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श्री प्रभु ने देश को बताया कि रेल मंत्री पूरे देश का होता है

मुंबई मे हर दिन कई तरह के आयोजन होते रहते हैं, जिसमें कॉर्पोरेट जगत से लेकर सांस्कृतिक, साहित्यिक, राजनीतिक और मनोरंजन सभी तरह के कार्यक्रम शामिल होते हैं, इन आयोजनों में कॉर्पोरेट से लेकर फिल्मी दुनिया और राजनीतिक जगत की हस्तियाँ शामिल होती रहती है। लेकिन कुछ ही ऐसे कार्यक्रम होते हैं जो मंच पर मौजूद लोगों के अलावा श्रोताओं के लिए भी यादगार हो पाते हैं। नहीं तो होता ये है कि मंच पर बैठे लोग एक दूसरे की तारीफों के पुल बाँधते रहते हैं और श्रोता अपने मोबाईल से खेलते रहते हैं। मुंबई के राजस्थान वसति गृह के पूर्व छात्रों के सम्मेलन में एक अलग ही नजारा देखने को मिला।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभाकर प्रभु मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। मुंबई के सामाजिक जगत में अपनी खास पहचान बना चुके जाने माने उद्योगपति एवँ व्यवसाई श्री रामस्वरुप गाड़िया ने आज से 55 साल पहले मुंबई में चार्टर्ड एकाउंटेट की पढ़ाई करने आने वाले छात्रों के लिए इस छात्रावास की शुरुआत की थी।

श्री सुरेश प्रभु ने अपने खास अंदाज़ में जिस तरह से संबोधित किया, वह हर एक श्रोता के लिए एक यादगार अनुभव था। श्री प्रभु ने कहा कि राजस्थान वसति गृह मेरे राजनीतिक जीवन की पहली पाठशाला था। हालांकि मैं इसमें नहीं रहता था, मगर यही मेरा ठिकाना होता था। तब मैने 1975 में डब्ल्यूसीएएसए का चुनाव लड़ा था और मात्र 50 रु. डिपाजिट किए थे। इस चुनाव में दो ग्रुप थे मेरा किसी ग्रुप से कोई लेना-देना नहीं था मगर मैं चुनाव जीत गया। इसके बाद मैं अपने सभी साथियों को इंडस्ट्रियल टूर पर पुणे लेकर गया, जिसका शुरु-शुरु में तो बहुत विरोध हुआ लेकिन बाद में सबने इस आईडिये को बहुत पसंद किया। श्री प्रभु ने कहा कि ये मेरा दुर्भाग्य था कि मैं राजस्थान वसति गृह में नहीं रह सका, लेकिन हर रविवार को वहाँ का बढ़िया खाना खाने मैं जरुर जाता था। किसी होस्टल में इतना बढ़िया खाना शायद ही मिले, जितना बढ़िया खाना राजस्थान वसति गृह में मिलता है।

श्री प्रभु ने इस होस्टल की कल्पना को साकार करने वाले मंच पर उपस्थित उद्योगपति श्री रामस्वरूप गाड़िया को लेकर कहा, इस बात की कल्पना करना ही रोमांचक है कि कोई व्यक्ति आज से 55 साल पहले चार्टर्ड एकाउंटेट बनने आने वाले छात्राओं के लिए मुंबई जैसे शहर में होस्टल बनाने की कल्पना करे, जिस व्यक्ति ने ये कल्पना कर उसे साकार करके पूरे समाज के सामने अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है। इनके नाता-पिता ने इनका जो नाम रखा है वह इनके व्यक्तित्व को साकार करता है –ये वास्तव में राम स्वरूप ही हैं।

श्री प्रभु ने का, आज देश भर में 7 हजार चार्टर्ड एकाउंटेट ऐसे हैं जो इस संस्थान में छात्र के रूप में रहे है। सरकार ने तो सीएसआर की योजना अब शुरु की है मगर श्री गाड़िया ने तो बगैर किसी कानून या नियम के बने देने के भाव के साथ सीएसआर की कल्पना को जन्म दिया।

ठहाकों के बीच श्री प्रभु ने कहा कि राजस्थान के जोधपुर की मिट्टी की जाँच करवाई जाना चाहिए क्योंकि अधिकतर चार्टर्ड एकाउंटेट इसी शहर से बने हैं। उन्होंने कहा कि राजस्थान के लोगों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे अपनी मिट्टी से जुड़े रहते हैं।

श्री प्रभु ने स्वच्छ भारत अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे देश को पहली बार ऐसा प्रधान मंत्री मिला है जो स्वच्छता की बात कर रहा है, स्वच्छता अभियान कोई मामूली सोच नहीं है, अगर हमारे आसपास का वातावरण स्वच्छ रहता है तो हम कई बीमारियों से बच सकते हैं, हमारे देश के पर्यटन स्थलों का विकास हो सकता है।

उन्होंने कहा कि चीन और मोरक्को जैसे देशों में सफाई की बदौलत वहाँ पर्यटकों की संख्या में वृध्दि हुई है।

कार्यक्रम के बाद श्री प्रभु मंच से उतरकर अपने सभी पुराने साथियों के पास जाकर उनसे मिले। उनके साथ सुरक्षा का कोई तामझाम नहीं था ओर लोग खुलकर उनसे मिलते रहे।

इस अवसर पर राजस्थान वसति गृह के छात्र रहे और बॉयोजेनोमिक्स कंपनी के माध्यम से 10 हजार लोगों को रोजगार देने वाले श्री राजमल पारेख ने मुंबई में अपने संघर्ष और राजस्थान वसति गृह में बिताए दिनों की मर्मस्पर्शी, रोमांचित करने वाले अनुभव किसी हिन्दी फिल्म की कहानी जैसे लगे जिसमें गरीबी में पला-बड़ा बच्चा अपनी मेहनत और लगन से दुनिया के प्रमुख कारोबारियों में अपना नाम लिखा लेता है।
श्री राजमल पारेख ने कहा कि जब मैं राजस्थान के अपने गाँव से पहली बार मुंबई आया तो पहली बार इतना बड़ा शहर देखकर घबरा गया था। तब मैं एल्फिस्टन स्टेशन के पास एक होस्टल में रहता था। मेरे मित्र श्री पद्म मनोज ने मुझे यहाँ सफल होने के लिए एक ही रास्ता बताया कि जहाँ कहीं भी सीए का बोर्ड देखो उससे काम मांगो। उन्होंने कहा कि मैं अपने गाँव में हिन्दी माध्यम से पढ़ा था और मुझे अंग्रेजी बिल्रकुल नहीं आती थी। लिफ्ट भी पहली बार देखी थी, और मुझे तो लिफ्ट में चढ़ना भी नहीं आता था। पैसे नहीं होते थे तो भूख लगती थी तो खाना खाने होस्टल में आता था। मैं दिन भर मुंबई के फोर्ट क्षेत्र में सीए का बोर्ड देखता और वहाँ जाकर रिसेप्शन पर बैठी लडड़की से नौकरी की माँग करता था। मगर मुझे हर बार वापस कर दिया जाता। मेरे मित्र श्री पद्म मनोज ने मुझसे जब पूछा कि मैं काम कैसे माँग रहा हूँ तो उसने समझाया रिसेप्सनिस्ट से नहीं सीधे उस कंपनी के मालिक से मिलो।

इसके बाद मै 15 दिन में मुंबई के 400 कंपनियों में जाकर उनके मालिकों मिला। इन 15 दिनों में मैने कामचलाउ अंग्रेजी भी सीख ली। एक कंपनी में गया तो उन्होंने मेरी शैक्षणिक योग्यता देखकर कहा कि मैं तुम्हें अगले साल नौकरी दे सकता हूँ। इस तरह मेरा संघर्ष लगातार जारी रहा।

1971 में सीए बनने के बाद मेरे सामने ये समस्या आ गई कि अब कहाँ रहूँगा क्योंकि होस्टल की सुविधा मेरे चात्र रहने तक ही थी, सीए बनने के बाद मैं होस्टल में नहीं रह सकता था।

मैं लोन लेने के लिए एपएसबीसी बैंक गया तो बैंक ने मेरा प्लान तो पसंद किया मगर कहा कि मेरे पास बैलेंस शीट नहीं है। मैं निराश हो गया तो वहाँ एक गुजराती भाई ने मुझे सलाह दी कि एक सीए फर्म में कुछ पैसे देकर चाहे जैसी बैलेंसशीट बना सकते हो। लेकिन मैं अपने मूल्यों से समझौता करके गलत तरीके से काम करना नहीं चाहता था, मैं दूसरे दिन फिर एचएसबीसी बैंक के मैनेजर के पास गया और कहा, अगर मैं फर्जी बैलेंसशीट बनाकर लाऊँ तो आप मुझे लोन दे देंगे….यह सुनकर बैंक का मैनेजर जो स्कॉटिश था, हैरान रह गया उसने मुझसे कहा ये कैसं संभव है तब मैने उनके यहाँ कार्यरत उस गुजराती भाई को आगे किया, उस गुजराती भाई ने बताया कि कोई भी पैसे देकर फर्जी बैलेंसशीट बनवा सकता है। मेरी बात सुनकर बैंक मैनेजर मुझे लोन देने को राजी हो गया।

श्री पारेख ने कहा कि मुंबई की इस भीड़भरी दुनिया में सच्चाई और ईमानदारी से काम करने की ये मेरी पहली जीत थी और इसी जीत के दम पर आज मेरी कंपनी इस मुकाम पर पहुँची है कि इसमें 10 हजार लोग काम कर रहे हैं जिसमें 40 लोग आईआईएम के हैं, 65 सीए हैं, 400 इंजीनियर हैं, और 200 आईआईटी के हैं।

श्री पारेख ने अपने संघर्ष की दास्तान जिस सहजता और सरलता से प्रस्तुत की उसने इस्कॉन सभागृह में बैठे श्रोताओं को रोमांच और अचरज से भर दिया। यह यकीन करना मुश्किल था कि श्री पारेख की कहानी कोई फिल्मी कहानी है कि उसका नायक उनके सामने खड़ा है।

इस अवसर पर यूनियन बैंक के प्रबंध संचालक एवँ अध्यक्ष श्री अरुण तिवारी ने कहा कि सुरेश प्रभु ऐसे रेल मंत्री है जिनके बजट के बाद ये पता लगाना मुश्किल है कि वे किस प्रदेश के हैं। मैने पहली बार ऐसा राजनीतिक व्यक्तित्व देखा है तो जज्बे के साथ व्यावहारिक बात करता है। उन्होंने कहा कि किसी होस्टल को बनाना किसी मंदिर बनाने से भी बड़ा काम है। 

दिन भर चले इस समारोह में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। सेवा इंटरनेशनल के श्री संजय हेगड़े ने सीए4सोसायटी के माध्यम से इस बात को रेखांकित किया कि हम समाज सेवा की छोटी से छोटी सोच के माध्यम से समाज को किस तरह लाभ पहुँचा सकते हैं।

वनबंधु परिषद् (फ्रैंडस ऑफ ट्रायबल सोसायटी) की ओर से जाने मे उद्योगपति श्री प्रदीप गोयल ने अपने प्रंजेटेशन के माध्यम से बताया कि उनकी संस्था देश भर के सुदूर आदिवासी अंचलों में किस तरह एकल विद्यालयों के संचालन के साथ ही ग्रा ग्राम स्वराज की अवधारणा पर सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। एकल विद्यालय अभियान की सफलता देख सभी लोग हैरत में थे।
इस अवसर पर आयोजन समिति के अश्र्यक्ष श्री मनोज संथेलिया और अनेय पदाधिकारियों ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन श्री सुनील गोयल ने किया और मौजूँ शेरो शायरी से श्रोताओँ और वक्ताओं के बीच सहजता बनाए रखी।

कार्यक्रम में कई जाने माने उद्योगपति, व्यवसाई जो किसी जमाने में इस होस्टल के छात्र रह चुके थे मौजूद थे।

बोस के गनर रहे जगराम बोले, ‘नेताजी की हत्या कराई गई थी’

गुड़गांव,  जंगे-ए-आजादी के महानायक रहे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निजी गनर रहे वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी जगराम ने खुलासा किया है कि नेता जी की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी, उनकी हत्या कराई गई होगी। उनका कहना है कि यदि विमान हादसे में उनकी मौत होती तो कर्नल हबीबुर्रहमान जिंदा कैसे बचता। वह दिन रात साये की तरह नेताजी के साथ रहता था। आजादी के बाद कर्नल पाकिस्तान चला गया था। सौ फीसद आशंका है कि नेताजी को रूस में फांसी दी गई थी। ऐसा नेहरू के कहने पर रूस के तानाशाह स्टालिन ने किया होगा।
शनिवार को दैनिक जागरण से बातचीत में 93 वर्षीय जगराम ने बताया कि हिरोशिमा एवं नागासाकी पर बमबारी के चार साल बाद चार नेताओं को युद्ध अपराधी घोषित किया गया था। इनमें जापान के तोजो, इटली के मुसोलिनी, जर्मनी के हिटलर एवं भारत के नेताजी सुभाषचंद्र बोस शामिल थे। तोजो ने छत से कूदकर अपनी जान दे दी थी। मुसोलिनी को पकड़कर मार दिया गया और हिटलर ने गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। केवल नेताजी ही बच गए थे। उन्हें जापान ने रूस भेज दिया था।

नेता जी से खौफ खाते थे नेहरू
लगातार 13 महीने तक नेताजी के गनर रहे जगराम ने बताया कि देश की आजादी में नेताजी के मुकाबले पंडित नेहरू की भूमिका कुछ भी नहीं थी। महात्मा गांधी ही नहीं, बल्कि दुनिया के बड़े से बड़े तानाशाह और शासक नेताजी के सामने बौने दिखते थे। उनके परिजनों की जासूसी की खबर से इस बात पर मुहर लग गई कि नेहरू किस कदर नेताजी से खौफ खाते थे। नेहरू को हमेशा यही लगता था कि यदि नेताजी सामने आ गए तो फिर उन्हें कोई पूछने वाला नहीं।

नेहरू को नहीं सुहाते थे नेता जी
नेता जी पूरी दुनिया में लोकप्रिय थे। जहां जाते थे, वहीं लोग उनसे मिलने के लिए टूट पड़ते थे। उनके आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभालते ही जवानों की संख्या तीन लाख से ऊपर पहुंच गई थी। यह बात अपने देश के अधिकतर नेताओं को अच्छी नहीं लगती थी। इनमें सबसे ऊपर नाम पंडित नेहरू का था। यही वजह रही कि नेता जी की मौत की फाइल दबा दी गई।
सामने दिखाई देते हैं नेताजी

2 जुलाई 1943 से अगस्त 1944 तक नेताजी के गनर रहे जगराम कहते हैं कि जैसे ही नेता जी 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा' नारा लगाते थे, जवान उनके एक इशारे पर मर मिटने को तैयार हो जाते थे। उनके आह्वान पर सिंगापुर से पैदल सेना तीन महीने में वर्मा पहुंची थी।

साभार–www.jagran.com/ से 

गोइन्का पुरस्कार व सम्मान समारोह हैदराबाद में सम्पन्न

 हैदराबाद के एन.टी.आर. कलामंदिरम् में कमला गोइन्का फाउण्डेशन द्वारा आयोजित वरिष्ठ तेलुगु भाषी हिन्दी साहित्यकारों एवं हिन्दी पत्रकारों के सम्मानार्थ समारोह में कमला गोइन्का फाउण्डेशन के प्रबंध न्यासी श्री श्यामसुन्दर गोइन्का ने पुरस्कृत साहित्यकारों और पत्रकारों के योगदान को सराहा व संस्था का परिचय दिया।

वरिष्ठ हिन्दी – तेलुगु अनुसृजक के सम्मानार्थ घोषित इकतीस हजार रुपये का "गीतादेवी गोइन्का हिन्दी-तेलुगु अनुवाद पुरस्कार" – 2015 डॉ. आर. सुमनलता जी को प्रख्यात समाजशास्त्री पुरुषोत्तम अग्रवाल की विख्यात कबीर-कथा 'अकथ कहानी प्रेम की' की उनके द्वारा अनुसृजित तेलुगु कृति "विनिपंचनि कथा विनिपिंचु" तथा उनके द्वारा हिन्दी व तेलुगु साहित्य के प्रति किये गये समग्र योगदान के लिए दिया गया। 

आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकारों के सम्मान में घोषित "भाभीश्री रमादेवी गोइन्का हिन्दी साहित्य सम्मान" – 2015 से वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सुवास कुमार जी को उनके साहित्यिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

साथ ही आंध्र प्रदेश के हिन्दी पत्रकारिता जगत के वरिष्ठ पत्रकारों के सम्मनार्थ घोषित "श्री मुनींद्र पत्रकारिता सम्मान" से हैदराबाद से प्रकाशित प्रमुख हिन्दी दैनिक ' मिलाप' से करीबी से जुड़े श्री दिवाकर पांडेय जी को सम्मानित किया गया।

समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. ए. के. पुरोहित (प्रख्यात स्नायुविज्ञान निष्णात) ने सम्मानमूर्ति साहित्यकारों का अभिनन्दन किया और साहित्यिक गितविधियों के न्यास को बधाई दी। समारोह अध्यक्ष डॉ. एम. वेंकटेश्वर जी ने कमला गोइन्का फाउण्डेशन द्वारा साहित्यकारों, पत्रकारों के सम्मनार्थ चलाये जा रहे इस मुहिम को व हिन्दी साहित्य के प्रति किये जा रहे कार्यों की भरपूर सराहना की और श्री गोइन्का जी को बधाई दी।

कार्यक्रम का संचालन श्री सुमित मिश्रा तथा ललिता गोइन्का ने किया। अंत में श्री ओमप्रकाश गोइन्का जी ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रादेशिक पुरस्कार समिति के सदस्य डॉ. राधेश्याम शुक्ल, श्री रवि श्रीवास्तव, श्री वेणुगोपाल भट्टड़ तथा एम. रंगय्या सहित हैदराबाद के अनेक गणमान्य साहित्य-प्रेमी व्यक्ति मौजूद थे।

छोटे उद्यमियों की बड़ी आस है मुद्रा

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लांच किए जाने के साथ 'मुद्रा बैंक" (माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट रिफाइनेंस एजेंसी) अस्तित्व में आ गया। यह बेशक 5.77 करोड़ छोटे व लघु कारोबारियों के उस लक्षित वर्ग की खातिर उठाया गया एक बड़ा कदम है, जिसे फॉर्मल बैंकिंग सेक्टर से कर्ज पाने में दिक्कतें पेश आती हैं। आखिर ये कोई नई-नवेली तकनीकी कंपनियां नहीं हैं, जिनके कि पावर प्वाइंट बिजनेस प्लान किसी कैफे कॉफी डे जैसे आउटलेट्स में बैठकर तैयार होते हैं, वैसे इन इकाइयों के साथ भी वित्तीय समस्याएं होती हैं। ये तो वास्तव में दुकानदार, वेंडर्स, शिल्पकार, बुनकर जैसे छोटे निजी कारोबारी हैं, जिनके लिए वित्त जुटाना हमेशा एक समस्या रही है। हालांकि ये अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और रोजगारों के सृजन में इनका बड़ा योगदान है।

वाणिज्यिक बैंक इन्हें कर्ज देने के प्रति अनिच्छुक होते हैं क्योंकि इन्हें उच्च-जोखिम वाले उद्यमों की तरह देखा जाता है, जिनके नाकाम होने का खतरा ज्यादा होता है। और चूंकि इनमें से ज्यादातर शुरुआती उद्यमी होते हैं, लिहाजा इनके कामकाजी प्रदर्शन की कोई पृष्ठभूमि भी नहीं होती, जिसके आधार पर इनका आकलन किया जा सके। जब बैंक इन्हें कर्ज देते हैं तो ब्याज दरें भी उच्च (दो अंकों में) होती हैं। इसके लिए कोई बैंकों को दोष नहीं दे सकता। आखिरकार उन्हें भी मार्केट में बने रहते हुए अपनी लाभदायकता को बरकरार रखना है, लेकिन इससे छोटे कारोबारियों की जिंदगी जरूर मुश्किल हो जाती है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2007-08 से 2013-14 के बीच वाणिज्यिक बैंकों द्वारा कुल दिए गए कर्जों में छोटे व लघु उद्योगों की हिस्सेदारी महज 6 फीसदी रही। यहां तक कि कर्ज की प्राथमिकता वाले सेक्टरों में भी इस अवधि के दौरान उनकी हिस्सेदारी 17-18 प्रतिशत ही रही। इसके अलावा मुद्रा बैंक के लक्षित सेक्टर का महज 4 फीसदी लोग ही इस अल्प संस्थागत वित्त का लाभ उठा रहे हैं।

असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनसीईयूएस) के मुताबित 5 लाख रुपए तक निवेश करने वाली इकाइयों को कर्ज ज्यादातर प्रधानमंत्री रोजगार योजना जैसी सरकार प्रायोजित योजनाओं के जरिए मिलता है। इसका मतलब है कि बैंक अपने कार्यक्रमों के तहत उन्हें कर्ज नहीं देते। शिल्पकारों और ग्रामीण उद्योगों को वाणिज्यिक बैंकों की ओर से एक फीसदी से भी कम कर्ज मिला। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और विकट है, जहां निजी सूदखोर महाजन अनुसूचित जाति के उद्यमियों को कर्ज नहीं देते, यानी यहां जाति का फैक्टर भी काम करता है।

एनसीईयूएस के मुताबिक 'इस सेक्टर की वृहद संभावनाओं को देखते हुए कह सकते हैं कि यदि इसे समुचित कर्ज मिलता, तो यह कहीं ज्यादा रोजगारों के अवसर सृजित करता, इसका आउटपुट कहीं ज्यादा होता और निर्यातों में भी इजाफा होता।" प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मुद्रा बैंक की लांचिंग के वक्त कुछ ऐसी ही बातें कही।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पहले की सरकारों ने इस समस्या को नजरअंदाज किया। लघु उद्योग क्षेत्र को कर्ज देना बैंकों के लिए कर्ज के तय मानदंडों में प्राथमिकता में शुमार है। लघु व छोटे उद्यमों को वित्तीय मदद देने की खातिर वर्ष 1990 में भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) की स्थापना भी हुई थी। साफ है कि इस सबसे मदद नहीं मिली, इसीलिए अब मुद्रा बैंक की स्थापना की गई।

 

मुद्रा बैंक अपने 20,000 करोड़ रुपए के कोष के साथ अन्य कर्जदाता संस्थाओं को रिफाइनेंसिंग के जरिए मदद करेगा, जो छोटे व लघु उद्यमियों को कर्ज देंगी। ऐसा एक चैनल सूक्ष्म-वित्त संस्थाओं और और अन्य गैर-बैंकिंग कंपनियों का है। ये संस्थाएं तकरीबन 13 फीसदी की दर पर उधार लेती हैं और इसे आगे 20 प्रतिशत की दर पर दूसरों को देती हैं। मुद्रा बैंक इसे निम्न दर पर रिफाइनेंस करेगा और इससे छोटे व लघु उद्यमों को सस्ती दरों पर कर्ज मिल सकेगा। इसके अलावा मुद्रा बैंक माइक्रो-फाइनेंस संस्थाओं के लिए नीतिगत दिशा-निर्देश भी तैयार करेगा, उनका आकलन और नियंत्रण करेगा।

 

हालांकि मुद्रा बैंक एक अहम जरूरत को साध रहा है, फिर भी यह सवाल तो उठता है कि क्या इस जरूरत की पूर्ति का यह सही तरीका है? यदि सिडबी उन समस्याओं का निराकरण करने में सफल नहीं रहा, जिनकी वजह से इसे स्थापित किया गया था, तो क्या ऐसी ही एक और संस्था स्थापित करना इस दिशा में आगे बढ़ने का सही तरीका है? क्या सिडबी की भूमिका और कामकाज को उस असल मुद्दे के समाधान के लिहाज से नहीं बदला जा सकता था, जिसके लिए मुद्रा बैंक की स्थापना की गई है?

 

बैंकिंग इंडस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि राजनीतिक और ब्यूरोक्रेटिक दखलंदाजी की वजह से सिडबी उतना सफल नहीं हो सका, जितना कि इसके बारे में सोचा गया था। ये समस्या तो मुद्रा बैंक के साथ भी रह सकती है क्योंकि यह भी सरकारी तंत्र के अधीन ही स्थापित है। अभी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि इसे इस तरह की दखलंदाजी से अछूता रखने के लिए कौन-से सुरक्षा-उपाय अपनाए जाएंगे।

 

मुद्रा बैंक प्रधानमंत्री की एक पसंदीदा परियोजना है, लिहाजा इस बात की पूरी संभावना है कि इसे सफल बनाने के लिए तमाम अवरोधों को दूर किया जाएगा। हालांकि इससे वित्त की चाहत रखने वाली परियोजनाओं के प्रति जरूरी सतर्कता में कमी आ सकती है। छोटे उद्यमियों के पीछे बड़ी राजनीतिक ताकत होती है और यदि पर्याप्त सुरक्षा-उपाय नहीं अपनाए गए तो हम छोटे व लघु उद्यमियों के नाम पर एक तरह के लोन मेेले का आयोजन होता भी देख सकते हैं। इस तरह देखा जाए तो कम समय में सफलता पाने का दबाव मुद्रा बैंक की दीर्घकालीन सफलता की संभावनाओं पर असर डाल सकता है। वाणिज्यिक लीक पर चलते हुए ही इसे दीर्घकालिक सफलता मिल सकती है।

 

वित्तीय क्षेत्र के विश्लेषकों ने यह अंदेशा भी जताया है कि मुद्रा बैंक शैडो बैंकिंग की वृत्ति को संस्थागत रूप दे सकता है। शैडो बैंकिंग यानी वाणिज्यिक बैंक जो परंपरागत रूप से करते हैं, वह गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं द्वारा किया जाना। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुताबिक वैश्विक वित्तीय तंत्र के नाकाम होने के पीछे शैडो बैंकिंग भी एक कारण रहा, जिसके चलते 2008 में व्यापक मंदी आई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शैडो बैंकिंग को लेकर चिंता बढ़ रही है और भारतीय रिजर्व बैंक भी इसे बढ़ने से रोकने के लिए कदम उठा रहा है।

 

मुद्रा बैंक का विचार भले ही बहुत अच्छा हो और छोटे व लघु उद्यमियों को इसके जरिए तमाम मदद मिल सकती है, लेकिन यह भी पूर्ववर्ती योजनाओं की तरह नाकाम न हो जाए, इस खातिर हमें उपरोक्त मसलों पर भी गौर करना होगा।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं

साभार http://naidunia.jagran.com/ से 

हिन्दी भाषी प्रदेश की लोक सभा अध्यक्ष के राज में लोकसभा टीवी पर हिन्दी की दुर्दशा

श्रीमती सुमित्रा महाजन को मेरा पत्र

महोदया,

इस विषय पर यह मेरा दसवाँ पत्र है. पहला पत्र मैंने 15 मार्च 2013 को भेजा था पर आज तक लोकसभा सचिवालय ने मेरे इतने सारे ईमेल में से किसी भी ईमेल का आज तक कोई भी जवाब नहीं दिया है? क्या सचिवालय के अधिकारी इसी प्रकार कार्य करते हैं कि आम नागरिक के कानून सम्मत प्रश्नों से संबंधित पत्रों के सैकड़ों अनुस्मारक भेजने के बाद भी उनके पत्रों के उत्तर देने की जहमत भी नहीं उठाते? इस बात से सिद्ध होता है कि सचिवालय की कार्यप्रणाली को सुधारे जाने की महती आवश्यकता है.

 

 
इस सम्बन्ध में पिछले डेढ़ साल से शिकायतें की जा रही हैं और राजभाषा विभाग भी संबंधित अधिकारियों को लिख चुका है पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है.
 
लोकसभा टीवी से संबंधित शिकायत :
 
१. लोकसभा टीवी पर सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण में एवं अन्य कार्यक्रमों में 'स्क्रीन' पर केवल अंग्रेजी में ही सभी कैप्शन दिखाई देते हैं, जो कि राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों का उल्लंघन है.पट्टी (स्क्रोल) भी केवल अंग्रेजी में चलाई जाती है.
२. लोकसभा टीवी के हिन्दी कार्यक्रमों/समाचार आदि में अनावश्यक रूप अंग्रेजी के शब्दों को ठूँसा जा रहा है.
३. लोकसभा टीवी की आधिकारिक वेबसाइट अंग्रेजी में पहले खुलती है जबकि राजभाषा हिन्दी है तो हिन्दी वेबसाइट ही पहले खुलनी चाहिए.
४. लोकसभा टीवी की हिन्दी वाली आधिकारिक वेबसाइट अद्यतन नहीं की जाती है.
 
विशेष: दोनों सदनों में मतदान के बाद मतगणना के प्रदर्शन हेतु लगाए गए डिजिटल मीटर केवल अंग्रेजी में हैं. [जैसे YES, NOES, TOTAL YES, TOTAL NOES,] इसमें अविलम्ब हिन्दी को शामिल किया जाए. 
 
मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि मेरी शिकायतों का निपटारा करने के निर्देश जारी करें।
 

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अनुच्छेद ३५१. हिंदी भाषा के विकास के लिए निदेश
संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से और गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

भवदीय
प्रवीण जैन,
ए-१०३ आदीश्वर सोसाइटी, जैन मंदिर के पीछे, 
सेक्टर ९ ए, वाशी नवी मुंबई – ४००७०३  

भारतीय योग की विश्व मान्यता का सन्देश

प्राचीन काल में भारत से शुरु हुआ योग ने बीते दशकों में दुनिया भर के लोगों को आकर्षित किया है। अब भारत के आग्रह पर योग के महत्व को मान्यता देते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया है। यह शायद पहला अवसर है, जब भारतीय योग से जुडे़ ज्ञान को पश्चिम समेत दुनिया के ज्यादातर देशों ने मान्यता दी है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस प्रस्ताव को जितने बहुमत  से पारित किया गया, यह भी एक ऐतिहासिक घटना है। 

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने के लिये हाल ही में अपनी अमेरिका की यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में दिए अपने पहले भाषण में योग दिवस मनाए जाने की पुरजोर पैरवी की थी। असल में यह एक ऐसा प्रस्ताव जो सम्पूर्ण विश्व के स्वास्थ्य और मानवता के उन्नयन के लिये था। 

योग भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है। लेकिन अब यह संपूर्ण विश्व का विषय एवं मानव मात्र के जीवन का अंग बन रहा है-यह दुनिया के सकारात्मक परिवर्तन का द्योतक है। मनुष्य नाना प्रकार के संस्कार रूपी रंगों से रंगे हुए शरीर में रहता है, लेकिन योगाभ्यास द्वारा तपाया गया शरीर रोग, बुढ़ापा आदि से रहित होकर स्वरूपानुभूति के योग्य होता है। आज के इस आपाधापी, अशांति, तनाव एवं असंतुलन के युग में बढ़ते मनोदैहिक रोगों का मुख्य कारण विसंगतिपूर्ण जीवन-शैली है। इसका एक कारण भौतिकता की होड़ भी है जिससे मानव की मानसिक चंचलता बढ़ी है एवं आध्यात्मिकता से वह वंचित होता गया है। नित्य नए रोगों के निवारण, व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक उत्थान, व्यक्तित्व विकास, कार्यक्षमता में अभिवृद्धि, तनावमुक्ति के लिए ध्यान जहां शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम है वहीं यह भौतिक उन्नति को सहज बनाने की प्रक्रिया है। इसके अभ्यासी पुरुष कभी रोगी नहीं हो सकते। वे निरंतर योग साधना के माध्यम से अपना इतना विकास कर सकते हैं कि हर चुनौती को सहजता से स्वीकार कर सकें। यह ध्यान पद्धति पारिवारिक संबंधों एवं रिश्तों में प्रगाढ़ता एवं मैत्री का भी सशक्त माध्यम है। यही कारण है कि आज समूची दुनिया में योग की मांग बढ़ रही है और इसकी आपूर्ति के लिए भारत की ओर सभी देश आशा भरी दृष्टि से देख रहे हैं। विश्व योग दिवस के माध्यम से योग की उपयोगिता बढ़ेगी और दुनिया में व्यापक रचनात्मक परिवर्तन दिखाई देंगे।

जाहिर है इन बदलते हालात में भारत अपने इस पुरातन एवं अति प्राचीन योग पद्धति के जरिए बेशुमार फायदा उठा सकता है। योग पर और अधिक ध्यान दिया जाए उसकी एक केन्द्रीय सुनियोजित व्यवस्था बनायी जाए तो भविष्य में यह ध्यान पद्धति धन कमाने के बेहतर जरिए की ओर ले जा सकती है। ऐसा इसलिए है क्योेंकि योग की जरूरत जीवन के हर क्षेत्र में महसूस की जा रही है। 

सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशों में भी योग को लेकर एक दिलचस्पी जग रही है। विदेशों में हमारे कई योग गुरु पहले से ही काम कर रहे हैं, जिनमें महेश योगी, ओशो आदि रहे हैं और इधर योग गुरु बाबा रामदेव के शिविर भी तमाम मुल्कों में लग रहे हैं। प्रेक्षाध्यान शिविरों का भी विदेशों में आकर्षण बढ़ा है। प्रतिवर्ष लगने वाले अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षाध्यान शिविर में विदेशों से आने वाले शिविरार्थियों एवं प्रशिक्षणार्थियों के अनुभवों से ज्ञात होता है कि विदेशों में प्रेक्षाध्यान की कितनी मांग है। बात इन चंद योग गुरुओं के शिविरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि योग की जो नयी मांग पैदा हुई है उसमें वैसे अनुभवी एवं दक्ष योग प्रशिक्षकों की भी जरूरत है, जिनका बेशक बड़ा नाम नहीं है पर वे कुशल योग प्रशिक्षक हैं। यूरोप और अमेरिका के अलावा रसिया, जापान, चीन और सिंगापुर जैसे देशों में भी योग प्रशिक्षकों की मांग बढ़ रही है। और विशेषतः भारतीय योग प्रशिक्षकों और योग गुरुओं की तो जबरदस्त मांग है। 

बेशक योग के प्रति बढ़ती दिलचस्पी और स्वास्थ्य जागरूकता के नए रुझानों के कारण योग प्रशिक्षक के लिए कार्य अवसरों में दिनोंदिन बढ़ोतरी ही हो रही है, लेकिन जरूरत के मुताबिक हमारे पास योग प्रशिक्षक हैं ही कितने? हमारे देश में ऐसी कोई केन्द्रीय संस्था नहीं है, जो इन योग प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण की गुणवत्ता और प्लेसमेंट जैसे मामलों की निगरानी करें। हालांकि दिल्ली स्थित भारतीय योग संस्थान और विश्वायतन, मुंगेर स्थित बिहार स्कूल आॅफ योगा, नय्यर डैम (केरल) का शिवानन्द आश्रम, पुणे स्थित बी.के.एस.आयंगर स्कूल और पट्टाभि जायसे जैसी दर्जनों संस्थाएं यहां निजी तौर पर काम कर रही हैं और उन्हीं से भारतीय योग प्रशिक्षक तैयार होकर निकलते हैं। पर एक केन्द्रीय व्यवस्था की जरूरत तो तब भी है। इस दिशा में भारत सरकार को भी योग प्रशिक्षक तैयार करने एवं विदेशों में भारतीय योग को प्रतिष्ठित करने की दिशा में चिन्तन करना चाहिए। एक केन्द्रीय योग संस्थान का गठन किया जाना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि योग के प्रशिक्षक विदेशों में ही जरूरी हों। भारत के शहरों और कस्बों में भी योग बतौर फैशन प्रचलन में आ चुका है। आगे चलकर जब मेडिकल टूरिज्म पूरे उफान पर होगा और विदेशों में लोग चिकित्सा के लिए बड़ी संख्या में भारत का रुख करना  शुरू करेंगे, तो योग एक बेहतर करियर संभावना वाला क्षेत्र बनकर सामने आएगा। फिलहाल भारत में ही एक योग प्रशिक्षक की प्रतिमाह आय 20,000 से लेकर 50,000 रुपये तक हो सकती है तो विदेशों में और भी अच्छे वेतनमान पर योग-प्रशिक्षक जा सकेंगे। भारत में भी योग जागृति के लिये विविध उपक्रम संचालित किये जाने चाहिए। वैसे योग प्रशिक्षक सामुदायिक केन्द्रों तथा सार्वजनिक पार्कों में सशुल्क योग शिविरों का आयोजन करते हैं। वे स्कूल, काॅलेजों तथा अन्य संगठनों में योग सिखाते हैं। योग प्रशिक्षक का कार्यक्षेत्र विस्तृत है और भविष्य अधिक संभावनाओं से भरा दिखाई दे रहा है। योग प्रशिक्षक जनसेवा के ध्येय के मकसद से योग प्रचारक बनने से लेकर किसी मंदिर, अस्पताल, जिम या खेल संस्थान आदि कहीं भी अपने लिए आजीविका ढूंढ सकते हैं।

योग को सिर्फ कैरियर की नजर से या आम जन के स्वास्थ्य में सुधार की नजर से ही नहीं, बल्कि देश की चिकित्सा निर्भरता के पैमाने से भी देखने की जरूरत है। विशेषतः भारत की तरक्की और बढ़ते समग्र विकास की दृष्टि से भी योग को मूलभूत आधार बनाये जाने की जरूरत है। अगर हम चाहते हैं कि नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य एवं उन्नत कार्यक्षमता सुलभ हो तो योग को एक युक्ति के रूप में अपनाया जा सकता है।
योग केवल मनुष्य की जीवनशैली को संतुलित और समृद्ध ही नहीं बनाता बल्कि यह पर्यावरण को भी दोषमुक्त करता है। योग के द्वारा ऐसी जागृति मनुष्य मस्तिष्क में होती कि वह जलवायु परिवर्तन से निपटने में दुनिया की मदद कर सकता है। याद रहे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी एक रिपोर्ट में कहा भी गया है कि लोगों में जो गुस्सा देखा जा रहा है और जिस तेजी से दुनिया में आत्महत्याएं बढ़ रही हैं, उनका एक कारण जलवायु में हो रहा बदलाव भी है। दुनिया के देशों ने इस समस्या को समझा और योग को इससे निपटने का आसान और सर्वसुलभ माध्यम माना। वैसे भी योग में मानवता को एकजुट करने की अद्भुत शक्ति है क्योंकि योग में ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय एवं समागम है।

मानसिक तनावों से जर्जर होता आज का मनुष्य संतोष और आनन्द की तलास में इधर-उधर भटक रहा है। शांति का अहसास महसूस करने के लिए उतावला हो रहा है। वह अपनी जीवन बगिया के आसपास से स्वार्थ, क्रोध, कटुता, ईष्र्या, घृणा आदि के काँटों को दूर कर देना चाहता है। उसे अपने इस जीवन रूपी उद्यान में सुगंध लानी है। उसे उस मार्ग की तलाश है जो उसे शरीर से दृढ़ और बलवान बनाये, बुद्धि से प्रखर और पुरुषार्थी बनाये, भौतिक लक्ष्यों की पूर्ति करते हुए उसे आत्मवान बनाये। निश्चित रूप से ऐसा मार्ग है और वह मार्ग योग का ही मार्ग है। महर्षि पतंजली ने योगदर्शन का नाम दिया है। योगदर्शन एक मानवतावादी सार्वभौम संपूर्ण जीवन दर्शन है।

आधुनिक युग में योग का महत्व और भी बढ़ गया है क्योंकि हमारी व्यस्तता और भागदौड़ भरी जिन्दगी ने हमे रोगों से घेर दिया है। आज हम देख रहें हैं कि मधुमेह, रक्तचाप, मोटापा, सिर-दर्द, छोटी उम्र में बालों का सफेद होना आदि जैसे आम रोग देखे जा रहे हैं। अत्यधिक तनाव, प्रदूषण, कैरियर की चिंता इत्यादि ने इन्सान को रोगग्रस्त बना छोड़ा है। आज युवाओं में कम मेहनत में ज्यादा पाने की हौड़ ने उन्हें अविवेकी बना छोड़ा है और इसी के चलते नौकरी प्रतिस्पर्धा का दूषण बन कर रह गई है जो आत्महत्याओं का बड़ कारण बन रही है। योग की जीवनशैली से ही हम इन समस्याओं से मुक्ति पा सकेंगे। योग एक ऐसी अमूल्य औषधि है जो बिना मूल्य आप को स्वस्थता प्रदान कर सकती है, आप को शक्तिवर्धक बना सकती है, आप का आत्म-विश्वास बढ़ा सकती है और स्वस्थ शरीर का आशीर्वाद भी दे सकती है। विश्व में अमनचेन ला सकती, इंसानों के बीच बढ़ती दूरियों को पाट सकती है। आर्थिक विकास के साथ-साथ एक आदर्श समाज निर्माण कर सकती है।  उठिए योग के महत्व को जानिए, पहचानिए और जीवन में उसे अपनाइये।
                                

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(ललित गर्ग)
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क्या ये फिल्म सबकी बैंड बजाएगी

रेडियो जॉकी  अनिरुद्ध चावला एक फिल्म लेकर आ रहे हैं, जिसमें बॉलिवुड के कई छिपे सेक्स सीक्रेट का खुलासा करने वाले हैं, इससे  बॉलिवुड सितारों की रातों की नींद उड़ा सकती हैं।

इस फिल्म का नाम है 'सबकी बजेगी बैंड'। उन्होंने पिछले साल एक फॉर्महाउस पार्टी रखी थी,  तभी उन्हें यह फिल्म बनाने का आइडिया आया था। इस पार्टी में शामिल होने वाले बॉलिवुड सितारे और मॉडलों को इस बारे में पता ही नहीं था कि वहां सीक्रेट लोकेशन पर 12 कैमरे लगाए गए हैं, जिनमें उनकी सेक्स, शादी, अफेयर और झगड़े से जुड़ी सभी निजी बातें रिकॉर्ड हो रही हैं।

अनिरुद्ध ने बाद में फुटेज देखे तो उन्होंने देश की पहली रियलिटी फिल्म बनाने का फैसला कर लिया। जानकारी के मुताबिक जब बॉलिवुड सितारों को इस बारे में पता चला तो उन्होंने अनिरुद्ध को निजता का उल्लंघन करने के आरोप में कोर्ट में घसीटने की धमकी भी दे डाली। इसलिए उन्होंने जो रेकॉर्ड किया था, उसे फिल्म के जरिए लोगों के  सामने पेश करने का नया तरीका ढूंढ निकाला।

गुजरात सरकार लाएगी 16 नए चैनल

गुजरात सरकार ने गांधीनगर स्थित भास्कराचार्य इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस एप्लीकेशन एंड जियों इन्फर्मेटिक्स (बायसेग) द्वारा 16 नए टीवी चैनल शुरू करने का निर्णय किया है। गुजरात सरकार की नोडल एजेंसी के तौर पर कार्यरत बायसेग को भारत सरकार के अंतरीक्ष विभाग ने दूरदर्शन के सेटेलाइट का उपयोग करने की स्वीकृति दी है। इससे अब गुजरात सरकार सेट कोम नेटवर्क गुजसेट के कार्यक्रम को प्रस्तुत करने वाला चैनल डीडी की डायरेक्ट टू होम सर्विस से निःशुल्क देखा जा सकेगा।

गुजसेट आज भी दो चैनल द्वारा टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य तथा कृषि सहित विविध विषयों की तालीम, शिक्षा एवं विस्तरण कार्यक्रमों का प्रसारण करता है। आजकल इस सुविधा का उपयोग पंचायत एवं शिक्षा सस्थाओं तक ही सीमित है। क्योंकि इनका प्रसारण बायसेग के सेटेलाइट द्वारा किया जाता है।

अब जब भारत सरकार ने दूरदर्शन के सेटेलाइट का उपयोग करने के लिए सकारात्मक रुख अपनाया है तो ध्यान में रखते हुए राज्य के साइंस एवं टेक्नोलॉजी विभाग ने शीघ्र ही 24 घंटे की नए 16 चैनल शुरु करने का निर्णय किया है।

सूत्रों की मानें तो 16 में से 12 चैनल द्वारा साइंस टेक्नोलॉजी गणित, स्वास्थ्य और लोक शिक्षा जैसे शैक्षणिक कार्यक्रम प्रसारित किए जाएंगे। विधार्थी, शिक्षक और तकनीक सीखने की लालसा वाले नागरिकों के लिए यह लाभकारी होगा।

अन्य दो चैनल का उपयोग सरकारी योजनाओं, लोकप्रश्न संवाद वगैरह के लिए किया जायेगा। इससे गुजरात में घर-घर बायसेग चैनल का सरलता से प्रसारण होगा।

हरियाली की राहों में भविष्य की खुशहाली

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा मानते हैं कि अगर दुनिया को बचाना है तो हिमालय को पूरी तरह पेड़ों से ढकना होगा।पर्यावरण के खतरों पर विश्व में चिंता तो बढ़ी है और कुछ पहल भी शुरू हुई है, लेकिन भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। विकसित देशों में जमीन ज्यादा है और आबादी कम। इस कारण वहां जंगल लगाए जा रहे हैं, जबकि हमारे यहां आबादी बसाने और बांध बनाने के लिए जंगल काटे जा रहे हैं। इतना ही नहीं, खेती की जमीन को रासायनिक खादों के जरिए नशेबाज बनाया जा रहा है। पेड़ हैं नहीं सो मिट्टी बह रही है। स्थिति यह है कि जमीन का पानी समाप्त हो रहा है। इसलिए हम अब भी न चेते तो कुछ समय बाद न तो जमीन बचेगी और न हमें पानी मिलेगा। वे कहते हैं कि भारत में वृक्षों की पूजा के पीछे अंधविश्वास नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के शिक्षक लुई फाउलर स्मिथ अपने शोधकार्य के सिलसिले में पांच वर्षो तक पूरे भारत के जंगलों में घूमे। उन्होंने हिंदुओं की वृक्ष पूजा की परंपरा का वैज्ञानिक आधार बताया है। हमारी संस्कृति ही अरण्य संस्कृति थी। हमारे गुरुकुल वनों में थे। 

लिहाज़ा, विशेषज्ञों की ये बात भी पते की है कि आईटी के बाद ग्रीन जॉब्स यानी हरियाली से जुड़े जॉब में होगा खुशहाल आने वाला कल। आखिर क्या हैं ग्रीन जॉब्स? एक सर्वे के अनुसार, ज्यादातर एमबीए आवेदक ऐसे जॉब चाहते हैं, जिसमें न केवल खूब कमाई हो, बल्कि उनके स्किल का प्रयोग पर्यावरण को हरा-भरा रखने में भी हो। इसे आप एक पंथ दो काज या आम और गुठलियों के दाम की तरह भी देख सकते हैं। यूनाइटेड नेशंस एन्वॉयरनमेंट प्रोग्राम, इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन और इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कॉन्फेडरेशन और इंटरनेशनल एम्प्लॉयर्स ऑर्गेनाइजेशन ने मिलकर लॉन्च किया ग्रीन जॉब्स इनिशिएटिव। एनर्जी एफिशिएंसी और एन्वॉयरनमेंटल फ्रेंडली फील्ड, जैसे-एनर्जी, युटिलिटी, कंस्ट्रक्शन और मैन्यूफैक्चरिंग आदि को ग्रीन जॉब्स में रखा गया है।

क्या है ग्रीन जॉब ?
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उत्पादन और खपत  का ऐसा काम जो ईको फ्रेंडली यानी पर्यावरण हितैषी हो, ग्रीन जॉब कहलाता है। इसे हम कुछ उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि कोई आर्किटेक्ट सौर ऊर्जा का प्रयोग करने वाले बिल्डिंग की डिजाइन तैयार कर रहा हो या अनाज उपजाने के काम में लगी ग्रामीण महिला या फिर वाटर री-साइक्लिंग सिस्टम से जुडा हुआ प्लंबर-ये सभी काम ग्रीन जॉब्स के अंतर्गत आते हैं। एग्रिकल्चर, रिसर्च ऐंड डेवलॅपमेंट, मैनूफैक्चरिंग, सर्विस और एडमिनिस्ट्रेटिव सेक्टर, जो एन्वॉयरनमेंट को सुरक्षित रखने और ईकोसिस्टम को बैलेंस रखने का काम करते हैं ग्रीन जॉब कहते हैं।

इसी तरह वानिकी एक ऐसा रोचक अध्ययन क्षेत्र है जो उन सब सिद्धांतों तथा व्यवहारों से मिलकर बना है जिनमें वनों के सृजन, संरक्षण तथा वैज्ञानिक प्रबंधन और उनके संसाधनों का उपयोग शामिल है। भारत में वैज्ञानिक वानिकी की शुरुआत सबसे पहले 1864 में वन प्रबंधन के लिए वानिकी व्यावसायिकों को प्रशिक्षित करने के वास्ते हुई थी। देश में विश्वविद्यालय स्तर पर वानिकी शिक्षा वर्ष 1985 में उस समय आरंभ हुई जब राज्य कृषि विश्वविद्यालयों-वाईएसपी यूएचएफ, सोलन तथा पीडीकेवी, अकोला में चार वर्ष के डिग्री कार्यक्रम के रूप में बीएससी वानिकी पाठ्यक्रम शुरु किया गया। बाद में यह कार्यक्रम 1986 में जीबीपीयूएटी, पन्त नगर तथा टीएनएयू, कोयम्बत्तूर में तथा इसके बाद 1987 में ओयूएटी, भुवनेश्वर तथा जेएनकेवीवी, जबलपुर में शुरु किया गया। अब यह कार्यक्रम बहुत से राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में संचालित किया जा रहा है। इसके अलावा कुछ कृषि विश्वविद्यालयों में वानिकी से संबंधित विशेष विषय में विशेषज्ञता के साथ वानिकी/कृषि-वानिकी में मास्टर और डॉक्टरल डिग्री पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। हाल के दिनों में कुछ परंपरागत विश्वविद्यालयों ने भी वानिकी शिक्षा की शुरुआत की है। 

ताजा अनुमानों से यह सिद्ध होता है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वानिकी क्षेत्र का उल्लेखनीय योगदान और महत्व है। विपरीत वन्य स्थिति से निपटने के लिए कुशल मानवशक्ति की आवश्यकता होती है ताकि शोध कार्यों और निर्देशक सिद्धांतों के आधार पर उपर्युक्त कार्य योजनाएं तैयार की जा सकें। इस प्रकार नीति और अनुप्रयोग की दृष्टि से वानिकी/कृषि वानिकी प्रबंधन से जुड़े पाठ्यक्रमों का बहुत महत्व है। वर्ष 2007 में भारत में कृषि (वानिकी सहित) शिक्षा पर बनाई गई भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की चौथी डीन कमेटी की सिफ़ारिशों पर स्नातकपूर्व-स्तर पर वानिकी कार्यक्रम हेतु समय की मांग के अनुरूप पाठ्यक्रम और निर्देशन व्यवस्था में संशोधन किए गए हैं। सामान्यतः वानिकी शिक्षा, अनुसंधान, प्रशिक्षण और विस्तार पर्यावरण और वन मंत्रालय, भारत सरकार के पर्यवेक्षणाधीन है। 

पर्यावरण और वन मंत्रालय के अधीन सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्यरत भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसी एफआरई) वानिकी अनुसंधान, प्रशिक्षण, विस्तार और शिक्षा में सक्रियता के साथ जुड़ा हुआ है। मंत्रालय के अधीन विभिन्न आठ वन संस्थान कार्यरत हैं। ये हैं ईसीएफआरई, देहरादून,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, हेदरादून, जो सर्वोच्च वन प्रशासक (आईएफएस) तैयार करती है, वन शिक्षा निदेशालय, जिसके अधीन चार राज्य वन सेवा महाविद्यालय (राज्य स्तर के) हैं, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून, भारतीय प्लाइवुड उद्योग अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान, बंगलौर तथा वन और पर्यावरण मंत्रालय से संबद्ध जीबी पंत हिमालयन पर्यावरण और विकास संस्थान। स्नातकपूर्व कार्यक्रम स्तर पर वानिकी शिक्षा वर्तमान में वानिकी में स्नातकपूर्व, स्नातकोत्तर और डॉक्टरल कार्यक्रम विभिन्न राज्य कृषि विश्वविद्यालयों तथा कुछ अन्य परंपरागत विश्वविद्यालयों/संस्थानों में संचालित किए जाते हैं। 

ज्यादातर राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में चार वर्षीय व्यावसायिक डिग्री कार्यक्रम बीएससी वानिकी संचालित किए जा रहे हैं तथा शेष संस्थान भी यह कार्यक्रम बहुत जल्दी ही शुरू करने की योजना बना रहे हैं। वानिकी स्नातक तकनीकी रूप से योग्य, कुशल तथा पर्यावरण और जीवन की सुरक्षा से जुड़े वानिकी क्षेत्र की उभरती चुनौतियों तथा मुद्दों से निपटने के लिए तैयार होते हैं। वानिकी स्नातकों को तैयार करने का मूल उद्देश्य वानिकी क्षेत्र के विकास तथा इसकी उद्यमशीलता हेतु वर्तमान स्थितियों तथा अपेक्षाओं के अनुरूप मानव शक्ति तैयार करना तथा दूसरी तरफ वानिकी स्नातकों को पर्यावरण सुरक्षा, वानिकी उत्पादों के मूल्य संवर्द्धन और वानिकी किसानों को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने के वास्ते सुयोग्य प्रबंधक माना जाता है। बीएससी वानिकी के छात्रों को वानिकी के सभी क्षेत्रों से संबंधित विभागवार पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराया जाता है तथा वे सही अर्थों में वनपाल बनकर उभरते हैं। 

शोध उपाधि कार्यक्रम 
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चार राज्य कृषि विश्वविद्यालयों दो डीम्ड विश्वविद्यालयों तथा तीन परंपरागत विश्वविद्यालयों द्वारा वानिकी/कृषि वानिकी में पी.एचडी. के रूप में न्यूनतम तीन वर्षीय डॉक्टरल कार्यक्रम भी संचालित किए जाते हैं। पी.एचडी. स्तर पर किया जाने वाला शोध कार्य वानिकी और संबद्ध क्षेत्रों के विशेषीकृत विषयों के बारे में होता है। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों/विश्वविद्यालयों में वानिकी कार्यक्रमों में प्रवेश/चयन प्रक्रिया : बी.एससी. वानिकी (चार वर्षीय डिग्री) में प्रवेश/चयन प्रक्रिया के लिए पीसीबी/पीसीएम/पीसीएमबी/कृषि समूह के छात्र १०(+)२ के बाद आवेदन कर सकते हैं। इसमें प्रवेश विश्वविद्यालय/संस्थान द्वारा आयोजित प्रवेश-परीक्षा के आधार पर प्रदान किया जाता है। कुछ विश्वविद्यालयों में प्रवेश उम्मीदवारों की मैरिट तथा सीटों की उपलब्धता के आधार पर प्रदान किया जाता है। 

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले राज्य के बाहरी उम्मीदवारों के लिए विशेष कोटे की व्यवस्था होती है। यह परीक्षा वानिकी में बैचलर डिग्री तथा अन्य कृषि विज्ञानों में बैचलर डिग्री हेतु राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में कुल सीटों की संख्या का 15% भरने के लिए आयोजित की जाती है। बी.एससी. वानिकी पूरी करने के उपरांत उम्मीदवार वानिकी में मास्टर डिग्री संचालित करने वाले राज्य कृषि विश्वविद्यालयों या अन्य संस्थानों/विश्वविद्यालयों में एम. एससी. वानिकी/कृषि-वानिकी के लिए आवेदन कर सकते हैं। 

मास्टर डिग्री में चयन या तो प्रवेश-परीक्षा में सफल होने पर अथवा विश्वविद्यालय/संस्थान की मैरिट के आधार पर होता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वानिकी सहित कृषि एवं संबद्ध विज्ञानों के क्षेत्र में आईसीएआर की कनिष्ठ अनुसंधान अध्येतावृत्ति (जेआरएफ) तथा सभी राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में मास्टर डिग्री कार्यक्रमों की 25% सीटों में प्रवेश हेतु एक अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जाता है। इसी प्रकार पी.एचडी. वानिकी कार्यक्रम में राज्य कृषि विश्वविद्यालयों या अन्य विश्वविद्यालयों/संस्थानों में प्रवेश सीधे संस्थान/ विश्वविद्यालयों के नियमों के अनुरूप या प्रवेश-परीक्षा उत्तीर्ण करने के आधार पर प्राप्त किया जा सकता है। वानिकी में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) भी लेक्चररशिप के लिए एक महत्वपूर्ण प्रमाण-पत्र है जिसे कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड, भा.कृ.अ.प., पूसा, नई दिल्ली द्वारा हर वर्ष आयोजित परीक्षा के जरिए उत्तीर्ण किया जा सकता है।

छात्रवृत्तियां 
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वानिकी में स्नातक तथा स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति भी उपलब्ध है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वानिकी सहित कई कृषि विषयों में आयोजित अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को भा.कृ.अप./रु. 1200 प्रति माह की दर से स्नातकपूर्व पाठ्यक्रम के अध्ययन हेतु राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति प्रदान करती है, बशर्ते कि उम्मीदवार ने अपने गृह राज्य के बाहर किसी संस्थान में प्रवेश लिया हो। स्नातकोत्तर स्तर पर संबंधित संबंधित राज्य सरकारें तथा भा.कृ.अ.प. कई तरह की छात्रवृत्तियां प्रदान करती है। भा.कृ.अप.वानिकी सहित कृषि विज्ञानों के क्षेत्र में कनिष्ठ अनुसंधान अध्येतावृत्ति (जेआरएफ) प्रदान करने के लिए अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा का आयोजन करती है। वर्तमान में भा.कृ.अ.प. अध्येतावृत्ति एमएससी छात्रों के लिए दो वर्ष की अवधि हेतु / रु. 5760 प्रतिमाह है तथा 6000 रु. वार्षिक आकस्मिक खर्च अनुदान के रूप में प्रदान किए जाते हैं। इसी प्रकार पी.एचडी छात्रों के लिए अध्येतावृत्ति वर्तमान में / रु. 7000 प्रतिमाह, तीन वर्ष की अवधि के लिए है तथा साथ में 10000 रु. वार्षिक आकस्मिक खर्च अनुदान के रूप में दिए जाते हैं। इसके अलावा वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा भी पादप विज्ञानों में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट छात्रों को छात्रवृत्तियां प्रदान की जाती हैं।

कुछ ख़ास बातें 
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बायोमास गैसिफिकेशन में 2025 तक भारत में लाख 9 लाख जॉब्स होंगे।आईटी के बाद भारत में नया रिवॉल्यूशन ग्रीन जॉब्स लाएगा।व्हाइट हाउस काउंसिल ऑन एन्वॉयरन्मेंटल क्वालिटी (सीईक्यू) में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ग्रीन जॉब्स, एंटरप्राइज और इनोवेशन के लिए वेन जॉन्स को स्पेशल एडवाइजर नियुक्त किया।

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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी 
ऑटोनॉमस कालेज, राजनांदगांव 
मो.9301054300

जेंजुम गादी के माय बेस्ट फ्रेंड के साथ इण्डिया रनवे वीक का भव्य उद्घाटन

नई दिल्ली। फैशन कैलेण्डर के बहुप्रतिक्षित युवा फैशन मूवमेंट इण्डिया रनवे वीक के चैथे सत्र का उद्घाटन आज छत्तरपुर स्थित होटल एपुलेंट में हुआ। रंग बिरंगी रोशनियों से जगमगाते रैंप, मंत्रमुग्ध करती म्यूजि़क की तेज धुनों और उनपे इठलाते हुए माॅडल्स ने डिजाइनर जेंजुम गादी के कलैक्शन के साथ तीन दिवसीय फैशन महाकुम्भ का शुभारम्भ किया। फैशन वीक का यह दौर 12 अप्रैल तक जारी रहेगा। इस दौरान करीब 34 फैशन डिजाइनर अपने स्टाइलिश फैशन कलेक्शन को एक्सपर्ट्स के  समक्ष प्रदर्शित करेंगे। फैशन शो के अलावा दर्शक यहां सुबह 11.30 बजे से शाम सात बजे तक संबंधित एग्जीबिशन का आयोजन किया जाएगा।

इंडियन फेडरेशन फॉर फैशन डेवलपमेंट (आई.एफ.एफ.डी) द्वारा युवा प्रतिभाओं को बढ़ावा देने ओर उन्हें एक बेहतर प्लेटफार्म देने के लिए इस फैशन वीक का आयोजन किया जा रहा है। इसमें परिधानों के पारंपरिक व आधुनिक कलेक्शन के अलावा बेहतरीन आभूषण व एसेसरीज के कलेक्शन को भी प्रदर्शित किया जाएगा। 

मौके पर आईएफएफडी के निदेशक अविनाश पठानिया ने कहा कि यह शो युवा डिजाइनरों के लिए अपने विशिष्ट संग्रह को थोक एवं रिटेल ग्राहकों, मीडिया तथा फैशन के माहिरों के समक्ष प्रदर्शित करने का नया मंच है। 

आईएफएफडी की निदेशक किरण खेवा ने कहा कि आईआरडल्यू का यह एडिशन रचनात्मक परिदृश्य का एक अलग ही स्तर देखेगा तथा भारतीय फैशन उद्योग में व्यापार को एक नई दिशा देते हुए पीआईआरडब्लू को एक विशिष्ट ब्रांड के रूप में स्थापित करेगा।

पहले दिन मासूमी मेवावाला, मनीष पटेल, विशाला श्री, मेघा व जिगर, वरीजा बजाज, अनविता देव, रोहिणी गुगनानी, मुक्ति तिबरेवाल व मनीष गुप्ता ने अपने कलैक्शन प्रस्तुत किये।