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हार का डर

आज हमारी समाज के समक्ष बहुत सारी  समस्याएं  हैं, और ये समस्याएं ख़त्म होने की जगह,  दिन दूनी रात चौगिनी बढ़ रही है. और कहीं ऐसा न हो की इन समस्याओं के कारण आगे आने वाली पीढ़ियां इन सबके कारण कहीं खो जाएँ।  

उन्ही समस्याओं में से एक बहुत बड़ी समस्या है  " हार का डर " . यह समस्या इतनी बढ़ गई है की समाज में व्यवसाय कर सेवाएं देने वाली जैन समाज तक नौकरी और दुसरे रास्तों पर चल पढ़ी है।  

यह समस्या कुछ ऐसी है, जैसे की एक बालक हमेशा जीतने के लिए छोटा खेल का मैदान चुनता है, और हमेशा जीतता है। इस भ्रम में जीता है कि मैं जीत गया हूँ।  जबकि वह यह नहीं जानता  की वह खुद के मैदान का  विजेता है। अभी बड़ा  मैदान तो देखा तक नहीं। कहीं न कहीं हम अच्छा पढ़ने व होशियार छात्र हमेशा अपने विश्वविद्यालय के छोटे से मैदान में जीतते हैं और विजेता की उपाधि स्वयं को दे देते हैं। और जब वह असलियत के धरातल पर उतरते हैं तो या तो रास्ता बदल कर ,एक कौना पकड़ कर बैठ जाते हैं , और उसी छोटे से कौने  के जीवन को जीते हैं. या फिर जीवन से हार जाते हैं। 

 आज की पीढ़ी , जोखिम उठाने को तैयार ही नहीं है। और कहीं न कहीं आज की पीढ़ी की उच्च स्तरीय शिक्षा, उसे ऐसा करने से रोक देती है। की "कोई क्या कहेगा" ?
स्वयं अपने व्यावसायिक स्थान की साफ़ सफाई करने  में संकोच होता है, की हम पढ़े लिखे ये काम कैसे करें। फिर वही बात आ गई "कोई क्या कहेगा" ? 
और यही "कोई क्या कहेगा" है "हार का डर "। 

एक और कारण है , आज की पीढ़ी ने हारना सीखा ही नहीं है , हर बच्चा भौतिक सुख सुविधाओं में माँ और बाबा के आँचल में पढता है, बढ़ता है। उसके विद्यालय से लेकर हर कार्य में माँ बाबा हमेशा साथ खड़े होते हैं। और बच्चा माँ बाबा की मदद से जीतता जाता है, यह जीत बच्चे की नहीं माँ बाबा की होती है। हार का कभी मुहं न देखने के कारण वह बड़े होकर जोखिम उठाने से डरते हैं।  और कभी कुछ  नया कर ही नहीं पाते। 
 

पर, इस हार के डर  को जीत कर जीवन में गर किसी ने कुछ किया है तो वो हैं अब्राहम लिंकन, विलियम शेक्सपियर , अल्बर्ट आइंस्टाइन, और हमारे अपने डॉ ए पी जे अब्दुल कलम आजाद और अन्य कई हस्तियां ,जिन्होंने "फर्श से अर्श "तक का रास्ता तय किया। न ही ये लोग परिस्थितियों से डरे और न ही हारने से , क्योंकि बचपन में ही परिस्थिति वश ये कई बार हारे और फिर उठ खड़े हुए. और जीवन में विजेता  हुए। 
 
तो आइये आज से हम नया काम शुरू करें , कि  अपने बच्चों को हारना सिखाएं, उनके मन से हार का डर  निकालें और फिर देखें एक नया सकारात्मक परिवर्तन होगा।  
 

(लेखिका हिन्दी को विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए समर्पित हैं और भारत सरकार के हर विभाग से हिन्दी में कामकाज को बढ़ावा देने व सरकारी वेबसाईटें हिन्दी में बनवाने के लिए संघर्ष कर रही है। चुनाव आय़ोग से लेकर वित्त मंत्रावय की वेबसाईटें हिन्दी में बनाए जाने में उनके संघर्ष की ही प्रमुख भूमिका है)

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सोच हो बड़ी, सुनो सबकी, करो मन की

जीवन में सफल होने के कई उपाय हो सकते हैं जिनमें से कुछ आप खुद बना सकते हैं पर इस मामले में सफलतम लोगों द्वारा अपनाये गए उपाय अपेक्षाकृत कम श्रम साध्य होते हैं। साथ ही इस रास्ते पर चलकर सफलता मिलने का अवसर और भी बढ़ जाता है।

सुनें अपने मन की ये पता लगाएं कि आपको क्या करना अच्छा लगता है और उसी काम को करें। काम यदि आपकी रूचि के अनुसार होता है तो आप उसमे अपना 100 प्रतिशत देते हैं। यदि आप अपना काम अच्छे से करते हैं और इसके बदले आपको कुछ भी नहीं मिलता है तो आप समझिए कि आप सफलता के मार्ग पर अग्रसर हैं। 

करियर काउंसलर अरविंद सेन कहते हैं कि जब आप ये निश्चय करते हैं कि चाहे कुछ भी हो, कितना भी मेहनत करना पड़े हमें अपना प्रयास करना है तो ये संकल्प हमें सफल बनाता है। इस संकल्प को निरंतर बनाए रखना पड़ता है। सोच हो बड़ी ज्यादातर लोग अपना गोल ही बहुत ही छोटा रखते हैं और उसे ही प्राप्त कर खुशी मना लेते हैं जबकि कुछ लोग बहुत बड़ा गोल पाने की कोशिश तो करते हैं लेकिन हासिल नहीं कर पाते। दोनों ही स्थिति सही नहींहै। इसलिए आप अपना गोल निश्चित करने से पहले खूब सोचे विचारे और काफी सोच समझ कर निर्धारित करें। 

बड़ा सोचेंगे तो बड़ी चीज पाएंगे। जिसके बारे में सोचेंगे ही नहीं उसे भला पाएंगे कैसे। अपने आप को कमतर मत समझें। अपने आप को कम आंकने के अपराध पर विजय प्राप्त करो। अपनी परिसंपत्तियों पर ध्यान लगाएं। जैसा आप अपने बारे में सोचते हो उससे कहीं बेहतर हो आप। बड़े सोच वाले लोगों की शब्दावली का प्रयोग करें। उज्ज्वल, हंसमुख, खुशी, आशा, से संबंधित शब्दों का प्रयोग करें। जीत का एहसास कराने वाले शब्दों का प्रयोग करें। 

विफलता या हार सूचक शब्दों का प्रयोग न करें। विस्तृत हो दायरा एक प्रसिद्ध उक्ति है कि असफलता का मतलब है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया। असफलता किसी काम को दुबारा शुरू करना का एक मौका देता है कि उसी काम को और भी अच्छे तरीके से किया जाए। अपने विजन को विस्तृत करें। सोचें कि क्या हो सकता है, न कि क्या है। अपने आप को, लोगों को, वस्तुओ को मूल्य परक कैसे बना सकते हैं इसके बारे में सोचें। अपने काम का बड़ा दृश्य सामने रखें। अपने वर्तमान काम को महत्वपूर्ण समझें। आपकी अगली पदोन्नति ज्यादातर इस पर निर्भर करता है कि आप अपने वर्तमान नौकरी के बारे में किस प्रकार सोचते हैं। 

छोटी छोटी बातों से ऊपर उठकर सोचो। कुछ लोग ऐसे होते हैं तो उदेश्य तो निर्धारित कर लेते है लेकिन उसके अनुरूप कर्म नहीं करते है जिससे वे सफल नहीं हो पाते हैं। सफल होने के लिए उसी के हिसाब से मेहनत करनी पड़ती है। बाधाओं को दूर करें पता करें कि वो कौन सी चीज है जो आपको पीछे की तरफ खींच रही है, फिर उससे अपना पीछा छुड़ाए। पहले आप अपनी बाधा को हटाएं। कभी-कभी हम जब सफलता की राह पर अग्रसर होते हैं तो कुछ बातें हमारे सामने आतीं हैं अगर हम उन बातों पर ध्यान न देकर सिर्फ अपने लक्ष्य के बारे में सोचते हैं तो हमें सफलता जरूर मिलती है। 

बदलाव की हो गुंजाइश नए विचारों, नयी योजनाएं अपनाने में घबराएं नहीं। नए विचार नई क्रांति को जन्म देती है। नए विचार, नयी योजनाएं सफलता की धुरी होते हैं। निराशा की कोई भावना आपको रोक नहीं सकती है। सदैव कड़ी मेहनत की इच्छा बनाएं रखें। सफल होने के लिए आपको एक सामान्य आदमी से ज्यादा काम करना होगा तभी आप टॉप पर पहुंच सकते हो। 

लक्ष्य प्राप्ति की प्रक्रिया को लोचदार बनाएं। यात्रा के आरंभ में तो लक्ष्य बदल सकते हैं मध्य में नहीं तो अनपेक्षित स्थितियों में अपने व्यवहार में लोच बनाएं। मुश्किल आने पर उसका सामना करें और तुरंत उसका समाधान निकालें। और आखिर में जब भी हम कोई काम करते हैं, हम अपने आप से बातें करते हैं। हमें हमेशा अपने मन की सुनकर ही निर्णय करना चाहिए। 

अंत में, बकौल नीरज जी, हमेशा याद रखें –

रचना होगी !
होगी !

स्वप्न होता है सत्य 
विसर्जित होने के बाद 
बूँद बनती है समुद्र 
अतल में खोने के बाद 

रचन होगी !
होगी !

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प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, शासकीय 
दिग्विजय पीजी कालेज,राजनांदगांव 

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मंत्री ईमानदार हो तो काम ऐसे होते हैं

इंटरनेट के जरिए थोक में रेल टिकट बुक कराकर उन्हें ब्लैक में बेचने वाले दलालों पर लगाम लगाने के लिए अब रेलवे इंटरनेट टिकटिंग सिस्टम में बदलाव करने की तैयारी में है। इस बदलाव का असर यह होगा कि एक लॉग इन पर एक वक्त में एक ही रेल टिकट लिया जा सकेगा , यानी ज्यादा से ज्यादा 6 यात्रियों के लिए टिकट बुक कराया जा सकेगा। इससे पहले रेलवे ने हाल ही में दलालों की उस कवायद पर भी लगाम लगाई है, जिसके तहत पहले से बुक टिकट में तारीख बढ़ाने के नाम पर फौरन ही दलाल टिकट बुक करा लेते थे।

इंडियन रेलवे के सूत्रों के मुताबिक रेलवे का कमर्शल विभाग अब नया नियम लागू करने की तैयारी में है, जिसके जरिए अब एक वक्त पर सिर्फ एक बार (अधिकतम 6 यात्रियों) ही टिकट बुक कराया जा सकेगा। रेलवे के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि रेल टिकटों की कालाबाजारी करने वाले दलाल एक बार लॉग इन कर लेते हैं, और फिर उस पर एक के बाद एक टिकट बुक करा लेते हैं। बाद में वे इन टिकटों को ब्लैक में बेचते हैं। हाल ही में इस तरह की जानकारी रेलवे के मेंबर ट्रैफिक अजय शुक्ला को मिली। इसके बाद शुक्ला ने ही इस सिस्टम में बदलाव के निर्देश दिए हैं।

रेलवे के सूत्रों का कहना है कि इस बारे में जल्द ही औपचारिक आदेश जारी किया जाएगा। इस आदेश के बाद इंटरनेट के जरिए टिकट लेने वाले को एक लॉग इन पर एक ही टिकट मिलेगा, यानी एक टिकट के तहत वह अधिकतम 6 यात्रियों के लिए टिकट बुक करा सकेगा। रेलवे का तर्क है कि आमतौर पर एक परिवार में 4 या ज्यादा से ज्यादा 6 लोग ही होते हैं। ऐसे में इन 6 लोगों का एक ही टिकट बुक हो सकता है। नई व्यवस्था होने से आम लोगों को तो दिक्कत नहीं होगी, लेकिन रेल टिकटों की कालाबाजारी करने वाले दलालों पर जरूर लगाम लगेगी, क्योंकि उन्हें एक से ज्यादा लोगों को अलग-अलग टिकट बेचनी होती है, तो उन्हें अलग-अलग पीएनआर की टिकट बुक करानी होती है। नई व्यवस्था में दलाल ऐसा नहीं कर सकेंगे। इस तरह से दलालों पर नकेल कसी जा सकेगी।

रेलवे सूत्रों का कहना है कि इसी तरह से उस सिस्टम को भी सुबह के वक्त एक घंटे के लिए बंद किया गया है, जिसके जरिए यात्री पहले से दर्ज ब्योरे के आधार पर फौरन टिकट के लिए एंट्री करके टिकट हासिल कर सकते थे। इससे दलाल तो फायदा उठा लेते थे, लेकिन आम जनता को इसके बारे में जानकारी नहीं होती थी। ऐसे में आम यात्री जब तक अपना पूरा ब्यौरा भरते, तब तक सारे टिकट ही बुक हो जाते थे।

साभार-टाईम्स ऑफ इंडिया से  

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क्या मोदीजी का सूट सूरत के विकास की नई कहानी लिखेगा?

पिछले महीने सूरत हीरा उद्योग ने एक नीलामी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विवादास्पद महीन धारियों वाला सूट 4.31 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि में खरीदा था, जो उसका एक रणनीतिक निवेश माना जाना चाहिए। इसका फायदा उसे भविष्य में कारोबारी मामलों में केंद्र के समर्थन के रूप में मिल सकता है। विशेष रूप से ऐसे समय में जब हीरे का कारोबारी केंद्र मुंबई के स्थान पर सूरत को बनाने को लेकर गहमागहमी बढ़ रही है।

देश से तराशे हीरों का जितना निर्यात होता है, उसमें मुंबई का योगदान करीब 90 फीसदी होता है। सूरत में हीरों के कारोबार के लिए एक्सचेंज बन रहा है, जिससे मुंबई का ज्यादातर कारोबार सूरत में जाने की संभावना है। स्थानीय उद्योग की मांग है कि देश में इस तरह का माहौल बने कि तराशकारों को भारत में ही कच्चे हीरे मिल जाएं। अभी उन्हें कच्चे हीरे खरीदने के लिए बेल्जियम, रूस और पश्चिम एशिया जाना पड़ता है।

हीरा तराशकार इस संबंध में पहले ही केंद्र से मदद की गुहार लगा चुके हैं। रत्नाभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) के आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में अप्रैल 2014 से जनवरी 2015 के बीच कटे एïवं तराशे हीरों का कुल निर्यात पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले 5 फीसदी घटकर 1.16 लाख करोड़ रुपये रहा है। ऐसी स्थिति में उद्योग की मांग पर विचार करना जरूरी है। सूरत के हीरा उद्योग के मोदी का सूट खरीदने के फैसले में परोपकार के साथ ही खुद का हित भी जुड़ा था।

साउथ गुजरात यूनिवर्सिटी में सामाजिक अध्ययन केंद्र के पूर्व निदेशक और समाजशास्त्री विद्युत जोशी के मुताबिक, 'हीरा कटाई करने वाले लोगों की पहली पीढ़ी 1970 के दशक में अकाल प्रभावित सौराष्ट्र आई थी और उन्होंने सूरत में जैन कारोबारियों के यहां काम करना शुरू किया था। उनमें से कुछ को उन दिनों हर महीने 10,000 रुपये तक वेतन मिलता था और इन नए अमीरों की कई तरह से प्रशंसा की गई।'

 

सूरत में हीरा कारोबारियों की वर्तमान पीढ़ी उन सौराष्ट्रवासियों की तीसरी पीढ़ी है और उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए न केवल अपने गांवों को धन मुहैया कराया, बल्कि आज के सूरत को बनाने में अहम भूमिका निभाई है। सूरत पुराने समय में बंदरगाह वाले शहर के रूप में फला-फूला और आज यह भारत में हीरा कारोबार का गढ़ है। यह गुजरात के स्वच्छ शहरों में से एक है। कंक्रीट से बनी चौड़ी-चौड़ी सड़कें साफ एवं स्वच्छ हैं। लोगों का कहना है कि सूरतवासियों ने 1994 में प्लेग के बाद स्वच्छता की अहमियत समझी है।

 

शहर के व्यापारी मुक्त-हस्त से दान कर रहे हैं, जिसकी बदौलत ही रियायती अस्पतालों समेत ये सामाजिक पहल हुई हैं। सूरत के अतिरिक्त कलेक्टर पी एन मकवाना कहते हैं, 'जब हमने बाढ़ प्रभावित कश्मीरी लोगों के लिए खाद्य पैकेट जुटाने का फैसला लिया तो सुबह योजना बनने के बाद दोपहर तक हवाई अड्डे से दो उड़ानें खाद्य पैकेट लेकर रवाना हो गई थीं।' नीलामी में प्रधानमंत्री का पिनस्ट्रीप सूट खरीदने वाले लालजीभाई पटेल की आंखों में हर कोई गर्व की चमक देख सकता है। वह कहते हैं कि मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सूरत के सीसीटीवी मॉडल के अध्ययन के लिए एक पुलिस टीम भेजी थी। पटेल ने कहा, 'हम पहले ही सभी ट्रैफिक सिग्नलों पर 600 कैमरे लगवा चुके हैं, जिस पर महज 30 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इससे एक साल के भीतर शहर में अपराध 27 फीसदी कम हो गए हैं।' पटेल अपने मोबाइल फोन में एक वीडियो दिखाते हैं, जिसमें वे प्रधानमंत्री के साथ सहज रूप से बातचीत कर रहे हैं।

 

खुद पटेल पहली पीढ़ी के कारोबारी हैं। उन्होंने 35 साल पहले एक हीरा तराशकार का काम शुरू किया था और आज उनका कारोबारी साम्राज्य 6,000 करोड़ रुपये का है। वह सौराष्ट्र में पाटीदार समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इस समुदाय ने एक-दूसरे को मुख्यधारा में लाने के लिए बहुत मदद की है और हीरे की तराशी के कारोबार को सामुदायिक कारोबार बना दिया है। इस समुदाय की न केवल सूरत को बनाने में अहम भूमिका रही है, बल्कि उनका गुजरात की राजनीति में तगड़ा दबदबा रहा है। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद खुद मोदी सूरत के विभिन्न हीरा कारोबारियों से मिलने उनके घर गए थे। इन कारोबारियों में से एक लालजीभाई का दावा है कि वह प्रधानमंत्री को 12 वर्षों से जानते हैं।

उस समय नए मुख्यमंत्री मोदी के लिए समुदाय से मजबूत रिश्ते रखना जरूरी था, जिन्होंने दिग्गज नेता केशुभाई पटेल की जगह ली थी। माना जाता है कि इस समुदाय ने बहुत से राजनेताओं को चुनाव लडऩे में वित्तीय मदद दी है। इस जुड़ाव के चलते सूरत में हुई नीलामी में मोदी के बहुप्रचारित बंदगला के लिए 4.31 करोड़ रुपये कीमत लगने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पटेल ने धर्मनंदन डायमंड्स के कॉरपोरेट कार्यालय के प्रवेश द्वार के दाहिनी ओर एक पुतले को यह सूट पहनाया हुआ है, जहां आगंतुक पुतले के साथ सेल्फी लेने में व्यस्त दिखाई देते हैं। इस सूट पर कई बार नरेंद्र दामोदरदास मोदी लिखा हुआ है। पटेल के लिए 4.31 करोड़ रुपये की राशि ज्यादा नहीं है, जिन्होंने सौराष्ट्र में अपने पैकृत गांव उगामेडी में पिछले साल जल परियोजना के लिए 12 करोड़ रुपये खर्च किए थे।

 

 

जिलाधीश के कार्यालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक वर्ष 2014 में पिछली नीलामी में मोदी के उपहार 2.18 करोड़ रुपये में बिके थे। उसमें 900 वस्तुओं की नीलामी की गई थी। शहर के दो छोटे हीरा कारोबारियों ने दावा किया कि इसी वजह से प्रधानमंत्री ने दिल्ली के बजाय सूरत को नीलामी के लिए चुना। एक कारोबारी ने कहा, 'वह जानते थे कि यहां के कारोबारियों से ज्यादा फंड जुटा सकेंगे। उन्होंने भविष्य में मोदी सरकार का समर्थन सुनिश्चित करने के लिए रणनीति निवेश किया है।' उद्योग को कई महत्त्वपूर्ण मसलों से निपटना होगा।

 

एसडीए के सचिव गणेश एन घेवरिया कहते हैं, 'अगर यहीं विक्रेता आ सकते हैं तो कच्चे हीरों के लिए बेल्जियम जाने की क्या जरूरत है? सरकार को केवल यह सुनिश्चित करना है कि देश से बिना बिके हीरों को बाहर ले जाने पर दो फीसदी सीमा शुल्क नहीं लगे।' पटेल इस बात को लेकर विश्वस्त हैं कि ये नियम जल्द बन जाएंगे और हीरा तराशकारों को कच्चा माल खरीदने के लिए रूस और बेल्जियम नहीं जाना होगा। शुरुआती झटकों के बाद प्रस्तावित सूरत डायमंड बुअर्स पटरी पर है। इसके लिए राज्य सरकार ने जमीन आवंटित कर दी है और इस महीने के प्रारंभ में शिलान्यास कर दिया गया है।   सूरत के हीरा कारोबारियों के लिए मार्जिन बढऩा जरूरी है, जो इस समय 3-4 फीसदी है। सूरत स्थित हीरा तराशकार और कारोबारी कीर्ति शाह ने कहा कि डॉलर में उतार-चढ़ाव और वैश्विक मंदी का उद्योग पर वर्ष 2008 से बुरा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा, 'सूरत में 6,000 इकाइयों में से करीब 70 फीसदी लघु इकाइयां हैं, जिनका सालाना कारोबार 2 से 15 करोड़ रुपये तक है। बहुत से कम क्षमता पर परिचालन कर रहे हैं, क्योंकि कच्चे माल में निवेश के लिए उनके पास पूंजी नहीं है।'

एसडीए के अध्यक्ष दिनेश नवादिया का दावा है कि कारोबारी उधार में कच्चा माल नहीं ले सकते हैं और अमेरिका से तराशे हीरे लाने के लिए प्रमाणपत्र लेने में 150 दिन लगते हैं। उन्होंने कहा, 'इसलिए तराशकारों के पास बैंकों से ऋण लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है।' हीरा कारोबार का केंद्र सूरत को बनाने का 1.85 लाख करोड़ रुपये के इस उद्योग के बहुत से कारोबारियों को फायदा मिलेगा।

 

साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से 

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ट्विटर पर बेशर्मी पर सेंसरशिप

माइक्रो ब्‍लॉगिंग साइट ट्विटर ने अपनी प्रायवेसी पॉलिसी में बदलाव करते हुए अश्लील फोटो पोस्‍ट करने पर बैन लगा दिया है। नए नियम के अनुसार अब कोई भी यूजर किसी अन्‍य व्‍यक्ति के अंतरंग फोटो और वीडियो उस व्‍यक्ति की अनुमति के बिना ट्विटर पर नहीं डाल पाएगा।

नया नियम ट्विटर के रूल पेज पर भी अपडेट कर दिया गया है। इससे पहले माइक्रो ब्‍लॉगिंग साइट ने एक नियम बनाया था जिसके अनुसार यूजर किसी अन्‍य व्‍यक्ति की अनुमति के बिना उसकी निजी और गुप्‍त जानकारी, जिसमें उसका क्रेडिट कार्ड नंबर, घर का पता, राष्‍ट्रीय पहचान नंबर नहीं शेयर कर सकते थे।

अगर कोई ऐसा करते पाया जाता है तो ट्विटर उसका अकाउंट बंद कर उसकी सारी जानकारी छिपा देता है। ट्विटर के अनुसार उसकी ट्रस्‍ट और सेफ्टी टीम जो इस तरह के मामले देखती है, वह 24 घंटे ऑनलाइन रह कर इस तरह के अनुरोधों का निपटारा करेगी।

पूर्व में ट्विटर के सीईओ डिक कॉस्‍टोलो ने यह स्वीकार किया था कि दुरूपयोग और शोषण के मामलों में साइट बेहद खराब हो जाती है। उस समय उन्‍होनें यह भी कहा था कि ऐसे यूजर जो साइट पर केवल दूसरों को परेशान करने के लिए आते हैं उनके लिए एक विशेष प्‍लान तैयार किया जा रहा है।

ट्‍िवटर के अलावा गूगल और रेडिट भी इस तरह के मामलों से निपटने के लिए कड़ा रुख अपनाने की तैयारी में थे। सोशल नेटवर्किंग और न्‍यूज साइट रेडिट ने कहा था कि वह अपनी साइट से सभी तरह के अश्लील फोटो, वीडियो और लिंक हटाएगा।

इसी तरह गूगल ने भी कहा था कि वह अपनी ब्‍लॉगर सर्विस पर मौजूद ज्‍यादातर अश्‍लील फोटो और वीडियो को बैन कर देगा। लेकिन कुछ समय बाद ही ब्‍लॉगर ने अपनी पॉर्न पॉलिसी बदल दी यह कहते हुए कि पॉलिसी अचानक बदलना उनके यूजर्स के साथ अन्‍याय होगा।

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पड़ोस में हो रही है हमारी घेराबंदी

वर्षों से चीन भारत को हिंद महासागर में 'मोतियों की माला" के माध्यम से घेरने की कोशिश करता रहा है। इसके तहत वह इस क्षेत्र में अपनी सुविधा के लिए नेटवर्क खड़ा करने के काम में जुटा हुआ है ताकि अपने सामरिक हितों को मजबूत कर सके और समुद्री क्षेत्र में पकड़ बढ़ा सके। चीन अब अपनी इस पुरानी नीति को अमलीजामा पहनाने के लिए समुद्री सिल्क रूट परियोजना के नाम से आगे बढ़ा रहा है। जाहिर है, इसके बहाने चीन की वास्तविक इच्छा कुछ और ही है। नया नामकरण भारत की चिंताओं के मद्देनजर किया गया है और इस बहाने चीन क्षेत्रीय प्रभुत्व कायम करने की कोशिश में है।

चीन की सिल्क रूट परियोजना एक लुभावना कदम है, जो 'मोतियों की माला" नीति के जैसी ही है। यह नीति इस योजना को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है कि एशिया की नई शक्ति व्यवस्था और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन को केंद्रीय स्थान दिलाया जा सके। इस परियोजना के माध्यम से चीन अपने तमाम पड़ोसी देशों के साथ मौजूदा समुद्री विवाद को हल करने के साथ ही क्षेत्रीय यथास्थिति को भी बदलने की कोशिश कर रहा है। कुल मिलाकर उसकी महत्वाकांक्षा यही है कि एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को नए सिरे से निर्धारित किया जाए।

चीन में सैन्य विज्ञान अकादमी के कर्नल बाओ झिउ के मुताबिक यह परियोजना वास्तव में तटवर्ती देशों को आर्थिक अवसर प्रदान करती है, जिसके माध्यम से चीन के साथ इन देशों का सुरक्षा सहयोग अधिक प्रगाढ़ हो सकेगा। इस पहल पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग की छाप है जिन्होंने सिल्क रूट के लिए 40 अरब डॉलर का कोष निर्धारित किया है। इसके अतिरिक्त इस परियोजना के लिए चीन द्वारा प्रायोजित एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक भी सहयोग कर रहा है। यह संस्था चीन को वित्तीय मदद देने, निवेश करने और अन्य आर्थिक सहूलियतें मुहैया कराती है, ताकि अन्य क्षेत्रीय देशों के साथ चीन की नजदीकी बढ़े। तटवर्ती देशों में चीन द्वारा बंदरगाहों का निर्माण, रेल संपर्क, हाईवे और पाइप लाइन बिछाने आदि का उद्देश्य भी क्षेत्रीय देशों को चीन की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ना है, जिसमें चीन को खनिज संसाधनों का निर्यात और चीन में बने सामानों का आयात शामिल है।

यदि समुद्री सिल्क मार्ग के सामरिक आयाम को देखा जाए तो यह चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को मजबूती प्रदान करता है। यह चीनी राष्ट्रपति की महत्वपूर्ण नीतिगत पहल है। उदाहरण के लिए चीन के नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में कार्यरत मेजर जनरल जी मिंगकुई अपने एक निबंध में लिखते हैं कि यह परियोजना चीन को नई पहचान देने के साथ ही उसके प्रभुत्व में विस्तार करेगी। विशेषकर अमेरिका की धुरी में एशिया को जाने से रोका जा सकेगा। हालांकि पीएलए विशेषज्ञ इस पहल को 'मोतियों की माला" नीति से जोड़कर देखने से इनकार करते हैं। वे सिल्क मार्ग योजना को 15वीं शताब्दी में झेंग हे से जाेडते हैं। झेंग हे चीनी एडमिरल थे, जो खजाने वाले जहाज के साथ अफ्रीका की नौसैनिक यात्रा पर गए थे। केंद्रीय सैन्य आयोग के सदस्य सुन जिंग और झेंग के मुताबिक प्राचीन सिल्क मार्ग में एक इंच जमीन पर भी कब्जा करने की कोशिश नहीं की गई, ना ही इसके माध्यम से समुद्री आधिपत्य कायम करने की कोशिश हुई।

हालांकि इतिहास गवाह है कि मुख्य समुद्री रास्तों पर सैन्य बलों के माध्यम से नियंत्रण स्थापित किया गया, जिसमें स्थानीय शासकों की भी मिलीभगत होती थी। वास्तव में 'मोतियों की माला" से समुद्री सिल्क मार्ग को मुश्किल से ही अलग किया जा सकता है। इसके माध्यम से तटवर्ती देशों में चीन द्वारा प्रायोजित इस परियोजना से चीनी सेना की मुखरता बढ़ेगी। इससे तटवर्ती देश चीन की एक समन्वित रणनीति का हिस्सा बन जाएंगे, जिससे इन देशों को प्रभावित किया जा सकेगा। चीन उन्हें यही समझा रहा है कि अगर चीन एशिया की सबसे बड़ी शक्ति बनता है तो यह उनके अपने हित में है। दूसरे शब्दों में समुद्री सिल्क मार्ग चीन की मोतियों की माला की उसकी छद्म रणनीति को शांति के नाम पर नए सिरे से आगे बढ़ा सकेगा।

चीन आर्थिक हितों के नाम पर अपने सैन्य लक्ष्यों को आगे बढ़ा रहा है। इसका पता इससे भी चलता है कि श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के पास चीन ने 50 करोड़ डॉलर की लागत से दो कंटेनर टर्मिनलों का नवनिर्माण किया है जहां उसने अलग से अपने दो युद्धपोतों को तैनात कर रखा है। इस टर्मिनल में अधिकांश स्वामित्व चीन की सरकारी कंपनियों के पास है। इन गतिविधियों के माध्यम से चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी स्थायी उपस्थिति बनाए रखने में समर्थ हुआ है। इसी तरह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर भी चीन ने अपनी पकड़ मजबूत करने के साथ ही अपनी उपस्थिति बना ली है। यह बंदरगाह सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण एक हारमुज जलडमरू के निकट स्थित है। चीन ने ग्वादर बंदरगाह का निर्माण केवल व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया है, बल्कि वह इसके माध्यम से नौसैनिक अड्डा स्थापित कर रहा है और महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर प्रभुत्व कायम कर रहा है।

श्रीलंका के दक्षिणी बंदरगाह हंबनटोटा के बाद चीन कोलंबो के पास 1.4 अरब डॉलर की राशि से छोटे-मोटे देश के बराबर की एक भूमि पर एक विशाल कांप्लेक्स बना रहा है। इस कांप्लेक्स में कई ऊंची इमारतें बनाई जाएंगी ताकि चीन के समुद्री रास्ते के लिए इसे ठहरने के एक बड़े स्थान के रूप में विकसित किया जा सके। पीएलए सैन्य विज्ञान अकादमी के मानद सदस्य झाउ बो स्वीकार करते हैं कि इस क्षेत्र में चीन की इस वृहत परियोजना से हिंद महासागर का राजनीतिक-आर्थिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल जाएगा और यहां चीन की सशक्त उपस्थिति होगी। यह चीन की मध्य एशिया नीति के लिए महत्वपूर्ण है।

कुल मिलाकर एशिया की नई क्रम-व्यवस्था पूर्व एशिया के घटनाक्रमों से निर्धारित नहीं होने वाली जहां जापान चीन के प्रभुत्व को रोकने के प्रति कृतसंकल्प है, बल्कि यह हिंद महासागर से निर्धारित होगी जहां बीजिंग भारतीय प्रभुत्व को खत्म करने के लिए लंबे समय से कार्य कर रहा है।

-लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।

 

साभार- दैनिक नईदुनिया से 

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आभूषण और पोशाक कश्मीर के गर्व

अपनी नैसर्गिक और अगाध खूबसूरती के लिए कश्मीर की वादियों का कवियों और गायकों ने भरपूर चित्रण किया है जिन्होंने इसे विभिन्न रस्मों, संस्कृतियों और जीने के तरीके का एक खुशनुमा स्थान बताया है। यहां की जमीन और लोगों की आत्मसात करने वाली प्रवृत्तियों ने जीवन का एक अनूठा दर्शन पैदा किया है जिसमें हर धर्म के बुनियादों को न केवल उचित जगह मिली है बल्कि पर्याप्त महत्व भी मिला है। कश्मीर को न केवल "धरती पर स्वर्ग" के रूप में जाना जाता है बल्कि अलग-अलग मजहबों और मूल्यों का पालन करने के बावजूद दुनिया भर में मानव मूल्यों के एक स्वर्ग के रूप में भी यह अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। कश्मीर के मूल तत्व की पहचान इसकी समृद्ध संस्कृति और गर्मजोशी से भरे लोगों से होती है। यह अपने शानदार आभूषणों और पोशाकों के लिए भी विख्यात है। घाटी में आभूषण न केवल उनके आतंरिक मूल्य और खूबसूरती के लिए पहने जाते हैं बल्कि उनके धार्मिक कारण भी होते हैं। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण कश्मीरी पंडितों की विवाहिता महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला खूबसूरत सोने का आभूषण देज-होर है।    

आभूषण

कश्मीर में आभूषण सोने के होते हैं लेकिन कभी-कभी खूबसूरती बढ़ाने के लिए उनकी बनावट और डिजाइन में दूधिये पत्थर, रक्तमणि, नीलमणि, फिरोजा और सुलेमानी पत्थर भी जड़ दिए जाते हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश रत्न क्षेत्र के बाहर से लाए जाते हैं लेकिन पन्ना, नीलमणि, सुलेमानी पत्थर और बिल्लौरी स्वदेशी हैं और जम्मू-कश्मीर राज्य के भीतर ही पाए जाते हैं।  

कश्मीरी संगतराश अपने फन में बहुत माहिर होते हैं और उनकी कारीगरी की जटिलता और महीनी के लिए उन्हें प्रशंसित किया जाना चाहिए। कश्मीर की मनमोहक खूबसूरती इसकी सभी कलाओं और शिल्पों में अभिव्यक्त होती है। गहनों के डिजाइन विशिष्ट होते हैं और दुनिया के किसी भी हिस्से में इनकी आसानी से पहचान की जा सकती है। प्रकृति इसके लघु चित्र कला रूप की डिजाइन में दिखती है। बादाम, चिनार के पत्ते और मैना और बुलबुल जैसे पक्षी महत्वपूर्ण हैं। 

कश्मीर में सुनार अपने काम को बेहद पसंद करता है और एक खूबसूरत चीज बनाने के लिए देर रात तक काम करता है। दिलचस्प बात यह है कि पंडितों और मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले ज्यादातर गहनों के रूप और आकार में काफी समानता होती है। कश्मीरी महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले कुछ प्रमुख आभूषण इस प्रकार हैं-

जिगनी और टीका ललाट पर पहने जाते हैं और आमतौर पर ये आकार में त्रिकोणीय, अर्द्ध-वक्राकार और वक्राकार होते हैं। ये सोने और चांदी से बने होते हैं और इनकी किनारी पर मोती और सोने की पत्तियां लटकती रहती हैं।

कान के गहनों के नाम अट्टा-हूर, कन-दूर, झुमका, देज-होर और कन-वजी होते हैं जिनमें फिरोजा जड़ा होता है और किनारी पर बॉल और सोने की पत्तियां लटकती रहती हैं। कन-वजी भी कान का एक गहना है जिनकी किनारी पर छोटे मोतियों के साथ विभिन्न रंगों के पत्थर जड़ें होते हैं। झुमका गेंद की आकार का कान में पहने जाने वाला एक गहना है।

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, देज-होर विवाहिता कश्मीरी पंडित महिलाओं के लिए एक अपरिहार्य गहना है जो इसे शादी अर्थात 'सुहाग' की एक निशानी के रूप में हमेशा पहने रहती हैं। अट्टा-होर विवाहिता कश्मीरी पंडित महिलाओं के सर के दोनों तरफ कान में लटका रहता है और सर के ऊपर से जाने वाले सोने की चेन के साथ जुड़ा रहता है। कन-दूर कान में पहने जाने वाला एक अन्य गहना है जिसे ज्यादातर लड़कियां पहनती हैं। ये गहने सोने और चांदी के बने होते हैं इनमें लाल और हरे रत्न या मोती जड़े होते हैं।
 
कश्मीर की पारंपरिक पोशाक
कश्मीर की पारंपरिक पोशाक अपनी कशीदाकारी और पेचदार डिजाइनों के लिए जानी जाती है जो राज्य की संस्कृति और प्राकृतिक दृश्यों की समृद्धि को परिलक्षित करती है। कश्मीर के पोशाकों की समानता अरब, ईरान और तुर्किस्तान में देखी जाती है। ऐसा विश्वास है कि सुलतान सिकंदर के शासनकाल में सैय्यद अली हमदानी ने इसे प्रचलित किया। कश्मीर घाटी के कश्मीरी पंडितों ने भी इसे अपना लिया। इसमें शरीर का निचला हिस्सा फारसी मूल के 'सलवार' नामक चौड़े पैजामे से ढका रहता था जबकि ऊपरी हिस्से में पूरे बांह की कमीज पहनी जाती थी। इसके ऊपर एक छोटा अंगरखा कोट होता था जिसे सदरी कहते थे। बाहरी लबादे को चोगा कहते थे जो नीचे टखनों तक आता था इसकी एक लंबी, ढीली आस्तीन होती थी और एक कमरबंद होता था। सर की पोशाक एक छोटे कपड़े से ढका छोटी चुस्त टोपी से बनी होती थी। इसी से पगड़ी बनती थी। त्यौहार के मौके पर सिल्क पहना जाता था। धनी और समाज के समृद्ध वर्गों के बीच पोशाक का ऐसा ही प्रचलन व्याप्त था।

गरीब वर्गों के लिए पोशाक में मध्य युग के बाद से कोई परिवर्तन नहीं आया है। पुरुष अपने मुंडे हुए सरों पर एक खोपड़ी नुमा टोपी पहनते थे पर पगड़ी नहीं बांधते थे। वे अपने शरीर को फेरन नामक एक लंबे ढीले ऊनी वस्त्र से ढकते थे जो गर्दन से लेकर कमर तक खुला होता था, कमर के पास वे एक पेटी बांधते थे और यह टखनों तक जाता था। जूते पूलहरु नामक घास से बने होते थे। कुछ लोग खड़ांउ नामक लकड़ी के चप्पल पहनते थे। महिलाओं की पोशाके भी पुरुषों जैसे होती थी फर्क इतना ही था कि उनके सिरों पर बांधने का एक फीता होता था और उसके ऊपर एक दुपट्टा होता था जो सिर से कंधों तक फैला होता था। कश्मीरी महिलाओं के सिर की पोशाक को कासबा बोलते थे। कश्मीरी पंडित महिलाएं भी कासबा का उपयोग करती थी लेकिन वे इसे तरंगा बोलती थीं जो स्त्रियों के पहनने की टोपी होती थी और यह पीछे से एड़ी तक फैली होती थी।
 
आज के जमाने की पोशाके
वर्तमान में कश्मीर में पोशाकों में बहुत परिवर्तन आया है। अन्य कई संस्कृतियों और समाजों की तरह कश्मीर ने भी जीने की आधुनिक पश्चिमी शैली अपना ली है। इस घुसपैठ के बावजूद समाज के सभी वर्गों द्वारा खासकर जाड़ों और राज्य के विषम मौसम में ठंड से मुक्ति पाने के लिए फेरन अवश्य पहना जाता है। एक कश्मीरी आमतौर पर जाड़ों के दौरान एक मौटे ऊनी कपड़े से बने फेरन तथा गर्मियों के दौरान सूती कपड़ों से बने फेरन को पहनकर प्रसन्न और गौरवान्वित महसूस करता है। अब यह पोशाक दूसरे राज्यों में भी लोकप्रिय हो गया है। फेरन को यहां आने वाले यात्रियों के बीच बेशुमार लोकप्रियता मिल रही है जिसे हमारे फिल्म उद्योग की हाल की कई बॉलीवुड फिल्मों में जगह मिली है।

एक कश्मीरी अपनी जमीन की अनूठी विरासत और पहचान से जुड़कर बहुत गर्व का अनुभव करता है। कश्मीर से बाहर देश के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले कश्मीरी पंडितों की    बहुसंख्यक आबादी अभी भी अपनी पारंपरिक पोशाक का उपयोग करना नहीं भूली है। उनमें से अधिकांश अभी भी खूबसूरत कश्मीरी आभूषण पहनते हैं। यहां यह अवश्य याद रखा जाना चाहिए कि सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक मूल्य शायद ही कभी मरते हैं। यह बात सभी पर लागू होती है।
 
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श्री सुनील कौल,  पीआईबी जम्मू में मीडिया एवं सूचना अधिकारी हैं।
 
 
फोटोग्राफ स्रोत : आर.ई. शॉर्टर द्वारा खिंची गई तथा एच.ए. नेवेल द्वारा 1921 में लिखे एक यात्रा विवरण में एक कश्मीरी पंडित महिला की छवि।

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सेंसर बोर्ड में तू-तू मैं मैं

फिल्म सेंसर बोर्ड की आपसी लड़ाई खुलकर सोशल मीडिया नेटवर्क पर आ गई है। बॉलीवुड फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है। पंडित का कहना है कि अध्यक्ष के मनमाने रवैये के चलते पूर्णता नग्नता पर आधारित चर्चित हॉलीवुड फिल्म 'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे' तो सिनेमाघरों के लिए हरी झंडी पा जाती है, लेकिन कई भारतीय फिल्में अजीबोगरीब फैसलों का शिकार हो जाती हैं।

अशोक पंडित ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा 'सेंसर बोर्ड प्रमुख निहलानी के कारण फिल्म सर्टीफिकेट (सीबीएफसी) को निजी मंसूबे पूरे करने का जरिया बना लिया गया है। एक के बाद एक कई फिल्में निहलानी के रवैये की शिकार हो रही हैं।'

पंडित ने  फिल्म 'एनएच 10' का उदाहरण देते हुए कहा 'इस बॉलीवुड थ्रिलर में एक युवा जोड़े को हाइवे पर जाते समय गैंग के हमले का शिकार होते दिखाया गया है। लेकिन निर्माता के 'ए' सर्टीफिकेट के लिए राजी होने के बावजूद इस फिल्म पर नौ कट लगाए गए। अभिनेत्री और निर्माता अनुष्का शर्मा से कहा गया कि वह फिल्म में हिंसा तीस फीसद तक कम कर दें। इस पर परेशान अनुष्का ने कहा कि भला फिल्म बनने के बाद यह कैसे हो सकता है।'

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अब केवल तिरंगा ही फहराएंगा जम्मू कश्मीर में

जम्मू। जम्‍मू-कश्‍मीर सरकार ने शुक्रवार को वह सर्कुलर वापस लेने का फैसला किया है, जिसमें कहा गया था कि राष्‍ट्रध्‍वज के साथ ही राज्‍य का ध्‍वज भी सरकारी वाहनों और सरकारी इमारतों में फहराया जाएगा। इसे एक दिन पहले ही सरकार ने सर्कुलर जारी कर कहा था कि सरकारी इमारतों और वाहनों में राष्‍ट्रध्‍वज के साथ ही राज्‍य का ध्‍वज भी फहराया जाएगा। यह आदेश्‍ा विवाद का विषय बन गया था।

हालांकि भाजपा ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 1952 से चली आ रही इस व्यवस्था से पार्टी को एतराज नहीं है, लेकिन इसे विपक्षी यह कहकर तूल दे रहा है कि यह मुफ्ती सरकार की भाजपा के मंत्रियों को राज्य का ध्वज लगाने की स्पष्ट हिदायत है।

ऐसे में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने गुरुवार को जारी आदेश को एक दिन बाद ही वापस ले लिया। सरकार की ओर से सफाई दी गई है कि आदेश संबंधित अथारिटी की मंजूरी के बिना ही जारी हो गया। जांच कर इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होगी।

सरकार के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर है कि राज्य का गणतंत्र दिवस उस दिन मनाया जाएगा जब राज्य का संविधान लागू हुआ था। याचिकाकर्ता ने यह मांग भी की है कि राज्य का ध्वज सरकारी कारों, कार्यालयों व भवनों पर लगाकर इसकी गरिमा बरकरार रखी जाए।

प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इस मामले में शपथ पत्र दायर करने के लिए न्यायालय ने सरकार को अंतिम मौका दिया था, ऐसे में शपथ पत्र दायर कर याचिककर्ता की दलीलों को चुनौती देने के साथ यह पक्ष रखना था कि सरकार जल्द इस बारे में आदेश जारी करेगी कि राज्य के ध्वज को भी राष्ट्रीय ध्वज की तरह सम्मान दिया जाए। ड्राफ्ट मंजूरी के बिना ही जारी कर दिया गया। लिहाजा अब इसे रद कर दिया गया है।

गौरतलब है कि गुरुवार को सरकार की ओर से जारी आदेश में राज्य के ध्वज को भी उसी तरह से इज्जत देने की बात की गई है जैसे राष्ट्रीय ध्वज को दी जाती है। आदेश आने के बाद इस मुद्दे पर सत्ताधारी पार्टियों को घेरने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

पैंथर्स पार्टी के सुप्रीमो प्रो. भीम सिंह ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा है कि आरएसएस के मंत्रियों के राज्य का ध्वज लगाने पर अब प्रधानमंत्री जवाब दें कि उनकी पार्टी ने पीडीपी को समर्थन क्यों दिया।

वहीं शुक्रवार शाम भाजपा मुख्यालय में पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सुनील सेठी ने सरकारी आदेश पर कहा कि यह कोई मुद्दा नहीं है, राई को पहाड़ बनाया जा रहा है

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उज्जैन के सिंहस्थ के लिए 150 गाईड तैयार होंगे

सिंहस्थ 2016 में आने वाले पर्यटकों को उज्जैन और महाकाल से जुड़ी रोचक जानकारियां ट्रेंड 150 गाइड देंगे। पर्यटन विभाग इन गाइड को प्रशिक्षित कर रहा है। इन्हें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टूरिज्म एंड ट्रेवल मैनेजमेंट (ग्वालियर) सर्टिफिकेट जारी करेगा। अभी 40 गाइडों को सर्टिफिकेट दिए जा चुके हैं।

यह घोषणा पर्यटन विकास निगम के प्रबंध संचालक अश्विनी लोहानी ने होटल और ट्रैवर्ल्स एसोसिएशन और पर्यटन निगम के अफसरों की बैठक में की। गाइड को मप्र टूरिज्म के होटल और रिसॉर्ट के अलावा आसपास के होटल में रखा जाएगा, ताकि पर्यटक इनसे संपर्क कर उज्जैन को जान सकें।

बाद में मांडव और महेश्वर में रहेंगे गाइड

सिंहस्थ के बाद इन गाइड को मांडव, महेश्वर, ओंकारेश्वर, अमरकंटक, सांची समेत अन्य टूरिस्ट प्लेस पर भेजा जाएगा। साथ ही स्थानीय लोगों को भी ट्रेनिंग दी जाएगी।

आसपास के होटल भी जुड़ेंगे

सिंहस्थ के लिए पर्यटन विभाग उज्जैन और आसपास के होटलों को अपने साथ जोड़ेगा, ताकि पर्यटकों को ठहरने और खाना खाने की बेहतर सुविधाएं मिल सकें। इसके लिए ज्यादातर होटल संचालकों ने अपनी सहमति दे दी है।

बॉक्स

25 स्थानों पर होंगे ढाबे

पर्यटन विभाग प्रदेशभर में हाइवे पर छोटे-छोटे ढाबे भी खोलेगा, जिससे पर्यटकों को अच्छा खाना मिल सके। ये ढाबे निजी हाथों में दिए जाएंगे, लेकिन खाने का स्तर टूरिज्म तय करेगा। इसके लिए टेंडर बुलाए जाएंगे।

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