Tuesday, April 23, 2024
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शुद्धि समाचार और स्वामी चिदानंद के कारावास का विस्मृत इतिहास

स्वामी श्रद्धानन्द जी के नेतृत्व में हिन्दू संगठन और दलितोद्धार के रूप में दो आंदोलन सन 1920 के दशक में चलाये गए। हिन्दुओं को संगठित करने और हिन्दुओं को तेजी से कम हो रही जनसंख्या को रोकने के लिए विधर्मी हो चुके हिन्दुओं की शुद्धि आवश्यक थी। स्वामी जी ने शुद्धि आंदोलन के रूप में देश व्यापी आंदोलन आरम्भ किया। देश में ऐसे अनेक स्थान थे जहाँ हिन्दू धर्म त्याग चुकें लाखों लोग रहते थे, जिनकी जीवन पद्यति मिश्रित थी। उनके पूर्वजों को कभी बलात अथवा प्रलोभन से मुस्लिम बना दिया गया था। आगरा-मथुरा के निकट रहने वाले ऐसे लोगों को मलकाना कहा जाता था। अनेक मलकाना तो अपने सर पर चोटी तक रखते थे।

स्वामी श्रद्धानन्द और आर्यसमाज के प्रयासों से मलकानों की बड़ी संख्या में शुद्धि हुई। इस्लामिक प्रेस, तबलीग और उसके प्रचारक स्वामी जी और शुद्धि आंदोलन के विरुद्ध दुष्प्रचार करने लगे। तब स्वामी जी को शुद्धि आंदोलन सम्बंधित जानकारी एवं भ्रम निवारण के लिए ‘शुद्धि समाचार’ के नाम से मुख पत्र आरम्भ करना पड़ा। यह लखनऊ से आरम्भ हुआ था और बाद में मार्च 1926 से दिल्ली आ गया। अल्पकाल में ही शुद्धि समाचार का कुशल संपादन स्वामी चिदानंद जी के नेतृत्व में होने लगा। स्वामी चिदानंद जी भारतवर्षीय साधु महामण्डल के मंत्री पद पर कार्य करते थे।

1923 में आप शुद्धि सभा से जुड़कर कन्नौज क्षेत्र में शुद्धि कार्य करने लगे। आपने एक दो मास के भीतर ही ऐसी उत्तमता से शुद्धि कार्य किया कि आपके क्षेत्र का विस्तार बढ़ाकर फरुखाबाद, मैनपुरी और शाजहांपुर कर दिया गया। 1925 में भारतीय शुद्धि सभा क सर्व साधारण सम्मेलन में आप शुद्धि सभा के मंत्री नियुक्त हुए और शुद्धि समाचार के सम्पादक बन गए। दिसम्बर 1926 में स्वामी जी के बलिदान के पश्चात चिदानंद जी पर शुद्धि सभा के कार्य का सारा भार स्वामी जी के कन्धों पर आ गया।

जनवरी1927 में आप सभा के प्रधान मंत्री निर्वाचित हुए। आपके कार्यकाल में शुद्धि सभा ने व्यापक प्रगति की और उसका कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण भारत में फैल गया। शुद्धि समाचार हज़ारों की संख्या में प्रकाशित होने लगा और देश भर में शुद्धि अभियान के समाचार प्रकाशित होने लगे। सन् 1928 में अप्रैल में शुद्धि समाचार में धारावाहिक रूप में ‘इस्लामी सिद्धांतों की समालोचना’ के नाम से लेखमाला का प्रकाशन आरम्भ हुआ। दिसम्बर तक इस लेखमाला के 7 भाग प्रकाशित हुए। इसके लेखक श्रीयुत जगदीश चंद्र जी वाचस्पति थे। आप शास्त्रार्थ महारथी और इस्लामिक मामलों के प्रबुद्ध विद्वान थे। जैसे जैसे लेखमाला प्रकाशित होती गई वैसे वैसे इस्लामिक जगत का आक्रोश बढ़ता गया।

उस दौर की इस्लामिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दू धर्म की मान्यताओं और सिद्धांतों पर निरंतर आक्षेप होते रहते थे। शुद्धि समाचार के कार्यालय को धमकी भरे पत्र आने लगे। इस बीच नौजवान भारत सभा और मिलाप लाहौर ने शुद्धि सभा के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया। उनके नोट का सहारा लेकर मुसलमानों ने शुद्धि समाचार के संपादक को गिरफ्तार करने का अभियान चलाना आरम्भ कर दिया।

अंततः 27 दिसम्बर 1928 को स्वामी चिदानंद जी को कलकत्ता से धारा 153ए एवं 295 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। स्वामी जी को गिरफ्तार कर 29 दिसंबर को दिल्ली लाया गया। स्वामी जी की गाड़ी दोपहर पौने दो बजे दिल्ली पहुंची। गाड़ी के पहुंचने से पहले ही स्टेशन पर उनके स्वागत के लिए भारी भीड़ थी। गाड़ी रुकते ही स्वामी श्रद्धानन्द की जय, शुद्धि की जय आदि शब्दों का जयघोष हुआ। उपस्थित जनसमूह में प्रमुख श्री महात्मा नारायण स्वामी जी महाराज,  लाला ज्ञानचंद जी, लाला लक्ष्मीचंद जी, शिवचरण दास जी, लाला जमनादास जी जैसे महानुभावों के नाम उल्लेखनीय हैं। स्वामी जी को मोटर में बैठकर शुद्धि कार्यालय, श्रद्धानन्द बाजार में लाया गया। उनकी गिरफ़्तारी की सुचना से हिन्दू जनता में रोष फैल गया।

यह कार्यवाही शुद्धि आंदोलन को रोकने के लिए थी। स्वामी जी पर मुकदमा आरम्भ हो गया जो छह महीने तक चला। स्वामी जी ने अपना बचाव पक्ष अदालत में प्रस्तुत किया। 22 जुलाई 1929 को स्वामी जी को छह महीने की सजा और 300 रुपये का जुर्माना की सजा हुई। स्वामी जी ने इस केस को आगे लड़ने से इंकार कर दिया और जेल चले गए। स्वामी जी ने अपील की कि मेरी सजा कम कराने या मुझे बरी कराने के लिए सेशन अथवा हाई-कोर्ट में किसी प्रकार की अपील न की जावे और न मेरी जमानत के लिए आवेदन किया जावे। क्योंकि न्याय का ढोंग रचकर सच्चाई को कुचलने वाली अदालतों से विशेष न्याय की आशा रखना वैसा ही है कि जैसा बालू कणों से तेल निकालना या बबुल के वृक्ष से मधुर आम चखने की आशा रखना।

अंग्रेजों की अदालत में जो न्याय नाटक खेला गया है। वह अंग्रेजी न्याय के लिए पर्याप्त है। अंग्रेजी न्यायालय में माथा रगड़-2 कर गिड़गिड़ाने और व्यर्थ में धन का दुरुपयोग करने का कोई लाभ नहीं है। भविष्य में निर्भयतापूर्वक खुल्लम खुल्ला, सर्वसाधारण में इस सच्चाई का पाठ पढ़ाने के लिये मजबूत बनकर जेलखाने में ( जीवित रहने की अवस्था में) बाहर निकलूं। मेरे ऊपर अभियोग चलवाने वालों की यह इच्छा कि चिदानंद को जेल खाने में डलवा देने से शुद्धि सभा का कार्य बंद हो जायेगा उनकी यह दूषित इच्छा किसी अंश में भी पूरी न हो।

चिदानंद जी की स्वामी श्रद्धानन्द जी में अपूर्व श्रद्धा थी। आपको शुद्धि सभा में लाने के लिए स्वामी जी ने यह पत्र लिखा था “आपका पत्र मिला। मुझे बड़ा हर्ष होगा जब में आपको शुद्धि क्षेत्र में सलंग्न देखूँगा। मेरी तो हार्दिक इच्छा है कि एक दो नहीं, बावन लाख साधु सन्यासी हिन्दू जाति के उत्थान के लिए शुद्धि कार्य में लग जाय। और अपने प्यारे धर्म, जाति और देश पर जीवन तक न्योछावर करें।
आपका मंगलाभिलाषी

श्रद्धानन्द सन्यासी”

स्वामी जी की गिरफ़्तारी कोलकाता से हुई थी। उनके दिल्ली गिरफ्तार कर लाये जाने पर कोलकाता निवासियों ने बंगाल, असम प्रान्तीय हिन्दू शुद्धि सभा की ओर से स्वामी जी के सेवा में अभिनन्दन पत्र भेजा। इस पत्र में उन्होंने स्वामी जी की अनुशंसा में लिखा- ‘आज हमको सहसा वह विकट समय याद आ जाता है जब कि आपने रात दिन मृत्यु की धमकियाँ पाते हुए, जीवन को खतरे में डालकर भी उस महान कार्य को अपने कन्धों पर उठा लिया था। जिसके लिए रुग्ण शय्या पर लेटे हुये भारत के महान पुरुष, आर्य जाति के प्राण, हिन्दू समाज के सर्वस्व शुद्धि संगठन के प्रवर्तक अमर स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज का एक धर्मोन्मत मुसलमान ने कायरतापूर्वक वध कर दिया था। निश्चय ही आप इस समय किसी मठ या मंदिर के महंत बन कर फूलों के गदेलों पर लेटे हुए सुख के दिन बिता रहे होते। पर, अपने देश व समाज की दुर्दशा को गहरी चोट आप के चित्त पर लगी और आपने उस ऐश्वर्य पूर्ण सुख-सामग्री पर लात मार कर काँटों से भरे हुए मार्ग पर ही चलना स्वीकार किया। इसी श्रद्धा से प्रेरित हो कर हमारा सीस सहज में आपके सम्मुख विनीत भाव से झुक जाता है। हिन्दू समाज को जागृत और संगठित करने का जो पुण्य कार्य आपने स्वीकार किया है, उससे हम लोगों की पूर्ण सहानुभूति है और यथासम्भव हम लोग उस कार्य में तन, मन, धन से आपके साथ हैं।”

जेल में स्वामी जी ने चिकित्सा विभाग में कार्य किया। उनके शुद्धि आंदोलन को दिए गए योगदान की चर्चा पीछे से आनंद भिक्षु जी के संपादन में छपती रही। दिसम्बर 1929 को स्वामी जी की जेल से मुक्ति हुई। जेल से मुक्त होकर स्वामी जी पुन: शुद्धि सभा के कार्य में लग गए। इस मुक़दमे से सम्बंधित सभी लेख और इसकी कार्यवाही शुद्धि समाचार के 1928 और 1929 के अंकों में प्रकाशित हुई थी। 1930 के अंक हमें प्राप्त नहीं हुए है। संभवत उनमें आगे पर प्रकाश डाला गया होगा।

पाठकों को यह विस्मृत इतिहास बताना मैं अपन दायित्व समझता हूँ क्योंकि हमारे पूर्वजों ने कैसा महान तप अपने धर्म की रक्षा के लिए किया था। यह आज की पीढ़ी को जानना अति आवश्यक है।

1928 के शुद्धि समाचार के सभी 12 अंक मुझे स्वर्गीय स्वामी जगदीश्वरानन्द जी के निजी पुस्तकालय से मिले और 1929 के शुद्धि समाचार के सभी अंक अमर स्वामी प्रकाशन, गाज़ियाबाद के  लाजपत राय अग्रवाल जी के सहयोग से प्राप्त हुए। मैं दोनों पुण्यात्माओं का आभारी हूँ।

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(लेखक hindimedia.in के लिए विभिन्न विषयों पर लिखते हैं।)

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