं। अरब प्रायद्वीप के इन तीनों मजहब-पंथों में समय-समय पर जो संघर्ष होते रहे हैं वही आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति कहलाती है। इस बार मजहबी खूनी संघर्ष में एक बार फिर से प्राचीन देश यमन हिंसा और उठापटक की राजनीति का केन्द्र बन गया है। दो भागों में बंटा यमन इस्लाम के अंतर्गत भी आज सबसे जटिल समस्या बनकर उभरा है। यमन के पहाड़ों में अलग-अलग मुस्लिम पंथों ने किस प्रकार मजहब की आड़ में राजनीति की उसका इतिहास खून से लथपथ है। वहां एक पंथ दूसरे के विरुद्ध और एक मजहबी नेता दूसरे के साथ टकरा रहा है। इतिहास में अब तक जो घटित हुआ है वह फिर से घट रहा है। यहां तीनों मजहबों में गुत्थमगुत्था है।
 
सभ्यता के लिए जन्मे यहां के तीनों मजहब आज राजनीति कर हिंसा के प्रेरणास्रोत बन गए हैं। जिन हौसियों के विरुद्ध सऊदी अरब और खाड़ी के देश एक साथ हैं, यही हौसी सऊदियों और उनके साथियों के अभिन्न मित्र थे। जब कर्नल नासिर ने अरब देशों को संगठित करने का संकल्प किया तो यमन पर उस समय इमाम बदर का राज था। नासिर के तीन दुश्मन-सऊदी, जॉर्डन और ईरान का समर्थन था। तत्कालीन यमन की सरकार को अब्दुल्ला अल सलासल को नासिर एवं रूस का समर्थन प्राप्त था। इस गृहयुद्ध में सऊदी, जॉर्डन और ईरान के शाह की हुकूमत की ओर से हौसी सत्ताधीशों को हथियार और धन के बदले नासिर ने लोकतंत्र की हिमायत में 70 हजार मिस्र के सैनिक उतार दिये। बदर ने भागकर सऊदी में शरण ली। 1965 में सऊदी और उनके समर्थकों ने ईरान के शाह का साथ छोड़ने में ही अपना भला समझा और 1968 में इस्रायल के हाथों करारी हार हो जाने के पश्चात वे चारों कोने चित हो गए। इसके फलस्वरूप उनकी सैनिक टुकडि़यां यमन, मिस्र तथा वियतनाम से वापस बुला लीं। लेकिन इसका एक परिणाम यह आया कि उत्तरी यमन पर रिपब्लिकन की सरकार कायम हो गई।
 
इस प्रकार हौसी जो हजारों साल से राज कर रहे थे उनका युग समाप्त हो गया। इधर दक्षिण यमन में अब तक ब्रिटिश सरकार थी लेकिन 1967 में ब्रिटेन ने इस भाग को स्वतंत्र कर अपनी सत्ता समाप्त कर दी। इस प्रकार अदन बंदरगाह सहित कुछ तटवर्ती क्षेत्रों के साथ एक नया देश कायम हो गया। जो दक्षिण यमन के नाम से जाना जाने लगा। वहां मार्क्सवादी सरकार बन गई। लेकिन 1990 में दक्षिण और उत्तरी यमन फिर एक हो गए। जिसके राष्ट्रपति अब्दुल्लाह सालेह मनोनीत किये गए। सऊदी और यमनी टकराव बहुत पुराना है। लेकिन बीच-बीच में उनमें एकता भी स्थापित होती रही। आसर और नजरान का यमनी क्षेत्र सऊदियों ने अपने राज में शामिल कर लिया। इसके बदले में सऊदियों ने यमनियों को अपने यहां आने-जाने और व्यापार करने की आज्ञा प्रदान कर दी। यमन एक बंजर देश होने के कारण यमनियों को सऊदी में काम धंधा मिलने लगा। इस प्रकार यह क्षेत्र सऊदियों पर निर्भर हो गया। लेकिन उनका कबीलाई चरित्र आज भी ज्यों का त्यों है। वे सऊदियों को घुसपैठिया कह कर यहां से निकालने के लिए आतुर हैं।
 
ईरान में जब तक राजाशाही रही सऊदियों को हौसियों से कोई बड़ी और कड़वी शिकायत नहीं रही। लेकिन ईरान में क्रांति होने के बाद सऊदियों को यह शंका होने लगी कि ईरानी इन हौसियों को सऊदी के विरुद्ध उपयोग कर सकते हैं। लेकिन इस बीच हौसियों को ऐसा लगने लगा कि सऊदी उन्हें अपनी मजहबी कट्टरता में ढालने का प्रयास कर रहे हैं। सऊदी में जो सुन्नी कट्टरवाद है उसकी छाया उन पर पड़ती हुई दिखलाई दी। इस कारण सऊदी ने उत्तरी और दक्षिणी यमन के एक हो जाने को भी बर्दाश्त कर लिया। 1990 में संयुक्त यमन ने कुवैत पर अधिकार जमाने वाले सद्दाम का विरोध और राष्ट्रसंघ के सदस्य होने के उपरांत भी अमरीका की संयुक्त सैनिक कार्यवाही करने के पक्ष में वोट देने से इनकार कर दिया तो यमन के लिए बड़ा भारी संकट पैदा हो गया। एक ओर तो ईरान ने इसे आर्थिक सहायता देना बंद कर दिया और सऊदी अरब ने यमनियों को इसकी सजा देने के लिए रातोंरात साढ़े सात लाख यमनियों को कूच करने का आदेश दे दिया। इस प्रकार एक सप्ताह में ही यमन की आबादी पांच प्रतिशत बढ़ गई।
 
 
जब 1994 में यमन ने विलय से अलग होने के लिए सशस्त्र कार्यवाही का रास्ता चुना तो दक्षिणी यमन के विद्रोहियों की सभी प्रकार से सहायता की गई। इसी बीच वहां खनिज तेल निकल आया तो वे संकट को झेल गए। सऊदी की सहायता के बिना भी उन्हें स्वयं के आत्मनिर्भर हो जाने का विश्वास पैदा हो गया। लेकिन इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता कि खनिज तेल उन्हीं स्थानों पर मिला जो सऊदी की सीमा से लगे हुए थे। इसी समय दोनों देशों के बीच 1934 के समझौते की समाप्ति की अवधि आ गई। लेकिन तेल के वरदान से उत्साहित होकर दोनों देशों ने अपने समझौते की सीमाओं को एक हजार किलोमीटर तक आगे बढ़ा दिया। बड़ी कठिनाई से सन 2000 में जेद्दाह समझौते के तहत दोनों देश अपनी सीमाएं निर्धारित करने में सफल हो गए। लेकिन अभी तो सरहद का झगड़ा मिटा ही था कि अमरीका में 11/9 की घटना घट गई।
 
अलकायदा के शस्त्रधारियों को यमन के पहाड़ों में छिपने का स्थान मिल गया। इस पर यमन की सालेह सरकार और सऊदी अरब को बातचीत के लिए तैयार हो जाना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि यहां ड्रोन से हमले होने लगे। शोकांतिका की सीमाएं तो उस समय टूट गईं जब यमन के जैदियों और सरकार के बीच ठन गई। सऊदी के प्रयासों से 2010 में इन दोनों के बीच समझौता हुआ। लेकिन यमन का दुर्भाग्य यहां भी उसके साथ बना रहा। इस बीच अरब वसंत की ध्वनि चारों ओर से सुनाई देने लगी इसलिए अली अब्दुल्ला सालेह की सरकार के विरुद्ध जनता उठ खड़ी हुई। इन्हें यमन छोड़ कर सऊदी में शरण लेनी पड़ी।
 
साभार-साप्ताहिक पाञ्चजन्य से

छोड़िये भी ! क्या रखा है इन विचारों में !

हम अपने मन में चल रहे अविवेकपूर्ण व अतार्किक विचारों से परेशान रहते हैं जिसका हमारे दैनिक जीवन और कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. ये विचार सफल व्यक्ति को असफल व्यक्ति से अलग करते हैं. ये विचार सभी क्लेशों और युद्दों की जड़ हैं क्योंकि अचेतन एवं अतार्किक विचारधारा ही सभी युद्धों को जन्म देती है.ऐसे 7 अतार्किक व अचेतन विचारों को एक बार गौर से पढ़िए तो सही, आप पाएंगे कि इनमें हमारी बहुत सी दिक्कतों का हल छुपा है। ये मिथ की तरह हैं, जिनके बाहर निकलना बहुत ज़रूरी है। 

1.यदि कोई मेरी आलोचना कर रहा है तो मुझमें अवश्य कोई दोष होगा. लोग एक-दूसरे की अनेक कारणों से आलोचना करते हैं. यदि कोई आपकी आलोचना कर रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपमें वाकई कोई दोष या कमी है. आलोचना का एक पक्ष यह भी हो सकता है कि आपके आलोचक आपसे कुछ भिन्न विचार रखते हों. यदि ऐसा है तो यह भी संभव है कि उनके विचार वाकई बेहतर और शानदार हों. यह तो आपको मानना ही पड़ेगा कि बिना किसी मत-वैभिन्य के यह दुनिया बड़ी अजीब जगह बन जायेगी. 

 2. मुझे अपनी ख़ुशी के लिए अपने शुभचिंतकों की सुझाई राह पर चलना चाहिए. बहुत से लोगों को जीवन में कभी-न-कभी ऐसा विचार आता है हांलांकि यह विचार तब घातक बन जाता है जब यह मन के सुप्त कोनों में जाकर अटक जाता है और विचलित करता रहता है. यह तय है कि आप हर किसी को हर समय खुश नहीं कर सकते इसलिए ऐसा करने का प्रयास करने में कोई सार नहीं है. यदि आप खुश रहते हों या खुश रहना चाहते हों तो अपने ही दिल की सुनें. दूसरों के हिसाब से ज़िंदगी जीने में कोई तुक नहीं है पर आपको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आपके क्रियाकलापों से किसी को कष्ट न हो. दूसरों की बातों पर ध्यान देना अच्छी बात है पर उन्हें खुश और संतुष्ट करने के लिए यदि आप हद से ज्यादा प्रयास करेंगे तो आपको ही तकलीफ होगी.

 3. यदि मुझे किसी काम को कर लेने में यकीन नहीं होगा तो मैं उसे शुरू ही नहीं करूंगा. इस विचार से भी बहुत से लोग ग्रस्त दिखते हैं. जीवन में नई चीज़ें करते रहना बढ़ने और विकसित होने का सबसे आजमाया हुआ तरीका है. इससे व्यक्ति को न केवल दूसरों के बारे में बल्कि स्वयं को भी जानने का अवसर मिलता है. हर आदमी हर काम में माहिर नहीं हो सकता पर इसका मतलब यह नहीं है कि आपको केवल वही काम हाथ में लेने चाहिए जो आप पहले कभी कर चुके हैं. वैसे भी, आपने हर काम कभी-न-कभी तो पहली बार किया ही था.

 4. यदि मेरी जिंदगी मेरे मुताबिक नहीं चली तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं है. मैं कुछ कहूं? सारी गलती आपकी है. इससे आप बुरे शख्स नहीं बन जाते और इससे यह भी साबित नहीं होता कि आप असफल व्यक्ति हैं. आपका अपने विचारों पर नियंत्रण है इसलिए अपने कर्मों के लिए भी आप ही जवाबदेह हैं. आपके विचार और कर्म ही आपके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं. यदि आप अपने जीवन में चल रही गड़बड़ियों के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराएंगे तो मैं यह समझूंगा कि आपका जीवन वाकई दूसरों के हाथों में ही था. उनके हाथों से अपना जीवन वापस ले लें और अपने विचारों एवं कर्मों के प्रति जवाबदेह बनें. 

 5. मैं सभी लोगों से कमतर हूँ. ऐसा आपको लगता है पर यह सच नहीं है. आपमें वे काबिलियत हैं जिन्हें कोई छू भी नहीं सकता और दूसरों में वे योग्यताएं हैं जिन्हें आप नहीं पा सकते. ये दोनों ही बातें सच हैं. अपनी शक्तियों और योग्यताओं को पहचानने से आपमें आत्मविश्वास आएगा और दूसरों की सामर्थ्य और कुशलताओं को पहचानने से उनके भीतर आत्मविश्वास जगेगा. आप किसी से भी कमतर नहीं हैं पर ऐसे बहुत से काम हो सकते हैं जिन्हें दूसरे लोग वाकई कई कारणों से आपसे बेहतर कर सकते हों इसलिए अपने दिल को छोटा न करें और स्वयं को विकसित करने के लिए सदैव प्रयासरत रहें. 

 6. मुझमें ज़रूर कोई कमी होगी तभी मुझे ठुकरा दिया गया. यह किसी बात का हद से ज्यादा सामान्यीकरण कर देने जैसा है और ऐसा उन लोगों के साथ अक्सर होता है जो किसी के साथ प्रेम-संबंध बनाना चाहते हैं. एक या दो बार ऐसा हो जाता है तो उन्हें लगने लगता है कि ऐसा हमेशा होता रहेगा और उन्हें कभी सच्चा प्यार नहीं मिल पायेगा. प्यार के मसले में लोग सामनेवाले को कई कारणों से ठुकरा देते हैं और ऐसा हर कोई करता है. इससे यह साबित नहीं होता कि आप प्यार के लायक नहीं हैं बल्कि यह कि आपका उस व्यक्ति के विचारों या उम्मीदों से मेल नहीं बैठता, बस इतना ही.  

 7.यदि मैं खुश रहूँगा तो मेरी खुशियों को नज़र लग जायेगी. यह बहुत ही बेवकूफी भरी बात है. आपकी ज़िंदगी को भी खुशियों की दरकार है. आपका अतीत बीत चुका है. यदि आपके अतीत के काले साए अभी भी आपकी खुशियों के आड़े आ रहे हों तो आपको इस बारे में किसी अनुभवी और ज्ञानी व्यक्ति से खुलकर बात करनी चाहिए. अपने वर्तमान और भविष्य को अतीत की कालिख से दूर रखें अन्यथा आपका भावी जीवन उनसे दूषित हो जाएगा और आप कभी भी खुश नहीं रह पायेंगे. कोई भी व्यक्ति किसी की खुशियों को नज़र नहीं लगा सकता. इन अचेतन विचारों से कैसे उबरें? यह बहुत आसान है. जब भी आपके मन में कोई अचेतन या अतार्किक विचार आये तो आप उसे लपक लें और अपनी विचार प्रक्रिया का अन्वेषण करते हुए उसमें कुछ मामूली फेरबदल कर दें
इसी तरह के और भी अचेतन व अतार्किक विचार हो सकते हैं जिनकी हमें पहचान करनी है और समय रहते ही उन्हें सकारात्मक विचार से बदल देना है. मुझे आशा है कि आपको अपने जीवन में बदलाव लाने के कुछ सूत्र अवश्य मिले होगे. कोई भी बदलाव सहज नहीं होता बल्कि उसके लिए सतत प्रयासरत रहना पड़ता है. यदि लिखी बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद आप उन्हें अपने जीवन में उतरने का प्रयास करेंगे तो आपको कुछ सफलता ज़रूर मिलगी। 
==================================
प्राध्यापक, हिन्दी विभाग,
शासकीय दिग्विजय पीजी स्वशासी महाविद्यालय
राजनांदगांव।  मो. 9301054300 
———————————————————-

आयकर विभाग में किन मूर्खों को बिठा रखा है जेटली जी

आयकर विभाग द्वारा ऑनलाइन आयकर विवरणी की हिन्दी वेबसाइट https://incometaxindiaefiling.gov.in/eFiling/index_hindi.html पर निम्न शब्दों का प्रयोग बार-२ किया गया है, इन शब्दों का अर्थ किसी शब्दकोष में नहीं मिला है इसलिए हम अनुरोध करते हैं कि तुरंत आयकर के सम्बन्ध में निम्न शब्दों का अर्थ जनता को बताया जाए ताकि आम कर निर्धारिती अपनी विवरणी सही तरह से दाखिल कर सकें: 
कालकुलाटोर, 
तसला, 
आर्टिफिसियाल, 
पर्सोन, 
रेसिडेंटिअल, 
वापसी, 
क्षेत्राधिकार ए. ओ. , 
आ. टी. आर, 
ओफ़ -फ़िन् , 
डोवंलोअड्स, 
धूप-ताम्रता, 
वेब्पग, 
परदे, 
रेगिस्ट्रशन, 
किल्क 
इन सभी शब्दों को वेबसाइट से चुना गया है जो केवल नमूने के तौर पर हैं, ऐसे अनेक शब्द हैं.  (कृपया सभी अनुलग्नक देखें) साथ ही उस अधिकारी का नाम -पता, ईमेल-फोन संपर्क सार्वजनिक करें जिसने इस वेबसाइट के लिए अभूतपूर्व वेबसाइट 'गूगल महाराज' की कृपा से तैयार की है ताकि लोग समझ सकें कि लिखा क्या गया है? बात स्पष्ट है हिंदी के नाम पर गूगल से अनुवाद करके सामग्री डाल दी गई है और जिसने डाली है उस अधिकारी ने उसे पढ़ने की भी जहमत नहीं उठाई है. सवाल यह है कि इतनी लापरवाही क्यों और लगातार क्यों जारी है? इसी वेबसाइट पर हिन्दी वेबसाइट के लिए हिंदी मे  लिखा गया है. जबकि सही : हिन्दी में  में होता है. गलती है छोटी, पर गलती तो गलती है. 
 
 
अन्य प्रमुख शिकायतें:
1.        आयकर विभाग एवं केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर मंडल की सभी ऑनलाइन सेवाएँ (आयकर विवरणी जमा करना, पैन कार्ड का ऑनलाइन आवेदन, टीडीएस विवरणी ऑनलाइन जमा करना, ऑनलाइन टीडीएस प्रमाण-पत्र निकालना आदि) केवल अंग्रेजी में उपलब्ध करवाई गई हैं, इस तरह अंग्रेजी ना जानने वाले नागरिकों को इन सेवाओं का लाभ लेने से वंचित किया जा रहा है. 

2.        आयकर विभाग की हिन्दी वेबसाइट का समय पर अद्यतन नहीं की जाती है. 

3.        विशेष: आयकर विभाग ने अभी एक और कारनामा किया है ऑनलाइन आयकर विवरणी दाखिल करने की वेबसाइट पर हिन्दी सामग्री 'गूगल हिन्दी अनुवादक' का प्रयोग करके डाली गई है जो राजभाषा कानून के अनुपालन के नाम पर किया गया एक बेहूदा मजाक है, हिन्दी वेबसाइट की पाठ्य सामग्री भगवान भी नहीं समझ सकते क्योंकि वह केवल दिखावे के लिए बनाई गई है(वेबसाइट के स्क्रीनशॉट ६ अनुलग्नक देखें)

4.        आयकर विभाग ने सभी आयकर विवरणी दाखिल करने के ऑनलाइन फॉर्म केवल अंग्रेजी में तैयार किए हैं जबकि नियम द्विभाषी प्रारूप बनाने का है, इसलिए सभी पीडीएफ एवं ऑनलाइन फॉर्म अलग-2 हिन्दी अंग्रेजी में ना तैयार किए जाएँ सभी फॉर्म द्विभाषी तैयार करवाए जाएँ.

5.        आयकर के ऑनलाइन फॉर्म जमा करने पर अभिस्वीकृति केवल अंग्रेजी में जारी होती है और आयकर सम्बन्धी सभी ईमेल भी अंग्रेजी में मिलते हैं. जिन्हें देश की 95 % जनता पढ़ भी नहीं पाती।

6.        मेरे एक पत्र के जवाब में आयकर विभाग ने बताया था कि पैनकार्ड को हिन्दी-अंग्रेजी द्विभाषीय बनाने के निर्देश कर दिए गए हैं, उस को शीघ्र अमल में लाया जाए. (पत्र संलग्न है)

7.        आयकर विभाग द्वारा अपने सभी प्रतीक-चिह्न (जैसे इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, टीडीएस, विभाग की स्वर्ण जयंती आदि के लोगो) अंग्रेजी में बनाए गए हैं, अथवा द्विभाषी ना बनाकर हिन्दी, अंग्रेजी में अलग-२ बनाए गए हैं ताकि अंग्रेजी का चिह्न इस्तेमाल किया जाता रहे.

 इन शिकायतों को दूर करवाने के प्रभावी कदम उठाएँ, आवेदक एवं अनेक नागरिक इन मुद्दों पर पिछले कई वर्षों से माँग कर रहे हैं पर अब तक कोई हल नहीं निकला है, कोई सुधार नहीं हुआ. 

मेरे 18 फ़रवरी 2015  गए ईमेल का अभी तक कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ है और वेबसाइट पर कोई भी सुधार भी नहीं हुआ है.

आपके द्वारा कार्यवाही एवं ईमेल के उत्तर की अपेक्षा  रखती हूँ। 

1.        माननीय प्रधानमंत्री महोदय, भारत सरकार, नई दिल्ली 

2.        माननीय वित्त मंत्री महोदय, भारत सरकार, नई दिल्ली  

3.        सचिव, राजभाषा विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली 

4.        संयुक्त सचिव, राजभाषा विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली 

5.        निदेशक (शिकायत), राजभाषा विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली 

 

 
भवदीय
विधि जैन 
जी-12, हावरे फैंटेशिया 
वाशी रेलवे स्थानक के पास, सेक्टर 30 ए,
वाशी, नवी मुम्बई – 400703

 
अनुलग्नक: यथोपरि 

शिक्षा,संगठन और संघर्ष के संगम : भारत रत्न डॉ.भीमराव अम्बेडकर

बाबा साहब भारतीय संस्कृति के आलोक पुरुष व पोषक थे। उनका नाम मन में आते ही सहसा एक सौम्य छवि नेत्रों के सामने आ जाती है। एक महान व्यक्तित्व जो बौध्दिक और सांस्कृतिक भ्रम की शिकार मानवता को सन्मार्ग की ओर ले जाकर गतिशीलता प्रदान करते हैं। शोषितों और पीड़ितों की दर्द भरी मूक भाषा को अमर स्वर प्रदान करने वाले, राष्ट्रीय एकता व साम्प्रदायिक सद्भाव के लिये जन-जन में अलख जगाने वाले, समाजवाद के कट्टर समर्थक, अहिंसा की प्रतिमूर्ति, बंधुत्व के प्रतिमान, भारत के संविधान के पावन शिल्पी बाबा साहब जैसे महामानव धरती पर जन्म लेने वाले सूरज की तरह हैं। 

बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जीवन संघर्ष का प्रतीक है। वे उच्च कोटि के नेता थे। जिन्होंने अपना सारा जीवन समग्र भारत की कल्याण कामना में समर्पित कर दिया। भारत के 80 फीसदी दलित जो सामाजिक व आर्थिक तौर से अभिशप्त थे, उन्हें अभिशाप से मुक्ति दिलाना ही डॉ. अम्बेडकर का जीवन संकल्प था। डॉ.अम्बेडकर का लक्ष्य था- सामाजिक असमानता दूर करके दलितों के मानवाधिकार की प्रतिष्ठा करना। बाबा साहब एक मनीषी, योद्धा, नायक, विद्वान, दार्शनिक,वैज्ञानिक, समाजसेवी एवं धीर-गम्भीर प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी अद्वितीय प्रतिभा चमत्कृत कर देने वाली और अनुकरणीय है।

बाबा साहब डा.अम्बेडकर ने सयाजीराव गायकवाड से कहा था- महाराज! मैं अध्ययन कर पता लगाऊंगा कि, जिस समाज में मेरा जन्म हुआ हैं, उस की ऐसी दुर्दशा क्यों हैं, और उसकी दुर्दशा के कारणों का पता लगाकर उन्हें दूर करने की कोशिश करूँगा। बचपन से लेकर,जब मैंने यह समझना शुरू किया कि जीवन का अर्थ क्या हैं, मैंने अपने जीवन में हमेशा एक ही सिद्धांत का पालन किया हैं और वह सिद्धांत हैं – अपने समाज के लोगों की सेवा करना।  मैं जहाँ कही भी और जिस हैसियत में भी रहा हूँ मैं हमेशा अपने भाइयों की बेहतरी के लिए विचार और कर्म करता रहता हूँ। मैंने इतना अधिक ध्यान किसी और समस्या पर नहीं दिया हैं। समाज के लोगों के हितों की रक्षा करना ही मेरे जीवन का मकसद रहा हैं और भविष्य में भी वह जरी रहेगा। मोटी रकम वाले आकर्षक वेतन के साथ मुझे अनेक लुभावने पदों के प्रस्ताव दिये गये परन्तु मैंने उन सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया क्योंकि मेरे जीवन का एक ही उदेश्य है और वह उदेश्य हैं अपने समाज के लोगों की सेवा करना। 

आगे बाबा साहब ने कहा था – मैं अपने विद्यार्थियों से एक पूछना चाहता हूँ आप लोग डिग्री लेकर नौकरी पाने के बाद अपने समाज के लिए क्या करेंगे? आप लोगों को अपने घर-संसार में ही मग्न न होकर, अपने समाज की सेवा की ओर भी ध्यान देना चाहिए। अपने समाज के लिए अपने वेतन से यथाशक्ति अधिकाधिक धन देना चाहिए। नवयुवकों तथा विद्यार्थियों से मेरा अनुरोध हैं कि वे अपने समुदाय की सेवा का भाव अपने मन में जगायें, समुदाय की बेहतरी डा भावी भार उन्हीं के कन्धों पर होगा और वे किसी भी जगह और किसी भी हैसियत में क्यों न रहें, उन्हें इस बात को किसी भी हालत में हरगिज नहीं भूलना चाहिए। 

हमारे देश को आजादी मिल गई यह तभी मानना चाहिए जब ग्रामीण लोग, जाति और अन्धविश्वास से छुटकारा पा लेंगे। मैं व्यक्तिगत तौर पर किसी से प्रेम नहीं करता, प्रेम केवल उनके कार्य से ही करता हूँ. जो निस्वार्थ भाव से कार्य करता है वही मुझे अच्छा लगता है। अच्छे काम करने के लिए कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता होती है। हर तरक्की की कीमत अदा करनी पड़ती है और जो लोग इसके लिए त्याग करते है, उन्हें तरक्की के लाभ मिलते है। डॉ.अम्बेडकर ने कहा – युवाओं को मेरा पैगाम है कि एक तो वे शिक्षा और बुद्धि में किसी सी कम न रहें। दूसरे,ऐशो-आराम में न पड़कर समाज का नेतृत्व करें। तीसरे, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी संभालें तथा समाज को जागृत और संगठित कर उसकी सच्ची सेवा करें। एक आत्म-सम्मानी व्यक्ति, तर्क की कसौटी पर यह निश्चित करता है कि अमुक बात अच्छी है या बुरी। तर्क बुद्धि ही उसे सच खोजने में सहायता करती है। 

शिक्षा के सम्बन्ध में उनके विचार नई दिशा व प्रेरणा देते हैं – जैसे शिक्षा शेरनी के दूध के समान है, जिसे पीकर हर व्यक्ति दहाड़ने लगता हैं। शिक्षा एक ऐसा माध्यम हैं जिसे प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचानी चाहिए। शिक्षा सस्ती से सस्ती हो जिससे निर्धन व्यक्ति भी शिक्षा प्राप्त कर सके। शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। शिक्षा के मार्ग सभी के लिए खुले होने चाहिए। किसी समाज की प्रगति उस समाज के बुद्धिमान, कर्मठ और उत्साही युवाओं पर निर्भर करती है। मैंने जिस प्रकार से शिक्षा प्राप्त की, आप भी प्राप्त कीजिए। केवल परीक्षा पास करने तथा पद प्राप्त करने से शिक्षा का क्या उपयोग? आपको यह याद रखना चाहिए कि कोई समाज जागृत, सुशिक्षित और स्वाभिमानी होगा तभी उसका विकास होगा। अपने गरीब और अज्ञानी भाईयों की सेवा करना प्रत्येक शिक्षित नागरिक का प्रथम कर्तव्य है। बड़े अधिकार के पद पाते ही शिक्षित भाई अपने अशिक्षित भाईयों को भूल जाते हैं। यदि उन्होंने अपने असंख्य भाईयों की ओर ध्यान नहीं दिया तो समाज का पतन निश्चित हैं। अपने बच्चों को विद्यालय जरुर भेजें। उन्हें शिक्षित बनाओ. शिक्षा के बिना समाज को सुधारने का और कोई चारा नहीं। 

बाबा साहब का मानना था कि यदि समाज को एक वृक्ष मान लिया जाये तो अर्थनीति उसकी जड़ है, राजनीति आधार, विज्ञान आदि उसके फूल हैं। इसलिए नये समाज की अर्थनीति या राजनीति पर दृष्टिपात करने से पूर्व उसकी संस्कृति की ओर सबसे अधिक ध्यान देना होगा, क्योंकि मूल और तने की सार्थकता तो उसके फूल में है। इसी श्रृंखला में उन्होंने बहिष्कृत हितकारी सभा का गठन कर तेरह शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। उन्होंने समाज की नींव नारी को पुरुष के समान सशक्त बनाने का बीड़ा भी उठाया। नागपुर के दलित महिला सम्मेलन में बोलते हुए बाबा साहब ने कहा था कि वे किसी भी वर्ग की उन्नति का अनुमान इस बात से लगा लेते हैं कि उस वर्ग की महिलाओं ने कितनी उन्नति की है।

डा.अम्बेडकर ने अहिंसा के माध्यम से हिंसा का दमन किया। वे अपनी व्यापक अहिंसा की दृष्टि से ही लोकतंत्र व समाजवाद के समर्थक थे। उन्होंने पूंजीवाद और जमींदारी प्रथा का विरोध अपनी अहिंसक नीति के अनुसार ही किया। पूंजीपतियों और जमींदारों द्वारा मजदूरों और किसानों के शोषण को वे हिंसा का पर्याय मानते थे। मानव कल्याण के विरुध्द किये गये प्रत्येक कार्य को वे हिंसा की श्रेणी में रखते थे। उन्होंने नवभारत के निर्माण के लिये सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, आध्यात्मिक आदि प्रत्येक क्षेत्र का गहन अध्ययन किया और पूर्व तथा पश्चिम के श्रेष्ठ तत्वों को समन्वित करके संविधान के रूप में जीवन शैली तैयार की। उन्होंने मानव जीवन को अमूल्यनिधि इस मंत्र के रूप में प्रदान की  – शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित कर उन्होंने सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोने का सफल प्रयास किया।

आज हर क्षेत्र में नई चेतना के साथ-साथ परिवर्तन की लहर भी दिखाई दे रही है, लेकिन आज बाबा साहब के विचारों और संदेशों को जीवन में उतारने की आवश्यकता है। अब समय आ गया है असत्य से लड़ने, विद्रूप हिंसा की बाढ़ रोकने तथा मानवता विरोधी शक्तियों का डटकर मुकाबला करने का और कहना न होगा कि बाबा साहब की सीख हमें सफलता का सीधा रास्ता बता सकती है। 
————————————————-
लेखक शासकीय दिग्विजय पीजी ऑटोनॉमस 
कालेज, राजनांदगांव के राष्ट्रपति सम्मानित 
प्रोफेसर हैं। संपर्क- 9301054300 

नेताजी के साथी कांतिचंद्र भी लापता हैं

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु 1945 में एक प्लेन क्रैश में हुई या वे किसी अन्य तरह की अज्ञात परिस्थितियों में इस संसार से विदा हुए,यह बात आज तक रहस्य बनी हुयी थी।पिछले दिनों इस रहस्य से पर्दा उठाने के लिए मीडिया में खूब चर्चा चली जो अब भी चल रही है।

इस प्रसंग में कश्मीर के जांबाज़ शहीद स्व0 कान्तिचन्द्र ज़ाडू का उल्लेख करना परमावश्यक है।सुना है कान्तिचन्द्र नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के करीबी सहयोगी थे और आखिरी दिनों तक नेताजी के साथ रहे।माना जा रहा है की 1945 में कान्तिचन्द्र भी नेताजी के साथ ही रहस्यमय परिस्थितियों में विलुप्त हो गए।इतने वर्ष गुज़रने के बाद भी अब तक कान्तिचन्द्र के घर वालों को उनके बारे में कोई आश्वस्त करने वाला समाचार मिला नहीं है।उनकी पत्नी सत्यवती अपने पति के लौटने का ज़िंदगीभर इंतज़ार करती रही और अंततः अपने ही देश में शरणार्थी बन 1990 में इस दुनिया से रुख़सत हुई।

सरकार चाहे तो नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु की गुत्थी को सुलझाने के साथ ही कश्मीरी पंडितों के अमर शहीद कान्तिचन्द्र ज़ाडू की मौत पर पड़े पर्दे को भी हटाने की पहल कर सकती है।

ईमानदार और दबंग रेल्वे पुलिस आयुक्त के तबादले का विरोध

मै पिछले दस वर्षो से अधिक समय से सामाजिक कार्य में जुड़ा हुआ हु | विशेष कर रेलवे के यात्रियों की सुरक्षा और समस्याओ को लेकर सम्बंधित विभाग में सूचित करते आया हूँ। | लेकिन पिछले दस वर्षो में मेरे जानकारी में जो भी अधिकारी आS वो अपने कार्यो को करने में लगे रहे यात्रियों की सुरक्षा प्रदान करने पर ध्यान दिया | लेकिन इन अधिकारियो की तुलना में डॉ रविंद्र सिंघल  ने जब से रेलवे पुलिस आयुक्त का कार्यभार संभाला है तब से लेकर अभी तक बहुत ही सराहनीय कार्य किया है | 

सबसे पहले सिंघल सर आते ही यात्रियों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देते हुए सभी स्टेशनों और आस पास के अपराधियों को समाप्त करने पर विशेष ध्यान दिया | यात्रियों और पुलिस के बिच की दुरी समाप्त करने के लिए रेलवे को सोशल मिडिया से जोड़ने के लिए फेसबुक चालु किया | इस के साथ ही पुलिस आयुक्त सिंगल सर ने सभी यात्रियों से आवाहन किया था की अगर आप की शिकायत कोई पुलिस नही लेता हो तो आप लिखित तौर पर फेसबुक या मेल के माध्यम से भेजे और सिंघल सर इस पर तुरंत कार्यवाई करते थे | इतना ही नही पुलिस विभाग के कर्मचारियों में समानता लाने के लिए कई तरह के सांस्कृतिक कार्यकर्मो के माध्यम से जोड़ने का अनोखा कार्य श्री सिंघल  ने किया है | स्टेशनों पर रहने वाले लावारिस या बेसहारा बच्चो के लिए ठाणे मनपा के माध्यम से आश्रम शुरु किया | इस तरह के सैकड़ो कार्य श्री सिंघल ने किए हैं इसके बावजूद उनका तबादला होना किसी साजिश का हिस्सा लगता है। 

 

 नागमणि पाण्डेय 
 09004322982

भोपाल के छात्र ने बनाई बगैर ड्रायवर की कार

भोपाल। इन दिनों गूगल की ड्राइवर लेस कार खासी चर्चा में है। इसके इतर राजधानी के एक इंजीनियर ने भारतीय उपभोक्ताओं की क्षमता को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी डिवाइस बनाई है, जिससे घर बैठे ही कार चलाई जा सकती है। कहीं जाना है तो भी ड्राइविंग सीट पर बैठने की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही यह ट्रिपल ब्रेन टेक्नोलॉजी आपकी कार को एक्सीडेंट से भी बचाएगी और आरामदायक सफर भी कराएगी। संकरी गलियों के आड़े-तेड़े रास्ते हों या हाइवे, यह किट हर जगह काम आएगी।
 
किट कैसे करेगी काम?
ओरियंटल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के थर्ड ईयर के स्टूडेंट सुशांत पटनायक ने यह कारनामा किया है। सुशांत बताते हैं,'इस किट को कार में फिट करने के बाद टैब या मोबाइल एप्लीकेशन से कमांड देना है। इस कमांड में डिवाइस को रूट की जानकारी दी जाती है। लोकेशन से डेस्टिनेशन आइडेंटिफाई करने के बाद कार उस रूट पर चलती है। यदि गाड़ी में लगे सेंसर को रूट में कहीं रुकावट दिखती है तो गाड़ी रुक जाती है और मोबाइल पर नोटिफिकेशन आता है। नोटिफिकेशन के बाद अगला कमांड देने पर ही गाड़ी आगे चलती है। इसके लिए एक मोबाइल एप्लीकेशन भी तैयार किया है।'
 
एक्सीडेंट से ऐसे बचाएगी कार
सुशांत बताते हैं, 'किट में ट्रिपल ब्रेन टेक्नोलॉजी लगाई गई है। इसमें तीन कैमरे लगे होते हैं। कार चलते वक्त यदि एक कैमरा भी सिग्नल देता है कि आगे रुकावट है तो कार रुक जाती है। इसके साथ ही जब तक दो कैमरे रास्ता साफ होने का सिग्नल नहीं देते तब तक कार आगे नहीं बढ़ती। कार में बैठे-बैठे मोबाइल से इसे मैन्युअली भी ऑपरेट किया जा सकता है।
 
कीमत 1 से 5 लाख
इस किट की कीमत 1 से 5 लाख रुपए है। सुशांत कहते हैं कि विदेशों में बन रही ड्राइवर लेस कार खरीदने के लिए उसे अपनी कार बेचकर नई कार खरीदनी होगी। यह भारतीय अफॉर्ड नहीं कर सकता। इसलिए मैंने ऐसी किट बनाई है कि उसे मौजूदा कार में ही वे सारी सुविधाएं मिल सके।
 
साभार- दैनिक भास्कर से 

तीस्ता के बाद अब फोर्ड फाउंडेशन की भी जाँच

गुजरात दंगा पीड़ितों के लिए जमा किए गए फंड में गबन के आरोपों का सामना कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ के बाद अब गुजरात सरकार ने उनके मुख्य फाइनैंसर और अमेरिकी एनजीओ फोर्ड फाउंडेशन को निशाने पर ले लिया है। गुजरात सरकार का कहना है कि फोर्ड फाउंडेशन भारत के आंतरिक मामलों में सीधे दखल दे रहा है और देश में सांप्रदायिक सौहार्द को खराब करने के लिए काम कर रहा है।
 
गुजरात सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को चिट्ठी लिखकर सीतलवाड़ के एनजीओ सबरंग ट्रस्ट और सिटिजन्स फॉर जस्टिस ऐंड पीस के खिलाफ फेमा के उल्लंघन के आरोपों की जांच की अपील की है। गुजरात सरकार ने इन एनजीओ को फोर्ड फाउंडेशन का प्रॉक्सी ऑफिस करार दिया है। चिट्ठी में यह भी कहा गया है कि तीस्ता और उनके पति जावेद आनंद ने विदेश में देश की छवि को नुकसान पहुंचाया। गुजरात सरकार की चिट्ठी पर कार्रवाई करते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले सप्ताह सीतलवाड़ के एनजीओ के खातों की जांच के लिए अपनी टीम भेजी थी। टीम ने जांच पूरी कर ली है और वह जल्द ही अपनी रिपोर्ट सौंप देगी।
 
गुजरात के गृह विभाग ने फोर्ड फाउंडेशन पर यह आरोप भी लगाया है कि उसने भारतीय न्यायिक व्यवस्था में दखल देने और भारतीय सेना को बदनाम करने की कोशिश की। यह भी आरोप है कि उसने सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के राज्य सरकार के घोषित उद्देश्य के खिलाफ काम किया। इसमें यह आरोप भी लगाया गया है कि फाउंडेशन ने सीतलवाड़ के एनजीओ को एक धर्म आधारित और मुस्लिम समर्थक अपराध संहिता की पैरवी के लिए उकसाया। गुजरात सरकार ने फोर्ड फाउंडेशन पर यह आरोप लगाया कि उसने बेबाक तरीके से एक धर्म (इस्लाम) का इस तर्क के साथ समर्थन किया कि इससे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को मदद मिलेगी।
 
गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव जी. आर. अलोरिया ने कहा कि हमने केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक महीना पहले पत्र लिखा था और अब उसके जवाब का इंतजार कर रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, 'इस मामले में फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेग्युलेशन ऐक्ट, 2010 का उल्लंघन पाया गया तो कार्रवाई शुरू करने से पहले एनजीओ से सफाई मांगेंगे।'
 
क्या है मामला?
 
गुजरात सरकार की ओर से लगाए गए प्रमुख आरोप हैं…
 
सबरंग ट्रस्ट और सबरंग कम्युनिकेशन ऐंड पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड (एससीपीपीएल) को फोर्ड फाउंडेशन से 5.4 लाख अमेरिकी डॉलर यानी करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये मिले। सवाल इस बात को लेकर है कि एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी (एससीपीपीएल) को कैसे भारत में सांप्रदायिकता और जातीय भेदभाव से निपटने के लिए 2.9 लाख डॉलर अनुदान के रूप में मिले।
 
एक प्रॉजेक्ट के लिए मिले ढाई लाख अमेरिकी डॉलर में से 80% ऑफिस के खर्चों पर खर्च किए गए। एससीपीपीएल को मिले 2.9 लाख डॉलर में से भी 75 % ऑफिस पर खर्च किए गए।
 
अपने अनुदान से पाकिस्तानी मानवाधिकार संगठन के लोगों की भारत यात्रा करवाकर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी सीमा का उल्लंघन किया। इसके अलावा देश की सांप्रदायिक स्थिति पर अतिरेकपूर्ण विचारों को प्रसारित करवाया।
 
एससीपीपीएल को यह कहने की इजाजत देना कि सेना और नौसेना में कार्यरत और रिटायर हो चुके अधिकारी आतंक को बढ़ावा दे रहे हैं, भारतीय सेना के लिए मानहानि को बढ़ावा देना है।
 
तीस्ता सीतलवाड़ ने खुद कहा था कि सबरंग ने गुजरात दंगों के दौरान के 5 लाख कॉल रिकॉर्ड्स का विश्लेषण किया था। फोर्ड फाउंडेशन ने ऐसी गैरकानूनी और अनाधिकृत गतिविधि पर आपत्ति क्यों नहीं जताई?
 
साभार- टाईम्स ऑफ इंडिया से