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आन बान और शान का प्रतीक गंगा गोल्डन जुबली संग्रहालय, बीकानेर

राजस्थान के बीकानेर संभाग मुख्यालय पर स्थित यह संग्रहालय राजस्थान की आन बान और शान का प्रतीक है।

कालीबंगा की प्रागैतिहासिक कालीन पुरा सामग्री के साथ-साथ बीकाणा क्षेत्र के रंगमहल की मृण प्रतिमाएं, प्रस्तर प्रतिमाएं, प्राचीन सिक्के, तेलचित्र, टेराकोटा स्कल्प्चर, अस्त्र-शस्त्र, शिलालेख, शाही परिधान, पेंटिंग सहित पुरासामग्री का इतिहास उनके प्राप्ति स्थल की जानकारी के साथ-साथ तैलचित्र, ऊँट की खाल से निर्मित सामग्री, शुतुरमुर्ग के अण्डों पर कलात्मक कार्य, काँच की सामग्री, उच्च कोटी के कलात्मक गलीचे बीकानेर के गंगा गोल्डन जुबली संग्रहालय की शान हैं। इसे बीकानेर संग्रहालय के नाम से भी जानते हैं। संग्रहालय की स्थापना 5 नवम्बर, 1937 को की गई थी और तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर-जनरल लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा इसका उद्घाटन किया गया था। बाद में नया भवन बनने पर संग्रहालय को 4 सितम्बर 1954 से नये भवन में शुरू किया गया।

संग्रहालय की महाराजा गंगासिंह के नाम पर दीर्घा में उनके जीवन से सम्बन्धित फोटोग्राफ, तैलचित्र, हथियार, शिकार किये गये वन्य पशु तथा प्रमाण पत्र आदि प्रदर्शित किये गए हैं। कला दीर्घा में लकड़ी, लाख तथा ऊंट की खाल से निर्मित कलाकृतियां, शुतुरमुर्ग के अण्डों पर कलात्मक कार्य, प्रस्तर पर नक्काशी कार्य युक्त झरोखा व स्तम्भ, मोर की लड़त, बीकानेर की मिट्टी से निर्मित कांच की सामग्री, इक्का, हुक्का पीते हुए शाही मुद्रा में पुरूष, नोहर के मृण्मय पात्र, प्राचीन वाद्य यंत्र, ढोलक, नगारा, झांझर, मोरचंग, पाबूजी का माटा आदि प्रदर्शित हैं। पट्ट-परिधान दीर्घा में बीकानेर जेल में निर्मित उच्च कोटि के कलात्मक गलीचे और राजाओं की पोशाकें प्रदर्शित हैं।

महाराणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए अकबर को पत्र द्वारा संदेश भेजा, लेकिन अकबर के दरबार में पृथ्वीसिंह (पीथल) ने पत्र की विश्वसनीयता पर संदेह प्रकट कर महाराणा को पत्र लिखा। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम पर आधारित दो चित्र विख्यात चित्रकार ए.एच.मूलर ने बनाये जो इस दीर्घा में प्रदर्शित हैं। इनके अलावा बीकानेर के संस्थापक राव बीकाजी (1472-1504 ई.) का जोधपुर से अपने पैतृक राज्य चिन्ह प्राप्ति विषयक चित्र, राव जैतसिंह का बाबर के पुत्र कामरान के साथ रात्रिकालीन युद्ध का सजीव चित्रांकन, राजा रायसिंह द्वारा गुजरात के गवर्नर मिर्जा मुहम्मद हुसैन के वध एवं हिन्दू धर्म रक्षार्थ राजा करणसिंह का शाही नावों को तोड़कर जय जंगलधर बादशाह की उपाधि प्राप्त करने का दृश्य काफी महत्वपूर्ण है।

शस्त्रागार दीर्घा में प्राचीन अद्भुत शस्त्रों का नायाब संग्रह है। महाराजा अनूपसिंह द्वारा आदूनी (दक्षिण भारत) की लूट में प्राप्त एक तलवार की मूंठ सर्प, मयूर, सिंह और हाथी आदि पशुओं की आकृति से बनी है। खांडा तलवार की ब्लेड पर हनुमान, भैरव, गणेश, दुर्गा आदि की आकृतियां उत्कीर्ण हैं। तलवारों की ब्लेड पर शिकार आदि का अंकन है। शस्त्रों में तीर कमान, तुक्के, तलवारें, कटार, छुरी, बिछुवा, जांभिया, बुग्दा, गुप्ती, सांग, गुर्ज, गेडिया, तवाल, फरसी, बंदूक, तोप आदि अपने क्रमिक विकास के साथ प्रदर्शित किए गये हैं। मैचलाक किस्म की बंदूकों के साथ-साथ अन्य श्रेणी की टोपोदार कारतूसी बंदूकें भी प्रदर्शित हैं। ’रामचंगी’ बंदूक लगभग 8 फुट लम्बी है। प्रदर्शित तलवारों में फारसी, अरबी, गुजराती, धूप, खुरासानी, करवणसाही, हकीमसाही, किर्च आदि हैं। कोफ्त तथा तहनिशा काम की तलवारें भी हैं। धार्मिक कार्यों में प्रयोग ली जाने वाली तलवारें और राठौड़ कुशलसिंह की वि.सं. 1799 की लेखयुक्त तलवार महत्वपूर्ण हैं। पेशकब्ज, खंजर, कमान, गदा, भाले, जगनोल, हिरनसिंगी आदि भी प्रदर्शित हैं। महाराजा गंगासिंह को भारतीय सेना के मुख्य सेनापति द्वारा प्रदान की गई तोप भी प्रदर्शित की गई हैं।

पुरातत्व की दृष्टि से लन्दन की अन्तर्राष्ट्रीय भारतीय कला प्रदर्शनी में आकर्षण का केन्द्र बनी, पल्लू’ ग्राम से मिली सफेद संगमरमर की सरस्वती प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है। ऐसी दूसरी प्रतिमा दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है। कालीबंगा, पीलीबंगा, दुलमाणी, भद्रकाली, भंवर, बड़ोपल, मानक और रंगमहल से प्राप्त प्रागैतिहासिक काल के विभिन्न प्रकार के आभूषण जैसे कंगन, अंगूठी, कान के गहने, मनके, मिट्टी के पशु-पक्षी और मानवाकृतियाँ एवं सादे तथा चित्रित मृण्मय पात्र आदि प्रदर्शित हैं। आरंभिक गुप्तकालीन मृण मूर्तियों का यहाँ अमूल्य भंडार है। रंगमहल से प्राप्त एकमुखी शिव लिंग, उमामाहेश्वर, दान लीला, चक्र पुरूष, गोवर्धनधारी कृष्ण, पीर सुल्तान की पेडी से अप्सरा, बडोपल से पुजारिन, प्रेम दृश्य, चिन्तन मग्न नायिका आदि मृण्मय मूर्तियां गुप्तकालीन मूर्तिकला पर प्रकाश डालती हैं। रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, पीर सुल्तान की थेड़ी से गुप्तकालीन फलक इस शती के प्रारम्भ में इटालियन विद्वान् डाॅ. एल.पी. टेसीटोरी द्वारा प्रकाश में लाए गए थे। ये सब पकाई हुई मिट्टी के बने हैं और बीकानेर के राजकीय संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे हैं। इन फलकों पर गंधार एवं मथुरा की कला का सम्मिश्रण सुस्पष्ट है। ये गुप्तकाल (ईसा की चतुर्थ शती) में बनाए गए थे और स्थानिक ईटों के बने मंदिरों के बाह्य भागों पर जड़े थे।

रंगमहल से प्राप्त सामग्री तो भारतीय शिल्प की अनुपम थाती है। यहाँ सरस्वती दृषदूती की संयुक्त धारा की विद्यमानता सुस्पष्ट है। कृष्ण की क्रीड़ास्थली मथुरा से भी अभी तक ऐसा ’गोवर्धनधारण’ फलक प्रकाश में नहीं आया है जहाँ कृष्ण को गंधार कला के प्रभावान्तर्गत मूंछों सहित दर्शाया गया है। रंगमहल से प्राप्त मिट्टी के बने इस फलक पर कृष्ण के गले में ग्रैवेयक मथुरा की कला का द्योतक है और हष्ट-पुष्ट कृष्ण की युवक रूप में प्रस्तुति गंधार शैली में की, गयी है। इस प्रकार बाललीला विषयक फलक में लकुटधारी कृष्ण गोपी से अठखेली कर रहे हैं, उसके सिर पर दूध की मटकी रखी है। गोपी की वेशभूषा ’रोमन’ प्रतीत होती है, उसके सिर पर ओढ़नी व अधोवस्त्र के रूप में स्कर्ट (घाघरी) आकर्षक ढंग से प्रदर्शित है।

बीकानेर संग्रहालय के अन्य समकालीन मृण्मय फलक और भी दर्शनीय हैं। शिव-पार्वती संदर्भ में शिव को त्रिमुखी दर्शाकर हाथों में सूर्य एवं चन्द्र को प्रदर्शित करना मूर्ति विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है और कुषाणकालीन माथुरी प्रभाव का परिचायक है। यहाँ योगी शिव की अद्र्धांगिनी पार्वती ने गंधार शैली का ’लहंगा’ पहन रखा है जिसका प्रचलन आज भी राजस्थान में सर्वत्र दिखाई देता है। रंगमहल के अन्य अद्वितीय फलकों में स्वतंत्र ’चक्र पुरूष’ एवं ’एकमुख शिवलिंग’ उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त अजैकपाद अभिप्राय विषयक फलक तो भारतीय शिल्प में अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। यहाँ स्थानक अजमुखी देव को एकपाद और वह भी हाथी के पैर वाला दर्शाया गया है जैसा वैदिक साहित्य में रूद्रों के विवरण में उपलब्ध है। बीकानेर संग्रहालय के ये गुप्तकालीन मृण्मय फलक भारतीय शिल्प की अनुपम निधि हैं।

अमरसर से प्राप्त 9वीं से 11वीं शताब्दी की धातु मूर्तियां भी उल्लेखनीय हैं। इनमें से कुछ मूर्तियों पर कुटिल लिपि के खेल उत्कीर्ण हैं। कुछ वर्ष पूर्व नागौर जिले के ’गोराऊ’ नामक स्थल से मिली चाहमान कालीन जैन धातु प्रतिमाएं भी इस संग्रहालय में हैं। लोक कला दीर्घा में चित्र, वस्त्र, जन-जीवन को प्रदर्शित करने वाले माॅडल, पाबूजी की पड़ व अन्य कलात्मक सामग्री प्रदर्शित है। चित्रकला दीर्घा में राजस्थान की विभिन्न चित्र शैली के चित्र प्रदर्शित हैं। अठारहवीं शताब्दी में चित्रित बारहमासा का पूरा सेट महत्वपूर्ण है, जिन पर गोविन्द कवि के ब्रजभाषा के छंद भी अंकित हैं। बीकानेर पर्यटन पर जाने वालों को यह संग्रहालय अवश्य देखना चाहिए। संग्रहालय प्रात: 10.00 से सांय 5.00 बजे तक खुला रहता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं व राजस्थान जनसंपर्क विभाग के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं)

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