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उत्तर पश्चमी घाटों पर स्थानीय फूलों की उत्पत्ति के अध्ययन से सामने आई संरक्षण योजनाओं में पठारों की अहमियत

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान आघारकर अनुसंधान संस्थान (एआरआई), पुणे के वैज्ञानिकों ने उत्तर पश्चिमी घाटों के वनस्पतियों से जुड़े आंकड़े सामने रखे हैं, जिससे संकेत मिलते हैं कि उत्तर पूर्वी घाटों के संरक्षण के लिए वनों के अलावा पठारों को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यह पठार और खड़ी चट्टानें ही हैं जो ज्यादातर स्थानीय प्रजातियों का आश्रय स्थल हैं, इस प्रकार संरक्षण योजनाओं का महत्व बढ़ रहा है। डॉ. मंदर दातार और डॉ. रितेश कुमार चौधरी की अगुआई वाले एआरआई के दल ने उत्तर पश्चिमी घाटों की गहन जांच के बाद अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में फायटोटैक्सा में एक पत्र प्रकाशित किया है, जिसमें चार मोनोस्पेसिफिक (विशेष) पौधों के साथ ही वनस्पतियों की 181 स्थानीय प्रजातियों की अद्यतन सूची दी गई है।

उन्होंने पाया कि स्थानीय वनस्पतियों में से अधिकांश थेरोफाइट्स हैं, जो मॉनसून के दौरान एक अल्प अवधि में अपना जीवन चक्र पूर्ण कर लेती हैं।

भारत के पश्चिमी घाट वनस्पतियों से युक्त दुनिया के प्रमुख जैव विविधता स्थलों में से एक है, जिन्हें पर्वतों की एक श्रृंखला का आश्रय मिला हुआ है। कोंकण के साथ ही इस जैव विविधता स्थल का उत्तरी भाग कम वर्षा और ज्यादा शुष्क मौसम के चलते इसके दक्षिणी और मध्य क्षेत्र से काफी अलग है।

उत्तर पश्चिमी घाटों की प्रमुख भौगोलिक विशेषता यहां उपस्थित पठार और चट्टानें हैं, जो वन की तुलना में अधिकतम स्थानीय वनस्पतियां हैं। उत्तर पश्चमिमी घाटों के वनों में ऐसी कई प्रजातियां हैं, जो स्थानीय नहीं हैं।

भले ही उत्तर पश्चिमी घाट क्षेत्र का वानस्पतिक लिहाज से व्यापक सर्वेक्षण किया गया है, लेकिन स्थानीय फूलों की खेती के लिए ज्यादा संभावनाएं नहीं तलाशी गई हैं।

एआआर दल द्वारा कराए गए अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि उत्तर पूर्वी घाट सेरोपेजिया, ग्लायफोचोला, दिपकादी और इरिकॉलोन जैसी स्थानीय जड़ी बूटी वाले पौधौं की विशेष प्रजातियों की तेज विविधीकरण वाला क्षेत्र है।

डॉ. मंदर ने कहा, “वैश्विक वनस्पतियों के नक्शे पर उत्तर पश्चिमी घाटों को प्रमुखता से आगे बढ़ाने के लिए प्राथमिकता के आधार पर आईयूसीएन खतरे की स्थिति का आकलन को पूरा किया जाना आवश्यक है।”

दल का दृढ़ विश्वास है कि प्रकाशित डाटा को उत्तर पश्चिमी घाटों की संरक्षण योजना और प्रभावी संरक्षण के उपायों के लिए प्रतिपत्र के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

(ज्यादा जानकारी के लिए डॉ. मंदर दातार ([email protected], 020-25325057), वैज्ञानिक, जैव विविधता और पुरा जैविकी समूह, डॉ. धाकेफलकर, निदेशक (कार्यकारी), एआरआई, पुणे ([email protected], [email protected], 020-25325002) से संपर्क किया जा सकता है।)

प्रकाशन:

भूषण के शीगवान, अबोली कुलकर्णी, स्मृति विजयन, रितेश कुमार चौधरी और मंदर एन. दाता, 2020। भारत के उत्तर पश्चिमी घाटों और कोंकण में फूलों की खेती का स्थानीयकरण : सूची, उत्पत्ति स्थान की विशेषताएं, वितरण और संरक्षण।

फायटोटैक्सा, 440 (1): 025–054

DOI: http://dx.doi.org/10.11646/phytotaxa.440.1.2]

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