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संस्कृत रॉकबैंड ने धूम मचाई

एक तरफ जहां केंद्र सरकार भारत की प्राचीनतम भाषा संस्कृत को लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने के प्रयासों में जुट रही है, वहीं मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के कुछ युवा भी इस कार्य में अपना योगदान देने आगे आए हैं। 

भोपाल के कुछ संस्कृत प्रेमी युवाओं ने रॉकबैंड 'ध्रुवा' बनाया है। देश में अपनी तरह का पहला ये संस्कृत रॉकबैंड अपनी अनोखी अवधारणा के चलते भारतीय संस्कृति प्रेमियों को लुभा रहा है। 

रॉकबैंड के सदस्य भारतीय वांगमय में शामिल आदिशंकराचार्य के स्तोत्रों और ऋग्वेद की ऋचाओं को सरल रूप में संगीतबद्ध तरीके से लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। 

बैंड का उद्देश्य आधुनिकता के दौर में पीछे छूटती जा रही संस्कृत को युवा पीढी के बीच लोकप्रिय बनाना है, जिसमें वह काफी हद तक सफल होता दिख रहा है। 

बैंड के संयोजक और पूरी अवधारणा के'मास्टरमाइंड' डॉ संजय द्विवेदी ने  बताया कि संस्कृत के प्रति लोगों के बीच का'हौवा' खत्म करने और लोगों को सहज भाषा में अपनी संस्कृति को समझाने के लिए उन्होंने ये प्रयोग किया है।

डॉ द्विवेदी पिछले 10 साल से संस्कृत गायन की एकल तौर पर प्रस्तुति दे रहे हैं और अपने इन्हीं अनुभवों का निचोड उन्होंने बैंड में समाहित किया है। 

बैंड ने हाल ही में अपनी पहली प्रस्तुति भोपाल में दी, जिसमें आदिशंकराचार्य के'भज गोङ्क्षवदम्', शिव तांडव और देश के प्रख्यात संस्कृत विशेषज्ञ प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी रचित धीवर (मल्लाह) गीतों पर अपनी प्रस्तुति से बैंड सदस्यों ने श्रोताओं को दांतो तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर दिया। 

आम तौर पर क्लिष्ट मानी जाने वाली संस्कृत भाषा के मंत्रों को समझाने के लिए बैंड के सदस्य प्रस्तुति के दौरान मंत्रों की पृष्ठभूमि से जुडा माहौल तैयार करते हैं और फिर बैंड के सदस्यों का गायन उस कथानक को श्रोताओं के सामने पेश करता है। 

साभार- पत्रिका से 

सेवा के जुनून में होनहारों ने ठुकराई लाखों की नौकरी !

लगता है हमारी नई पीढ़ी की सोच अब बदल रही है और साथ ही उसे नया आयाम भी मिल रहा है। क्योंकि, ऐसे समय में जब लोग अधिक से अधिक वेतन वाली नौकरी की तलाश में रहते हैं, लाखों रुपए की नौकरी छोड़कर समाजिक कार्य करना बहुत बड़ी बात है। आईआईटी बॉम्बे से पास कुछ छात्रों ने जन कल्याण के लिए इतना बड़ा कदम उठाया है। उनमें से कुछ का शिक्षक बनने का सपना है तो कुछ ने सामाजिक उद्यमिता को अपनाया है और कुछ समजिक कार्य पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। 

जी हाँ ! आईआईटी बॉम्बे के 2010 बैच के प्रत्युष राठौड़ गुड़गांव में एक कंपनी में नौकरी करते थे, जिसका हेड क्वॉर्टर न्यूयॉर्क में है। उनको 44 लाख का पैकेज मिल रहा था, साथ में भत्ता भी। लेकिन, उन्होंने पढ़ाने के अपने सपने को पूरा करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी, जबकि उनके माता-पिता ने इसका विरोध भी किया था। तीन सालों तक आईआईटी की प्रवेश परीक्षा के लिए छात्रों को प्रशिक्षण देने के बाद राठौड़ ने स्कूल बनाने के लिए अपने पैतृक शहर मध्यप्रदेश के सिरले के करीब छोटे से गांव में जमीन खरीद ली है। उन्होंने जमीन पर निर्माण से संबंधित आवेदन दे रखा है और उनके प्लान को स्थानीय अथॉरिटी की ओर से मंजूरी मिलने का इंतजार है।

इसी तरह 2014 में पास सिद्धार्थ शाह ने भी किसी कंपनी में नौकरी करने की बजाए दो साल के रेजिडेंशल प्रोग्राम गांधी फेलोशिप को चुना, जिसमें उन्हें प्रिंसिपलों और टीचरों में लीडरशिप क्वॉलिटी लाने के लिए छोटे शहरों की स्कूल में प्रशिक्षण देना पड़ता है। शाह ने बताया कि मेरी इच्छा थी कि मैं ऐसा कार्य करूं जिसकी माध्यम से समाजिक परिवर्तन लाने में सहायता कर सकूं। मैं कम आय में ही संतुष्ट हूं। प्रोग्राम पूरा होने के बाद मैं कभी भी रिसर्च के लिए वापस जा सकता हूं।

2011 बैच के मेकेनिकल इंजीनियर अंकुर तुलसियान ने एक मल्टिनैशनल कंपनी के ऑफर के स्थान पर यंग इंडिया पेलोशिप को प्राथमिकता दी। फेलोशिप मिलने से वह लिबरल आर्ट्स और लीडरशिपर में ग्लोबल एक्सपर्ट्स से एक साल तक अध्ययन करने का मौका मिला। उन्होंने बताया, प्रोग्राम से मुझे उन कोर्सो को सीखने का मौका मिला जिसका अध्ययन करने का आईआईटी में अवसर नहीं मिला था।

आईआईटी बॉम्बे की पूर्व छात्र सुहानी मोहन एक मल्टिनैशनल बैंक में जॉब करती थीं, जहां उनको कैश इन हैंड 20 लाख रुपए से अधिक मिलता था। अब वह एक कंपनी की स्थापना पर गौर कर रही हैं जो ग्रामीण भारत के लिए कम कीमत की सैनिटरी नैपकिन बनाएगी। सुहानी ने बताया कि हमें पता था कि इस प्रॉडक्ट को बनाने के लिए हमारी स्किल का इस्तेमाल हो सकता है। यह एक स्टार्ट-अप है और इसमें निवेश करने के लिए हम अपने संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर कंपनी आरंभ की है। कुछ छात्रों का मानना है कि कैंपस प्लेसमेंट के दौरान मिलने वाले कुछ ऑफर की तुलना में फेलोशिप प्रोग्राम बेहतर विकल्प है।

दवा के रिएक्शन पर आप लें एक्शन !
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आजकल उपभोक्ताओं के हितों को नज़रअंदाज करना भारी पद सकता है। मसलन एक नई पहल के तहत किसी भी दवा के रिएक्‍शन करने पर या दवा खाने के बाद हुए बुरे अनुभव के बारे में अब उपभोक्‍ता फोन कर सीधे रिपोर्ट कर सकेंगे। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने एक टोल फ्री नंबर शुरू किया है, जहां लोग फोन कर दवा के साइड इफेक्‍ट, उससे हुई समस्‍या आदि के साथ ही यदि किसी दवा के खाने के बाद किसी दुष्‍प्रभाव के होने का संदेह है, तो भी उसकी शिकायत की जा सकती है।
 
फार्मासिस्‍ट, हॉस्पिटल और अन्‍य स्‍वतंत्र क्‍लीनिक्‍स के लिए यह जरूरी किया जाएगा कि वे जनहित में टोलफ्री नंबर 18001803024 को प्रदर्शित करें। इस योजना को लागू करने के पीछे मकसद है कि उपभोक्‍ताओं को अधिक मजबूत किया जाए ताकि वे दवाओं के दुष्‍प्रभाव पर खुद रिपोर्ट कर सकें। इससे ऐसा माहौल बनेगा, जिससे दवाओं के दुष्‍प्रभाव की रिपोर्ट देश के हर हिस्‍से से मिल सकेगी।
 
वर्ष 2011 से देशभर से दवाओं के दुष्‍प्रभाव के करीब एक लाख 10 हजार मामले सामने आए। हालां‍कि, यह तब मुमकिन हो सका, जब सरकार ने अस्‍पतालों में फार्माकोविजिलेंस सेल बनाना अनिवार्य कर दिया। हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि देश में चुनिंदा अस्‍पताल ही इस प्रक्रिया का पालन कर रहे हैं। फिलहाल देशभर में 150 अस्‍पतालों में ही फार्माकोविजिलेंस सेल काम कर रही हैं। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय और ड्रग नियंत्रक ऐसी सेल को बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
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प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, शासकीय 
दिग्विजय महाविद्यालय,राजनांदगांव।
मो.9301054300  

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भारत का स्वदेशी जल प्रहरी ‘स्कॉर्पियन सबमरीन’ समुद्र में उतरा

भारतीय नौसेना को मजबूत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही केंद्र सरकार को सोमवार को एक कामयाबी मिली। मझगांव डॉक पर तैयार की जा रही 6 में से एक 'स्कॉर्पियन सबमरीन' को सोमवार को केंद्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने ल़ॉंच किया। इसका निर्माण यूपीए सरकार के कार्यकाल में शुरू हुआ था। 

मझगॉव डॉक लिमिटेड के अधिकारियों ने बताया कि स्कॉर्पियन सबमरीन को सोमवार को डॉक से बाहर निकाला जाएगा। इसके बाद पहली बार सबमरीन को टेस्ट के लिए समुद्र में उतारा जाएगा। 

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक टेस्ट के लिए सबमरीन को समुद्र में उतारे जाने के दौरान देखा जाएगा कि उसमे किसी तरह की तकनीकी खराबी तो नहीं है। अगर कोई तकनीकी खराबी होगी तो उसकी जांच की जाएगी। उम्मीद की जा रही है कि 2018 तक सबमरीन को नौसेना को सौंपा जा सकता है। 

इस दौरान रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने यूपीए सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि पूर्ववर्ती सरकार ने रक्षा प्रोजेक्ट्स को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन मोदी सरकार रक्षा मुद्दों से जुड़ी चीजों पर बहुत गंभीर है। 

मुस्लिम लड़की ने जीती भगवद् गीता पर आयोजित प्रतियोगिता

12 साल की मरियम सिद्दीकी वैसे तो अपनी क्लास की टॉपर्स में शुमार हैं, लेकिन हाल ही में उन्होंने हिंदू धर्म ग्रंथ भगवद् गीता की एक प्रतियोगिता में पहले पायदान पर पहुंचकर सबको हैरान कर दिया।

छठी क्लास में पढ़ रही इस मुस्लिम लड़की ने इस्कॉन की ओर से आयोजित किए गए 'गीता चैंपियंस लीग कॉन्टेस्ट' में 3,000 प्रतियोगियों को हराकर खिताब अपने नाम कर लिया।

इस टेस्ट में बच्चों का गीता ज्ञान परखा जाना था। 15 मार्च को अवॉर्ड जीतने के बाद मरियम ने बताया, 'हमेशा से ही मेरी धर्मों में दिलचस्पी रही है और अक्सर ही फ्री टाइम में मैं ऐसी किताबें पढ़ने बैठ जाती हूं। इसलिए जब टीचर ने इस कॉन्टेस्ट के बारे में बताया, तो मुझे लगा कि यह गीता पढ़ने और समझने का अच्छा मौका होगा। मेरे पैरेंट्स ने भी इसमें हिस्सा लेने के लिए मेरा मनोबल बढ़ाया।'

कॉस्मोपॉलिटन हाई स्कूल में पढ़ने वाली मरियम ने इस्कॉन की ओर से दी गई किताबें एक महीने तक पढ़ीं और अंग्रेजी में टेस्ट दिया। गीता के बारे में काफी कुछ पढ़ चुकी मरियम ने बताया, 'मैं विभिन्न धर्मों के बारे में जितना पढ़ती हूं, उतना ही मेरा यकीन भी गहराता है कि दुनिया का सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है।'

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भारत के उजले पक्ष को दिखाएं साहित्यकार : श्री महेश श्रीवास्तव

लोकेन्द्र सिंह के काव्य संग्रह 'मैं भारत हूं' का विमोचन
भोपाल। अपने देश को हमें हीन भावना से प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। अपने लेखन में भारतीय वाग्ंमय और भारतीय उदाहरणों को प्रस्तुत करना चाहिए। ताकि प्रत्येक भारतवासी को अपने देश पर गौरव हो और दुनिया भी जाने की भारत एक महान देश है। यह पुरानी कहावत है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। लेकिन, धन और बाजारवाद का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे ये दर्पण कुछ दरक गया है। इस कारण बिम्ब कुछ धुंधले बन रहे हैं। साहित्यकारों को भारत के उजले पक्ष को दिखाना चाहिए। ये विचार प्रख्यात कवि और वरिष्ठ पत्रकार श्री महेश श्रीवास्तव ने व्यक्त किए। वे युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह के काव्य संग्रह 'मैं भारत हूं' के विमोचन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थे। समारोह का आयोजन 'एक भारतीय आत्मा' पं. माखनलाल चतुर्वेदी की जयंती प्रसंग पर मीडिया विमर्श पत्रिका के तत्वावधान में किया गया। समारोह की अध्यक्षता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने की। वरिष्ठ पत्रकार श्री अक्षत शर्मा भी बतौर विशिष्ट अतिथि मौजूद रहे।
               

 श्री श्रीवास्तव ने कहा कि जब मैं कहता हूं कि मैं भारत हूं तो हमारे भीतर गंगा की पवित्रता, हिमालय की गर्वोन्नति और हिन्द महासागर की गहराई एवं विशालता दिखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अनुभव की अभिव्यक्ति है साहित्य। पत्रकारिता भी साहित्य है लेकिन इसमें अनुभव का इस्तेमाल कम होता है। 'मैं भारत हूंÓ काव्य संग्रह की बेटि को समर्पित एक कविता का जिक्र करते हुए कहा कि आज समाज में बेटियों की अस्वीकारता है लेकिन कवि किस तरह से अपनी बेटियों को सम्मान देता है, यह सबको जानना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जब तक हम अपने देश की हवा, मिट्टी, पानी को आत्मसात नहीं करेंगे तब तक देश का कल्याण नहीं होगा। विमोचित काव्य संग्रह में कवि ने इसी हवा, मिट्टी और पानी को आत्मसात कर लेखन किया है। शोधपत्रों का उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि उज्जैन में स्थित महाकाल के शिवलिंग को केन्द्र मानकर खगोल की गणना की जाती थी। ज्यामिति, गणित, चिकित्सा इन सबका विकास कहाँ हुआ? अपनी लेखनी से हमें यह बताना चाहिए।

भाव को मजबूत बनाती है बौद्धिकता : कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि लाखों वर्षों की संकल्पनाओं का समावेश 'भारत' शब्द में है। उसे व्यक्त करना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। 'एक भारतीय आत्मा' के नाम से ख्यात महान कवि पं. माखनलाल चतुर्वेदी की आज जयंती है। उनको याद करना भारतीय परम्पराओं को याद करना है। हमें यह जानना चाहिए कि उन्होंने इतना सकारात्मक लेखन करने के लिए क्या-क्या अध्ययन किया। विद्वान कहते हैं कि एक हजार शब्द पढऩे के बाद एक शब्द लिखना चाहिए। हमारे शास्त्र मनन की बात करते हैं। हमें अध्ययन के बाद मनन करना चाहिए, तब जो शब्द निकलेगा वह ब्रह्म होगा। वरना शब्द तो भ्रम भी होता है। इसलिए हमें अध्ययन में भी सावधानी बरतनी चाहिए। गलत दिशा में अध्ययन से श्रेष्ठ अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। भाव की मजबूती के लिए बौद्धिकता की जरूरत होती है। 

उन्होंने कहा कि आसान काम नहीं था, जब माखनलाल चतुर्वेदी ने पत्रकारिता और लेखन कार्य किया। उस वक्त अंग्रेजी हुकूमत का दौर था। लेकिन,समाज के लिए समर्पित जीवन से उन्होंने वह कर दिखाया था। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि श्री अक्षत शर्मा ने कहा कि 'मैं भारत हूं' काव्य संग्रह में शामिल सब कविताएं अपनी माटी के लिए समर्पित हैं। उन्होंने कहा कि संग्रह में शामिल कविताएं उज्ज्वल और गौरवशाली भारत की तस्वीर दिखाती हैं। अपने देश पर गर्व करने की प्रेरणा देती हैं। इससे पूर्व पुस्तक का परिचय लेखक एवं कवि लोकेन्द्र सिंह ने दिया। उन्होंने कहा कि उनके लिए देश कोई भूगोल नहीं है बल्कि एक जीता-जागता देवता है। अपने इस देवता की स्तुति में ही उन्होंने कविताएं और गीत रचे हैं। उन्होंने कहा कि देश,समाज और प्रकृति के साथ-साथ संग्रह में शामिल कई कविताएं मानवीय रिश्तों के इर्द-गिर्द भी रची गई हैं। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सौरभ मालवीय ने किया। इस मौके पर कुलाधिसचिव श्री लाजपत आहूजा, कुलसचिव श्री चंदर सोनाने, जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय, सुनील शुक्ला, प्रवीण दुबे, शैलेन्द्र तिवारी, मध्यप्रदेश सूचना आयुक्त आत्मदीप, सामाजिक कार्यकर्त्ता सतीश पिम्पलीकर, हेमन्त मुक्तिबोध, डॉ. मयंक चतुर्वेदी और शहर के गणमान्य नागरिकों सहित विद्यार्थी भी मौजूद रहे।

 
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Journalism And Communication
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आतंकियों के जुल्म की कहानी भुक्तभोगी पत्रकार की जुबानी

आतंकी संगठन आईएसआईएस की चुंगल से छूटे तुर्की के फोटोजर्नलिस्ट बुन्यामिन अयगुन के ऊपर आतंकवादियों द्वारा किए गए जुल्म की कहानी सुनकर आप कांप उठेंगे। 
 
अयगुन ने बताया कि कैसे वे आईएस के चंगुल में फंसे, कैसे आतंकियों ने उनको रखा और कैसे वो रिहा हुए। आईएस की बर्बरता का खुलासा करते हुए उन्होंने बताया कि 40 दिनों तक वो आतंकियों के कब्जे में रहे और ये 40 दिन उनको 40 वर्षों के समान लगे। 
 
उन्होंने बताया कि मैं वहां 40 दिनों तक रोज मर-मर के जीता था। मुझे रोज कहा जाता था, खड़े हो जाओ, प्रार्थना कर लो और जिन्हें याद करना है याद कर लो, तुम्हें कल हम तलवार से मौत के घाट उतार देंगे।
 
बंधक रहने के दौरान अपने अनुभवों को किताब ''40 डेस एट द हैंड्स ऑफ आईएस'' के जरिए दुनिया के सामने ला रहे अयगुन ने कहा कि रोज मेरे सामने मेरा पूरा जीवन होता था। मैं जब भी आंखें बंद करता था तो सपने देखता था कि कैसे आतंकवादी मुझे मौत के घाट उतारेंगे।
 
गौरतलब है कि अयगुन 'मिलियत डेली' के फोटो जर्नलिस्ट हैं और हमेशा अपने काम को लेकर चर्चा में रहते हैं। अवॉर्ड विजेता अयगुन को नवंबर 2013 में आईएसआईएस के आतंकियों ने अगवा किया था।  वह 40 दिनों तक आतंकवादियों के कब्जे में रहे। वह अपने अनुभवों के आधार पर ''40 डेस एट द हैंड्स ऑफ आईएस'' किताब लिख रहे हैं, जिसमें उन्होंने अपनी कहानी कही है।
 
अयगुन ने उल्लेख किया है कि उन्हें आतंकवादी ज्यादातर आंखों पर पट्टी बांध कर रखते थे। इस दौरान अयगुन के दोनों पैर भी रस्सी से बंधे होते थे। इस हालत में उन्हें कई बार ऐसे लगा कि वह वापस अपनी दुनिया में नहीं जा पाएंगे। उन्होंने उल्लेख किया है, 'आईएस की कैद में मेरे 40 दिन बड़ी मुश्किल से बीते। ऐसे लगा कि मैं 40 सालों से यहां कैद हूं।'
 
40 दिनों तक आतंकियों के कब्जे में रहने के बाद जब अयगुन वापस लौटे तो कई दिनों तक 'मिलियत डेली' में उनके बहादुरी के किस्से छापे गए थे। अयगुन एक बार फिर अपनी किताब को लेकर चर्चा में हैं और उनकी यह किताब जल्द ही बाजार में होगी।
 
अपने अनुभवों को बताते हुए उन्होंने किताब में लिखा है कि मुझे तुर्की का निवासी होने का फायदा मिला। तुर्की एजेंसियां लगातार मुझे बचाने का प्रयत्न कर रही थीं और अंत में मुझे बचा लिया गया। उन्होंने बताया कि जहां पर मुझे रखा गया था वहां विद्रोही गुट ने हमला कर दिया, जिस कारण आतंकियो को वहां से भागना पड़ा। इसके चलते मुझे छुड़ाने में तुकी एजेंसियों को मदद मिली।

साभार- समाचार4मीडिया से 

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इंटरनेट का इस्तेमाल मानव अधिकार बने ?

फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने इंटरनेट के इस्तेमाल को मानव अधिकार बताते हुए कहा है कि सोशल नेटवर्किग साइट की तरफ से किए गए सर्वे में यह पाया गया है कि 69 प्रतिशत भारतीय यह नहीं जानते कि इंटरनेट से उन्हें क्या फायदे हैं। केवल 30 साल के इस नौजवान बिलेनियर ने कहा कि फेसबुक इस समय स्थानीय भाषा में कंटेंट यानी अंतर्वस्तु पर ध्यान दे रहा है। यह भारत में इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए जरूरी है।

जुकरबर्ग ने किसानों के लिए लोकल एप्स और स्थानीय भाषाओं में सोशियल सर्विस डेवलप करने वालों के लिए नया कॉन्टेस्ट भी लॉन्च किया है। इसके लिए एक मिलियन डॉलर का फंड दिया गया है। जुकरबर्ग भारत ने दो दिन की भारत यात्रा पर नई दिल्ली में इंटरनेट डॉट ओआरजी समिट पर संबोधन भी किया। जुकरबर्ग प्रशासन के सुधार में सोशल मीडिया के इस्तेमाल की पुरजोर वकालत कर रहे हैं।  साथ ही वे भारतीय पर्यटन को बढ़ाने में सोशल मीडिया कितना योगदान दे सकती है इस बारे में भी चर्चा का माहौल बना रहे हैं। 

गौरतलब है कि भारत में अमरीका के बाद फेसबुक की मजबूत मौजूदगी है। यहां फेसबुक के विस्तार के लिए अपार संभावनाएं हैं, जो कि भारत में एक पहले ही एक मशहूर प्लेटफॉर्म है। साथ ही कहा गया था कि यहां शिक्षा, स्वास्थ्य और रचनात्मक कार्यों में एक साथ काम करने की जरूरत है। तो ये है मानव अधिकारों के बदलते परिवेश और उससे जुड़ी उम्मीदों के बढ़ते दायरे की एक नई पेशकश। मानव निर्मित इंटरनेट का मानव अधिकारों से क्या रिश्ता हो सकता है इसकी भनक साइबर क्राइम को लेकर तो मिलती ही रहती है, लेकिन इसके इस्तेमाल को इंसान के हक़ से जोड़ने वाली बात वास्तव में बिलकुल निराली है। 
वंचित अधिकार से जन्मे कुछ संकट 
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खैर, हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ और कश्मीर में हुईं वारदातों के मद्देनज़र अगर गौर करें तो मानव अधिकारों का मुद्दा बार फिर नए सिरे से सोचने का सबब बन गया है। माओवाद और नक्सलवाद को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में बहुत से लोग ऐसे हालातों में रहते हैं, जिनसे यह रोग पनपता है। बेहतर भविष्य की आशा रखने वाले वे भारतीय नागरिक अनेक कारणों से खुद को अपने अधिकारों से वंचित महसूस करते हैं। उन क्षेत्रों में यही इस रोग के पनपने का आधार बनता है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मानव अधिकार मानव की अनिवार्य महत्ता को पहचान देते हैं। यह भी एक वास्तविकता है कि माओवादी और नक्सलवादी गुट निर्दोष लोगों के मानवाधिकारों पर वार करते हैं। लेकिन इससे निपटने के लिए भी उन इलाकों के सभी बाशिंदों के मानवाधिकारों का संरक्षण और संवर्द्धन ही एकमात्र उपाय है। आज विकास, सुरक्षा और मानव अधिकारों में से कोई भी एक, बाकी दोनों तत्वों के बिना अकेले सफल नही हो सकता। 
सुरक्षा का अभाव,विश्वास पर खतरा  
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लिहाज़ा, मानव अधिकार  के प्रखर चिंतकों का यह कहना बेमानी नहीं है कि मानव अधिकार की जोरदार वकालत करने वाला तंत्र भी यदि स्थानीय लोगों की सुरक्षा और विकास के लिए कुछ ठोस उपाय नहीं करता,तो गाहे बगाहे वह अपनी विश्वसनीयता को कमजोर कर रहा है। लेकिन इसके साथ ही गरीबों को भी इतना सजग बनाने की जरूरत है कि वे अपने शोषण का प्रतिरोध कर सकें और कोई सरकारी तंत्र या गैरसरकारी समूह उनका शोषण नहीं कर सके। सामाजिक न्याय विशेषकर वैश्वीकरण के व्यापक संदर्भ में अति आवश्यक मुद्दा बन चुका है। सरकारों और नागरिकों के पारंपरिक संबंध वैश्वीकरण के कारण बदल रहे हैं। इसके चलते सामाजिक-आर्थिक न्याय की प्राप्ति के रास्ते में नई चुनौतियां पेश हो रही हैं – चाहे वह विनाशकारी वित्तीय संकट के रूप में हो या आवश्यक वस्तुओं के बढ़ते मूल्यों के रूप में ,या फिर विश्व व्यापार संगठन , अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष,विश्व बैंक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बढ़ते प्रभाव के रूप में। मानवाधिकारों को समाज के सभी सदस्यों ,विशेषकर सरकार और उसकी एजेंसियों के व्यवहार की उपलब्धियों और सिद्धांतों के मानक के तौर पर देखा जाता है। 

स्मरणीय है कि 10 दिसंबर 1948 को यूनाइटेड नेशन्स की जनरल एसेम्बली ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया। इस ऐतिहासिक कार्य के बाद ही एसेम्बली ने सभी सदस्य देशों से अपील की कि वे इस घोषणा का प्रचार करें और देशों या प्रदेशों की राजनीतिक स्थिति पर आधारित भेदभाव का विचार किए बिना विशेषतः स्कूलों और अन्य शिक्षा संस्थाओं में इसके प्रचार, प्रदर्शन और व्याख्या का प्रबंध करें। इस घोषणा में न सिर्फ मनुष्य जाति के अधिकारों को बढ़ाया गया बल्कि स्त्री और पुरुषों को भी समान अधिकार दिए गए।
इंसानियत की छतरी का दूसरा नाम 
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बहरहाल,मानव अधिकार से तात्पर्य उन सभी अधिकारों से है जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता एवं प्रतिष्ठा से जुड़े हुए हैं। यह अधिकार भारतीय संविधान के भाग-तीन में मूलभूत अधिकारों के नाम से वर्णित किये गये हैं और न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है । इसके अलावा ऐसे अधिकार जो अंतर राष्ट्रीय  समझौते के फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा स्वीकार किये गये है और देश के न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय है, को मानव अधिकार माना जाता है । इन अधिकारों में प्रदूषण  मुक्त वातावरण में जीने का अधिकार, अभिरक्षा में यातनापूर्ण और अपमानजनक व्यवहार न होने संबंधी अधिकार, और महिलाओं के साथ प्रतिष्ठापूर्ण व्यवहार का अधिकार शामिल है।
अधिकार के हनन के जाने कितने रूप 
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एक और पहलू पर गौर कीजिए। आज जहां हमारी नारियां सशक्तीकरण के मार्ग पर सतत अग्रसर हैं ,वहीं बड़ी तादाद में बच्चे अभी भी बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं और मजदूरी करने के लिए विवश हैं। वृद्ध जनों और विकलांगों की दीर्घकालिक तथा सतत देखभाल करने वाली हमारी मशीनरी और संस्थाएं अब भी बेहद सतही हैं। सरकार जहां समावेशी विकास सुनिश्चित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है वहीं आम मानस में जाति और क्षेत्र आधारित विभाजन अब भी कुंडली मारे बैठा है। अति गरीब की श्रेणी में समाज का वह समूह आता है जो सामाजिक – आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से सर्वथा असुरक्षित है। ऐसे समूहों में भिखारी ,किन्नर ,एचआईवी पीडि़त , झुग्गी – झोपड़ी में रहने वाले बच्चे , कारखानों में काम करने वाले बच्चे, अवैध रूप से प्रताडि़त लोग , खासकर महिलाएं , मानसिक विकलांग , कुष्ट रोगी , बहु विकलांगता के शिकार व्यक्ति , देह व्यापार वाले इलाके में रहने वाले बच्चे , अनाथ बच्चे , परिसंपत्ति विहीन लोग , फुटपाथ पर रहने वाले लोग , बेघर और कचरा बीनने वाले आदि शामिल हैं। ऐसे लोगों की बदहाली इतनी अधिक है कि वे अमानवीय स्थिति में जीवन बसर करने को मजबूर हैं। 
न्याय पालिका की सशक्त भूमिका 
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अति गरीबों के उत्थान के लिए उनकी पहुंच सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं के लाभ तक बनानी होगी। इसके लिए भी उन्हें सहयोग की आवश्यकता है। ऐसे लोग घोर आर्थिक तंगी के शिकार होते हैं , जिसके चलते समाज इन्हें अपने लिए कलंक मानता है और इन्हें खुद से अलग – थलग कर देता है। व्यापक समाज में इनकी कोई अपनी पहचान नहीं है। किसी प्रकार की आकस्मिकता को झेलने के लिए इनके पास अपना कहने को कुछ भी नहीं है तथा इन्हें किसी प्रकार का संस्थागत सहयोग प्राप्त नहीं है। बहरहाल , हमारी कमजोरियां चाहे जो भी हों , हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि मानवाधिकार सुनिश्चित करने और सामाजिक न्याय हासिल करने की हमारी संरचना काफी मजबूत है। यह गर्व की बात है कि न्यायपालिका ने इसे असीम शक्ति दी है। 

स्पष्ट है कि मानवाधिकार मनुष्य के वे मूलभूत सार्वभौमिक अधिकार हैं, जिनसे मनुष्य को नस्ल, जाति, राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग आदि किसी भी दूसरे कारक के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता।
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लेखक छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण से सम्मानित 
प्रखर वक्ता और दिग्विजय कालेज के प्रोफ़ेसर हैं। 
मो.9301054300 

वाजपेयी के नाती की हत्या के आरोपी भी छूट गए

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाती के हत्यारोपी को कोर्ट ने बरी कर दिया है। लगभग 11 साल पुराने मामले में मनीष मिश्रा को चलती ट्रेन से फेंक दिया गया था, जिसके चलते उनकी मौत हो गई। मनीष, अटल बिहारी वाजपेयी की बहन विमला मिश्रा के नाती हैं।
 
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक वारदात के दिन मनीष ने ट्रेन में लड़कियों से हो रही छेड़छाड़ को रोकने की कोशिश की थी। मनीष के मामले में सभी 34 चश्मदीद अपने पुराने बयानों से मुकर गए। इसलिए अपर सत्र न्यायधीश-9 रमेश चंद्र दिवाकर आरोपी रामजी वर्मा को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
 
अभियोजन पक्ष की ओर से मामले की पैरवी कर रहे सहायक शासकीय अधिवक्ता रविंद्र कुमार ने बताया उन्होंने 6 चश्मदीद गवाह और 28 पुलिस व अन्य गवाहों को न्यायालय में पेश किया था। गवाहों के मुकरने के चलते आरोपी को लाभ मिल गया मामले में अभियोजन पक्ष ने आदेश के अध्ययन के उच्च न्यायालय में अपील की बात कही है।
 
मनीष के मामले में अदालत का फैसला चौंकाने वाला माना जा रहा है। ये मुकदमा 11 सालों से चल रहा था, जिसमें मनीष के माता-पिता और दादी विमला मिश्रा अधिकांश रिश्तेदारों की मौत हो गई।
 
घटनाक्रम के मुताबिक, 24 जनवरी 2004 को मनीष मिश्रा अपने दोस्त राकेश के साथ मथुरा से कोसी छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से जा रहे थे। वृंदावन रोड और छाता के बीच ट्रेन में उनका कुछ लोगों से झगड़ा हो गया था। उस समय की रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे लोग शराब पिए हुए थे और लड़कियों को छेड़ रहे थे। मनीष ने उनका विरोध किय तो, उनमें से कुछ लोगों ने उनके और राकेश के साथ मारपीट कर दी। उन्होंने मनीष को चलती ट्रेन से धक्का दे दिया, जिसके चलते उनकी मृत्यु हो गई।
 
मारपीट में दोस्त राकेश घायल हो गए थे। मामले में 8 फरवरी को बिलासपुर जीआरपी ने गजा पाइसा निवासी रामजी वर्मा को मनीष की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया और उसे मथुरा जीआरपी के हवाले कर दिया। आरोपी कोरबा छत्तीसगढ़ में काम करता है।

संघ के मंच पर आएँगे अजीम प्रेमजी और सुभाष घई

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों अपने बयान में मदर टरेसा के सेवा कार्यों को धर्मांतरण से जोड़ने की कोशिश की थी। इस बयान से इतर अपने सेवा कार्यों को समाज के सामने रखने के लिए संघ का आज से तीन दिनों का राष्ट्रीय सेवा संगम शुरू हो रहा है। दिल्ली के बाहरी इलाके में हो रहे इस कार्यक्रम में 800 से ज्यादा एनजीओ शामिल हो रहें हैं। इनमें से ज्यादातर संघ से जुड़े हुए हैं। खास बात यह है कि इसके उद्घाटन सत्र में देश के दिग्गज उद्योगपति अजीम प्रेमजी और जीएम राव के अलावा फिल्म निर्माता सुभाष घई के भी मुख्य अतिथि के तौर पर आने की संभावना है। 

इस कार्यक्रम के जरिए संघ अपना और हिन्दू संगठनों के सेवा कार्यों को समाज के सामने रखते हुए यह जताने की कोशिश करेगा कि भारत में सामाजिक कार्य विदेशी मिशनरियों की देन नहीं है बल्कि दूसरे संगठन भी इस क्षेत्र में बिना किसी लोभ के काफी अच्छा काम कर रहे हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता आध्यात्मिक गुरु माता अमृतानंदमयी और संघ प्रमुख मोहन भागवत करेंगे। संघ इस तरह का आयोजन चार साल बाद कर रहा है और इस बार यह कितने बड़े स्तर पर किया जा रहा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 836 संगठनों से जुड़े चार हजार प्रतिनिधि इसमें भाग ले रहे हैं। 

संघ के सह-सेवा प्रमुख अजीत प्रसाद महापात्रा ने कहा, 'यह कार्यक्रम यह संदेश देने के लिए किया जा रहा है कि समाज के लिए सेवा की भावना इस देश में शुरू से है। मिशनरियां क्या कर रही हैं, उससे हमें मतलब नहीं है। हम सेवा का काम हर भारतीय को स्वाभिमान के साथ आत्मनिर्भर बनाने के लिए कर रहे हैं।' तीन दिनों के इस आयोजन में संघ अपने स्वयंसेवक द्वारा स्वच्छ भारत, कश्मीर बाढ़ में किए राहत कार्यों और गायों के संरक्षण के लिए किए गए कामों को पेश कर सकता है। महापात्रा ने कहा कि सेवा का काम हम कर्तव्य मानकर करते हैं न कि किसी के प्रति दया का भाव रखकर। 

संघ गायों के संरक्षण पर बहुत जोर दे रहा है और इस कार्यक्रम के जरिए भी यह संदेश देने की कोशिश की जाएगी। महापात्रा ने कहा, 'हम अपने स्वयंसेवकों से अपील करेंगे कि किसानों और ग्रामीण के पास जाएं और उन्हें समझाएं कि अपनी बूढ़ी गायों को न बेचें। गाय जब दूध देना बंद कर देती है तो उसका इस्तेमाल यूरिन और गोबर के लिए किया जा सकता है, जिनकी अच्छी कीमत मिलती हैं। लोग यह बात नहीं जानते हैं और कसाइयों के चक्कर में फंस जाते हैं।' शनिवार को संघ के नेता प्रतिनिधियों को एकजुट होकर समाज का काम करने के महत्व के बारे में बताएंगे। 

संघ के संगठन सेवा भारती के उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड क्षेत्र के प्रमुख सतीश अग्रवाल इसे समझाते हुए बताते हैं, 'हजार से भी ज्यादा संगठन गायों को बचाने के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन, क्या सब जानते हैं कि हमें देशी नस्ल की गायों को बचाने पर जोर देना है? हम एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हैं और इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि मिलकर काम करें।' अग्रवाल कहते हैं कि लोग मिशनरियों के किए गए कामों का जिक्र बहुत उत्साह से करते हैं, संघ दशकों से सेवा कार्य कर रहा है लेकिन कभी इसका प्रचार नहीं किया। उन्होंने कहा कि संघ बिना हल्ला मचाए समाज के सबसे निचले तबके के लिए काम करने में विश्वास रखता है। 

राष्ट्रीय सेवा संगम में हॉस्पिटल, स्कूल, सांस्कृतिक केंद्र, वृद्धाश्रम, ब्लड बैंक, योग केंद्र, अनाथ आश्रम और कुष्ठ रोगियों के लिए केंद्र चलाने वाले एनजीओ भाग ले रहे हैं। संघ के सूत्रों ने बताया कि अपनी ताकत दिखाने के लिए संगठन अपने से जुड़े एनजीओ की नेटवर्किंग पर भी काम शुरू कर दिया है। उसके 400 में से 96 एनजीओ को एक-दूसरे से लिंक किया जा चुका है। 

साभार- इकॉनामिक टाईम्स से 

पायलट अच्छी हिन्दी बोलेंगे तो ईनाम मिलेगा

सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया अपने पायलटों को हिंदी बोलने के लिए प्रेरित कर रही है। कंपनी ने पायलटों से कहा है कि उड़ान के दौरान अच्छी हिंदी में घोषणा करने पर उन्हें ईनाम दिया जाएगा।
 
एयर इंडिया और उड्डयन मंत्रालय के अधिकारियों के बीच हुई मिटिंग के मिनट्स को उद्धृत एक नोट के मुताबिक, पायलट या तो अंग्रेजी में घोषणा करते हैं या बिल्कुल नहीं करते। इसमें कहा गया है, 'हमें हिंदी में घोषणा करने के लिए स्वतः प्रेरित होना है। जो पायलट हिंदी में अच्छी उद्घोषणा करते हैं उन्हें इनाम दिया जाएगा।' हिंदी में ही उद्घोषणा  हो, यह तय करने के लिए एयर इंडिया ने दो फैसले किए। पहला कि पायलटों द्वारा की गई उद्घोषणा का ब्यौरा  फ्लाइट की रिपोर्टों में रिकॉर्ड किया जाना चाहिए और दूसरा यह कि फीडबैक फॉर्म के जरिए इन उद्घोषणाओं पर यात्रियों की राय ली जाए।