Home Blog Page 1952

हिन्दी सेवी जगदीप सिंह डांगी का नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्डस 2015 में दर्ज हुआ

जगदीप सिंह डांगी, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, प्रौद्योगिकी अध्ययन केंद्र, भाषा विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा का नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्डस 2015 में दर्ज किया गया है। यह सम्मान प्रो. डांगी को हिंदी के प्रथम वर्तनी परीक्षक सॉफ़्टवेयर ‘सक्षम’ को विकसित करने पर दिया गया। इससे पहले भी इनका नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्डस 2007 में हिंदी के प्रथम इंटरनेट एक्सप्लोरर आई-ब्राउज़र++ को विकसित करने पर दर्ज किया जा चुका है। ‘सक्षम’ यूनिकोड समर्थित ऐसा पहला ख़ास वर्तनी परीक्षक सॉफ़्टवेयर है जोकि यूनिकोड समर्थित एम.एस. विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम आधारित एम.एस. वर्ड के सभी ऑफिस संस्करणों के साथ में लिंक होकर कार्य करने में पूर्ण सक्षम है।
क्या है सक्षम सॉफ़्टवेयर?
सक्षम – यूनिकोड हिंदी देवनागरी हेतु वर्तनी परीक्षक
Saksham – Unicode Based Devanagari Hindi Spell Check Software
यह यूनिकोड फ़ॉन्ट आधारित देवनागरी हिंदी पाठ के लिए वर्तनी परीक्षक सॉफ़्टवेयर है। इसके माध्यम से यूनिकोड फ़ॉन्ट आधारित देवनागरी हिंदी में लिखे गए पाठ की वर्तनी को जाँचने, सुधारने एवं संशोधन करने में सहायता मिलती है। यह पाठ के शब्दों की वर्तनी में हुई अशुद्धियों को हाईलाइट करते हुए शब्दों की लगभग सभी शुद्ध वर्तनियों को दर्शाता है। यह विंडोज़ के एम.एस. वर्ड सॉफ़्टवेयर के अंदर कार्य करने में पूर्ण सक्षम है। वर्तमान में इसके अंदर हिंदी के 1 लाख शब्द संगृहीत हैं भविष्य में लगभग पाँच लाख मानक शब्द संगृहीत करने का लक्ष्य है। 

सक्षम सॉफ़्टवेयर की विशेषताएँ:- 
1.    विंडोज़ के एम.एस. वर्ड सॉफ़्टवेयर के अंदर कार्य करने में पूर्ण सक्षम है।
2.    यह यूनिकोड आधारित मानक हिंदी के लिए पहला वर्तनी परीक्षक सॉफ़्टवेयर है। 
3.    सॉफ़्टवेयर का संपूर्ण इंटरफ़ेस देवनागरी लिपि (हिंदी भाषा) में है। 
4.    यह यूनिकोड फ़ॉन्ट आधारित देवनागरी एवं रोमन फ़ॉन्ट में लिखे हुए द्विभाषी पाठ में से यह रोमन फ़ॉन्ट में लिखे हुए पाठ को छोड़ कर सिर्फ़ देवनागरी पाठ की वर्तनी जाँचने में पूर्ण सक्षम है। 
5.    तालिका के रूप में लिखे हुए पाठ पर भी यह सॉफ़्टवेयर कार्य करने में पूर्ण सक्षम है। 
6.    यह परीक्षण के दौरान प्राप्त अशुद्ध वर्तनी वाले शब्द को हाईलाइट करता है एवं उक्त अशुद्ध वर्तनी वाले शब्द के लिए कुछ शुद्ध वर्तनी युक्त संभावित शब्दों का सुझाब भी देता है। 
7.    परीक्षण के दौरान हाईलाइट वाले शब्द को उपयोगकर्ता अपने शब्दकोश में सम्मिलित भी कर सकता है और उसे छोड़ भी सकता है इसके लिए उपयुक्त कमांड कुंजियाँ दी गईं हैं।

इससे पूर्व भी प्रो. डांगी ने हिंदी के लिए कई महत्वपूर्ण सॉफ़्टवेयर विकसित किए हैं। जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है:-
1.    प्रखर देवनागरी फ़ॉन्ट परिवर्तक (अस्की/इस्की फ़ॉन्ट से यूनिकोड फ़ॉन्ट में परिवर्तन हेतु) 
2.    यूनिदेव (यूनिकोड फ़ॉन्ट से अस्की/इस्की फ़ॉन्ट में परिवर्तन हेतु) 
3.    शब्द-ज्ञान (यूनिकोड आधारित हिंदी-अँग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश) 
4.    प्रखर देवनागरी लिपिक (यूनिकोडित रेमिंगटन टंकण प्रणाली आधारित) 
5.    प्रलेख देवनागरी लिपिक (यूनिकोडित फ़ॉनेटिक इंग्लिश टंकण प्रणाली आधारित) 
6.    आई-ब्राउज़र++ (प्रथम हिंदी इंटरनेट एक्सप्लोरर) – लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्डस – 2007 में दर्ज 
7.    अँग्रेज़ी-हिंदी शब्दानुवादक (ग्लोबल वर्ड ट्रांसलेटर) 
8.    शब्द-संग्राहक 
9.    शब्दकोश (हिंदी-अँग्रेज़ी-हिंदी) 
10.    वर्धा हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी)

परिचय:-
जगदीप सिंह दांगी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में एसोसिएट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनका हिंदी सॉफ़्टवेयर विकास कार्य उल्लेखनीय है। वे निरंतर 12 वर्षों से हिंदी भाषा में कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर का विकास कार्य कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत किया गया है और उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्डस – 2007 में ससम्मान दर्ज किया गया है। प्रो. दांगी के अनेक साक्षात्कार राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के समाचार चैनल, वेब-साइट्स एवं पत्र-पत्रिकाओं में समय समय पर प्रकाशित किए गए हैं। उनका प्रयास हिंदी भाषा को सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूर्ण रूप से स्थापित कर अन्य सभी भाषाओं के साथ संयोजन स्थापित करने का है। — 

.

मोदीजी भारत सरकार में हिन्दी के अच्छे दिन कब आएँगे

महोदय/महोदया,

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (रअविस) अथवा डीआरडीओ का प्रतीक चिह्न द्विभाषी रूप में नहीं है जबकि राजभाषा अधिनियम के अनुसार इसे पूर्णतः द्विभाषी होना चाहिए। 

रअविस अपनी बैठकों/कार्यक्रमों के बैनर/पोस्टर एवं अतिथि नाम पट  केवल अंग्रेजी में तैयार करता है जबकि भारत अब अंग्रेजों का गुलाम नहीं हैं और राजभाषा कानून भी स्पष्ट है.राजभाषा अधिनियम कहता है भारत सरकार के हर कार्यालय /निकाय के लिए यह अनिवार्य है कि 'क' क्षेत्र में होने वाले सभी कार्यक्रमों/बैठकों (राष्ट्रिय /अंतरराष्ट्रीय) के बैनर/पोस्टर/आमंत्रण -पत्र/ अतिथि नामपट अनिवार्य रूप से द्विभाषी (हिन्दी-अंग्रेजी में एकसाथ) बनाए/छपवाए जाएँ और 'ख' एवं ''ग' क्षेत्र में त्रिभाषी रूप में (प्रांतीय भाषा /हिन्दी /अंग्रेजी एकसाथ). 

रअविस की हिंदी वेबसाइट पर अद्यतित नहीं की जा रही है और हिंदी वेबसाइट पर सभी अन्य पीडीएफ फाइलें केवल अंग्रेजी में हैं. 

उदाहरण के लिए हाल ही आयोजित निम्न कार्यक्रमों के लिए के बैनर/पोस्टर एवं अतिथि नाम पट केवल अंग्रेजी में छपवाए गए गए, चित्र भी इसी क्रम में संलग्न हैं:

१. अग्नि, विस्‍फोटक एवं पर्यावरण सुरक्षा केन्‍द्र की निदेशक डा. चित्रा राजगोपाल 08 मार्च, 2015 को नई दिल्‍ली में अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ''अनुसंधान और विज्ञान में उत्‍कृष्‍ट महिला नवाचारक'' विषय पर राष्‍ट्रीय कार्यशाला के दौरान विजेता-2015 चुनी गई माउंट एवरेस्‍ट पर चढ़ने वाली पहली निशक्‍त महिला सुश्री अरुणिमा सिन्‍हा को एक स्‍मृति चिह्न भेंट करती हुई।
२. योजना (स्वतंत्र प्रभार) और रक्षा राज्य मंत्री श्री राव इंद्रजीत सिंह और भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम राज्य मंत्री श्री जी.एम. सिद्धेश्वरा 16 फरवरी, 2015 को बेंगलुरू में "एयरोस्पेस: विजन 2050" पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर 'संगोष्ठी स्मारिका' और 'उपयुक्तता और प्रमाणन' पर एक विशेष अंक का विमोचन करते हुए।
३. पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम 18 दिसंबर, 2014 को अवाड़ी, चेन्नई में कॉम्‍बेट व्‍हीकल्‍स रिसर्च एंड डवलपमेंट (सीवीआरडीई) में दो दिवसीय नेशनल कांफ्रेंस ऑन कंडीशन मॉनटरिंग (एनसीसीएम)-2014 के उद्घाटन के बाद मुख्य संबोधन करते हुए.

कृपया राष्ट्रपति जी के आदेशों एवं राजभाषा कानून का पालन करवाएँ।

भवदीय, 
प्रवीण जैन 
ए -103, आदीश्वर सोसाइटी, 
श्री दिगंबर जैन मंदिर के पीछे,
सेक्टर-9ए, वाशी, नवी मुंबई – 400 703

.

बेटे के हाथ नहीं रहे तो पिता ने बनवा ली बगैर हैंडल वाली साइकिल

अब्दुल कादिर रतलाम में रहते हैं। उनके पिता हुसैन इंदौरी ने बताया, 'अब्दुल कादिर को साइकिल चलाने का बेहद शौक था। साल भर पहले ही उसे नई साइकिल ला कर दी थी, एक-दो बार ही साइकिल चलाई थी कि भोपाल में करंट लगने के कारण हाथ चले गए। हाथ गंवाने के बाद अकसर उसे साइकिल चलाने का मन होता था। दूसरे बच्चों को साइकिल चलाते हुए देखता था तो रोता था। उसके इस शौक को पूरा करने के लिए बाजार में ऐसी साइकिल ढूंढी जो बिना हाथ के चलाई जा सके, लेकिन नहीं मिली। फिर इंटरनेट पर सर्च किया तो विदेशों में इस तरह के मॉडल दिखे। रतलाम के ही एक कारिगर काे ऐसी साइकिल बनाने का आइडिया दिया तो वह साइकिल बनवाने के लिए तैयार हो गया। हमने काम शुरू किया। बैलेंस का गणित बिठाया। यह भी ध्यान रखा कि साइकिल मुड़ते समय बैलेंस न बिगड़े। चार से पांच बार ट्रायल किया और दस दिन में तीन पहियों वाली साइकिल तैयार कर ली। अब अब्दुल कादिर खुद साइकिल चलाता है।'

हुसैन इंदौरी बताते हैं, 'साइकिल का ज्यादातर काम कारिगर सरफराज शैख ने ही किया। मेरा काम अाइडिया देने और बैलेंस बनवाने का रहा। जब हम घर पर साइकिल तैयार कर रहे थे तो अब्दुल कादिर भी हमें सजेशन देता था। अब्दुल की सेफ्टी के लिए हमने साइकिल में सीट बेल्ट भी लगाया। वहीं साइकिल में पैर से ब्रेक लगा सकते हैं।'

हुसैन इंदौरी ने बताया, "बेटा अब्दुल कादिर बीते साल 20 मई को राजधानी की हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में रहने वाले रिश्तेदार के यहां आया था। 24 मई की दोपहर वह मकान की छत पर खेल रहा था। तभी, छत के ऊपर से निकली हाइटेंशन लाइन को उसने पकड़ लिया था। हादसे में अब्दुल के दोनों हाथ झुलस गए थे। हादसे के बाद भोपाल के अस्पतालों में कराए इलाज से आराम नहीं मिलने पर, उसे मुंबई के मासीना हॉस्पिटल में भर्ती कराया था। इलाज के दौरान झुलसे हुए हाथों में संक्रमण बढ़ने पर डॉक्टरों ने उसके दोनों हाथ कंधे से काट दिए थे।"

 
हुसैन इंदौरी बताते हैं, "अब्दुल कादिर के इलाज में 8 से 9 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। कृत्रिम हाथ लगवाने का खर्च अब 13 लाख रुपए आ रहा है। इसलिए पिछले दिनों मुख्य सचिव से मिलकर मदद के लिए गुजारिश की थी। मुख्य सचिव एंटोनी डिसा को बेटे के कटे हाथों के स्थान पर आर्टिफिशियल इलेक्‍ट्रॉनिक हाथ लगवाने पर 13.5 लाख रुपए खर्च आने का दिल्ली के निजी अस्पताल का कोटेशन दिया था। इस पर उन्होंने बेटे को सरकारी खर्च पर आर्टिफिशियल इलेक्‍ट्रॉनिक हाथ लगवाने का आश्वासन दिया है। हालांकि इस बात को दो महीने बीत चुके हैं लेकिन अब तक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है।''

साभार- दैनिक भास्कर से 

.

घोटाले के आरोपी बदहवास मनमोहन सिंह भाजपा नेताओं से रास्ता पूछ रहे हैं

क्या पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पहले से ही मालूम था कि वह कोयला घोटाला मामले में फंसने जा रहे हैं? खबर सामने आई है कि इसी साल जनवरी में कोलगेट केस में पूछताछ के बाद मनमोहन सिंह इतने घबरा गए थे कि उन्होंने बीजेपी के टॉप लीडर्स से संपर्क किया था । हमारे सहयोगी न्यूज चैनल टाइम्स नाउ के मुताबिक मनमोहन ने किसी तरह का आश्वासन हासिल करने के लिए बीजेपी के शीर्ष नेताओं से व्यक्तिगत स्तर पर संपर्क किया था।

टाइम्स नाउ के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी ने बताया कि बीजेपी के एक टॉप नेता ने उन्हें जानकारी दी है कि मनमोहन सिंह ने बीजेपी के नेताओं से संपर्क किया था । बीजेपी के इस टॉप नेता के मुताबिक मनमोहन ने तब संपर्क किया था, जब उनसे सीबीआई ने पूछताछ की थी। वह बहुत परेशान लग रहे थे और एक तरह से कोई आश्वासन चाहते थे। बीजेपी नेता के मुताबिक मनमोहन को इस बात की चिंता सता रही थी कि कहीं उन पर कोई आंच तो नहीं आएगी। बीजेपी नेता के मुताबिक उन्हें इस बात का भरोसा दिलाया गया था कि इस केस में बदले की भावना से कोई काम नहीं हो रहा है।

अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि मनमोहन सिंह ने खुद फोन करके बीजेपी नेताओं से संपर्क किया था या फिर किसी शख्स के माध्यम से। यह वाकया 20 जनवरी से लेकर 5 फरवरी के बीच का है।
मिलती-जुलती खबरें

स्पेशल सीबीआई जज भारत पराशर ने 8 आरोपियों को 8 अप्रैल को पेश होने के लिए समन भेजा है। इन्हें आईपीसी की धाराओं 120बी (आपराधिक साजिश) और 409 (पब्लिक सर्वेंट, बैंकर, मर्चेंट या एजेंट द्वारा जनता का भरोसा तोड़ना) जैसी धाराओं और प्रिवेंशन ऑफ करपप्शन ऐक्ट के प्रावधानों के तहत आरोपी बनाया गया है। दोषी पाए जाने पर अधिकतम उम्रकैद तक हो सकती है।

साभार-टाईम्स ऑफ इंडिया से 

.

मॉरीशस में मोदीजी का हिन्दी भाषण, क्या खुद पीएमओ और केंद्र के मंत्री इससे प्रेरणा लेंगे

मॉरिशस में विश्व हिंदी सचिवालय के भवन निर्माण आरम्भ पर प्रधानमन्त्री  श्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्य का मूल पाठ

सर जगन्‍नाथ जी, मारीशस सरकार के मंत्रीपरिषद के सभी महानुभाव, सभी वरिष्‍ठ नागरिक भाईयों और बहनों, 

सर जगन्‍नाथ जी ने कहा कि छोटे भारत में भारत के प्रधानमंत्री का स्‍वागत करता हूं। ये लघू भारत शब्‍द सूनते ही पूरे तन मन में एक वाइब्रेशन की अनुभूति होती है, एक अपनेपन की अनुभूति होती है। एक प्रकार से 1.2 मिलियन के देश को 1.2 बिलियन का देश गले लगाने आया है। ये अपने आप में हमारी सांस्‍कृतिक विरासत है। हम कल्‍पना कर सकते हैं कि सौ डेढ़ सौ साल पहले हमारे पूर्वज यहां श्रमिक के रूप में आए और साथ में तुलसीदासकृत रामायण, हनुमान चालीसा और हिंदी भाषा को ले करके आए। इन सौ डेढ़ सौ साल में अगर ये तीन चीज़ें न होती और बाकी सब होता, तो आप कहां होते और मैं कहां होता, इसका हम अंदाज कर सकते हैं। इसे हमने बचाए भी रखा है, बनाए भी रखा है और जोड़ करके भी रखा है। 

1975 में, जब नागपुर में विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन हुआ तब श्री शिवसागर जी वहां आए थे और आपने उस समय प्रस्‍ताव रखा था, एक विश्‍व हिंदी सचिवालय होना चाहिए। 1975 में इस विचार को स्‍वीकार किया गया था, लेकिन उस बात को आगे बढ़ते-बढ़ते सालों बीत गए। और मैं मानता हूं कि आज विश्‍व सचिवालय की एक नई इमारत का शिलान्‍यास हो रहा है, तो उसकी खुशी विश्‍वभर में फैले हिंदी प्रेमियों को तो होगी ही होगी, लेकिन मुझे विश्‍वास है कि सर शिवसागर जी जहां कहीं भी होंगे, उनको अति प्रसन्‍नता होगी कि उनके सपनों का यह काम आज साकार हो रहा है। 

जब अटल जी की सरकार थी तो 1975 के विचार को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास हुआ। डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी यहां आए थे। फिर बाद में गाड़ी में रूकावट आ गई और शायद ये काम मेरे ही भाग्‍य में लिखा था। लेकिन मैं चाहूंगा कि अब ज्‍यादा देर न हो। आज जिसकी शुरूआत हो, अभी तय कर लें कि इतनी तारीख को उसका उद्घाटन हो जाए। 

मॉरीशस ने हिंदी साहित्‍य की बहुत बड़ी सेवा की है। बहुत से सार्क देशों में हिंदी भाषा के प्रति प्रेम रहा है। अनेक भाषा भाषी लोगों ने हिंदी भाषा को सीखा है। दूनिया की अनेक युनिवर्सिटीज़ में हिंदी सिखाई जाती है। कई पुस्‍तकों का हिंदी में अनुवाद हुआ है। कई भाषाओं की किताबों का अनुवाद हुआ है। लेकिन जैसे मूर्धन्‍य साहित्‍यकार दिनकर जी कहते थे कि मॉरीशस अकेला एक ऐसा देश है जिसका, उसका अपना हिेंदी साहित्‍य है। ये मैं मानता हूं, बहुत बड़ी बात है। 

अभी 2015 का प्रवासी भारतीय दिवस हुआ। इस बार के प्रवासी भारतीय दिवस में कार्यक्रम रखा गया था कि प्रवासी भारतीयों के द्वारा जो साहित्‍य सर्जन हुआ है, उसकी एक प्रदर्शनी लगाई जाए। दूनियाभर में फैले हुए भारतीयों ने जो कुछ भी रचनाएं की हैं, अलग-अलग भाषा में की हैं, उसकी प्रदर्शनी थी। और मैं आज गर्व से कहता हूं कि विश्‍वभर में फैले हुए भारतीयों के द्वारा लिखे गए साहित्‍य की इस प्रदर्शनी में डेढ़ सौ से ज्‍यादा पुस्‍तकें मॉरीशस की थीं। यानि यहां पर हिंदी भाषा को इतना प्‍यार किया गया है, उसका इतना लालन-पालन किया गया है, उसको इतना दुलार मिला है, शायद कभी कभी हिंदुस्‍तान के भी कुछ इलाके होंगे जहां इतना दुलार नहीं मिला होगा जितना मॉरीशस में मिला है। 

भाषा की अपनी एक ताकत होती है। भाषा भाव की अभिव्‍यक्ति का एक माध्‍यम होता है। जब व्‍यक्ति अपनी भाषा में कोई बात करता है, तब वो दिमाग से नहीं निकलती है, दिल से निकलती है। किसी और भाषा में जब बात की जाती है तो पहले विचार, दिमाग में ट्रांसलेशन चलता है और फिर प्रकट होता है। सही शब्‍द का चयन करने के लिए दिमाग पूरी डिक्‍शनरी छान मारता है और फिर प्रकट होता है। लेकिन, अपनी भाषा भाव की अभिव्‍यक्ति का बहुत बड़ा माध्‍यम होती है। जयशंकर राय ने कहा था कि मारीशस की हिंदी.. ये श्रमिकों की भक्ति का जीता जागता सबूत है। ये जयशंकर राय ने कहा था। 

और मैं मानता हूं कि मॉरीशस में जो हिंदी साहित्‍य लिखा गया है, वो कलम से निकलने वाली स्‍याही से नहीं लिखा गया है। मॉरीशस में जो साहित्‍य लिखा गया है, उस कलम से, श्रमिकों की पसीने की बूंद से लिखा गया है। मॉरीशस जो हिंदी साहित्‍य है, उसमें यहां के पसीने की महक है। और वो महक आने वाले दिनों में साहित्‍य को और नया सामर्थ्‍य देगी। और जैसा मैंने कहा कि भाव की अभिव्‍यक्ति .. हर भाषा का भाषातंर संभव नहीं होता है। और भाव का तो असंभव होता है। 

जैसे हमारे यहां कहा गया है- "राधिका तूने बांसूरी चुराई।" अब यहां बैठे हुए जो लोग भी हिंदी भाषा को जानते हैं, उन्‍हें पूरी समझ है कि मैं क्‍या कह रहा हूं। “राधिके तूने बांसूरी चुराई।“ लेकिन यही बात बहुत बढिया अंग्रेजी़ में मैं ट्रांसलेट करके कहूंगा तो ये कहूंगा कि “Radhika has stolen the flute. Go to police station and report.” भाषा भाव की अभिव्‍यक्ति का एक बहुत बड़ा माध्‍यम होता है। भाषा से अभिव्‍यक्‍त होने वाले भाव सामर्थ्‍य भी देते हैं। हम हमारे प्रधानमंत्री श्री अनिरूद्ध जगन्‍नाथ जी को जानते हैं। नाम भी बोलते हैं लेकिन हमें पता नहीं होगा शायद कि जगन्‍नाथ में से ही अंग्रेजी डिक्‍शनरी में एक शब्‍द आया है और मूल शब्‍द वो जगन्‍नाथ का है.. और अंगेज़ी में शब्‍द आया है- Juggernaut. यानी ऐसा स्रोत,ऐसी शक्ति का स्रोत जिसे रोका नहीं जा सकता। इस के लिए और अंगेज़ी में शब्‍द आया है- Juggernaut. ये जगन्‍नाथ से गया है। 

क्योंकि जब पुरी में जगन्‍नाथ जी यात्रा निकलती है और जो दृश्‍य होता है, उसमें जो शब्‍द वहां पहुंचा है। मैं एक बार Russia के उस क्षेत्र में गया जो हिंदूस्‍तान से सटा हुआ है। वहां के लोगों को tea शब्‍द पता नहीं है लेकिन चाय पता है। Door मालूम नहीं लेकिन द्वार पता है। कभी कभार ये भी अवसर होता है। 

और मैं चाहूंगा कि ये जो हमारा विश्‍व हिंदी सचिवालय जो बन रहा है, वहां टेक्‍नॉलॉजी का भी भरपूर उपयोग हो। दूनिया की जितनी भाषाओं में हिंदी ने अपनी जगह बनाई है, किसी न किसी रूप में, पिछले दरवाजे से क्‍यों न हो, लेकिन पहूंच गई है, उसको भी कभी खोज कर निकालना चाहिए कि हम किस किस रूप में पहुंचे और क्‍यों स्‍वीकृति हो गई। विश्‍व की कई भाषाओं में हमारी भाषा के शब्‍द पहुंचे हैं। जब ये जानते हैं तो हमें गर्व होता है। ये अपने आप में एक राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान का कारण बन जाता है। 

विश्‍व में फैले हुए हिंदी प्रेमियों के लिए ये आज के पल अत्‍यंत शुभ पल हैं। आज 12 मार्च है, जब मॉरीशस अपना राष्‍ट्रीय दिवस मना रहा है। मैं मॉरीशस के लिए सवा सौ करोड़ देशवासियों की सवा सौ करोड़ शुभकामनाएं ले करके आया हूं। 

आज का वो दिन है, 12 मार्च,1930, जब महात्‍मा गांधी ने साबरमती के तट से दांडी यात्रा का आरंभ किया था। दांडी यात्रा भारत की आज़ादी के आंदोलन का एक turning point बनी थी। उसी साबरमती के तट से निकला था जिस साबरम‍ती का पानी पीकर मुझे भी तो बड़े होने का सौभाग्‍य मिला है। आज उसी 12 मार्च को ये अवसर आया है। महात्‍मा गांधी मॉरीशस आए थे। महात्‍मा गांधी ने मॉरीशस को भरपूर प्‍यार दिया था। सौ साल पहल.. महात्‍मा गांधी से जिनको बहुत प्रेम रहता था, एसे मणिलाल डॉ.. सौ वर्ष पूर्व उन्‍होंने यहां पर हिंदी अख़बार शुरू किया था.. हिंदुस्‍तानी। उस अख़बार की यह विशेषता थी.. कि अभी भी जब कुछ लोग भाषाओं के झगड़े करते हैं, लेकिन उस डॉ मणिलाल ने महात्‍मा गांधी की प्रेरणा से रास्‍ता निकाला था। वो हिंदुस्‍तानी अखबार ऐसा था जिसमें कुछ पेज गुजराती में छपते थे, कुछ हिंदी में छपते थे और कुछ अंग्रेज़ी में छपते थे और एक प्रकार से three language formula वाला वो अख़बार सौ साल पहले निकलता था। 

लेकिन वो हिंदुस्‍तानी अख़बार मॉरीशस के लोगों को जोड़ने का एक बहुत बड़ा माध्‍यम बना हुआ था। तो महात्‍मा गांधी के विचारों का प्रभाव उसमें अभिव्यक्त होता था। और स्‍वदेश प्रेम स्‍वदेशी भाषा से उजागर हो जाता है। अपनी भाषा से उजागर होता है। भाषा के बंधनों में बंधन वाले हम लोग नहीं हैं। हम तो वो लोग हैं जो सब भाषाओं के अपने गले लगाना चाहते हैं, क्‍योंकि वही तो समृद्धि का कारण बनता है। अगर अंग्रेजी ने जगन्‍नाथ को गले नहीं लगाया होता तो juggernaut शब्‍द पैदा नहीं होता। और इसलिए, भाषा की सम़द्धि भी बांधने से बंधती नहीं है। एक बगीचे से जब हवा चलती है तो हवा उसकी सुगंध को फैलाती जाती है। भाषा की भी वो ताकत होती है कि वो अपने प्रवाह के साथ सदियों तक नई चेतना, नई उर्जा, नया प्राण प्रसारित करती रहती है। 

उस अर्थ में आज मेरे लिए बड़ा गर्व का विषय है कि मॉरीशस की धरती पर विश्‍व हिंदी सचिवालय के नए भवन का निर्माण हो रहा है। भाषा प्रेमियों के लिए, हिंदी भाषा प्रेमियों के लिए, भारत प्रेमियों के लिए, और महान विरासत जिस भाषा के भीतर नवप‍ल्‍लवित होती रही है, उस महान विरासत के साथ विश्‍व को जोड़ने का जो प्रयास हो रहा है, उसको मैं बहुत बहुत शुभकामनाएं देता हूं। और इस अवसर पर मुझे आपके बीच आने का अवसर मिला उसके लिए मैं आपका बहुत आभारी हूं। 

.

हर जगह से हिन्दी गायब हो रही है मोदीजी के राज में

महोदय,

अक्सर ऐसा देखने में आ रहा है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय अपनी बैठकों/कार्यक्रमों के बैनर/पोस्टर एवं अतिथि नाम पट  केवल अंग्रेजी में तैयार करता है जबकि भारत अब अंग्रेजों का गुलाम नहीं हैं और राजभाषा कानून भी स्पष्ट है. हर साल कई लोग इस सम्बन्ध में शिकायतें भी करते हैं पर स्थिति में कोई सुधार नहीं है. शायद अधिकारियों एवं कर्मचारियों को कानून का ज्ञान ही नहीं है इसलिए प्रशिक्षण देकर जागरुकता लाने की महती आवश्यकता है.

राजभाषा अधिनियम कहता है भारत सरकार के हर कार्यालय /निकाय के लिए यह अनिवार्य है कि 'क' क्षेत्र में होने वाले सभी कार्यक्रमों/बैठकों (राष्ट्रिय /अंतरराष्ट्रीय) के बैनर/पोस्टर/आमंत्रण -पत्र/ अतिथि नामपट अनिवार्य रूप से द्विभाषी (हिन्दी-अंग्रेजी में एकसाथ) बनाए/छपवाए जाएँ और 'ख'/'' ग' क्षेत्र में त्रिभाषी रूप में (प्रांतीय भाषा /हिन्दी /अंग्रेजी एकसाथ)  

हाल ही आयोजित निम्न कार्यक्रमों के लिए के बैनर/पोस्टर एवं अतिथि नाम पट केवल अंग्रेजी में छपवाए गए गए, चित्र भी इसी क्रम में संलग्न हैं:

नई दिल्ली में 10 मार्च, 2015 को तीसरे चरण में निजी एफएम रेडियो चैनलों के पहले बैच की ई-नीलामी के लिए बोली पूर्व सम्मेलन

29 दिसंबर,2014 को नई दिल्‍ली में 'मेक इन इंडिया' पर राष्‍ट्रीय कार्यशाला

Inauguration of the Public Information Campaign, at Domkal, Murshidabad district, West Bengal on December 23, 2014 (हिन्दी का प्रयोग नहीं)

23 दिसंबर 2014 को असम के कामरूप जिले के तहत रंगिया में जन सूचना अभियान के अवसर पर निदेशालय क्षेत्रीय प्रचार के तेजपुर और बारपेटा इकाइयों द्वारा आयोजित एक रैली 

17 दिसंबर 2014 को नई दिल्ली में भारत सरकार का कैलेंडर जारी करने का अवसर (डिजिटल स्क्रीन बैनर अंग्रेजी में) 

3 दिसम्बर, 2014 को चैन्नई में पसूका और डब्ल्यूसीसी द्वारा संयुक्त रूप से "भारत की एकता और अखण्डता के लिए सरदार बल्लभभाई पटेल की भूमिका" विषय पर लेख प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार और प्रमाण-पत्र का समारोह (तमिल -हिन्दी का प्रयोग नहीं)

सूचना एवं प्रसारण (स्‍वतंत्र प्रभार), पर्यावरण, वन और जलवायु परि‍वर्तन (स्‍वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य राज्‍य मंत्री श्री प्रकाश जावडेकर 08 अक्‍टूबर, 2014 को नई दि‍ल्‍ली में केबल टीवी डि‍जि‍टलीकरण पर गठि‍त कार्यबल की पहली बैठक की अध्‍यक्षता करते हुए

First ever Regional Community Sammelan held at Puducherry from 28th to 30th September 2014.

एक चीनी शिष्‍टमंडल 18 सितम्‍बर 2014 की नई दिल्‍ली में सूचना और प्रसारण (स्‍वतंत्र प्रभार) पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन (स्‍वतंत्र प्रभार), संसदीय कार्य राज्‍यमंत्री श्री प्रकाश जावडेकर से मुलाकात 

श्री प्रकाश जावडेकर द्वारा 26 अगस्‍त, 2014 नई दिल्‍ली में 'ताना बाना जीवन का' नामक पुस्‍तक का विमोचन।

24 अगस्त 2014 को नई दिल्ली में फिल्म समारोह निदेशालय द्वारा पूर्वोत्तर की सुगंध विषय पर आयोजित तीन दिवसीय फिल्म समारोह

प्रसार भारती और जर्मनी के सरकारी प्रसारक दायचे वैले के बीच 05 अगस्त, 2014 को नई दिल्ली में आपसी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कार्यक्रम।

कृपया राष्ट्रपति जी के आदेशों एवं राजभाषा कानून का पालन करवाएँ।

***

भवदीय, 

प्रवीण जैन 

ए -103, आदीश्वर सोसाइटी, 

श्री दिगंबर जैन मंदिर के पीछे,

सेक्टर-9ए, वाशी, नवी मुंबई – 400 703

.

75 हजार रु. महीना कमाता है ये बिखारी

मुंबई। अगर आप भिखारी को 'भिखारी' ही समझते हैं तो नजरिए में थोड़ा बदलाव कर लीजिए क्योंकि यह खबर आपको सोचने पर मजबूर कर देगी। मुंबई का एक भिखारी इन दिनों सुर्खियों में है जो कि हर महीने भीख से 75 हजार रुपये कमाई, 80 लाख रुपये का निजी फ्लैट और खुद की दुकान का किराया 10 हजार रुपये महीने अलग से वसूलता है।
 
आइए आपको, बताते हैं यह भिखारी है कौन? देश का सबसे रईस भिखारी भारत जैन मुंबई में रहता है। इसे शहर की गलियों में अक्सर भीख मांगते देखा जा सकता है। ज्यादातर छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, आजाद मैदान में यह दिखेगा।
 
आप भले ही दिन में 12-14 घंटे की नौकरी करते हों, लेकिन भारत जैन बगैर कुछ किए लोगों की रहम से महज 8 से 10 घंटे के भीतर 2000-2500 रुपये हर दिन जुटा लेता है। उसकी हर महीने की कमाई लगभग 75,000 रुपये है जो कि भारत के किसी मुख्यमंत्री को मिलने वाले वेतन से भी अधिक है। भारत ने भांडुप में अपनी निजी दुकान को हर महीने 10 हजार रुपये किराये पर उठा रखा है।

साभार- आईनेक्स्ट से 

.

टीआरपी के ढर्रे में जल्दी ही बदलाव आएगाः पुनीत गोयनका

बीएआरसी (Broadcast Audience Research Council) के अध्यक्ष और आईबीएफ  बोर्ड के उपाध्यक्ष श्री पुनीत गोयनका का कहना है कि ट्रांसपेरेंट गर्वनेंस और व्यापक रेटिंग सिस्टम के लिए सारी तैयारियां हो चुकी हैं। उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश..
 
बीएआरसी के लागू होने के बाद टेलिविजन के दर्शकों के मूल्यांकन और टेलिविजन इंडस्ट्री में क्या फर्क आने वाला है?
 
जैसा कि आप जानते हैं कि मौजूदा सिस्टम में कुछ दर्शकों को ही कवर किया जाता है। इस समय सिर्फ छह करोड़ घरों को कवर किया जाता है जबकि बीएआरसी के बाद पहले चरण में ही 15 करोड़ 30 लाख घरों को कवर किया जा सकेगा। तो इससे टीवी व्यूअरशिप के मौजूदा बेस के करीब ढाई गुना बढने की संभावना है।
 
आपको क्या लगता है, बीएआरसी के आने के बाद प्रोग्रामिंग में भी बदलाव होंगे क्योंकि यह अलग तरह से दर्शकों का मूल्यांकन करेगा।
 
ऐसा कहना तो मुश्किल है क्योंकि अभी हम यह नहीं कह सकते कि क्या निकलकर सामने आएगा। लेकिन इससे उन जॉनर्स को महत्व मिलेगा जिन पर अभी किसी का ध्यान नहीं है। इससे ग्रामीण या टियर 2, टियर 3 शहरों को भी कवर किया जा सकेगा और ऐसे कंटेंट की जरूरत पड़ेगी, जिसे अभी क्रिएट ही नहीं किया जाता।
 
बीएआरसी के रास्ते में आने वाली अड़चनें कौन सी हैं? लोग उसे पूरी तरह अपनाएं, इसके लिए क्या बदलाव करने की जरूरत है?
 
यह हमारी इंडस्ट्री की तरफ से की गई पहल है और हम सभी इसका हिस्सा हैं। इसे लागू करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। हमारी इंडस्ट्री इसका स्वागत करेगी और मुझे यकीन है कि ज्यादातर लोग इसका इंतजार कर रहे हैं।
 
आपने कहा कि यह इंडस्ट्री की तरफ से की गई पहल है और हम सब इसके हिस्सेदार हैं। तो क्या आप इससे पारदर्शिता और गर्वनेंस की उम्मीद करते हैं?
 
यह बोर्ड के नेतृत्व वाला संगठन है और बोर्ड इंडस्ट्री की तीन संस्थाओं- भारतीय ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन, ऐडर्वटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया और इंडियन सोसाइटी ऑफ ऐडर्वटाइजर्स का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अलावा इसकी टेक्निकल कमिटी TechCom की अध्यक्षता शशि सिन्हा कर रहे हैं। IBF से पारितोष जोशी हैं और ISA से, HUL की स्मिता भोंसले हैं। गर्वनेंस का बेसिक प्रिंसिपल यह है कि TechCom में तीनों हिस्सेदारों की सर्वसम्मति होनी चाहिए और किसी भी फैसले को रद्द करने के लिए 75% की सहमति जरूरी है। कोई भी संगठन या हिस्सेदार अपने हिसाब से फैसला नहीं कर सकता। इसे इसी तरह से गठित किया गया है कि यह एक स्वतंत्र संगठन बन सके।
 
बीएआरसी की पूरी प्रक्रिया के प्रि-ऑडिट और पोस्ट-ऑडिट के लिए हमने इ वाय को एंगेज किया है जोकि विश्व स्तर की व्यूअरशिप एजेंसियों का ऑडिट करती है। यूएस की एक टीम भारत आकर ऑडिट का काम करेगी। इसलिए रेटिंग के पब्लिश होने से पहले ही हम ऑडिट रिपोर्ट पेश कर देंगे। इसकी सभी कार्रवाई पूरी तरह से पारदर्शी होगी।
 
बीएआरसी मौजूदा सिस्टम से किस तरह अलग होगा?
 
सबसे पहली बात तो यह है कि बीएआरसी बड़ी संख्या में मार्केंट्स को कवर करेगा, इसमें देश के बाहर के मार्केट्स को भी कवर किया जाएगा। दूसरी बात यह कि इसके पहले चरण में ही, सैंपल साइज भी दोगुने से ज्यादा होगा। आगे हम इससे भी ज्यादा की उम्मीद करते हैं। मौजूदा सिस्टम से कम गलतियों की गुंजाइश भी है।
 
हमें पता चला है कि आईबीएफ  ने अपने सदस्यों से बीएआरसी को लागू करने को कहा है…
 
हां,  आईबीएफ  ने अपने सदस्यों से ऐसा कहा है। हम बहुत जल्दी डेटा देने लगेंगे। बीएआरसी को लागू करने के लिए हमें सभी सदस्यों का सहयोग चाहिए।
 
प्राइजिंग फ्रंट से कुछ चिंताएं जताई जा रही हैं। सुना है कि बीएआरसी मौजूदा रेटिंग सिस्टम से कुछ महंगा है…
 
हां, कुछ महंगा तो होगा। अगर कोई सिस्टम विश्व को कवर करेगा और उसका सैंपल साइज बड़ा होगा, तो वह थोड़ा महंगा भी होगा। आपको इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि किसी हिस्सेदार ने कैश नहीं लगाया है, गारंटी दी है। यस बैंक  ने पूरा सेटअप लगाने के लिए हमारी मदद की है। इससे सिस्टम कुछ महंगा तो होगा। लेकिन इसके कामयाब होने पर यह एक विश्वसनीय मॉडल बनेगा।
 
वैसे हमारा प्राइजिंग मैकेनिज्म भी पारदर्शी है। हमारी वेबसाइट पर इसे पब्लिश किया जाएगा। मौजूदा सिस्टम नेगोसिएशन वाला सिस्टम है। हम किसी एक प्राइज पर नेगोशिएट कर सकते हैं तो दूसरा किसी दूसरे पर। लेकिन बीएआरसी में एक ही प्राइज है। यह पारदर्शी है और हर कोई एक फॉर्मूले पर पे करेगा।
 
इस संगठन के चेयरमैन के तौर पर मैं सभी हिस्सेदारों का शुक्रिया अदा करता हूं कि उन्होंने इस पहल को समर्थन दिया। बेशक, हम इस सुरंग के आखिर में खड़े हैं और हमें रोशनी साफ नजर आ रही है।
 
साभार- समाचार4मीडिया से 

.

राजदीप सरदेसाई को राहुल गाँधी पर दया आई, पत्र लिखा

राजदीप सरदेसाई को राहुल गाँधी पर इतनी दया आई कि उन्होंने राहुल गाँधी को पत्र लिखकर सलाह दी है कि वो राजनीति मे क्यों फ्लॉप हो रहे हैं और कैसे हिट हो सकते हैं……
प्रिय राहुल, एक खुला पत्र आपसे मुखातिब होने का शायद सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि हम आम पत्रकारों के लिए 12 तुगलक लेन के दरवाजे बंद हैं बल्कि प्रतिबंधित हैं और ई-मेल, एसएमएस तथा फोन कॉल का आमतौर पर जवाब नहीं मिलता। सत्ता के गलियारों में दबी जुबान कही बातों से संकेत मिलता है कि वरिष्ठ कांग्रेसजनों का भी वहां पहुंचना उतना ही मुश्किल है। जाहिर है मेरे जैसे और भी भले लोग हैं।
 
संसद के बजट सत्र की शुरुआत पर आपके नदारद रहने से जो विवाद खड़ा हुआ उसमें अपना थोड़ा योगदान देने के लिए मैं यह पत्र लिख रहा हूं। वफादार कांग्रेसियों का कहना था कि यह कोई छुट्‌टी नहीं है बल्कि 'आत्म-परीक्षण' की ईमानदार कोशिश और पार्टी के भविष्य के लिए रूप-रेखा खींचने की प्रक्रिया का हिस्सा है। एक इंटरव्यू में जयराम रमेश ने तो यहां तक इशारा दे दिया कि 'अब हमें नए राहुल देखने को मिलेंगे : खुले, अपनी ओर से पहल करने वाले और मिलनसार।' सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि पूरी तरह रूपांतरित राजनेता को कौन नहीं देखना चाहेगा। हम सब खुद का पुन: आविष्कार करने के लिए संघर्षरत रहते हैं। और यदि रमेश के दावे के मुताबिक आपने अपनी गलतियों से सबक सीखा है, तो हमें आपको एक मौका तो देना ही चाहिए। किंतु राजनीतिक पत्रकारिता में 26 साल गुजारने के बाद मेरे लिए संदेह को परे रखना मुश्किल है। कांग्रेस पार्टी के खुद को नए रूप में ढालने या 'नए राहुल' के उभरने की रिपोर्टें पढ़-सुनकर मैं सोचने लगता हूं कि क्या मैंने इसे पहले नहीं सुना है। मुझे याद आता है कि 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी पराजय के बाद यह वादा किया गया था कि अब आप अपनी कर्मभूमि में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने में ऊर्जा लगाएंगे। इसकी बजाय आपने खुद को परिवार के गढ़ अमेठी तक सीमित कर लिया।
 
सालभर बाद दिसंबर 2013 में दिल्ली राजस्थान विधानसभा के चुनावों में हार के बाद आपने फिर कांग्रेस को बदलने का वादा किया, 'आपको कांग्रेस कई तरह से बदली हुई नजर आएगी, जिसकी आपने कल्पना नहीं की होगी।' यह आपके शब्द थे। आपके ये शब्द उतने ही प्रभावी थे, जितना एक माह बाद तालकटोरा स्टेडियम में एआईसीसी के अधिवेशन में दिया आपका भाषण। एक्शन के लिए आपकी बुलंद पुकार ने नेताओं कार्यकर्ताओं में उत्साह भर दिया था। हालांकि, उसके बाद चुनाव अभियान में ऐसा कुछ नजर नहीं आया। मोदी के बढ़ते महारथ का सामना करते हुए राजनीतिक चर्चा को खुद तय करने की बजाय आप लगातार उनके मुद्‌दों पर ही बात करते नजर आए। शायद यूपीए के दस साल का बोझ उतार फेंकना मुश्किल था।
 
कांग्रेस की 44 सीटों की तोहमत आप पर लगाना नाइंसाफी होगी। और इसके बावजूद मई बाद के जो राहुल हम देखते हैं उससे जाहिर होता है कि 24 घंटे जोश-ओ-खरोश से बहस-मुबाहिसे वाली राजनीति आपको रोमांचित नहीं करती। पिछले नौ महीनों में हमने आपको कोई मुद्‌दा उठाते देखा-सुना नहीं, जो वाकई विपक्षी दल को आंदोलित कर दे। ऐसा भी नहीं कि मोदी सरकार ने आपको कोई मौका ही नहीं दिया। धर्मनिरपेक्षता की प्रकृति विषय वस्तु पर संघ परिवार द्वारा बार-बार की गई हलकी बातें आपके लिए खतरे का झंडा बुलंद कर राष्ट्रीय बहस शुरू करने के लिए पर्याप्त थीं। आपकी पार्टी प्रधानमंत्री पर चुप रहने का आरोप लगाती है, लेकिन ज्यादातर वक्त आप भी तो चुप ही रहे हैं।
 
अब भूमि अधिग्रहण अध्यादेश राजनीति का ज्वलंत मुद्‌दा बनता जा रहा है। आप जायज तरीके से मूल विधेयक पर दावा कर सकते हैं, जिसे यूपीए ने आगे बढ़ाया था। भट्‌टा परसौल में 2011 में आंदोलन शायद सड़क पर छेड़े गए किसी आंदोलन में आपकी सबसे साफ नजर आने वाली भागीदारी थी। और इसके बाद भी जब बाएं से लेकर दाएं तक सारे राजनीतिक समूह यह मुद्‌दा उठा रहे हैं, आप फिर यह मौका चूक रहे हैं। कांग्रेस ने जंतर-मंतर पर रैली निकालने का फैसला किया, लेकिन नेता वहां भी नदारद। इससे ऐसा संकेत मिलता है कि या तो पार्टी में महत्वाकांक्षा का अभाव है या इस क्षण आप अप्रासंगिक हैं। आपके इस संकोची रवैये और आम आदमी पार्टी के नेता अब दिल्ल के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के रुख में कितना विरोधाभास है। अापकी तरह केजरीवाल भी लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारे थे, मोदी लहर में बह गए थे। और फिर भी पराजय उन्हें विचलित नहीं कर पाई और उन्होंने तो मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी तक मांग ली।
 
दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में जब आप बंद दरवाजों के पीछे 'आत्म-निरीक्षण' कर रहे थे और भाजपा नेतृत्व न्यूयॉर्क से सिडनी तक दुनिया को रिझाने में लगा था, केजरीवाल दिल्ली के मोहल्ले कॉलोनियों में प्रचार की अलख जगा रहे थे। यह उनके लिए आसान नहीं रहा होगा, लेकिन राजनीति में कोई शॉर्टकट नहीं होता। केजरीवाल के लिए दिल्ली 'करो या मरो' की लड़ाई थी : उन्होंने और जमीन हाथ से जाने देने की बजाय लड़ने का फैसला किया। और मतदाता ने उनके प्रयासों को पुरस्कृत किया। इसके विपरीत जब आपने सांकेतिक रोड शो करने का फैसला लिया, यह एक बार फिर बहुत छोटा, बहुत देर से किया गया प्रयास था। कांग्रेस चौराहे पर है : महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग को भाजपा आकर्षित करती है, 'आप' निम्न आय वर्गों को खींच रही है जबकि क्षेत्रीय दल अपने क्षेत्रों में जमे हुए हैं। आपको किसी परिवार या विचारधारा से परंपरागत रूप से नहीं बंधे नई पीढ़ी के मतदाताओं को उत्साहित करने के लिए शक्तिशाली विजन देना होगा। परंतु वह विकल्प देने की बजाय आपका राजनीतिक कॅरिअर तो 'मौका खोने' का कोई अवसर गंवाने की केस स्टडी बन चुका है।
 
2011 में आप भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारियों तक पहुंच सकते थे पर आपने ऐसा नहीं किया। 2012 में आप दिल्ली की सड़कों पर हुए निर्भया आंदोलन से सार्वजनिक रूप से जुड़ सकते थे। 2013 में आपने पार्टी को नेतृत्व देने की बजाय यह जता दिया कि 'सत्ता जहर है।' और अब 2015 में आपने फिर मिश्रित संकेत दिए हैं। आपकी दादी ही नहीं आपकी मां भी याद दिला सकती हंै कि राजनीति मैराथन धावकों को पुरस्कृत करती है। आइटम नंबर के लिए इसमें ज्यादा धैर्य नहीं है।
 
पुनश्च: पिछले हफ्ते मेरी बेटी की सीबीएसई परीक्षा शुरू हुई है। उसकी कक्षा के सारे विद्यार्थियों की तरह वह भी जानती है कि अत्यधिक स्पर्द्धा वाली दुनिया में सफल होने के लिए उसे बहुत कड़ी मेहनत करनी होगी। भारत में अब युवाओं के पास 'आत्म-निरीक्षण' की लग्ज़री नहीं है। फिर छुट्‌टी की तो बात ही क्या।
 
(साभार: दैनिक भास्कर)

.

विदेशी पत्रकार ट्विटर पर पेश करेंगे महाभारत एक नए अंदाज़ में

ब्रिटेन स्थित एक भारतीय शिक्षाविद् ने ट्विटर पर महभारत का सिक्वल बनाने की योजना तैयार की है। इस बार वह ग्रंथ के खलनायक दुर्योधन के नजरिए से इसे पेश करेंगे। वह इससे पहले प्राचीन संस्कृत ग्रंथ महाभारत पर ट्विटर पर एक श्रृंखला चला चुके हैं।

पूर्व युद्ध संवाददाता व इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर बर्नमाउथ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के व्याख्याता चिंदू श्रीधरन ने 2009 में किस्सागोई के डिजिटल प्रयोग के रूप में माइक्रोब्लागिंग साइट पर भारतीय गंथ का वर्णन करना शुरू किया था।

श्रीधरन का किस्सागोई का यह सिलसिला चार वर्षों तक चला और इस दौरान उन्होंने 2700 ट्वीट किए और उनके प्रयासों से भारत का पहला ट्विटर उपन्यास ‘एपिक रिटोल्ड’ दिसंबर में जारी किया गया।

41 वर्षीय लेखक ने कहा कि वह इस ग्रंथ का सिक्वल तैयार करने से पहले थोड़ा आराम करना चाहते हैं।

करीब एक लाख से अधिक श्लोकों वाला ‘महाभारत ग्रंथ’ हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें कौरवों और पांडवों के बीच सत्ता संघर्ष के जरिए मानव जीवन के लक्ष्यों का संदेश दिया गया है।

श्रीधरन ने कहा कि उन्होंने दुर्योधन को दूसरी दृष्टि से देखा है, वह दुर्योधन के विचारों को समझ सकते हैं। एपिक रिटोल्ड भीम की दृष्टि पेश की गई थी। यह दुर्योधन की दृष्टि से पेश की जाएगी।

साभार- http://www.samachar4media.com/ से 

.