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रेल मंत्री के ये प्रयोग अगर सफल हो जाएँ

हादसे का वक्त इससे ज्यादा अपशकुन वाला नहीं हो सकता था। जिस दिन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने नवाचार पर सुझाव के लिए कायाकल्प परिषद की कमान संभालने के लिए रतन टाटा को आमंत्रित किया, उसी दिन हुए रेल हादसे में 39 लोग मौत के शिकार हो गए। अगले दिन इसी अखबार ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें अर्थशास्त्री विवेक देबरॉय की अगुआई वाली समिति की सिफारिशों को शामिल किया गया था, समिति का गठन रेलवे की गाड़ी को पटरी पर लाने में मदद के मकसद से किया गया था।
 
राजीव गांधी ने रतन टाटा को एयर इंडिया का चेयरमैन और राहुल बजाज को इंडियन एयरलाइंस का चेयरमैन बनाया था ताकि नए विचारों और त्वरित फैसलों के साथ उन दोनों कंपनियों का कायाकल्प हो सके। राजीव गांधी का प्रधानमंत्रित्वकाल बहुत लंबा नहीं चला और हम जानते हैं कि बाद में इन दोनों कंपनियों के साथ क्या हुआ। एंप्रेस मिल्स और नेलको को संभालने में रतन टाटा को कामयाबी नहीं मिली लेकिन टाटा समूह को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में उन्होंने ऐतिहासिक भूमिका अदा की। यह संभवत: अत्यधिक सरलीकरण होगा लेकिन फिर भी सच है कि किसी एक कंपनी के प्रबंधन के मामले में रतन टाटा उतने कारगर नहीं रहे लेकिन जब किसी संगठन को एक दृष्टिïकोण देने की बारी आई तो वह बेजोड़ साबित हुए।

अभी रेलवे को सबसे पहले किस तरह के प्रबंधकीय उपचार की दरकार है? तात्कालिक रूप से विचार कितने प्रासंगिक होंगे? मेरे ख्याल से इस गंध को साफ करने के लिए आपात कदम उठाने की जरूरत है। सबसे बुनियादी स्तर आधारभूत खामी दुर्घटना के मामलों में नजर आ रही है जो वक्त के साथ और बदतर होती जा रही है। पिछले दस वर्षों के दौरान यात्री हादसों में चार गुना वृद्घि हुई है। मार्च, 2013 में लोकसभा सचिवालय द्वारा तैयार एक विवरणिका के अनुसार 2002-03 में प्रति दस लाख मुसाफिरों पर 0.03 के आंकड़े से 2011-12 में यह बढ़कर 0.126 हो गया। जब हम इन हादसों में हुई मौतों पर नजर डालते हैं तो तस्वीर और साफ होती है। वर्ष 1965-96 के बीच तीन दशकों तक अगर अपवादस्वरूप कुछ बुरे वर्षों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश वर्षों में दुर्घटनाओं में हुई मौतों का आंकड़ा 100 से कम के दायरे में ही रहा।
पिछले एक दशक में चीजें खराब होना शुरू हुईं। वर्ष 2003-04 से 10 में से नौ वर्षों के दौरान दुर्घटनाओं में मृतकों की संख्या 100 से ज्यादा रही जबकि इनमें से छह वर्षों में यह आंकड़ा 200 से अधिक और तीन वर्षों में 300 से अधिक रहा। पिछले कुछ वर्षों के दौरान रेलगाडिय़ों में आग लगने के भी काफी मामले सामने आए हैं। रेलगाडिय़ों के डिब्बे बनाने में, जिस सामग्री का इस्तेमाल होता है, वह वास्तव में अग्निरोधी है या नहीं, जैसा कि अनिवार्य होता है? विवरणिका के अनुसार अधिकांश हादसे प्रक्रियात्मक नाकामियों की वजह से होते हैं। सिग्नल और रूट रिले इंटरलॉकिंग जैसे तंत्र पुराने पड़ चुके हैं, जिनसे गड़बडिय़ां होती हैं और जिन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। 1990-91 में 16 लाख कर्मियों की तादाद को पिछले तीन वर्षों में घटाकर 13 से 14 लाख करने पर रेलवे ने बड़ी शाबाशी हासिल की लेकिन आखिर किस कीमत पर? लाखों सुरक्षाकर्मियों के पद रिक्त हैं।

तमाम हादसे गाड़ी के पटरी से उतर जाने, दो रेलगाडिय़ों की भिड़ंत और क्रॉसिंग पर गड़बड़ी के कारण होते हैं। इसकी वजह भी रेलवे की पुरानी पड़ चुकी पटरियां और गड़बड़ी वाला रॉलिंग स्टॉक है। खराब रखरखाव भी एक  महामारी है। हालिया हादसे में भी खुद रेलवे की ओर से आरोपों की झड़ी लगी। रखरखाव के लिहाज से रेलगाड़ी की हालत खराब थी और कर्मचारी संघ के नेताओं का आरोप है कि दो स्टेशनों पर कमजोर ब्रेकों की शिकायत पर संबंधित विभागों ने गौर ही नहीं किया। दुर्घटना का स्पष्टï कारण सिग्नल का अतिक्रमण करना था लेकिन यह कमजोर ब्रेक पावर के कारण हो सकता है। आने जाने के पूरे चक्कर के लिए रखरखाव पंजीकरण प्रत्येक दौरे के निरीक्षण के बाद दिया जाना चाहिए। कर्मचारी संघों के सदस्यों की तो छोडि़ए रेलवे के ही तमाम लोग निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि लागत में कटौती और लंबी प्रक्रियाओं से बचने की कवायद ही दुर्घटनाओं की असल वजह हैं।

विवेक देबरॉय समिति के बारे में माना जा रहा है कि वह रेलवे के पूरी तरह निजीकरण या व्यवसायीकरण के बजाय यात्री और मालगाडिय़ों के संचालन के अलावा रॉलिंग स्टॉक के उत्पादन के निजीकरण का सुझाव दे सकती है। इसमें निजी रेलगाडिय़ों द्वारा टै्रक के उपयोग को लेकर स्वतंत्र नियामक का प्रावधान हो सकता है। टै्रक सहित बुनियादी ढांचे का प्रबंधन एक मूल कंपनी के तहत स्वतंत्र कंपनी द्वारा किया जाना चाहिए।

रेल यातायात बहुत बढ़ा है, जिसमें कई रेलगाडिय़ां जुड़ी हैं और अधिक नौकरियां सृजित हुई हैं। ग्राहक सेवा, विश्वसनीयता, मुनाफा और सक्षमता में कोई खास सुधार नहीं हुआ लेकिन सुरक्षा रिकॉर्ड स्पष्टï रूप से सुधरा है। निजीकरण के साथ ही सरकारी नियंत्रण भी वास्तव में बढ़ा है, नतीजतन ढांचा और जटिल हुआ है। असली सबक यह नहीं है कि निजीकरण नाकाम हुआ है बल्कि यह है कि अनुभवों से सीखने वाला और कारगर युक्तियों को तलाशने वाला एक तंत्र है। अगर स्वास्थ्य रूपकों का इस्तेमाल करें तो देबरॉय समिति द्वितीयक देखभाल में परिर्वतन की सिफारिशें करेगी और रतन टाटा तृतीयक देखभाल के लिए एक दृष्टिïकोण को विकसित करेंगे लेकिन असल में रेलवे को इस समय प्राथमिक देखभाल की दरकार है। बुनियादी चीजों की ओर लौटना बेहद जरूरी है, पुराने ढांचे को बदलना होगा, रखरखाव के क्रम को लेकर सख्त होना होगा और प्रक्रियात्मक अभ्यास करना होगा ताकि आने वाले वर्षों में सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और कर्मियों की प्रतिबद्घता और हौसला बढ़े। उदासीनता और भ्रष्टïाचार की मौजूदा संस्कृति की जगह वास्तव में नए नेतृत्व की जरूरत है, जो वफादारी और प्रतिबद्घता वाला हो।
 
साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से

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आसाराम के बेटे नारायण साईं के घूस के 8 करोड़ जप्त

अहमदाबाद। प्रवर्तन निदेशालय(ईडी) ने सूरत में दो लोगों के ठिकानों पर छापा मारते हुए 8.10 करोड़ रूपये जब्त किए हैं। बताया जाता है कि इन पैसों को आसाराम के बेटे नारायण सांई पर लगे रेप केस को कमजोर करने के लिए पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को घूस के रूप में दिया जाना था।
 
ईडी के सूत्रों का कहना है,  सूरत निवासी केतन पटेल के पास से आठ करोड़ और रीना वाघेला के पास से 10 लाख रूपये जब्त किए गए हैं और नारायण सांई के खिलाफ घूस देने का मामला दर्ज किया गया है। केतन पटेल जमीन व्यापारी है और रीना वाघेला घूस मामले में आरोपी हितेन्द्रसिंह वाघेला की पत्नी है। इस बारे में ईडी ने पिछले साल 27 नवंबर को नारायण सांई का बयान दर्ज किया था। नारायण सांई ने बताया था कि, उसने अपने साथी उदय सांघानी को पटेल से पैसे लेने और सूरत के नरेश मल्कानी को देने को कहा था। मल्कानी इस पैसे को पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को घूस के रूप में देने वाला था।
 
घूस कांड का खुलासा पिछले साल सूरत पुलिस क्राइम ब्रांच ने किया था। इसके अनुसार सांई की योजना के अनुसार डॉक्टरों, पुलिसवालों और न्यायिक अधिकारियों को केस को कमजोर बनाने के लिए पैसा दिया जाना था। इसके बाद पुलिस ने 14 लोगों को गिरफ्तार किया था। उस समय केतन पटेल ने जांच में बताया था कि फ्लैट खरीदारों ने उसके एक प्रोजेक्ट के लिए यह पैसा उसे दिया था। हालांकि ईडी की जांच में उसकी पोल खुल गई।
 
सांई दिसंबर 2013 से ही सूरत जेल में बंद है। उसके और आसाराम के खिलाफ दो बहनों ने दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया था। छोटी बहन ने नारायण सांई पर आरोप लगाया कि उसने सूरत आश्रम में 2002 से 2005 के बीच उससे कई बार दुष्कर्म किया। वहीं आसाराम एक अन्य मामले में राजस्थान की जोधपुर जेल में बंद है। 

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पड़ोसियों से दोस्ताना संबंध न होना एक बड़ी समस्या

प्रधान मंत्री के सुरक्षा सलाहकार श्री अजीत डोभाल का कहना है कि ऎसा एक भी पड़ोसी देश नहीं है जिसके साथ भारत को परेशानी न हो। उन्होंने कहा कि मैनेजिंग सिक्यॉरिटी की सबसे बड़ी समस्या ही पड़ोसी देशों से ज्यादा दोस्ताना संबंध न होना है। इंटेलिजेंस ब्यूरो के चीफ रह चुके डोभाल ने कहा, "म्यानमार के साथ इनसर्जेसी की समस्या है, बांग्लादेश के साथ गैरकानूनी प्रवासी की समस्या है, तो नेपाल का इस्तेमाल कुख्यात एजेंसिया भारत के खिलाफ गलत इरादों को अंजाम देने के लिए करती हैं।"
 
डोभाल ने कहा, "भारत जैसे बड़े देश की सुरक्षा करना बड़ा काम है। देश की अंतरराष्ट्रीय सीमा बड़ी है और पड़ोसी देशों से हमारे कुछ खास दोस्ताना संबंध भी नहीं हैं। इस पर सबसे बुरा यह है कि हमारे दो पड़ोसी देश परमाणु ताकत भी रखते हैं।" एयरफोर्स के एक इवेंट में डोभाल ने पाकिस्तान व इस्लामाबाद में रेडिकलाइजेशन पर चिंता व्यक्त की।
 
डोभाल ने कहा, "पाकिस्तान में रेडिकलाइजेशन और अफगानिस्तान में समस्याएं भी हमारे लिए चिंता का विषय हैं। हमें पाकिस्तानी सरकार पर संशय है कि वे अपनी सरजमीं पर इसे पूरी तरह से कंट्रोल में कर सकेंगे।" डोभाल ने कहा कि भारत पाकिस्तान के साथ तमाम समस्याओं को न्यायपूर्वक सुलझाना चाहता है और इसके लिए प्रयासरत है। 

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लापरवाह डॉक्टर को देना होगा 19 लाख का हर्जाना

कंज्यूमर फोरम ने मुंबई के एक डॉक्टर को निर्देश दिया है कि वह मलाड़ में रहने वाली एक महिला को 19 लाख रुपये हर्जाना दे। डॉक्टर के वक्त पर न पहुंचने की वजह से इस महिला ने डिलिवरी के कुछ ही देर बाद अपना बच्चा खो दिया था।
 
मुंबई सबअर्बन डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर फोरम ने कहा, 'बच्चे की मौत डॉक्टर की लापरवाही की वजह से हुई। परिवार को पहुंचे सदमे और नुकसान के लिए डॉक्टर ही जिम्मेदार है।' फोरम ने कहा, 'डॉक्टर को मालूम था कि महिला प्रेगनेंट है और डिलिवरी की नॉर्मल अवधि पार कर चुकी है। ऐसे में जन्म के वक्त डॉक्टर का मौजूद रहना और इस बारे में अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी था।'
 
बच्चे की मां सोनू करीर ने शिकायत की थी और केस पिता ने लड़ा। मामला 2003 का है। 18 अक्टूबर को वह चेकअप के लिए डॉक्टर के पास गईं, तो बताया गया कि बेबी कभी भी हो सकता है। डॉक्टर ने महिला को सलाह दी कि वह कांदिवली के एक अन्य अस्पताल में भर्ती हो जाए।
 
सोनू 28 अक्टूबर को 12.30 बजे लेबर पेन होने पर हॉस्पिटल ले जाई गईं। डॉक्टर 4 बजे आया और एग्जामिनेशन के बाद कहा कि 15 मिनट में डिलिवरी होगी। इसके बाद डॉक्टर घर के लिए रवाना हो गया। सोनू साढ़े 5 बजे तक दर्द से जूझती रहीं। जब उन्होंने डॉक्टर के बारे में पूछा तो बताया गया कि वह जल्दी आएंगे। इस बीच नर्स उन्हे ऑपरेशन थिएटर ले गईं। नर्स की मौजूदगी में ही बेबी हो गया। जब डॉक्टर आया तो उसने परिवार से कहा कि बेबी को तुरंत बच्चों के अस्पताल ले जाइए।
 
फोरम ने डॉक्टर का यह दावा खारिज कर दिया कि बच्चा मृत पैदा हुआ था और उसने उसे बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। यह पाया गया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत की वजह अननैचरल थी और ऑक्सिजन की कमी की वजह से उसकी जान गई थी। फोरम ने पाया कि गर्भनाल बच्चे के गले में लिपटी हुई थी और इस वजह से वह जोर-जोर से सांस ले रहा था। फोरम ने कहा कि इससे साबित होता है कि बच्चा मृत पैदा नहीं हुआ था।
 
साभार-
टाईम्स ऑफ इंडिया से 

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रेल बजट की खास बातें, जिनकी कहीं कोई चर्चा नहीं हुई

अब तक अधिकांश रेल मंत्री अपना बजट प्रस्तुत करते हुए तथ्यों की अपेक्षा आंकड़ों का सहारा लेने का ही प्रयास करते रहे हैं। संभवतः पहली बार हुआ है कि रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभाकर प्रभु ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए सन् 2015-16 के लिए 1,00,011 करोड़ रुपए का रेल बजट प्रस्तुत किया। इस बजट में गत वर्ष की अपेक्षा आकार में 52 प्रतिशत की भारी वृद्धि की गई, लेकिन उसका भार आम जनता पर नहीं डाला गया। श्री सुरेश प्रभु ने रेल बजट में लोगों को लुभाने की अपेक्षा उन्हें रेल की वास्तविक स्थिति से अवगत कराने का सफल प्रयास किया है। उन्होंने खुद को जनता की नाराजगी का शिकार भी नहीं होने दिया और यात्री किराए में वृद्धि करने की अपेक्षा माल भाड़े की दरों में 16 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की। भले ही यह विकासोन्मुखी बजट कई अर्थों में पहले के बजटों से अलग है परन्तु उन्होंने रेल उपभोक्ताओं को आंकड़ों के जाल में उलझाने का प्रयास कतई नहीं किया। इसके लिए उन्होंने अपने वित्तीय प्रबंध के कौशल का सहारा लिया। रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष श्री विवेक सहाय ने इसे बजट कम और विजन दस्तावेज कहना बेहतर समझा।

     

रेल बजट 2015 अगले पांच साल में कई लक्ष्यों को पूरा करने वाला साबित होगा। बजट में पूरे तौर पर 4 चीजों पर ध्यान दिया गया है। पहला लक्ष्य- यात्रियों को निरंतर मजबूत और स्थायी तौर पर सुविधा प्रदान करना है। अनुभव को जानकर उनके साथ संपर्क स्थापित करना रेल में सुरक्षित और आरामदायक यात्रा का विकल्प लोगों को देना है, रेलवे की आधारभूत संरचना और क्षमता का आधुनिकीकरण के साथ विस्तार करना एवं रेलवे को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए रेलवे ने पंचवर्षीय योजना तैयार की है। जिसके लिए रेलवे ने करीब साढ़े आठ लाख करोड़ रूपए निवेश की योजना बनाई है।

 

     

रेल मंत्री ने न तो किसी नई रेलगाड़ी की घोषणा की है, जैसा कि अधिकतर रेल मंत्री करते रहे हैं, और न ही रेलों के फेरों में बढ़ोतरी की बात की है। इस पर भी रेलवे के विकास पर होने वाले व्यय का बोझ उन्होंने रेल उपभोक्तओं पर डालने से परहेज किया। संभवतः उन्हें इस बात का विश्वास रहा होगा कि कुछ गाड़ियों में 24 के बजाय 26 कोच लगाने से अधिक किराया वसूला जा सकेगा। वर्तमान रेल लाइनों में 24 हजार किलोमीटर की बढ़ोतरी भी रेल के लिए अधिक कमाई का कारण बनेगी। रेल मंत्री ने अपना अनुमान यात्रियों की बढ़ने वाली संख्या के आधार पर लगाया है। उनका मत है कि वर्तमान में 2.10 करोड़ की अपेक्षा आने वाले समय में 3 करोड़ यात्री रेलवे का उपयोग प्रतिदिन करेंगे। मालभाड़े को एक समान बनाए जाने के लिए कदम उठाए गए है। इस कदम से दूरदराज के इलाके जैसे नॉर्थ ईस्ट के लोगों को अधिक मालाभाड़े का बोझ नही उठाना पड़ेगा।

     

साथ ही रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभाकर प्रभु ने रेलवे स्टेशनो को बेहतर बनाने के लिए आदर्श स्टेशन योजना का खाका भी पेश किया है। इस योजना के तहत 200 नए रेलवे स्टेशन का चयन किया गया है जिन्हे विश्वस्तरीय बनाया जाएगा। इसके अलावा यात्री सुविधाओं पर जोर देते हुए स्टेशनों पर वाई-फाई (wi-fi) की सुविधा प्रदान किए जाने की योजना का भी ऐलान किया। यात्रियों की सुविधा के लिए लिफ्ट और एस्कलेटर के साथ ही विकलांगों के लिए स्टेशनो को फ्रेंडली स्वरूप दिया जा रहा है। रेलवे स्टेशनों के आसपास खाली पड़ी जमीन पर कौशल विकास से जुड़ी गतिविधियां शुरु करने की भी योजना है, जिसके तहत युवाओं को रोजगार से जुड़े अलग-अलग कोर्सेज कराए जाएगें।

 

रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास और लॉजिस्टिक पार्क के लिए एक लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। ऐसा सरकार और निजी क्षेत्र के संयुक्त निवेश से होना संभव है परन्तु इसके लिए भी रेलवे को अतिरिक्त प्रयास करने होंगे और निजी पूंजी को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ आकर्षक प्रस्ताव लाने होंगे। प्रसन्नता की बात यह है कि उद्योग जगत ने इस बजट का दिल खोल कर स्वागत करते हुए कहा है कि रेल बजट में व्यापार आसान बनाने और इसमें निवेश बढ़ाने के लिए लंबी अवधि के उपाय किए गए हैं। उद्योग जगत ने उत्साहित होते हुए कहा है कि सरकार के पीपीपी मॉडल के जरिए रेलवे के सुधार की गति तेज़ होगी। संभवतः सरकार की नजर उन रेल डिब्बों के निर्यात पर भी रही है, जो प्रति वर्ष हमारे रेल के कारखानों में निर्मित होते हैं। स्मरणीय है कि हमारे कारखाने प्रति वर्ष लगभग 350 डिब्बों का उत्पादन करते हैं जिन्हें नई ट्रेनों में लगाने की बातें की जाती रही हैं। इन कारखानों के लिए प्रति वर्ष 2200 करोड़ रुपये के सामान का आयात किया जाता रहा है। प्रधान मंत्री के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के अन्तर्गत इसमें 75 प्रतिशत की कमी करने की महत्वाकांक्षी योजना पर कार्य किया जायेगा। 

 

रेलवे का राजस्व बढ़ाने के लिए रेल मंत्री ने पर्यावरण में सुधार और बिजली के उपयोग में बचत करने की योजना भी बनाई है। रेलवे अपनी भूमि, स्टेशनों और भवनों की छतों पर सौर ऊर्जा संयत्र लगाने की योजनाओं में तेजी से काम करेगा। रेल मंत्री के एक अनुमान के अनुसार इन से न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी बल्कि रेलवे आने वाले पांच वर्षों में कम से कम एक हजार मेगावाट क्षमता के संयत्र लगाने में सक्षम होगा। इसी प्रकार बिजली का अपव्यय रोकने का भी हर संभव प्रयास किया जायेगा। रेलवे अपने उपयोग के लिए बिजली खरीदने के लिए भी बिजली कम्पनियों में होने वाली प्रतिस्पर्धा का लाभ उठा कर कम से कम तीन हजार करोड़ रुपए की बचत करने में सफल हो सकेगा। श्री सुरेश प्रभु की योजना है कि पर्यावरण प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए गाडि़यों को चलाने में डीजल के साथ साथ सीएनजी का प्रयोग भी किया जायेगा। इतना ही नहीं उन्होंने वाटर हारवेस्टिंग सिस्टम के विस्तार का भी निर्णय लिया है। उन्होंने ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए रेल इंजिनों की आवाज कम करने का भी फैसला किया है। इस प्रकार की योजनाओं पर पहले न तो विशेष ध्यान दिया गया था और न इनके प्रति किसी प्रकार के गंभीर प्रयास ही किए गए थे। इन बातों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि रेल बजट भविष्योन्मुखी और यात्री केन्द्रित है जिसमें एक स्पष्ट नजरिया और उसे हासिल करने की निश्चित योजना का मिश्रण है। इससे सिद्ध होता है कि रेल मंत्री ने प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि को ध्यान में रखते हुए ही रेल बजट तैयार किया है। केन्द्रीय मंत्री श्री वेंकैया नायडू का भी यह मानना है कि बजट निश्चित रूप से रेल यात्रियों के लिए गति, सुरक्षा, संरक्षा और संतोष को सुनिश्चित करने वाला है।

 

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की महत्वकांक्षी योजना बुलेट ट्रेन को अगले दो वर्षों में हकीकत में बदलने की कोशिश की जाएगी। इसके लिए रेलवे आवश्यक नेटवर्क तैयार करेगा। बुलेट ट्रेन न केवल प्रधानमंत्री का सपना है बल्कि वे भारत के भविष्य के लिए एक सुनहरी किरण भी है क्योंकि ऐसी गाड़ियों के चलने से यात्रा के समय में 20 प्रतिशत तक की बचत हो सकेगी।

 

इसके अलावा 9 रेलवे कॉरिडोर्स पर ट्रेनों की गतिसीमा को भी वर्तमान 110-130 किमी प्रति घंटा से बढ़ाकर 160-200 किमी प्रति घंटा करने की भी योजना है। रेल मंत्रालय की कोशिश रेल की औसत गति 100 किमी. प्रति घंटा करने की है। श्री प्रभु ने लोगों को प्रसन्न करने की बजाय एक प्रगतिशील रेल की योजना पर ध्यान दिया। इसी कारण इस बजट को लोकलुभावन बजट कहने की अपेक्षा एक प्रगतिशील और सुधारवादी बजट की संज्ञा दी गई।यात्री सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रेल बजट में रेलवे स्टेशनो पर बड़ी संख्या में सीसीटीवी कैमरे लगाने का भी ऐलान किया। इसके साथ ही टोल फ्री नंबर 182 भी जारी किया जिस पर सुरक्षा संबंधित शिकायत दर्ज की जा सकती है, साथ ही 138 नम्बर पर 24 घंटे हेल्पलाइन की भी शुरूआत की गई। इसके अलावा चुनिंदा रेल मार्गों पर टीसीएस यानी ट्रेन कॉलिजन एवाएडेंस सिस्टम इंस्टॉल करने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। आने वाले वक्त में 3438 मानवरहित क्रॉसिंग को खत्म किया जाएगा, जिसके लिए बजट में 6581 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।  

 

रेल बजट में एन डी ए सरकार के स्वच्छता अभियान को ध्यान में रखते हुए उन्होंने 650 स्टेशनों पर शौचालय बनाने की बात भी की है। रेल मंत्री ने कहा कि हमारा प्रयास होगा कि इस वर्ष रेलगाडि़यों में 17,000 जैव शौचालयों का प्रबंध हो सके और हाउस कीपिंग सेवा में भी सुधार किया जा सके। यह अपने आपमें बहुत बड़ी बात है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लगभग 7000 रेलवे स्टेशनों को साफ सुथरा रखने का दायित्व रेल विभाग पर होता है। इस पर भी उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया है कि रेलवे स्टेशनों की साफ सफाई का पहले की अपेक्षा कहीं अधिक ध्यान रखा जायेगा, इस लिहाज से स्वच्छता पर नई पॉलिसी बनाने का भी ऐलान किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने अन्य अनेक छोटी छोटी परन्तु महत्वपूर्ण सुविधायें यात्रियों को उपलब्ध कराने की घोषणाएं भी की हैं, जिन के कारण अधिकांश यात्री अपमानित और स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते थे। शायद पहली बार यात्रियों को यह महसूस हुआ होगा कि रेलवे ने उन्हें एक उपभोक्ता के रूप में स्वीकार करते हुए उनके अधिकारों की ओर ध्यान दिया है।

 

बजटीय अनुमान के मुताबिक 2015-16 के लिए 100011 करोड़ रूपये की वित्तीय व्यवस्था की गई है जोकि पिछले बजट की तुलना में 52 प्रतिशत अधिक है। इस राशि का 41.6 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से आएगा जबकि 17.8 प्रतिशत आंतरिक संसाधनों द्वारा जुटाया जाएगा।

 

पहली बार रेल मंत्री ने सांसदों का आवाहन करते हुए उनसे अनुरोध किया कि वे सांसद निधि का कुछ भाग रेलवे के विकास के लिए इस्‍तेमाल करें। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सांसद इस निधि का उपयोग अपनी स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने में करना चाहते हैं परन्तु अधिकांश सांसदों के निर्वाचन क्षेत्रों में कोई न कोई रेलवे स्टेशन भी होता है। यदि वहां पर कोई विकास कार्य किया जायेगा तो उससे सांसदों के मतदाताओं को ही सुविधायें मिलेंगी। प्रत्येक सुविधा प्रदान करने का दायित्व आज तक रेलवे विभाग का ही क्यों माना जा रहा है। क्या सांसदों का कार्य इतना ही है कि वे अपने अपने क्षेत्रों के लिए नई नई रेल लाइनों की ही मांग करते रहें और स्वयं रेलवे के विकास में योगदान देने से बचते रहें इस दृष्टि से रेल मंत्री के इस विचार का स्वागत किया जाना चाहिए। रेल मंत्री ने एक नया विचार सांसदों के सम्मुख प्रस्तुत किया है। कम से कम वे सांसद जिन की पूरी सांसद निधि का उपयोग नहीं हो पा रहा है वे तो इस दिशा में विचार कर ही सकते हैं। इसमें उनके क्षेत्र को भी लाभ होगा ही इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। रेल मंत्री ने लंबे समय को ध्यान में रखते हुए दूरगामी योजनाएं जनता के सामने रखीं हैं उनके फलीभूत होने का इंतजार तो किया ही जाना चाहिए।

 

(पीआईबी फीचर)
ईमेल: – featuresunit@gmail.com
himalaya@nic.in

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20-30 रु. में स्वादिष्ट खाना मिलता है बेंगलुरू में

20-30 रुपये खाने की ऐसी थाली जो स्वादिष्ट भी हो और पौष्टिक भी हो, शायद आज के समय हम-आप इसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं। तेजी से बढ़ती महंगाई का सबसे ज्यादा असर खाने-पीने और स्वास्थ्य के क्षेत्र पर काफी पड़ा है। इस वजह से अगर स्वादिष्ट और पौष्टिक खाना चाहिए तो कम से कम 50 रुपये तो जेब ढीली करनी पड़ती है।
 
ऐसे में गरीब-मजदूर वर्ग के लिए रोड किनारे लगी रेहड़ी, ढाबों आदि के अलावा खाने का सस्ता कोई और विकल्प नहीं था। लेकिन, गुड़गांव स्थित रेस्ट्रॉन्ट जनता मील्स 20-30 रुपये में स्वादिष्ट और पौष्टिक आहारों वाली थाली बेचकर अविश्वसनीय कारनामा अंजाम दे रहा है।
 
 
इस कंपनी की शुरुआत मई 2013 में हुई थी। इस का लक्ष्य गरीब वर्ग जो रेहड़ियों, ढाबा, छोटे रेस्ट्रॉन्ट या घर के पके खाने पर निर्भर रहते हैं, को 20-30 के हिसाब से सस्ता, साफ और पोषक खाना उपलब्ध करवाना है।
 
इस तरह का रेस्ट्रॉन्ट खोलने का विचार जेसी वान डे जैंड के भारत आने और जनता मील्स में निवेश करने वाले प्रभात अग्रवाल से उनकी मुलाकात के बाद आया था। जैंड अपनी कंपनी एन्विउ जो इन्कयुबेटर बनाती है, के प्रसार के लिए भारत आए थे। वह सोशल सेक्टर में किसी स्टार्टअप्स की तलाश में थे लेकिन अग्रवाल से मुलाकात के बाद उन्होंने अपना बिजनस ट्रैक बदलने और खाने का बिजनस शुरू करने का निर्णय किया।
 
बहुत ही कम समय में जनता मील्स ने काफी तरक्की की है। अभी दिल्ली, मानेसर और गुड़गांव में इसके कुल 25 आउटलेट्स हैं जिनमें 8 से 16 सीटें होती हैं। इस रेस्ट्रॉन्ट का खाना सेंट्रल किचन में तैयार किया जाता है जो पूरे भारत में स्कूल लॉन्च प्रोग्राम चलाने वाली एनजीओ अक्षय पत्रा की संपत्ति है।
 
अग्रवाल ने बताया, 'हमारा टारगेट सेगमेंट गुड़गांव में रहने वाले करीब 10 लाख और दिल्ली एनसीआर में रहने वाले एक करोड़ या उससे ज्यादा लोग हैं।' कंपनी खाना सप्लाई का काम भी करती है और ज्यादातर सप्लाई गारमेंट फैक्ट्रियों, एनजीओ, झुग्गी-झोपड़ियों में चलने वाले स्कूल और इसके सेंट्रल किचन से नजदीक एक बड़े निर्माण स्थल पर की जाती है।
 
अग्रवाल ने बताया, 'हमारा खाना दो स्थानों पर खाया जाता है, या तो रेस्ट्रॉन्ट के अंदर या लोग अपने स्थान पर ले जाकर खाते हैं। इस व्यवस्था से हमारे टारगेट सेगमेंट को पोषक खाना मिल पाता है।'
साभार- इकॉनामिक टाईम्स से 

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इंडिया रनवे वीक सीजन 4 के लिए फैशनिस्‍टा और आईएफएफडी एक साथ

शिक्षा के नजरिये से फैशन हमेशा युवाओं के लिए उत्‍सुकता और सृजनात्‍मकता का विषय रहा है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां कोई भी अपनी कल्‍पनाशक्ति से एक अलग मुकाम हासिल कर सकता है, यह रोजगार के लिए बेहतर विकल्‍प भी है। फैशनिस्‍टा स्‍कूल ऑफ फैशन टेक्‍नोलॉजी (फैशनिस्‍टा), नई दिल्‍ली ने इंडियन फेडरेशन फॉर फैशन डेवेलपमेंट (आईएफएफडी) के सहयोग से इंडियन रनवे वीक (आईआरडब्‍ल्‍यू) सीजन 4 – समर एडीशन 2015 में हिस्‍सा लिया है, यह फैशन की शिक्षा और फैशन के व्‍यापार को के प्रति लोगों के नजरिये को प्रोत्‍साहित करने के लिए है।

फैशन के क्षेत्र में युवा प्रतिभाओं को प्रोत्‍साहित करने के लिए फैशनिस्‍टा और आईएफएफडी मिलकर आईआरडब्‍ल्‍यू में एक फैशन शो का आयोजन 10 अप्रैल से 12 अप्रैल 2015 तक, होटल ओप्‍यूलेंट, छतरपुर नई दिल्‍ली में करेंगे।

फैशन, जैसा कि हम सभी जानते हैं यह रचनात्‍मकता और विचारों की स्‍वतंत्रता को बयां करता है। लेकिन सफल व्यवसाय को चलाने के लिए एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। इस फैशन वीक में फैशन के व्‍यापार के बारे में – सही विचार के साथ उत्‍पादों के सही प्रदर्शन और बेहतर उत्‍पाद को आगे लाने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी जायेगी, जिससे प्रतिभा लोगों के सामने आये।

इस फैशन वीक के दौरान छात्र यह सीखेंगे कि किस तरह से घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय खरीदारों और डिजाइनरों के साथ एक बेहतर तालमेल बैठता है और कैसे डिजाइनर उपभोक्‍ताओं की मांग पूरा करने में सफल होते हैं। इसके अलावा छात्र यह सीखेंगे कि इस उद्योग में अपनी छवि को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।
फैशनिस्‍टा के प्रबंध संचालक, नीतू पवन मनीकटालिया के अनुसार, ''इंडिया रनवे वीक डिजाइनरों और फैशन के छात्रों को फैशन के बारे में सीखने और समझने के लिए एक अच्‍छा मंच है। इसमें उनको उनके खुद के अनुभव के साथ स्‍पष्‍ट जानकारी मिल जायेगी''

आईएफएफडी के संस्‍थापक अविनाश ने बताया, फैशन और शिक्षा के बीच यह सहयोग भारतीय युवा फैशन विरादरी के बीच जानकारी बांटने का एकीकृत प्रयास है।''
 

मीडिया संपर्क 

ख्याति मंगलानी

08527413948

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पाकिस्तान जाकर कैसी भाषा बोलते हैं नसीरुद्दीन शाह

पाकिस्तान के तमाम अखबारों और न्यूज पोर्टल्स में बॉलिवुड ऐक्टर नसीरुद्दीन का वह इंटरव्यू छाया हुआ है, जिसमें उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान की इमेज दुश्मन देश के रूप में बनाने के लिए भारत में ब्रेन वॉशिंग हो रही है। नसीरुद्दीन के हवाले से यह भी लिखा गया है कि भारत में तो अक्सर पाक कलाकारो का विरोध होता है, मगर पाकिस्तान हमारा बाहें खोलकर स्वागत करता है।
 
पाकिस्तान के अंग्रेजी अखबार 'ट्रिब्यून' ने लिखा है, 'पाकिस्तान के सफल दौरे के बाद भारत लौटे दिग्गज बॉलिवुड ऐक्टर नसीरुद्दीन शाह ने इस बात को लेकर चिंता जताई है कि उनके देश में पाकिस्तान के प्रति नफरत बढ़ रही है।' पाक के अन्य बड़े अखबारों और टीवी चैनलों की वेबसाइट्स पर भी ऐसा ही जिक्र किया गया है। दरअसल नसीरुद्दीन ने ये बातें एंटरटेनमेंट वेबसाइट 'बॉलिवुड हंगामा' को दिए इंटरव्यू के दौरान कही थीं।
 
नसीरुद्दीन शाह फरवरी में अपनी किताब 'ऐंड देन वन डे: अ मेम्वार' के प्रमोशन के लिए पाकिस्तान में थे। इस दौरान उन्होंने लाहौर लिटररी फेस्टिवल में शिरकत की थी। उन्होंने कराची आर्ट काउंसिल में एक थिएटर वर्कशॉप का भी आयोजन किया था। वहां से लौटने के बाद दिए इंटरव्यू में शाह ने कहा है, 'यह दुखद है कि अक्सर पाकिस्तान के कलाकारों को देश में परफॉर्म करने से रोका जाता है। हाल ही में बड़ी बुरी घटना घटी, जब अहमदाबाद में पाकिस्तानी आर्टिस्ट की कलाकृतियों को नुकसान पहुंचाया गया। मगर पाकिस्तान में तो हमारा बांहें फैलाकर स्वागत किया जाता है।'
 
ऐसे ही एक सवाल के जवाब में शाह ने कहा, 'मैं पाकिस्तान जाता रहता हूं। मुझे लगता है कि लोगों में संपर्क बना रहना चाहिए, क्योंकि राजनेता तो जरूरत पड़ने पर रंग बदल लेंगे। भारतीयों की ब्रेन वॉशिंग हो रही है कि पाकिस्तान एक दुश्मन देश है। उन्हें यह नहीं बताया जा रहा है कि इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या रही है।'
 
शाह ने राजनीतिक गतिरोध को खत्म करते हुए रिश्ते जोड़ने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा, 'रिश्ते जुड़ने चाहिए। इस बात का मेरे मुस्लिम होने से कोई नाता नहीं है। पाकिस्तान के खिलाफ नफरत से हमें मिलता क्या है? यह तो एक तरह से दादागीरी करने जैसा है। आखिर वे हमारे पड़ोसी ही तो हैं।'
 
नसीरुद्दीन शाह ने कहा, 'जब मैं पाकिस्तान जाता हूं, तो सुनता हूं कि वहां से 25 फीसदी लोग भारत विस्थापित हुए हैं, जबकि यहां से सिर्फ 1 फीसदी वहां गए हैं। मुझे पता चला कि 1947 से पहले कराची में 95 फीसदी लोग सिंधी बोलते थे, लेकिन 1948 में सिर्फ 2 फीसदी लोग सिंधी बोलने वाले बचे। यह जानकर बहुत अफसोस हुआ।'
 
पाकिस्तान में भारतीयों के लिए प्यार का जिक्र करते हुए नसीरुद्दीन शाह ने कहा, 'दोनों देशों के बीच जो दूरी है, वह राजनीतिक है। यह खत्म होनी चाहिए। यह दूरी तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक हम वहां के लोगों से बात नहीं करेंगे। भारत ने जो कुछ हासिल किया है, उसके प्रति पाकिस्तान में बड़ी जिज्ञासा और इज्जत है।'
 
नसीरुद्दीन ने इंटरव्यू में कहा है, 'पाकिस्तान में वे मुझे बहुत प्यार करते हैं। वे सलमान और शाहरुख खान जैसे स्टार्स के दीवाने हैं, मगर मेरे, ओम पुरी और फारूख शेख जैसे ऐक्टर्स को भी वे प्यार करते हैं। मुझे पाकिस्तान में बहुत स्पेशल महसूस होता है। मुझे अपनी किताब को लेकर पाकिस्तान में जैसे शानदार रेस्पॉन्स की उम्मीद थी, वैसी उम्मीद मुझे अपने यहां भारत में नहीं थी।'
 
 
साभार- एक्सप्रेस ट्रिब्यून से 

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भाषाई सद्भावना के लिए काम रही मीडिया विमर्शः बृजमोहन

गुजराती पत्रकारिता विशेषांक का विमोचन

रायपुर। भारतीय नववर्ष के उपलक्ष्य में छत्तीसगढ़ प्रदेश के कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने अपने निवास पर जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित पत्रिका “मीडिया विमर्श” के गुजराती पत्रकारिता विशेषांक का विमोचन किया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर, पत्रिका के प्रबंध सम्पादक प्रभात मिश्र, संपादक मंडल की सदस्य डॉ सुभद्रा राठौर,वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी सहित युवा पत्रकार हेमंत पाणिग्राही, बिकास कुमार शर्मा, मनीष शर्मा एवं रोहित साहू उपस्थित थे।

   इस अवसर पर बृजमोहन अग्रवाल उपस्थित जनों को नववर्ष की बधाई देते हुए कहा कि मीडिया विमर्श पत्रिका लगातार मीडिया के विभिन्न विषयों पर सामग्री उपलब्ध करा रही है जो मीडिया से जुड़े लोगों एवं मीडिया छात्रों के लिए बहुत उपयोगी है। भारत में हिंदी भाषा के साथ साथ समस्त क्षेत्रीय भाषाओँ एवं स्थानीय बोलियों का अपना अलग महत्त्व है,हमें सभी भाषाओं समृद्ध करने की दिशा में कार्य करना चाहिये।मीडिया विमर्श का प्रयास इस दिशा में सराहनीय है। उन्होंने कहा कि उर्दू पत्रकारिता के बाद पत्रिका ने गुजराती पत्रकारिता का विशेषांक प्रकाशित है। इससे देश में भाषाई सद् भाव पैदा होगा और भारतीय भाषाओं में अंतरसंवाद भी होगा। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाएं मातृभाषाएं भी हैं इसलिए इनके लिए आपसी संवाद के क्षेत्र तलाशे जाने चाहिए।

    पत्रिका के प्रबंध सम्पादक प्रभात मिश्र ने इस विशेषांक के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि हिंदी पत्राकारिता के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय भाषायी पत्रकारिता पर भी मीडिया विमर्श सामग्री उपलब्ध करा रही है। पत्रिका अपने प्रकाशन का एक दशक जल्द ही पूरा करने जा रही है। पत्रकार श्री रमेश नैयर ने कहा कि पत्रिका सही मायने में मीडियाकर्मियों के आत्मचिंतन और आत्ममंथन का मंच बन गयी है, इसका हर अंक संग्रहणीय और पठनीय है,साथ ही विमर्श के नए द्वार खोलता है।

क्या है गुजराती पत्रकारिता अंक मेः
    मीडिया विमर्श के गुजराती पत्रकारिता पर आए विशेषांक में समूची गुजराती पत्रकारिता पर पठनीय और संग्रहणीय सामग्री है। गुजराती पत्रकारिता के दिग्गज पत्रकारों के अलावा अन्य मीडिया विशेषज्ञों ने गुजराती पत्रकारिता पर अपनी कलम चलाई है। गुजराती पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों, टेलीविजन चैनल्स, वेब मीडिया के साथ ही गुजराती फिल्मों के संबंध में भी मीडिया विमर्श का यह अंक महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है। इसमें शशिकांत वसानी, पिंकी दलाल, भगवती कुमार शर्मा, मनीष मेहता, किरीट गणात्रा, कौशिक मेहता, काना बाटवा, डा.महेश परिमल और आशीष जोशी के साक्षात्कार प्रकाशित किए गए हैं। खण्ड ‘नया दौर, नई चुनौतियां’ के अंतर्गत शैलेष रावल, पिंकी दलाल, कुलवंत हैप्पी, जयेश चितलिया, अर्चना गुसाणी, तुषार त्रिवेदी, विक्रम वकील, जयेश ठकरार और डॉ. यासीन दलाल के लेख प्रकाशित हैं। स्वर्णिम अध्याय खण्ड में कमल शर्मा, कौशिक मेहता, डॉ. किषोर दवे और बादल पंड्या के लेख शामिल हैं। अजय नायक, हिमांशु किकाणी और कल्याणी देशमुख ने गुजरात की वेब पत्रकारिता को रेखांकित किया है।
 
संपर्क
– संजय द्विवेदी, 
अध्यक्षः जनसंचार विभाग,
 माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, 
प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल-462011 (मप्र)
मोबाइलः 09893598888
http://sanjayubach.blogspot.com/
http://sanjaydwivedi.com/

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कश्मीरी पंडितों का अपमान करने के बाद उनके नाम फिल्म समर्पित कर दी

"हैदर" के लिए पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल करने वाले निर्माता-निर्देशक विशाल भारद्वाज ने इन्हें कश्मीरी पंडितों को समर्पित करने की घोषणा की है। हालांकि, उनकी इस घोषणा पर विवाद हो गया है। वरिष्ठ अभिनेता अनुपम खेर और फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सदस्य अशोक पंडित ने विशाल की मंशा पर सवाल उठाया है।

अनुपम खेर ने इसे कश्मीरी पंडितों के साथ धोखाधड़ी करार दिया है। उन्होंने कहा कि विशाल को राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के लिए मैं बधाई देता हूं, लेकिन उन पुरस्कारों को कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को समर्पित करना धोखाधड़ी है। उन्होंने पूछा कि कश्मीरी पंडितों के पलायन पर विशाल ने कब सवाल उठाया था? दरअसल, हमारे मंदिर में शैतानी नृत्य कर वे हमें अपमानित कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि "हैदर" विलियम शेक्सपीयर के नाटक "हैमलेट" का फिल्मी रूपांतरण है। इसे कश्मीरी आतंकवाद की पृष्ठभूमि में फिल्माया गया है। निर्माता-निर्देशक विशाल भारद्वाज पर फिल्म में इस समस्या का एक ही पक्ष दिखाने का आरोप है। इसको लेकर विशाल का कहना है कि कश्मीरी पंडितों की समस्या बहुत बड़ी है। इसे कुछ दृश्यों में नहीं समेटा जा सकता। इस मसले पर एक पूरी की पूरी फिल्म ही बनाई जानी चाहिए। इसलिए मैंने अपने सभी राष्ट्रीय पुरस्कार कश्मीरी पंडितों को समर्पित करने का फैसला किया है।

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