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1921 में मालाबार में हिंदुओं के साथ हुए नृशंस नर संहार की भुली बिसरी गाथा

“मालाबार और आर्यसमाज” पुस्तक आर्यसमाज के विख्यात विद्वान, नेता एवं संन्यासी स्वामी महात्मा आनन्द स्वामी जी ने लिखकर सन् 1923 में प्रकाशित की थी। यह पुस्तक मोपला विद्रोह की पृष्ठभूमि एवं उस विद्रोह में स्थानीय हिन्दुओं पर मोपलाओं द्वारा किये गये अत्याचारों को ऐतिहासिक तथ्यों सहित प्रकाशित करती है। इस घटना में सैकड़ों हिन्दू पुरुष, स्त्री व बच्चे अकारण विद्वेष का शिकार हुए थे और हत्या सहित बलात्कार एवं धर्मान्तरण की घटनायें घटी थीं। यह पुस्तक सन् 1921 में मालाबार में घटी घटनाओं का एक प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज है। इसे प्रत्येक आर्य व हिन्दू को पढ़ना व जानना चाहिये और भविष्य में ऐसी घटनाओं से जाति की रक्षा के उपाय करने चाहियें।

सारा आर्य व हिन्दू समाज महात्मा हंसराज जी तथा महात्मा आनन्दस्वामी जी सहित उन सभी वीर पुरुषों का आभारी व कृतज्ञ है जिन्होंने तत्कालीन पंजाब की धरती से केरल पहुंच कर अपने पीड़ित भाईयों की रक्षा व सहायता की थी। महात्मा हंसराज जी की प्रेरणा से घटना स्थान पर पहुंचे आर्यों ने घायलों के उपचार सहित धर्मान्तरित वा विधर्मी बनाये गए जातीय बन्धुओं की शुद्धि की और भविष्य में उनकी रक्षा के उपाय किए थे। जिस प्रकार हैदराबाद रियासत में हिन्दुओं पर अत्याचार किए जाने पर आर्यसमाज ने वहां हैदराबाद आर्य सत्याग्रह संचालित कर हिन्दू जाति में चेतना उत्पन्न करने के साथ अपने धार्मिक व मानवीय अधिकारों को प्राप्त किया था, उसी प्रकार केरल के मलाबार में मोपला विद्रोह में मारे गये व पीड़ित परिवारों की रक्षा व शुद्धि का महान कार्य आर्यसमाज व इसके अनुयायियों ने किया था। प्रत्येक वैदिक धर्मी व सनातनी बन्धु को इस ग्रन्थ का एकाधिक बार अध्ययन करना चाहिये और इसे पढ़कर तथ्यों के अनुरूप अपने स्वभाव व व्यवहार में सुधार करना चाहिये। अपने आर्य हिन्दू जाति में विद्यमान अन्धविश्वासों, पाखण्डों व दुर्बलताओं को दूरकर वैदिक सनातन धर्म की रक्षा के उपाय करने चाहियें।

इसी प्रकार के उद्देश्य से ऋषि दयानन्द ने वेदों की रक्षा एवं प्रचार का कार्य किया था तथा आर्यसमाज की स्थापना की थी। आर्यसमाज मानवता का रक्षक, मानवीय सत्य मूल्यों का प्रचारक तथा मानवता के विरुद्ध कार्यों का विरोधी है। हम आशा करते हैं कि आर्य हिन्दू बन्धु इस पुस्तक को प्राप्त कर इसका अध्ययन अवश्य करेंगे। अपनी युवा पीढ़ी को भी इससे परिचित करायेंगे। इसके साथ ही वीर विनायक सावरकर जी की प्रसिद्ध हिन्दी पुस्तक ‘मोपला विद्रोह’ का अध्ययन भी करेंगे। यह इतिहास को जानने, इतिहास की रक्षा सहित धर्म रक्षा के लिए भी आवश्यक है।

यह भी बता दें कि इस पुस्तक के प्रकाशन में डा. मदनमोहन जी ने इकयावन हजार रूपये की सहायता की है। यह ऐतिहासिक पुस्तक उन महान ज्ञात व अज्ञात मानवता के प्रति पूर्ण समर्पित भाव से ओत-प्रोत व्यक्तियों को समर्पित की गई है जिन्होंने पिछले 1200 वर्षों में अमानवीय मतान्ध व्यक्तियों के अत्याचार का प्रतिकार करने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और अपने प्रिय वैदिक धर्म का कभी त्याग नहीं किया। पुस्तक की 4 पृष्ठों की भूमिका माप्पिला शहीद स्मारक समिति के समन्वयक श्री ए. विनोद जी ने लिखी है। इस पुस्तक का दस पृष्ठीय पुरोवाक् श्री रंगाहरि जी, केरल ने लिखा है। पुरोवाक् के बाद पुस्तक की भूमिका, जो प्रथम संस्करण के प्रकाशन के समय लिखी गई थी, वह महात्मा हंसराज जी ने लिखी है। इस भूमिका में 7 पृष्ठ है। यह भूमिका पढ़ने योग्य है। इस भूमिका से महात्मा हंसराज जी द्वारा लिखे गये कुछ शब्द प्रस्तुत हैं

‘‘पाठकगण! इन पृष्ठों में मालाबार के वृतान्त और वह काम, जो आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा पंजाब-सिन्ध-बिलोचिस्तान, लाहौर की ओर से वहां किया गया है, अंकित है। मालाबार भारतवर्ष का एक अति सुन्दर भाग है और पौराणिक विचार से पवित्र भूमि समझा जाता है। वहां आदि से अन्त तक चारों वेदों का शुद्ध और भ्रान्तिरहित पाठ मधुर स्वर से बिना पुस्तक देखे कर सकते हैं। इस इलाके में पहिले केवल हिन्दू ही हिन्दू बसते थे। परन्तु हिन्दू राजाओं की धार्मिक उदारता ने उनको आज्ञा न दी कि वह मुसलमान और ईसाई मतों के दाखले और फैलाव को अपने इलाके के भीतर रोंके और जो लोग अन्य मतावलम्बी हों उन पर अत्याचार और कठोरता करें।

धर्म तथा देश की एकता के लिए आवश्यक है कि जिस प्रकार शरीर के एक अंग में दुःख होने से सारा शरीर दुःखी हो जाता है, इसी प्रकार देश में एक स्थान पर विपत्ति पड़ने से देश के अन्य भागों को भी अनुभव करना चाहिये कि वे भी विपद्ग्रस्त हैं। जिस देश अथवा जाति में यह भाव नहीं है, वह देश या जाति कहलाने के योग्य नहीं। आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा की ओर से जो सहायता मालाबार को दी गई है, वह न केवल इस बात का दृढ़ प्रमाण है कि हिन्दुओं के भीतर आर्यसमाज के द्वारा सामाजिक उत्साह पैदा हो गया है, प्रत्युत भविष्य के लिये भी आर्य जाति के विविध भागों में एकता का भाव बढ़ाने वाली है। हमको दूसरों पर यह सिद्ध कर देना चाहिये कि भारतवर्ष के हिन्दू एक हैं और एक दूसरे में भेदभाव नहीं करते। …. परमात्मा करे कि जमदग्नि और परशुराम की पवित्र भूमि में, जो सौन्दर्य की उपमा से कश्मीर से कम नहीं, ऋषियों का धर्म सदा जीता जागता रहे।

पुस्तक में प्रथम मुख्य शीर्षक मालाबार में जानकारी दी गई है। इस अध्याय के उपशीर्षक हैं 1- मालाबार में यवन प्रवेश, 2- मालाबार में ईसाइयों का प्रवेश, मालाबार में हिन्दू, नम्बोदरी ब्राह्मण, नायर, तीया जाति, चमार, अन्य जातियां, मालाबार में अछूत, मालाबार के मुसलमान तथा मालाबार के ईसाई। दूसरा अध्याय ‘मालाबार का मोपला विद्रोह’ है। इस अध्याय के उपशीर्षक हैं विद्रोह का प्रारम्भ, बागी मोपलों का व्यवहार, मोपलों का जंगी जयकारा और जंगी झंडा, बगावत की खबरों पर अविश्वास, कांग्रेस और खिलाफल कमेटी की साझी चिट्ठी, मालाबार में आर्यसमाज के स्वयंसेवक, (पीड़ितों की रक्षा) कार्यों का आरम्भ, मालाबार के पीड़ित हिन्दुओं के लिए आर्यसमाज का डिपो, शुद्धि का काम, भीतरी इलाके की दशा (मालाबार के भीतरी भागों में, कालीकट ताल्लुके में, घने वन के भीतर, अरनाड ताल्लुके में), एक अनाथ कन्या के विषय में, एक और पीड़ित कन्या, शुद्धि का काम, 2 हजार धर्मान्तरित बन्धुओं की शुद्धि, शुद्ध हुए हिन्दुओं के साथ हिन्दुओं का बर्ताव, बागी मोपले हाइकोर्ट में, एक विद्रोही मोपला जज से वार्तालाप, एक ब्राह्मण का नष्ट हुआ पुस्तकालय, इलाके की दशा, सहायक डिपुओं का काम तथा स्थानिक सहायक)। पुस्तक के अन्तिम अध्याय में पीड़ित लोगों के बयानात दिये गये हैं। इन बयानात में कुल पिच्चहत्तर विवरण सम्मिलित किए गए हैं।

पुस्तक में उपर्युक्त विवरणों को पढ़कर सन् 1921 में केरल के एक स्थान मालाबार में हुए मोपला विद्रोह का विस्तृत ऐतिहासिक विवरण जाना जा सकता है। अतीत वा इतिहास का ज्ञान व उन विवरणों से शिक्षा एवं अपनी रक्षा के समुचित उपाय ही हमें भविष्य में सुरक्षित रख सकते हैं। इस दृष्टि से पुस्तक का महत्व है। अतः हम सभी बन्धुओं से इस पुस्तक को प्राप्त करने व इसे आद्योपान्त पढ़ने की प्रेरणा करते हैं। हमें अपने जीवन में यह पुस्तक कभी किसी प्रकाशक व पुस्तक विक्रेता के पास दृष्टिगोचर नहीं हुई। वर्तमान पीढ़ी का यह सौभाग्य है कि इसे केरल के श्री के.एम. राजन जी ने प्रकाशित कर दिया है।

इस कार्य के लिए हम उनका धन्यवाद करते हैं। हम ऋषिभक्त श्री प्रभाकरदेव आर्य, हिण्डौन सिटी का भी इस पुस्तक को हमें भेजने के लिए धन्यवाद करते हैं। हमारा अनुमान है कि यह पुस्तक बिक्री हेतु उनसे भी उपलब्ध हो सकती है। पाठक पुस्तक प्राप्ति के लिए श्री के.एम. राजन जी के चलभाष सहित श्री प्रभाकरदेव आर्य जी के चलभाष 7014248035 एवं 9414034072 पर सम्पर्क कर सकते हैं।

‘मालाबार और आर्यसमाज’ पुस्तक के मूल लेखक महात्मा आनन्दस्वामी जी हैं। पुस्तक का नाम ‘1921 मालाबार और आर्यसमाज’ दिया गया है। वर्तमान में प्रकाशित यह पुस्तक मूल पुस्तक का दूसरा संस्करण है। इसके सम्पादक हैं ऋषिभक्त श्री के.एम. राजन जी। पुस्तक का प्रकाशन आर्यसमाज वेल्लिनेषि, पंडित लेखराम स्मृति भवन, वेल्लिनेषि (पो0), पालक्काड़ जिला, वेल्लिनेषि- 678504 (केरल) से हुआ है। प्रकाशक महोदय श्री के.एम. राजन जी के दूरभाष नम्बर 7907077891 तथा 9446575923 हैं।

प्रकाशक से इमेल aryasamajvellinezh[email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है। प्रकाशक की वेबसाइट www.aryasamajkerala.org.in है। पुस्तक का प्रथम संस्करण सन् 1923 में प्रकाशित हुआ था। पुस्तक का यह दूसरा संस्करण है, प्रथम संस्करण सन् 1921 में प्रकाशित हुआ था।

वर्तमान में प्रकाशित पुस्तक का मूल्य 50 रुपये है। पुस्तक में कुल 88 पृष्ठ है। पुस्तक के शब्द-संयोजक आर्य लेजर प्रिंट्स, हिण्डौन सिटी (राजस्थान) तथा मुद्रक राधा प्रेस, 38/2/16, साइट 4, साहिबाबाद (उ.प्र.) हैं।

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