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मुस्लिम मानसः बात निकली है तो दूर तलक जाएगी

 संवाद के अवसर हों, तो बातें निकलती हैं और दूर तलक जाती हैं। मुस्लिम समाज की बात हो तो हम काफी संकोच और पूर्वग्रहों से घिर ही जाते हैं। हैदराबाद स्थित मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूर्निवर्सिटी में पिछली 17 और 18 मार्च को ‘मुस्लिम, मीडिया और लोकतंत्र’ विषय पर हुए सेमीनार के लिए हमें इस संस्था का आभारी होना चाहिए कि उसने इस बहाने न सिर्फ सोचने के लिए नए विषय दिए बल्कि यह अहसास भी कराया कि भारत-पाकिस्तान की सामूहिक इच्छाएं शांति से जीने और साथ रहने की हैं।

    भारत और पाकिस्तान के लगभग तीस महत्वपूर्ण पत्रकारों, 20 से अधिक मीडिया अध्यापकों की मौजूदगी ने इस सेमीनार को जहां सफल बनाया। वहीं लार्ड मेघनाद देसाई, एन.राम, वैदप्रताप वैदिक, नजम सेठी, शेखर गुप्ता, राजदीप सरदेसाई, स्वपनदास गुप्ता, सीमा मुस्तफा, जफर आगा, विनोद शर्मा, शाहिद सिद्दीकी, सतीश जैकब, सैय्यद फैसल अली, कमाल खान, अंजुम राजाबली, हिलाल अहमद, शेषाद्रि चारी, किंशुक नाग,कुमार केतकर, जावेद नकवी, अकू श्रीवास्तव, मासूम मुरादाबादी, तहसीन मुनव्वर, अबदुस्स सलाम असिम जैसे पत्रकारों- बुद्धिजीवियों की मौजूदगी ने इस आयोजन में विमर्श के नए सूत्र दिए। पाकिस्तान से आए तीन पत्रकारों नजम सेठी, महमल सरफराज और इम्तियाज आलम के भाषणों से साफ पता चलता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ आम लोगों में खासा आक्रोश है और वे इस खूनी खेल से तंग से हैं। भारत के लोगों के संदेश देते हुए इनका साफ कहना था कि वे चाहें तो पाकिस्तान जैसे हो जाएं पर इससे उनकी जिंदगी नरक हो जाएगी। इन पत्रकारों का मानना था कि पिछले छः दशक तक वे जिस रास्ते पर चले हैं वह गलत है और मजहब और राजनीति के घालमेल से हालात बदतर ही हुए हैं।  
 
उर्दू और पापुलर कल्चरः
  हिंदुस्तानी मुसलमानों की मीडिया में उपस्थिति और उनकी प्रक्षेपित की जा रही छवि भी चर्चा के केंद्र में रही। वैश्विक मीडिया में मुसलमानों को लेकर जो कुछ बताया और छपाया जा रहा है उस पर काफी बातें हुयीं। आमतौर पर रूझान यही रहा कि जो कहा और बताया जा रहा है उसमें पूरा सच नहीं है। राजदीप सरदेसाई और कमाल खान के संयुक्त संचालन में हुए मीडिया कान्क्लेव में यह बातें उभरकर सामने आई कि मुसलमानों को इन सवालों पर सोचने और आत्ममंथन करने की जरूरत है। यदि वे अपने अंदर झांककर खुद को नहीं बदलते हैं तो यह छवि तोड़नी मुश्किल है। मुस्लिम मानस की चिंताओं के साथ वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने उर्दू की भी बात छेड़ी। उनका कहना था कि हिंदुस्तान में पापुलर कल्चर को उर्दू ने ही जिंदा रखा है। उन्होंने कहा वैश्विक आतंकवाद का चेहरा फिल्मों में भी दिख रहा है, इससे मुस्लिम समाज को जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा भारत की परिस्थितियां अलग हैं। यहां लोकतंत्र है और लोग अपने हकों के लिए आगे आ सकते हैं। अरब देशों से आतंकवादी अधिक इसलिए निकलते हैं क्योंकि वहां पर विरोध करने के अवसर नहीं हैं। इसलिए विरोध आतंकवाद की शक्ल में ही सामने आता है। उनका मानना था कि इस्लामोफोबिया से भारतीय मीडिया को बचाने की जरूरत है। मीडिया और मीडिया शिक्षण से जुड़े लोगों ने इस मौके पर भारतीय उपमहाद्वीप में उपस्थित चुनौतियों पर लंबी बातचीत की। उर्दू और उसकी समस्याओं पर भी चर्चा की।

अलग नहीं हैं मुसलमानों की चिंताएः
   मुस्लिम राजनीति के संकट वस्तुतः भारतीय राजनीति और समाज के ही संकट हैं। उनकी चुनौतियां कम या ज्यादा गंभीर हो सकती हैं, पर वे शेष भारतीय समाज के संकटों से जरा भी अलग नहीं है। सही अर्थों में पूरी भारतीय राजनीति का चरित्र ही कमोबेश भावनात्मक एवं तात्कालिक महत्व के मुद्दों के इर्द-गर्द नचाता रहा है। आम जनता का दर्द, उनकी आकांक्षाएं और बेहतरी कभी भारतीय राजनीति के विमर्श के केंद्र में नहीं रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति का यह सामूहिक चरित्र है, अतएव इसे हिंदू, मुस्लिम या दलित राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने को कोई अर्थ नहीं है और शायद इसलिए‘जनता का एजेंडा’ किसी की राजनीति का एजेंडा नहीं है। यह अकारण नहीं है कि मंडल और मंदिर के भावनात्मक सवालों पर आंदोलित हो उठने वाला हमारा राजनीतिक समाज बेरोजगारी के भयावह प्रश्न पर एक देशव्यापी आंदोलन चलाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। इसलिए मुस्लिम नेताओं पर यह आरोप तो आसानी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कौम को आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ा बनाए रखा, लेकिन क्या यही बात अन्य वर्गों की राजनीति कर रहे लोगों तथा मुख्यधारा की राजनीति करने वालों पर लागू नहीं होती ? बेरोजगारी, अशिक्षा, अंधविश्वास, गंदगी, पेयजल ये समूचे भारतीय समाज के संकट हैं और यह भी सही है कि हमारी राजनीति के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक परिवेश में आश्चर्यजनक ही है। देश की मुस्लिम राजनीति का एजेंडा भी हमारी मुख्यधारा की राजनीति से ही परिचालित होता है। जाहिर है मूल प्रश्नों से भटकाव और भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द समूची राजनीति का ताना बुना जाता है।

बंटवारे के भावनात्मक प्रभावों से मुक्त होः
   सही अर्थों में भारतीय मुसलमान अभी भी बंटवारे के भावनात्मक प्रभावों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। पड़ोसी देश की हरकतें बराबर उनमें भय और असुरक्षाबोध का भाव भरती रहती हैं। लेकिन आजादी के साढ़े छः दशक बीत जाने के बाद अब उनमें यह भरोसा जगने लगा है कि भारत में रुकने का उनका फैसला जायज था। इसके बावजूद भी कहीं अन्तर्मन में बंटवारे की भयावह त्रासदी के चित्र अंकित हैं। भारत में गैर मुस्लिमों के साथ उनके संबंधों की जो ‘जिन्नावादी असहजता’ है, उस पर उन्हें लगातार ‘भारतवादी’ होने का मुलम्मा चढ़ाए रखना होता है। दूसरी ओर पाकिस्तान और पाकिस्तानी मुसलमानों से अपने रिश्तों के प्रति लगातार असहजता प्रकट करनी पड़ती है। मुस्लिम राजनीति का यह वैचारिक द्वंद्व बहुत त्रासद है। आप देखें तो हिंदुस्तान के हर मुसलमान नेता को एक ढोंग रचना पड़ता है।

  एक तरफ तो वह स्वयं को अपने समाज के बीच अपनी कौम और उसके प्रतीकों का रक्षक बताता है, वहीं दूसरी ओर उसे अपने राजनीतिक मंच (पार्टी) पर भारतीय राष्ट्र राज्य के साथ अपनी प्रतिबद्धता का स्वांग रचना पड़ता है। समूचे भारतीय समाज की स्वीकृति पाने के लिए सही अर्थों में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। फिलवक्त की राजनीति में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। आज की राजनीति में तो ऐसा संभव नहीं दिखता । भारतीय समाज में ही नहीं,हर समाज में सुधारवादी और परंपरावादियों का संघर्ष चलता रहा है। मुस्लिम समाज में भी ऐसी बहसे चलती रही हैं। इस्लाम के भीतर एक ऐसा तबका पैदा हुआ, जिसे लगता था कि हिंदुत्व के चलते इस्लाम भ्रष्ट और अपवित्र होता जा रहा है। वहीं मीर तकी मीर,नजीर अकबरवादी, अब्दुर्रहीम खानखाना, रसखान की भी परंपरा देखने को मिलती है। हिंदुस्तान का आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर एक शायर था और उसे सारे भारतीय समाज में आदर प्राप्त था। एक तरफ औरंगजेब था तो दूसरी तरफ उसका बड़ा भाई दारा शिकोह भी था, जिसनें ‘उपनिषद्’ का फारसी में अनुवाद किया। इसलिए यह सोचना कि आज कट्टरता बढ़ी है, संवाद के अवसर घटे हैं-गलत है। आक्रामकता अकबर के समय में भी थी, आज भी है। यही बात हिंदुत्व के संदर्भ में भी उतनी ही सच है।

जरूरी है संवाद और सांस्कृतिक आवाजाहीः
      वीर सावरकर और गांधी दोनों की उपस्थिति के बावजूद लोग गांधी का नेतृत्व स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन इसके विपरीत मुस्लिमों का नेतृत्व मौलाना आजाद के बजाए जिन्ना के हाथ में आ जाता है। इतिहास के ये पृष्ठ हमें सचेत करते हैं। यहां यह बात रेखांकित किए जाने योग्य है कि अल्पसंख्यक अपनी परंपरा एवं विरासत के प्रति बड़े चैतन्य होते हैं। वे चाहते हैं कि कम होने के नाते कहीं उनकी उपेक्षा न हो जाए । यह भयग्रंथि उन्हें एकजुट भी रखती है। अतएव वे भावनात्मक नारेबाजियों से जल्दी प्रभावित होते हैं। सो उनके बीच राजनीति प्रायः इन्हीं आधारों पर होती है। यह अकारण नहीं था कि नमाज न पढ़ने वाले मोहम्मद अली जिन्ना, जो नेहरू से भी ज्यादा अंग्रेज थे,मुस्लिमों के बीच आधार बनाने के लिए कट्टर हो गए ।

      मुस्लिम राजनीति वास्तव में आज एक खासे द्वंद में हैं, जहां उसके पास नेतृत्व का संकट है । आजादी के बाद 1964 तक पं. नेहरु मुसलमानों के निर्विवादित नेता रहे । सच देखें तो उनके बाद मुसलमान किसी पर भरोसा नहीं कर पाया और जब किया तब ठगा गया । बाबरी मस्जिद काण्ड के बाद मुस्लिम समाज की दिशा काफी बदली है । बड़बोले राजनेताओं को समाज ने हाशिए पर लगा दिया है। मुस्लिम समाज में अब राजनीति के अलावा सामाजिक, आर्थिक, समाज सुधार, शिक्षा जैसे सवालों पर बातचीत शुरु हो गई है । सतह पर दिख रहा मुस्लिम राजनीति का यह ठंडापन एक परिपक्वता का अहसास कराता है।मुस्लिम समाज में वैचारिक बदलाव की यह हवा जितनी ते होगी, समाज उतना ही प्रगति करता दिखेगा । एक सांस्कृतिक आवाजाही, सांस्कृतिक सहजीविता ही इस संकट का अंत है।जाहिर है इसके लिए नेतृत्व का पढ़ा, लिखा और समझदार होना जरुरी है । नए जमाने की हवा से ताल मिलाकर यदि देश का मुस्लिम अपने ही बनाए अंधेरों को चीरकर आगे आ रहा है तो भविष्य उसका स्वागत ही करेगा । हैदराबाद में हुयी बातचीत मुसलमान, उर्दू के इर्द-गिर्द जरूर हुयी पर उसने एक बहस शुरू की है जिसमें हिंदुस्तानी मुसलमान की उम्मीदें दिखती हैं और यही उनके बेहतर भविष्य और सार्थक लोकतंत्र की राह बनाएगी।

(लेखक मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं)

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बारहवीं के बाद पत्राचार कोर्स की राहों पर एक नज़र

आजकल अक्सर बारहवीं के बाद क्या किया जाए जैसे प्रश्न पर चर्चा की जाती है।आज ही इस कालम के लेखक ने एक करियर मार्गदर्शन कार्यशाला में मुख्य वक्त के रूप में सहभागिता की। वहां भी दसवीं और बारहवीं के बाद की पढ़ाई पर बेहद कारगर बातें की गईं।  करियर बारे में नवीनतम जानकारी के साथ गति बनाए रखना वास्तव में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।विशेषकर पत्राचार पाठ्यक्रमों को लेकर जागरूकता का अभाव है। स्मरण रहे कि पत्राचार शिक्षा ने, देश की शिक्षा-प्रणाली में एक आश्चर्यजनक परिवर्तन ला दिया है। यह अनुमान लगाया जाता है कि आने वाले समय में परम्परागत अध्यापन के अध्यापक उपग्रह संचार, लो पावर ट्रांसमीटर्स की सहायता से और सूचना सुपर-हाइवेज़ के माध्यम से देश भर की शिक्षा का लाइव प्रदर्शन कर सकेंगे। इस संबंध में शुरूआत हो चुकी है। 

उल्लेखनीय है कि हमारे देश में कई खुले विश्वविद्यालय तथा नियमित विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थाएं दूरस्थ यानी पत्राचार अध्ययन कार्यक्रम चलाते हैं। दूरस्थ शिक्षा पद्धत्ति कई श्रेणियों के शिक्षार्थियों को लाभ प्रदान कर रही है। खुले विश्वविद्यालय ऐसे लचीले पाठ्यक्रम विकल्प देते हैं, जिन्हें वे प्रवेशार्थी ले सकते हैं जिनके पास कोई औपचारिक योग्यता नहीं है किंतु अपेक्षित आयु के हो चुके हैं और लिखित प्रवेश परीक्षा भी उत्तीर्ण कर चुके हैं। ये पाठ्यक्रम छात्र की सुविधानुसार भी लिए जा सकते हैं। विश्वविद्यालयों के दूरस्थ शिक्षा केंद्र न्यूनतम पात्रता रखने वाले उम्मीदवारों को प्रवेश देते हैं। 

अधिकांश अध्यापन-अध्ययन प्रक्रिया में मुद्रित अध्ययन सामग्री तथा नोडल केंद्रों पर मल्टीमीडिया सुविधा सेट-अप या दूरदर्शन अथवा रेडियो नेटवर्क के माध्यम से अध्यापन शामिल होता है। ये विश्वविद्यालय स्नातक पाठ्यक्रम, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम, एम.फिल, पी.एच.डी. तथा डिप्लोमा एवं प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम भी चलाते हैं, जिनमें से अधिकांश पाठ्यक्रम भविष्य उन्मुखी होते हैं।

निम्नलिखित संस्थाएं पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से शिक्षार्थियों को लाभान्वित कर रही हैं –

खुले विश्वविद्यालय
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1. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय, मैदान गढ़ी, नई दिल्ली

2. डॉ. बी.आर. आंबेडकर खुला विश्वविद्यालय, (बीआरएओयू) हैदराबाद, आंध्र प्रदेश

3. वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय (वी.एम.ओ.यू.), कोटा, राजस्थान, रावतभाटा रोड, अखेलगढ़, कोटा राजस्थान 

4. नालंदा खुला विश्वविद्यालय (एन.ओ.यू), पटना, बिहार, तीसरी मंजिल, बिस्कोमॉन भवन, पश्चिम गांधी मैदान, पटना

5. यशवंतराव चौहान महाराष्ट्र खुला विश्वविद्यालय (वाईसीएमओयू), नाशिक, महाराष्ट्र

6. मध्य प्रदेश भोज खुला विश्वविद्यालय (एम.पी.बी.ओ.यू.) भोपाल, म.प्र. 

7. डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर खुला विश्वविद्यालय (बीएओयू), अहमदाबाद, गुजरात 

8. कर्नाटक राज्य खुला विश्वविद्यालय (के.एस.ओ.यू.) मैसूर, कर्नाटक

9. नेताजी सुभाष खुला विश्वविद्यालय (एन.एस.ओ.यू.), कोलकाता

10. उ.प्र. राजश्री टंडन खुला विश्वविद्यालय (यूपीआरटीओयू), इलाहाबाद, उ.प्र. 

11. तमिलनाडु खुला विश्वविद्यालय (टी.एन.ओ.यू.), चेन्नै, तमिलनाडु

12. पंडित सुंदरलाल शर्मा खुला विश्वविद्यालय (पीएसएसओयू), बिलासपुर, छत्तीसगढ़ विहार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

13. उत्तरांचल खुला विश्वविद्यालय, हल्द्वानी, (नैनीताल), उत्तरांचल – सौरभ माउंट व्यू के पास, भोटिया पड़ाव, हल्द्वानी, नैनीताल

14. के.के. हैंडकि, राज्य विश्वविद्यालय, गुवाहाटी, असम

दूरस्थ शिक्षा राज्य विश्वविद्यालय
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1. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आं.प्र. 
2. काकतिया विश्वविद्यालय, वरंगल, आं.प्र. 
3. उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आं.प्र. 
4. पोट्टी श्रीरामुलु तेलुगु विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आं.प्र. 
5. श्री कृष्णदेवराया विश्वविद्यालय, अनंतपुर, आं.प्र. 
6. श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, आं.प्र. 
7. नलसार विधि विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आं.प्र. 
8. नागार्जुन विश्वविद्यालय, नागार्जुन नगर, आं.प्र. 
09. बंगलौर विश्वविद्यालय, बंगलौर, कर्नाटक
10. कन्नड विश्वविद्यालय, हम्पी, कर्नाटक
11. गुलबर्गा विश्वविद्यालय, गुलबर्गा, कर्नाटक
12. मैंगलोर विश्वविद्यालय, मंगलागंगोत्री, कर्नाटक
13. कुवेम्पु विश्वविद्यालय, शंकरागट्टा, कर्नाटक
14. मैसूर विश्वविद्यालय, मैसूर, कर्नाटक
15. गोवा विश्वविद्यालय, गोवा
16. डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय, डिब्रूगढ़, असम
17. गौहाटी विश्वविद्यालय, गुवाहाटी, असम
18. बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार
19. ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, बिहार
20. पटना विश्वविद्यालय, पटना, बिहार
21. तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार
22. उड़ीसा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, उड़ीसा
23. सम्बलपुर विश्वविद्यालय, सम्बलपुर, उड़ीसा
24. बरहामपुर विश्वविद्यालय, बरहामपुर, उड़ीसा
25. उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, उड़ीसा
26. फकीर मोहन विश्वविद्यालय, बालासोर, ओडि़शा
27. नार्थ उड़ीसा विश्वविद्यालय, मयूरभंज, ओडि़शा
28. त्रिपुरा विश्वविद्यालय, त्रिपुरा
29. बर्दवान विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल
30. विद्यासागर विश्वविद्यालय, मिदनापुर, पश्चिम बंगाल
31. जादवपुर विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल
32. रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
33. कल्याणी विश्वविद्यालय, जिला-नाडिया, पश्चिम बंगाल
34. गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा
35. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र, हरियाणा
36. एम.डी. विश्वविद्यालय, रोहतक, हरियाणा
37. एच.पी. विश्वविद्यालय, शिमला, (हि.प्र) 
38. जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू-कश्मीर
39. कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर
40. पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, पंजाब
41. पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला पंजाब
42. गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब
43. जी.बी.पंत विश्वविद्यालय, पंतनगर, उत्तरांचल
44. कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल, उत्तरांचल
45. बी.आर. आम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा, उ.प्र. 
46. लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, उ.प्र. 
47. गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
48. अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, म.प्र. 
49. बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, इंदौर, म.प्र. 
50. देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, भोपाल, म.प्र. 
51. डॉ. हरिसिंह गौड़ विश्वविद्यालय, सागर, म.प्र. 
52. जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, म.प्र. 
53. एम.जी. चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट, म.प्र. 
54. रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर, म.प्र. 
55. शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर, म.प्र. 
56. एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, मुंबई, महाराष्ट्र
57. मुंबई विश्वविद्यालय, विद्यानगरी, मुंबई
58. अमरावती विश्वविद्यालय, अमरावती
59. स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, नांदेड, महाराष्ट्र
60. महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, कोट्टयम, केरल
61. कालीकट विश्वविद्यालय, कालीकट, केरल
62. कन्नूर विश्वविद्यालय, काल्लियासेरी, केरल
63. केरल विश्वविद्यालय, त्रिवेंद्रम, केरल
64. अलगप्पा विश्वविद्यालय, कराइकुडी, तमिलनाडु
65. अन्नामलै विश्वविद्यालय, अन्नामलैनगर, तमिलनाडु
66. भरथियार विश्वविद्यालय, कोयम्बत्तूर, तमिलनाडु
67. भारतीदासन विश्वविद्यालय, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
68. मदुरै कामराज विश्वविद्यालय, मदुरै, तमिलनाडु
69. मेननमणियम सुंदरनगर विश्वविद्यालय, तिरुनेलवेली, तमिलनाडु
70. मदर टेरेसा महिला विश्वविद्यालय, कोडईकनाल, तमिलनाडु
71. तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयम्बत्तूर, तमिलनाडु
72. मद्रास विश्वविद्यालय, मद्रास, तमिलनाडु
73. पेरियार विश्वविद्यालय, सलेम, तमिलनाडु
74. तमिलनाडु डॉ. आम्बेडकर विधि विश्वविद्यालय, चेन्नै
पाठ्यक्रम

पत्राचार के माध्यम से डिग्री पाठ्यक्रम 
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•    बी.ए. (लगभग सभी विषय) 
•    बी.ए. (लगभग सभी विषय), बी.कॉम. 
•    एम.ए. (लगभग सभी विषय), एम.एस.सी. (लगभग सभी विषय), एम.कॉम. 
•    बी.बी.ए./बी.बी.एम./बी.बी.एस. 
•    बी.जे.एम.सी, बी.टेक, एम.टेक
•    पर्यटन स्नातक
•    बी.एड., एम.एड
•    बी.एल.आई.एस, एम.एल.आई.एस.v •    बी.बी.ए., एम.बी.ए. 
इन विश्वविद्यालयों द्वारा कई डिप्लोमा पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। 
चलाए जाने वाले कुल डिप्लोमा/प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम निम्नलिखित हैं –

इंजीनियरी से जुडे़ पाठ्यक्रम
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•    शर्करा प्रौद्योगिकी
•    औद्योगिक संरक्षा
•    रसायन प्रसंस्करण, इंस्ट्रूमेंटेशन एवं नियंत्रण
•    अनुप्रयुक्त इलेक्ट्रॉनिकी
•    ऑटोमोबाइल प्रौद्योगिकी

कम्प्यूटर पाठ्यक्रम
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•    कार्यालय प्रबंधन/सेवा हेतु कम्प्यूटर
•    कम्प्यूटर अनुप्रयोग/कम्प्यूटर विज्ञान/कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग
•    कम्प्यूटर प्रणाली

कृषि एवं शिक्षा 
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•    बागवानी
•    उर्वरक प्रौद्योगिकी
•    मार्गदर्शन एवं परामर्श
•    शिशु शिक्षा एवं देखरेख
•    शैक्षिक नियोजन
•    विद्यालय प्रबंधन

व्यावसायिक
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•    सौंदर्य प्रसाधन विज्ञान
•    विज्ञापन
•    टी.वी. मेकेनिक्स
•    चिकित्सा प्रयोगशाला प्रौद्योगिकी
•    निर्माण प्रबंधन
•    बैंकिंग
•    बैंकिंग तथा वित्त में डिप्लोमा

स्वास्थ्य
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•    डाइट थेरेपी
•    खाद्य एवं पोषण
•    औद्योगिक प्रदूषण एवं नियंत्रण
•    औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन
•    पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा
•    समाज पोषण

विधि
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•    सामान्य विधि स्नातक (बी.जी.एल.) 
•    शैक्षिक विधि स्नातक (एलएलबीएके), एलएलएम
•    श्रम विधि में डिप्लोमा
•    कराधान विधि
•    कम्पनी विधि में डिप्लोमा
•    उपभोक्ता परिरक्षण विधि एवं विधि तथा सार्वजनिक सेवा में डिप्लोमा

तो फिर क्या, बस तैयार हो जाइए और अपनी स्थिति व पसंद को ध्यान में रखकर कोई अच्छा सा कोर्स चुन लीजिये। ऊपर दी गई सूची आपकी मदद करेगी। 

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 राजनांदगांव. संपर्क – मो.9301054300 

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जब हम चिड़िया की बात करते हैं

जब हम चिड़िया की बात करते हैं तो हम उम्मीद और प्यार की गर्माहट भरी दुनिया की बात करते हैं। जब हम चिड़िया की बात करते हैं तो एक छोटी और नन्ही उड़ान की बात करते हैं। इस दुनिया में चिड़िया गायब होने लगे तो दुनिया में जरूर एसा कुछ चल रहा है जो इस चिड़िया के लिए मुफीद नहीं है। चिड़ियों का चहचहाना और पेड़ पर उनका कलरव स्मृति के हिस्से हो चले हैं। जब नन्ही चिड़िया को दुनिया जीने नहीं दे रही है तो इंसानों के लिए यह किसी संकट की ही चेतावनी है।

'जब हम चिड़िया की बात करते हैं' पंक्ति मैने कवि विनीत तिवारी की कविता 'जब हम चिड़िया की बात करते हैं' से उधार ली है।

नन्ही गौरेया की किसी भी वातावरण में जीवित बने रहने की अकूत क्षमता होती है। गौरेया का लुप्त होना पर्यावरण के ह्रास और मानव जीवन के लिए खतरे का संकेत है। गौरेया के लुप्त होने के बारे में कई कयास हैं, लेकिन तथ्य यही है कि शहरी इलाकों में मनुष्य के रहन-सहन की बदलती जीवन शैली गौरेया के अनुकूल नहीं है। गौरेया की खास बात यही है कि वह दूसरे पक्षियों की तरह पेड़ के कोटरों के बजाय मानव बसाहटों में अपने लिए घोंसला बनाती है। यही कारण है कि गौरेया अन्य पक्षियों की तुलना में मनुष्य के अधिक नजदीक है। आधुनिक बिल्डिंगों में उन्हें भोजन के लिए छोटे कीड़े-मकोड़े नहीं मिलते हैं। मच्छरनाशक द्रव्यों के अधिक इस्तेमाल से ये कीड़े समाप्त हो चुके हैं, इसी के साथ गौरेया भी कम होती जा रही है। इमारतों में गौरेया के आने-जाने की कोई जगह नहीं होती। खिड़कियों पर एसी लगाकर उन्हें बंद किया जा चुका है। शहरों में गौरेया अक्सर घरों में पंखों, विद्युत मीटर और ट्यूबलाइट के पास अपना घोंसला बनातीं थीं। आज के आधुनिक घरों में उनके घोंसला बनाने की कोई जगह नहीं है। सड़कों पर वाहनों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण और उनसे निकलने वाली विषाक्त गैसों (कार्बन मोनोआक्साइड) ने उन्हें शहरों से दर-बदर कर दिया है। मोबाइल और इंटरनेट की तरंगों के संजाल के कारण भी गौरेया शहरी इलाकों का रुख नहीं करतीं। इंटरनेट को हम पर्यावरण मित्र कहते हैं। आज सभी फेसबुक और व्हाट्सऐप की आभासी दुनिया में इस कदर गाफिल हैं कि उन्होंने इस असल दुनिया के भीतर एक अपनी दुनिया बना ली है। यह दुनिया जिस इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों से चल रही है वही इस चिड़िया की उड़ान में बाधा बन रही है। नतीजतन सालों से मनुष्य के करीब रहती आई गौरेया ने शहर के शोरशराबे से दूर-दराज के इलाकों की ओर रुख कर लिया है।

पिछले 60 साल में जैवविविधता बड़ी तेजी से खत्म हुई है। नन्ही गौरैया का लुप्त होना इसी का सबूत है। घास के बीज गौरेया का प्रमुख भोजन है। बड़े शहरों में घास के मैदान खत्म हो गए तो गौरेया को भोजन मिलना बंद हो गया, जिससे उसने ग्रामीण इलाकों में अपना घर बना लिया। शहरों में बच्चों के लिए घास वाले खेल के मैदान का लुप्त होना और गौरेया का खत्म होना एक ही परिघटना है।

वैसे सेल फोन के आगमन से बहुत पहले ही गौरैया का लुप्त होना शुरू हो गया था। रसैल कारसन ने 1962 में अपनी बहुपठित किताब साइलेंट स्प्रिंग में चेतावनी दे दी थी कि हमारा सभ्य समाज 1939 के बाद से कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग कर रहा है जिससे हम जैव विविधता को नष्ट कर रहे हैं। इससे न केवल नन्हे कीट खत्म हो रहे हैं, पारिस्थितकीय तंत्र की खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो रही है।

गौरेया मोटे किस्म का अनाज, कई प्रकार के फल, घास के फूल-बीज आदि खाती है। इस प्रक्रिया में वह इनके बीज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है इस प्रकार प्रकृति में तमाम स्थानों पर बीज पहुंचते हैं और जैवविविधता और पर्यावरण संतुलन बना रहता है। गौरेया फसलों और पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कई प्रकार के कीड़ों, कृमियों और इल्लियों को भी अपना भोजन बनाती है, इस प्रकार फसलों और पेड़ पौधों का प्राकृतिक कीट नियंत्रण करती है। पारिस्थितिक तंत्र को स्वस्थ्य रखने में गौरेया की अहम भूमिका होती है। खाद्य श्रृंखला में गौरेया, बाज, गिद्ध और कुछ बड़े पक्षियों समेत सांप का प्रमुख भोजन होती है। इस प्रकार से यह खाद्यश्रंखला में दूसरे पायदान पर होती है। यानी यह बीज, फल, कीड़ो आदि को खाकर फिर बड़े पक्षियों का भोजन बनती है इस प्रकार खाद्य श्रंखला की महत्वपूर्ण कड़ी बनती है। यदि गौरेया कम होंगी तो बड़े पक्षियों और सांप को उनका भोजन नहीं मिलेगा और खाद्य श्रृंखला बिगड़ेगी प्राकृतिक असंतुलन पैदा होगा। गौरेया के साथ ही गिद्धों की संख्या में कमी का कारण गौरेया और गिद्ध में यह अंतर्सबंध भी हो सकता है। गौरैया की संख्या में तेजी से गिरावट आई है जिससे और परोक्ष अपरोक्ष रूप से मानव जीवन का अस्तिव भी संकट में है। नन्ही गौरेया का अस्तित्व एक मानवीय और सभ्य दुनिया की आश्वस्ति है, जिसे हर हाल में बचाए रखने की जरूरत है।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से

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​मौत पर भारी मैच …!!​

क्रिकेट का एक मैच यानी हजारों सहूलियत का कैच। बाजार के लिए यह खेल बिल्कुल गाय की तरह है। जो हमेशा देती ही देती है। नाम – दाम और पैसा बस इसी खेल में है। दूसरे खेलों के महारथी जीवन – भर सुख – सुविधाओं का रोना रोते हैं, जबकि यही सुख – सुविधाएं  मानो क्रिकेट खिलाड़ियों के चरण में लोटने को तरसती रहती है। दुनिया के  विकासशील देशों में क्रिकेट आम – आदमी से लेकर महान हस्तियों यहां तक कि प्रधानमंत्री जैसे पद पर रहने वालों को सीधे प्रभावित करता है।  तो इसकी सबसे बड़ी सुविधा यह है कि घंटों करते रहिए मैच के हर कोण का पोस्टमार्टम। जीते तो भी हारे तो भी। मैच हारे तो हार की लाश के पोस्टमार्टम के बहाने घंटों खींच सकते हैं। और यदि जीत गए तो फिर कई दिनों की बल्ले – बल्ले।  

मैच जिताऊ  क्रिकेट खिलाड़ियों को असाधारण से लेकर अवतारी पुरुष तक बनाने की यहां छूट है। बुलंद सितारे वाले खिलाड़ियों के परिजनों से लेकर दोस्त, प्रेयसी , बांधवी व गर्ल फ्रेंड तक का लंबा इंटरव्यू दिखाया जा सकता है। वर्तमान में चल रहे खिलाड़ियों की महिमा का बखान करने के बहाने आप उन चेहरों पर भी  घंटों फोकस बनाए रख सकते हैं, जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं और हाशिये पर पड़े है। इस बहाने पेज थ्री कल्चर का बखूबी पोषण हो सकता है। दुनिया के तमाम दूसरे खेल फूल की तरह है, जो खेले यानी खिले और चंद  मिनटों में खत्म यानी मुर्झा गए। लेकिन क्रिकेट का मामला हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह है। जैसे मान लीजिए कि बारिश के चलते कोई मैच हुआ ही नहीं। फिर भी आंकड़ों के जरिए यहां यह बताने की गुंजाइश है कि इससे पहले कब – कब बारिश के चलते मैच रद हुआ था। 

कोई टीम लगातार हारती ही जा रही है तो भी आंकड़ों के जरिए बताया जा सकता है कि हारने के मामले में अब तक दूसरी टीमों का रिकार्ड क्या रहा है। यह संभावना दूसरे खेलों में नहीं है।  खबरों की दुनिया के लिहाज से आकलन करें तो हादसों में मौत और सैनिकों पर आतंकवादी हमला सबसे ज्यादा नेगलेक्टेड और ओवरलुक की जाने वाली खबरे हैंं। इसका इस्तेमाल बस फीलर या रुटीन खबरों की तरह ही होता है। बहुत हुआ तो सुर्खियां दिखाने के दौरान कुछ फुटेज दिखा दिए। स़ड़क हादसों में होने वाली मौत तो खबरों की दुनिया के लिए कभी चिंतनीय प्रश्न रहा ही नहीं। हां रेल हादसों का मसला काफी हद तक समय और परिस्थिति पर  निर्भर करता है। बिल्कुल शेयर मार्केट की तरह। कभी तो किसी मालगाड़ी के बेपटरी हो जाने की खबर देर तक चलती रहती है और कभी बड़े हादसों को भी वह महत्व नहीं मिलता। जो मिलना चाहिए। क्योंकि एेसी दुर्घटनाओं में मरता तो बिल्कुल आम आदमी ही है। जैसे उस दिन हुआ। विश्व कप क्रिकेट में बांग्लादेश पर भारतीय टीम की जीत के बाद मानो चैनलों ने पूरे दिन दर्शकों को क्रिकेट के रंग में रगने की अग्रिम  तैयारियां कर रखी थी। 

एंकरों पर इसका नशा कुछ इस कदर चढ़ा हुआ था कि सफल खिलाड़ियों का  बखान ही नहीं महिमामंडन करने की जैसे  होड़ सी मची थी। । लेकिन तभी जम्मू कश्मीर में आतंकवादी हमला…. तीन जवान शहीद… और रायबरेली में ट्रेन हादसा, 32 की मौत की खबर अाई। लेकिन चैनलों पर क्रिकेट पुराण जारी था। हादसे से जुड़ी खबरों को बिल्कुल चलताऊ तरीके से निपटाया जा रहा था। मसलन  रेल राज्य मंत्री ने की   मुआवजे की घोषणा…  दिए जांच के आदेश। सुर्खियां दिखाने के दौरान बस एकाध बार रेल राज्य मंत्री का चेहरा और फिर दुर्घटनास्थल का सामान्य फुटेज। जिसमें साफ नजर आ रहा है कि सरकारें बदलने के बावजूद यह वही रेल है, जिसे हम  सालों से इस्तेमाल करते आ रहे हैं।  विश्व कप  क्रिकेट पर भारत की बांग्लादेश पर जीत न हुई होती तो चार लोग चैनलों पर बहस के लिए बैठाए भी जा सकते थे। रेल व्यवस्था पर छाती पीटने के लिए। लेकिन ….।
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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और दैनिक जागरण से जुड़े हैं। 
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तारकेश कुमार ओझा, भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर पश्चिम बंगाल ः721301 जिला पश्चिम मेदिनीपुर संपर्कः 09434453934 

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म.प्र. विधान सबा के दरवाजे आम आदमी के लिए भी खुले

भोपाल। सीएम हेल्पलाइन की तरह मध्य प्रदेश विधानसभा भी आम आदमी की शिकायत न सिर्फ सुनेगी, बल्कि सुलझाएगी भी। विधानसभा अब लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू की तर्ज पर वाच डॉग की भूमिका भी निभाएगी। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीतासरन शर्मा की पहल पर नया प्रयोग किया जा रहा है। इससे आम आदमी भी व्यक्तिगत, योजनाओं के क्रियान्वयन, गड़बड़ी, भ्रष्टाचार या स्वयं के साथ हो रहे भेदभाव की शिकायत विधानसभा सचिवालय से कर सकेगा। इसकी जांच विधानसभा की याचिका समिति से कराई जाएगी।

अभी तक आम आदमी की का सीधा जु़़डाव विधानसभा से नहीं था। समस्या या शिकायत को विधायक प्रश्न या याचिका के माध्यम से उठाते थे लेकिन इसका दायरा सीमित था।

 

नए नियमों के अनुसार अब विधायकों के साथ आम आदमी भी विधानसभा में सीधे शिकायत कर सकता है। इसके लिए व्यक्ति को शिकायत के साथ दस्तावेज भी देने होंगे। इनका परीक्षण करने के बाद विभाग से जवाब तलब होगा। यदि जरूरत महसूस हुई तो समिति विभागीय मंत्री और आला अफसरों को भी बुलाकर पूछताछ कर सकेगी। समिति की सिफारिशें सदन में रखी जाएंगी। अधिकारियों का कहना है कि यदि कोई मामला नियम, प्रक्रियाओं से जु़़डा होगा तो समिति अपने प्रतिवेदन में उसको लेकर भी सिफारिश करेगी। प्रतिवेदन पर पालन प्रतिवेदन भी प्रस्तुत होते हैं, इसलिए इसकी गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

 

कहां और कैसे दर्ज होगी शिकायत

विधानसभा सचिवालय में अध्यक्ष या प्रमुख सचिव के नाम शिकायत या आवेदन देना होगा। इसे परीक्षण के लिए याचिका समिति शाखा को भेजा जाएगा। यहां आवेदक द्वारा दिए गए दस्तावेज की जांच करने के बाद प्रतिवेदन अध्यक्ष के सामने रखा जाएगा। अध्यक्ष प्रकरण को देखने के बाद याचिका समिति को जांच पड़ताल के लिए देने योग्य पाते हैं तो आगे बढ़ा देंगे। समिति विभागीय मंत्री और आला अफसरों को बुलाकर पूछताछ भी कर सकेगी।

किस तरह की शिकायतों की होगी सुनवाई

-क्षेत्र में घोषणा के बाद काम नहीं हो रहा।

-भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण या अनियमितता ।

-योजनाओं का फायदा पहुंचाने में भेदभाव।

-व्यक्तिगत मामला, जिसमें सुनवाई नहीं हो रही।

आम आदमी की भागीदारी होगी सुनिश्चित

 

विधानसभा की इस पहल से आम आदमी की निभर्रता विधायक पर कम होगी और उसकी भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी । वहीं, विधानसभा ने नई व्यवस्था में विधायकों पर ये पाबंदी लगा दी है कि वे एक दिन में एक से ज्यादा याचिका सूचना नहीं दे सकेंगे।

 

आम आदमी का फायदा

इस कदम से आम आदमी को फायदा होगा। उसे न्याय पाने के लिए कहीं भटकना नहीं प़़डेगा। तर्क और विधिसंगत शिकायत की सुनवाई याचिका समिति से करवाई जाएगी। इसके लिए नया नियम ही बना दिया है- डॉ. सीतासरन शर्मा, अध्यक्ष, विधानसभा।

 

विस के दरवाजे खोले

विधानसभा के दरवाजे अब आम आदमी के लिए खोल दिए हैं। यदि किसी के जायज सार्वजनिक या व्यक्तिगत काम नहीं हो रहे हैं तो वो दस्तावेज सहित अपनी बात खुद रख सकता है। कोशिश होगी कि विधानसभा आने वाले व्यक्ति को न्याय मिले- भगवानदेव ईसरानी, प्रमुख सचिव, विधानसभा।

 

साभार- www.jagran.com/ से

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गुटखा बेचना गैर जमानती अपराध होगा महाराष्ट्र में

मुंबई। राज्य में पाबंदी के बावजूद गुटखे की बिक्री हो रही है। पडोसी राज्यों में इस पर प्रतिबंध न होने की वजह से महाराष्ट्र में इसकी तस्करी हो रही है। राज्य पुलिस को निर्देश दिया जाएगा कि गुटखा जप्ती के मामले में दोषियों के खिलाफ गैर जमानती धाराओं में मामले दर्ज किए जाए। सोमवार को विधानसभा एफडीए मंत्री गिरीश बापट ने प्रश्नकाल के दौरान यह जानकारी भाजपा के मंगल प्रभात लोढ़ा को दी।

    विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान भाजपा के वरिष्ठ विधायक मंगल प्रभात लोढा ने पूछा कि गुटखा बेचते पकड़े जाने पर क्या सरकार उन दुकानों के लाईंसेंस रद्द करेगी। इस पर मंत्री ने कहा कि गुटखा के बेचने के लिए अलग से लाईसेंस नहीं दिया जाता। किसी भी दुकान पर गुटखा बेचने के मामले पकड़े जा सकते हैं। जो दुकान गुटखा बेचते पकड़े जाएंगे उनके लाईसेंस रद्द करने की बाबत सरकार विचार करेगी। इस दौरान भाजपा के मंगल प्रभात लोढा ने पूछा कि गुटखा बेचते पकड़े जाने पर क्या सरकार उन दुकानों के लाईंसेंस रद्द करेगी। इस पर मंत्री ने कहा कि गुटखा के बेचने के लिए अलग से लाईसेंस नहीं दिया जाता। किसी भी दुकान पर गुटखा बेचने के मामले पकड़े जा सकते हैं। जो दुकानवाले गुटखा बेचते पकड़े जाएंगे उनके लाईसेंस रद्द करने की बाबत सरकार विचार करेगी। कांग्रेस के नसीम खान ने राज्य में पाबंदी के बावजूद धडल्ले से गुटखा बेचे जाने की बात कही। 

उन्होंने कहा कि विधानभवन के बाहर भी गुटखा बेचा जा रहा है। इस मामले में सरकार क्या कार्रवाई कर रही है।  इसके जवाब में एफडीए मंत्री बापट ने कहा कि गुटखा बिक्री रोकने के लिए राज्य सरकार कार्रवाई कर रही है। 72 हजार दुकानों की तलाशी ली गई है। 32 करोड़ रुपए मूल्य का गुटखा जप्त किया गया है। उन्होंने कहा कि गुटखा जानलेना है। विधायक लोढ़ा ने कहा कि पुलिस को जो अघिकार है, उनके मुताबिक गुटखा के मामले में पुलिस भारतीय दंड संहिता की धारा 328 का इस्तेमाल कर सकती है। यह गैरजमानती धारा है। लेकिन पुलिस ऐसा नहीं कर रही है। इसलिए पुलिस को निर्देश दिया जाए कि गुटखा बिक्री के आरोपियों के खिलाफ गैरजमानती धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जाए। मंत्री श्री बापट ने कहा कि अब गुटखे की अवैध बिक्री के 1538 मामले अदालत तक ले जाए गए हैं। इसके लिए हमने टोल फ्री नंबर भी शुरु किया है। लोग इस नंबर गुटखा बेचे जाने की जानकारी दे सकते हैं।

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हिन्दी वाले ही हिन्दी की कर रहे चिंदी चिंंदी

चंडीगढ़ में दस साल रहा हूँ। जयपुर की तरह जब-तब वहाँ के अखबारों को नेट पर देख आता हूँ। इस तरह शहर से एक रिश्ता बना रहता है। कुछ मीठी यादें, कुछ सोए गम जाग जाते हैं।

कल ही उधर का एक बड़ा हिंदी अखबार देख रहा था। एक खबर यों शुरू होती थी : 'सॉपिंस स्कूल-32 में वीरवार को एनुअल स्पोर्ट्स डे के मौके पर रिमोट कंट्रोल्ड हेलिकॉप्टर की उड़ान स्टूडेंट्स के लिए सरप्राइज पैकेज रही।' ऊपर अखबार के कई खाने थे। सिर्फ पहले का नाम हिंदी में था – संघ राज्य क्षेत्र। यह यूनियन टेरिटरी का अनुवाद हुआ। हम केंद्रशासित प्रदेश लिखा करते थे।

बहरहाल, अखबार के बाकी खाने नागरी में यों थे : न्यूज; इवेंट; बेस्ट ऑफ सिटी; सिटी ब्लॉगर; सिटी डायरेक्टरी; गैलरी; ई-पेपर।

मैंने 'बेस्ट ऑफ सिटी' का पन्ना खोला। कुछ बानगी देखिए : ''ट्राईसिटी चंडीगढ़ में शॉपिंग के लिए सेक्टर-17 एक स्वर्ग की तरह है। यहां दुनिया भर के मशहूर ब्रैंड्स अपनी स्टोर्स के साथ मौजूद हैं। शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स, रेस्तरां, बैंक, डिस्को और पब सेक्टर-17 को शहर का मोस्ट हैप्पनिंग प्लेस बनाते हैं।… दोस्तों के साथ हैंगआउट करने के लिए सेंट्रा मॉल यंगस्टर्स का फेवरेट हॉट स्पॉट हैं। मस्ती और फन के साथ यहां फूड कोर्ट की जबरदस्त वैरायटी हैं। साथ ही यहां के स्टोर्स शॉपर्स के लिए बेहद कूल हैं। दोस्तों के साथ गप्पे मारने के बाद आप फोर-स्क्रीन पीवीआर सिनेमा में मूवी इंज्वॉय कर सकते हैं।… चंडीगढ़ में सिटी म्यूजियम जाकर हैंग आउट करने वालों में एडल्ट के साथ यंगस्टर्स की संख्या भी अच्छी खासी है।''

कभी एक पत्रिका में स्तंभ छपा करता था- ''यह किस देश-प्रदेश की भाषा है?'' आज लगता है यह प्रश्न बेमानी होगा। क्या खुद पत्र-पत्रिकाओं की भाषा देखकर पूछने को मन न होगा कि यह कहाँ की भाषा है?

हालाँकि भाषा की नई चाल के नमूने लेने के लिए चंडीगढ़ तक जाने की जरूरत नहीं। ये दिल्ली में भी बहुत मिल जाते हैं। इतना जरूर है कि प्रादेशिक अखबारों या संस्करणों में इस तरह की 'भाषा' का इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। इंदौर, उज्जैन, जयपुर और जोधपुर आदि शहरों के दौरे में भी इस प्रवृत्ति के दर्शन पहले होते रहे हैं। लेकिन अब महसूस होता है कि बीमारी किसी महामारी का रूप ले रही है। मैं हिंदी का विशेषज्ञ नहीं हूँ, विधिवत उसे पढ़ा भी नहीं है, पर खराब हिंदी के प्रसार को भाँप सकता हूँ।

मजे की बात यह है कि ऐसी भाषा इसलिए नहीं लिखी जा रही कि संपादक और उसके सहयोगी सही शब्दों का प्रयोग नहीं जानते। वे हिंदी के शब्द गलत लिख सकते हैं, पर अँगरेजी शब्दों के हिंदी पर्याय उन्हें खूब पता हैं। मगर ऐसी भाषा लिखने का फैसला उनका नहीं है, यह प्रतिष्ठान के व्यापारिक महकमों का निर्णय है जो आजकल के संपादकों को मानना होता है। संपादकों को समझाया जाता है कि समाज अब ऐसी भाषा बोलता है (समझाने वाले की भाषा ही इसका प्रत्यक्ष प्रमाण होगी!), इसलिए हमें समाज को उसकी भाषा में अखबार देना होगा।

बुनियादी रूप से विज्ञापनों की यह भाषा अभी स्थानीय खबरों में ज्यादा प्रयोग की जाती है। धीमे-धीमे वह मुख्य पन्नों की ओर बढ़ रही है। हो सकता है किसी समय संपादकीय पन्ने तक जा पहुँचे। दरअसल, ऐसी भाषा की शुरुआत कभी एक टीवी चैनल ने की थी। उसमें विवेक जागा और 'नीति' बदल दी। पर अखबारों ने इस नीति को जल्द अपना लिया, भले ही प्रयोग के बतौर और चुनिंदा पन्नों के बीच। सर्वेक्षण के आधार पर व्यापार वालों का मानना है कि 'प्रयोग' सफल रहा। यानी अब वह अपने पाँव पसारेगा।

टीवी और अखबारों में भाषा के प्रयोग को लेकर एक व्यावहारिक भेद है। टीवी के प्रस्तोता बोलते हैं और अँगरेजी राज-काज के अनुगामी देश में बोलचाल में अँगरेजी शब्द टपक पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन अखबार तो घड़ी-घड़ी की खबर नहीं उछालते। उनके पास पर्याप्त समय और भाषा की देखभाल के साधन होते हैं।

व्यापार विभाग का तर्क मुट्ठी भर शहरी युवकों पर लागू हो सकता है। लेकिन जितनी अँगरेजी भरी हिंदी यह हिंदी-भाषी तबका बोलता होगा, क्या अँगरेजी पढ़ने वालों की बोलचाल की अँगरेजी में उससे ज्यादा खराबी नहीं मिलेगी? फिर अँगरेजी अखबार जान-बूझ कर खराब अँगरेजी में क्यों नहीं निकाले जाते, उस अँगरेजी में जो आम भारतीय पाठक बोलता-समझता है?

मीडिया को भटकने से बचाने की हमारे यहाँ बहुत चिंता होती है। वह वाजिब भी है। सरकार, प्रेस परिषद या एडिटर्स गिल्ड आदि में आचार संहिता की बात होती है, पेड न्यूज की बात होती है, संपादक के पद के अवमूल्यन की फिक्र होती है, मीडिया प्रतिष्ठानों में देसी-विदेशी व्यापारिक घरानों के निवेश की बात की जाती है, लेकिन क्या हिंदी अखबारों के हाथों हिंदी के पतन की चिंता कहीं उस स्तर पर आपने सुनी?

यह तो हुई व्यापारिक दबाव में हिंदी के अँगरेजीकरण की बात। इसके साथ दुखद सच्चाई यह भी है कि संपादकों और सहयोगी पत्रकारों में अच्छी हिंदी के प्रति जागरूकता निरंतर घटती जा रही है। भाषा और वर्तनी के स्तर पर अखबारों या टीवी-रेडियो में हिंदी का कोई मानक रूप प्रचलित नहीं है। प्रतिष्ठान इस तरफ से उदासीन हैं। अस्सी के दशक में जब मैं 'राजस्थान पत्रिका' में काम करता था, प्रधान संपादक कर्पूरचंद कुलिश ने हिंदी विद्वान भगवान सहाय त्रिवेदी को सिर्फ हिंदी-विमर्श के लिए नियुक्त किया था। त्रिवेदी जी ने एक भाषा-नीति बनाई और मानक शब्दावली दी। वे रोज अखबार की भाषिक त्रुटियों का परीक्षण कर सुझाव भी देते थे।

त्रिवेदी जी की भाषा-नीति का प्रभाष जी ने अध्ययन किया और उसे काफी-कुछ अपनाते हुए अपने सुझावों के साथ 'जनसत्ता' में लागू किया। उसमें मामूली संशोधन मैंने भी किए हैं। मसलन त्रिवेदी जी और प्रभाष जी ने 'द्वारा' शब्द को निषिद्ध घोषित किया था। 'द्वारा' को सब जगह 'ओर से' कर दिया जाता था। अब, इसमें गोली 'दिनेश द्वारा' और 'दिनेश की ओर से' मारी गई में जुदा अर्थ ध्वनित होंगे। 'द्वारा' में खुद गोली दागने का भाव आता है जो 'ओर से' कर देने पर दूसरों पर चला जाता है। हालाँकि बेहतर प्रयोग होगा कि गोली दिनेश ने या दिनेश के लोगों ने चलाई।

बहरहाल, मैं किसी शब्द को निषिद्ध घोषित करने के हक में नहीं हूँ। कोई शब्द कब कहाँ काम आ जाय, कौन जानता है। यहाँ पर प्रयोजन कुछ ही वर्ष पहले तक भाषा के प्रति बरती जा रही नीतिगत सजगता की तरफ ध्यान दिलाना भर है। नीति छोड़िए, अब तो सामान्य प्रयोग के हिंदी शब्द भी पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर गलत मिलते हैं। ऐसे शब्दों की संख्या पाँच सौ से ऊपर होगी। कुछ नमूने देखिए; साथ में कोष्ठक में गलत रूप : ब्योरा (ब्यौरा), न्योता (न्यौता), बनिस्बत (बनिस्पत), अधीन (आधीन), अध्यात्म (आध्यात्म), अंत्येष्टि( (अंत्येष्ठि), व्यावसायिक (व्यवसायिक), गुरु (गुरू), तबीयत (तबियत), संन्यास( (सन्यास), पश्चात्ताप (पश्चाताप), परखचे (परखच्चे), स्रोत (स्त्रोत), चरागाह (चारागाह), सौहार्द (सौहार्द्र), शलाका (श्लाका), अभयारण्य (अभ्यारण्य) आदि।

गलत लिखे जा रहे ऐसे शब्दों में मैं वे शब्द शामिल नहीं कर रहा, जो दूसरी भाषाओं से आए और हिंदी में उपसर्ग और प्रत्यय के जोड़ से या उच्चारण बदलकर रूपांतरित हो गए। मसलन हलवाई (हलवा+ई), जिम्मेवारी (जिम्मा+वारी), कानवाई (कॉनवॉय), पलटन (प्लैटून), पतलून (पैंटालून), लालटेन (लैंटर्न) आदि। इन्हें गलत भी नहीं मानता हूँ। यह परदेसी शब्दों का हिंदीकरण है।

शब्दों के रूप बदलने में हमने संस्कृत से भी बहुत छूट ली है। संस्कृत के 'राष्ट्रिय' शब्द को हम 'राष्ट्रीय' लिखते हैं। आत्मा वहाँ पुल्लिंग है, हिंदी में उसका स्त्रीलिंग रूढ़ है। ऐसे ही, संस्कृत में 'अ' और 'अन्' उपसर्ग हैं, जो शब्दों का अर्थ उलट देते हैं- ज्ञान/अज्ञान, उचित/अनुचित। संस्कृत में व्यंजन से शुरू होने वाले शब्द से पहले 'अ' उपसर्ग जुड़ता है और शब्द स्वर से शुरू होता हो तो 'अन्'। अब देखिए हिंदी क्षेत्र में विकसित हुए अपने उपसर्ग 'अ' और 'अन', जिनके सहारे हिंदी ने बेधड़क ढेर अलग शब्द बना लिए हैं: अछूत, अबूझ, अनचाहा, अनजान, अनबन, अनपढ़, अनगिनत आदि। अधकचरा, अड़चन, आढ़तिया, अठन्नी, अगाड़ी, अकुलाहट, अचकचाना, अललबछेड़ा, अलगाव, अहेरी जैसे सैकड़ों शब्द हिंदी में ही जन्मे और पनपे हैं।

कहना न होगा, यह सिलसिला आगे भी बढ़ता है इसलिए बात-बात पर संस्कृत स्रोत की दुहाई या शुद्धिकरण की टेर का मैं पक्षधर नहीं। अनुशासन जरूरी मानता हूँ, लेकिन प्रयोग और चलन में भी मान्यता की गुंजाइश लेकर चलता हूँ।

मेरे गुरु अज्ञेय प्रयोगवादी माने जाते हैं (हालाँकि उन्होंने इसका हमेशा खंडन किया); कविता में प्रयोग को उन्होंने जरूरी माना- लेकिन भाषा के मामले में वे और उस दौर के अनेक साहित्यकार और संपादक लगता है कुछ शुद्धिवादी थे।

अज्ञेय मास्को को, शुद्ध उच्चारण के अनुरूप, मस्क्वा लिखते-लिखवाते थे। दुविधा को द्विविधा लिखते। मुझे लगता है मास्को हिंदी में इतना रूढ़ हो गया कि उसका हिंदीकरण स्वीकार्य होना चाहिए। लेकिन असम को आसाम की जगह सही लिखने-लिखवाने का आग्रह हमें क्यों नहीं करना चाहिए? निकट के नाम जाने-अनजाने बिगड़ जाएँगे तो दूर के सुधारने का क्या औचित्य होगा?

जो नाम रूढ़ नहीं हुए और जानकारी के अभाव में अलग-अलग रूपों में लिखे जाते हैं, उनका सुधार भी जरूरी लगता है। जैसे चे गेवारा को ग्वेरा या गुएवारा लिखने से रोका जा सकता है। अभी ऊगो चावेज की मृत्यु हुई, नाम का प्रामाणिक उच्चारण (इंटरनेट इसमें बहुत मददगार है) मालूम कर हमने उसे ह्यूगो शावेज के विचलन से भरसक बचाया। यह शुद्धिवाद शायद नहीं, बस जिम्मेवारी का तकाजा है। (जिम्मेदारी जानबूझ कर नहीं कहता क्योंकि उसमें सरोकार से बढ़कर दायित्व या 'ड्यूटी' का भाव आ जाता है। उर्दू के जानकार जिम्मेदारी की जगह जिम्मेवारी देखकर जरूर चौंकते हैं। पर बाबू श्यामसुंदर दास ने शब्दसागर में उसे हिंदी प्रत्यय से बना हिंदी शब्द ही माना है।

अपने यात्रा-वृत्तांत 'मुअनजोदड़ो' में मैंने मोहनजोदड़ो के भ्रामक प्रयोग की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की। कोई मोहनजोदड़ो लिखे तो उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि वह इसी रूप में प्रयोग होता आया है। उ और ओ की आपसी आवाजाही (मुहम्मद/मोहम्मद, मुहल्ला/मोहल्ला/, उसामा/ओसामा) और ह और अ की आपसदारी (स-ह, य-ज, र-ल की तरह) में मुअन-जो-दड़ो (मुर्दों का टीला) अकारण मोहनजोदड़ो या मोहेंजोदाड़ो हो गया। पाकिस्तान यात्रा में पाया कि सिंधी समाज इस क्षेत्र में मुअनजोदड़ो बोलता है। मोहन कृष्ण का नाम है, जिनका जन्म सिंधु सभ्यता के बहुत बाद हुआ, अगर हुआ। इस विभ्रम से बचने के लिए मैंने वह नाम प्रयोग किया, जो सिंध में बोला जाता है।

जो हो, आप समझ सकते हैं कि मैं भाषा की शुद्धि और अशुद्धि के बीच उलझता रहता हूं। क्योंकि यह मेरा पेशा है और थोड़ा सरोकार भी। इसी के चलते अपनी भाषा में सुधार के प्रयत्न भी जारी रहते हैं। अक्सर मानक कोश की शरण जाता हूँ।

कोई कोश भाषा नहीं सिखा सकता, भाषा समाज में पनपती है। लेकिन भाषा का मानकीकरण कोश ही करते हैं। प्रयोग और विचलन का लिहाज कोशकार करते हैं, लेकिन बहुत उदार होकर नहीं। यह उचित भी है। वरना एक रोज वही हिंदी मानक कहलाने लगेगी जो कभी जीटीवी या आज के बहु-वितरित अखबार इस्तेमाल करते हैं। यह जरूर है कि हिंदी में कोश-संशोधन अँगरेजी की तरह नियत अवधि में नहीं होते। अपनी भाषा के बिगड़े हुए शब्दों को भी अँगरेजी कोश खास तवज्जोह नहीं देते, लेकिन नए शब्द जरूर जोड़ते रहते हैं।

अगर हम मानते हैं कि भाषा में प्रयोगों की छूट के साथ एक अनुशासन भी कायम रहना चाहिए तो कोश के मानक समर्थन की हमें अक्सर दरकार होगी। इसके साथ हिंदी की शब्द-शक्ति बढ़ाने और सामान्य अनुशासन से भाषा को फिसलने न देने के लिए साहित्यकारों, पत्रकारों और हिंदी शिक्षकों का सजग और सक्रिय रहना भी जरूरी होगा।

हिंदी के शिक्षक, मुझे लगता है, इस मामले में सबसे उदासीन बिरादरी हैं। कभी वे सबसे ज्यादा सक्रिय हुआ करते थे। महत्त्वपूर्ण ग्रंथ और मानक हमें भाषाविज्ञानी और साहित्य के शिक्षक दे गए। आखिर साहित्यकार से तो हम अभिव्यक्ति की अपेक्षा ही ज्यादा करते हैं, बजाय शब्दविज्ञान या भाषाविज्ञान के कौशल के। लेकिन शिक्षकों का हाल बेहाल है। उनकी तर्क-पद्धति संदिग्ध है। वे ''शुद्ध भाषा'' के समर्थक भी हो सकते हैं और नितांत अशुद्ध प्रयोगों के भी। अगर वे अशुद्ध भाषा के हामी- बहुत संभव है अपनी सीमाओं के कारण- निकले तो उनके छात्र किस धारा की ओर जाएँगे। अगर वे विद्यार्थी लेखक, पत्रकार या प्रूफ-संशोधक बन गए तो भाषा में किस मत का पालन करेंगे?

ताजा अनुभव बयान करता हूँ। एक कॉलेज में पढ़ाने वाले हिंदी व्याख्याता को कहा कि 'सामर्थ्य' और 'सोच' के स्त्रीलिंग रूप चलन में भले हों, पर वे कोशसम्मत नहीं हैं। वे नहीं माने। तर्क देते रहे, पर कोई कोश उठाकर नहीं देखा। मुझे ही हवाले ढूँढ़ने पड़े। ऐसे कुछ प्रसंग और हैं।

लेकिन पिछले पखवाड़े दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी शिक्षक आशुतोष कुमार (नाम इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि वे 'बहस' में शिरकत को आतुर हैं) ने फेसबुक पर कहीं 'गाली-गलौच' लिखा। सोशल मीडिया जल्दबाजी का माध्यम है, सो मैंने पाती भेजकर पूछ लिया कि 'गाली-गलौज' सही होगा या 'गाली-गलौच'? उन्होंने कोश से पुष्टि कर ली होगी। बोले, ''सही तो वैसे 'गलौज' ही है। लेकिन 'ज' को 'च' कर देने से गाली की कड़वाहट तनिक हल्की नहीं हो जाती?''

गाली में गलौज जोड़ने से तो गाली का असर बढ़ जाएगा। लेकिन 'गाली की कड़वाहट हल्की' करने का ख्वाहिशमंद गाली देगा ही क्यों?

उन्होंने मुझे समझाया कि गाली की नहीं ''लफ्ज की कड़वाहट कम करने की बात है। गलौज से गलाजत झाँकती है तो गलौच से- हद से हद- गले या गालों की मश्क।'' फिर उन्होंने पंजाबी के एक कोशकार का हवाला दिया, कि पंजाबी में गाली-गलौच ही चलता है।

गले और गालों की मश्क? जो युग्म शुद्ध हिंदी क्षेत्र की उपज है, जो हिंदी शब्दसागर से लेकर मानक कोश तक 'गलौज' ही है, उसके लिए पंजाबी की मिसाल? वह भी अपने गलत प्रयोग को सही साबित करने के लिए? पंजाब में कीचड़ को चीकड़, मतलब को मतबल और निबंध को प्रस्ताव कहते हैं। क्या हम भी इन्हें अपना लें? दिल्ली में करा-करी-करिए प्रयोग प्रचलित हो गए हैं, आप कहाँ जा रहे हो, आपके मम्मी कहाँ गए हैं आदि प्रयोग भी खूब सुने जाते हैं। क्या इन्हें भी हम आदर्श मानकर विश्वविद्यालय में पढ़ाएँ? 'गाली-गलौच' की तरह कृप्या, धुम्रपान, आर्शीवाद जैसे अनेक अशुद्ध शब्द दिल्ली में सार्वजनिक स्थलों पर नजर आ जाते हैं। लेकिन ये जानकारी के अभाव में होने वाली त्रुटियाँ हैं, हिंदी शिक्षक तो ऐसी त्रुटियाँ करते या उनका पक्ष लेते नहीं देखे जाते। क्या अखबारों की तरह विश्वविद्यालयों में यह किसी नई प्रवृत्ति की पदचाप है? या कोई हीनता का अहंकार है?

इस पर व्यापक चर्चा के लिए मैंने फेसबुक पर यह प्रसंग छेड़ा। पर आशुतोष कुमार का नाम नहीं दिया। वे वहां अपने नाम (और चित्र तो होता ही है) सहित खुद आ गए। 'गलौच' को सही साबित करने के लिए नए-नए तर्कों के साथ। मुख्यतः उनका कहना था कि ''भाखा बहता नीर है।… अगर 'गालीगलौच' लफ्ज प्रचलन में है तो कोई तानाशाह उसे हिंदी से खारिज नहीं कर सकता।… गलौच की आदत हिंदी के संपादकों में पाई जाती है, अध्यापकों में नहीं।''

प्रचलन से कितना भारी तर्क बनता है, मुझे नहीं पता। लेकिन 'प्रचलन' का परिमाण जानने के लिए मैंने गूगल में गाली-गलौच टाइप किया। उससे अंदाजा लगता है कि हजारों लोग वाकई गलत प्रयोग करते हैं। फिर मैंने गाली-गलौज टाइप किया। उसके प्रयोगों की संख्या तो लाखों में निकली। यानी ज्यादा प्रचलन सही वर्तनी का ही है। फिर जिद काहे की?

सबसे हैरान करने वाली चेष्टा यह हुई कि उन्होंने प्रूफ की गलतियों वाली किताबों को प्रमाण मानकर बड़े लेखकों को भी 'गलौच' लिखने वाला मान लिया! पहले के लेखक हाथ से लिखते थे, पर कंपोज और त्रुटि-सुधार का काम प्रायः और लोग करते थे। लेखक के न रहने पर छपने वाले संस्करणों में भाषिक त्रुटियों की आशंका और बढ़ जाती है। ऐसे में यह कहना हास्यास्पद होगा कि वे लेखक सही हिंदी का प्रयोग नहीं जानते थे।
सबसे पहले अज्ञेय को; एक कहानी (सभ्यता का एक दिन) उद्धृत कर कहा: ''यह मेरी नहीं 'अज्ञेय' की पंक्ति है। 'गाली-गलौच' जैसे लफ्ज पर हिंदी के मेरे जैसे 'अयोग्य' अध्यापक का एकाधिकार नहीं है।'' अज्ञेय का उद्धरण उन्होंने शायद भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित अज्ञेय अज्ञेय रचनावली से लिया था।

मैंने हाथ बढ़ाया और अज्ञेय के जीते-जी प्रकाशित उनके कहानी-संग्रह, समग्र कहानियों के खंड 'छोड़ा हुआ रास्ता' और संपूर्ण कहानियों के एकल संस्करण को पलटा: सब में उस कहानी में 'गाली-गलौज' ही मुद्रित था। फिर उस बहस में उनके समर्थन में कोई मैथिली गुप्ता उतरे। उन्होंने किताबों के पन्ने पेश कर साबित करने की कोशिश की कि प्रेमचंद, रेणु, कमलेश्वर, भीष्म साहनी, भगवतीचरण वर्मा, सियारामशरण गुप्त आदि भी 'गलौच' लिखते थे। कुतर्क की भी सीमा होती है। मैथिली गुप्ता के दावे (जितने मैं जाँच सका गलत निकले। नए कंप्यूटरकृत संस्करणों में (जिनमें प्रूफ की त्रुटियों की पर्याप्त आशंका रहती है) उन्हें 'गलौच' शब्द मिल गया था, लेकिन ठीक उन्हीं रचनाओं में – जो प्रेमचंद, रेणु, सियारामशरण गुप्त की किताबों के पुराने संस्करणों में छपी थीं- मुझे 'गलौज' ही छपा मिला।

मुझे अजीबोगरीब बात यह लगी कि छापे की गलती के आधार पर हिंदी शिक्षक महान हिंदी लेखकों की भाषा की खराबी कैसे घोषित कर सकते हैं। पहले के लेखक हाथ से लिखते थे, पर कंपोज और त्रुटि-सुधार का काम प्रायः और लोग करते हैं। लेखक के न रहने पर छपने वाले संस्करणों में भाषिक त्रुटियों की आशंका और बढ़ जाती है। ऐसे में यह कहना हास्यास्पद होगा कि वे लेखक सही हिंदी का प्रयोग नहीं जानते थे।
सबसे मजेदार बात यह रही कि इतने मूल संस्करणों के प्रमाण सामने आ जाने के बाद भी आशुतोष कुमार यह बोले: ''मुझे मालूम था कि बात प्रूफ पर आएगी।''
यानी अभी भी वे सही थे! प्रेमचंद, अज्ञेय, रेणु, सियारामशरण गुप्त आदि सब गलत, जिन्हें वे अपने समर्थन में मान रहे थे, पर वे निकले नहीं। प्रचलन के आँकड़े भी सही नहीं निकले। उनका यह कहना बिलकुल ठीक है कि भाषा बहता नीर है। लेकिन यह भी समझना चाहिए वह बहता नीर है, बहता नाला नहीं है। गलत वर्तनी का इस किस्म का समर्थन नीर को कैसा नीर रहने देगा?

हिंदी समय की टिप्पणी : हिंदी अपने देश में ही इतने बड़े इलाके की भाषा है कि उस पर स्थानीय प्रभाव पड़ना अत्यंत स्वाभाविक है। गाली-गलौज और गाली-गलौच के विवाद का स्रोत संभवतः यही है। जिस तर्क से अमेरिका में labour को labor लिखते हैं, उसी तर्क से क्या गलौच को गलौज का एक अन्य रूप नहीं माना जा सकता? फिर, हमारे यहाँ तत्सम और तद्भव, दोनों रूप चलते हैं, जैसे यमुना और जमुना, योगी और जोगी। पूड़ी को कई जिलों में पूरी कहते हैं। वर्तनी का मानकीकरण होना ही चाहिए, परंतु मानकीकृत वर्तनी में भी सुअर और सूअर तथा पेच और पेंच, दोनों लिखने की छूट हो, तो क्या हर्ज होगा? आखिर हिंदी किसी एक क्षेत्र की भाषा नहीं है – यह भारत संघ की भाषा है। गैर-हिंदीभाषियों द्वारा लाए गए विकारों का क्या किया जाए, यह एक अलग मुद्दा है।

लेखक हिन्दी दैनिक  जनसत्ता के संपादक हैं।

साभार-  http://www.hindisamay.com/ से

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अंग्रेजी राज के सिक्कों से आदिवासी निकालते हैं सुरीली तान

जगदलपुर । हवा में लहराकर बांसुरी की मीठी धुन सुनने वाले बस्तर के आदिवासी अपनी परंपरागत बांसुरी में आज भी 72 साल पुराना सिक्‍का उपयोग करते हैं। 1943 का छेदवाला वह तांबे का सिक्का नहीं मिलता, तो नट-बोल्ट के साथ उपयोग किए जाने वाले वॉसर से काम चला लेते हैं।

बस्तर की हाथ बांसुरी का उपयोग वनांचल में लंबे समय से होता आ रहा है। राह चलते या नृत्य करते हुए इसे हवा में लहरा कर ग्रामीण इसकी मीठी धुन का आनंद लेते हैं। इसे बनाने के लिए सबसे जरूरी होता है। धातु का एक छल्ला।

बस्तर का आदिवासी छल्ले के रूप में करीब 72 साल से 1943 में ब्रिटिश सरकार व्दारा जारी एक पैसे का उपयोग करता आ रहा है,चूंकि इस सिक्के के मध्य में बड़ा छेद होता है।तांबे के इस सिक्के को बस्तर में काना पैसा तो छग के मैदानी इलाकों में भोंगरी कहा जाता है।

दुर्लभ हो गया है सिक्‍का

वर्षों से ग्रामीण इसे सहेजकर रखते रहे हैं, परन्तु 72 साल पुराना यह सिक्का अब दुर्लभ हो गया है, इसलिए हाथ बांसुरी बनाने के लिए मिल नहीं पाता। मोहलई करनपुर के समरथ नाग बताते हैं कि उनके गांव में करीब 10 परिवार हाथ बांसुरी बनाने का काम करता है। क्षेत्र के हाट- बाजारों में इस बांसुरी की मांग है। वहीं जगदलपुर स्थित शिल्पी संस्था से भी पर्यटक इसे खरीदकर ले जाते हैं।

इन्‍होने बताया कि 1943 का यह तांबे का सिक्का बड़ी मुश्किल से मिलता है, इसलिए कारीगरों ने विकल्प ढूंढ लिया है। पहले वे एल्यूमिनियम के पुराने बर्तनों को काट कर सिक्के की जगह लगाते रहे, परन्तु अब बाजार में उपलब्ध नट-बोल्ट के साथ उपयोग किए जाने वाले वॉसर से काम चला रहे हैं।

भागवत बघेल ने बताया कि बस्तर में हाथ बांसुरी के पुराने शौकीन अभी भी सौ रुपए की बांसुरी में पुराना सिक्का लगाकर देने पर मुंहमांगी कीमत देने को तैयार रहते हैं चूंकि तांबे के सिक्के वाले बांसुरी की आवाज स्पष्ट और बेहतर होती है।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से 

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सुप्रिया शर्मा को चमेली देवी पुरस्कार

सर्वश्रेष्ठ महिला पत्रकार के लिए मीडिया फाउंडेशन द्वारा प्रदत्त 'चमेली देवी जैन पुरस्कार' इस बार ऑनलाइन पत्रकार सुप्रिया शर्मा को दिए जाने की घोषणा की गई है।

 

मीडिया फाउंडेशन ने सोमवार को इसकी घोषणा की। ऐसा पहली बार है कि यह पुरस्कार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम करने वाली किसी पत्रकार को दिया जा रहा है।

 

‘स्क्रॉल डॉट इन’ की न्यूज एडिटर ने यह पुरस्कार हाशिए पर जीने को मजबूर व उपेक्षित समुदायों पर रिपोर्ताज और समसामयिक मुद्दे उठाने के लिए दिया जा रहा है। यह सम्मान राष्ट्रीय राजधानी स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 19 मार्च को दिया जाएगा, जिसके बाद एक व्याख्यान होगा।

 

इस साल जूरी में मिंट के आर.सुकुमार, एनडीटीवी इंडिया के रवीश कुमार और इंडिया टुडे ग्रुप की कावेरी बामजई थीं।

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कूपन दुनिया ने रफ्तार.इन से हाथ मिलाया

CouponDunia.in  ने कूपन को हिंदी में प्रचारित करने के लिए  हिंदी वेबसाइट Raftaar.in से हाथ मिलाने की घोषणा की है। इस समझौते के बाद रफ्तार के उपभोक्‍ता इसके होम पेज पर‘कूपन टैब’ के द्वारा इसके योजनाओं की जानकारी हासिल कर सकेंगे।  इसके अलावा दर्शक मोबाइल, शिक्षा, सौंदर्य,, फैशन,रिचार्ज, खेल और यात्रा में से कूपन की विविध सुविधाओं का लाभ ले सकेंगे।  ऐसे में कूपन उन्‍हें उस वेबसाइट के बारे में बताएगी जहां से खरीदारी कर वे पैसे बचा सकते हैं।
 
इस समझौते के बारे में CouponDunia.in  के संस्‍थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी  समीर परवानी ने कहा, ‘भारत में विभिन्‍न क्षेत्रीय भाषाए हैं और इस प्रकार वहां की स्‍थानीय भाषा पर पकड़ बनाकर छोटे कस्‍बों और शहरों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जा सकती है। इस समझौते के द्वारा हमारा उद्देश्‍य ज्‍यादा से ज्‍यादा हिंदी भाषी क्षेत्रों में अपनी पहुंच बनाना है और उन्‍हें डिजिटल शॉपिंग के फायदों से परिचित कराना है।
 
Raftaar.in के श्री  सुरजीत सिंह ने कहा, ‘अभी तक ऑनलाइन शॉपिंग की पहुंच अंग्रेजी में पकड़ रखने वाले लोगों में ज्‍यादा है। इन दिनों स्‍मार्टफोन पर भी ऑनलाइन शॉपिंग का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी और ऑनलाइन ट्रैवल पोर्टल ने लोगों की इस जरूरत को समझकर उन पर काम करना शुरू कर दिया है और उन्‍हें हिंदी में बेस्‍ट ऑनलाइन ऑफर देना शुरू कर दिया है। रफ्तार ने  कूपन के कंटेंट को ज्‍यादा से ज्‍यादा सुविधाजनक बनाने के लिए उसे हिंदी में अनुवादित करने के लिए अपनी Natural Language Processing (NLP) ती खूबी का इस्‍तेमाल किया है। 

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