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वैदिक काल में होता था दूरस्थ देशों से व्यापार

वैदिक ग्रंथों में इस बात के प्रचुर विवेचन मिलते हैं कि उस समय बड़े-बड़े जलयानों से दूरस्थ देशों से व्यापार होता था। तमिलनाडु, ओडिशा के बंदरगाहों पर समुद्रतल में 7 से 9,000 वर्ष पूर्व के जहाजों के लंगर के अवशेष इसे प्रमाणित करते हैं

वेदों में वस्तुओं के महानुमाप उत्पादन, व्यापार, वाणिज्य, समुद्र पार विदेश व्यापार, जल, थल व वायुमार्ग से बिक्री हेतु वस्तुओं के परिवहन, मूल्य निर्धारण व नियमन, मुद्राओं के प्रकार आदि पर प्रचुर सन्दर्भ मिलते हैं। विश्व के कई भागों में सभ्यता के उदय से कई सहस्राब्दी पूर्व, भारत में उन्नत व्यवसाय एवं तत्सम्बन्धी आज जैसी उन्नत नियमावलियां, व्यवसाय के नियमन एवं करारोपण के सिद्धान्तों का अत्यन्त विस्तृत विवेचन प्राचीन भारत में उन्नत व्यावसायिक प्रशासन व प्रबन्धन युक्त अर्थतन्त्र के होने का प्रमाण है।

व्यवसाय की आधुनिक व्याख्या के अनुरूप ही वेदों व प्राचीन अर्थशास्त्र के ग्रन्थों में भी व्यवसाय के विवेचन में व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योगों का समावेश किया जाता रहा है। ईसा पूर्व कई सहस्राब्दी पहले से लेकर 17वीं सदी तक भारत विश्व के अधिकांश भागों में कृषि पदार्थों, लौह व इस्पात, ताम्र, यशद आदि धातुओं, वस्त्रों, रत्न, मसालों आदि अनेक वस्तुओं के निर्यात का केन्द्र रहा है। खम्भात, द्वारका, भरूच, सूरत आदि पश्चिमी तट स्थित प्राचीन बन्दरगाहों एवं पूर्वी तट पर तमिलनाडु, ओडिशा आदि के बडे़-बडे़ प्राचीन बन्दरगाहों पर आज भी 7 से 9,000 वर्ष प्राचीन जहाजों के लंगर समुद्रतल में बड़ी मात्रा में मिलते हैं। सिन्घु घाटी सभ्यता के समकालीन गुजरात स्थित लोथल एवं केरल के मुजुरिस आदि बन्दरगाह 3000 ईसा पूर्व के हैं।

वाणिज्य से आशय व्यापार एवं व्यापार की सहायक क्रियाओं से लिया जाता है। इन सहायक क्रियाओं में व्यापार हेतु ब्याज पर ऋण उपलब्ध करना, परिवहन, योगक्षेम अर्थात बीमा आदि आते हैं। अथर्ववेद के वाणिज्य सूक्त सहित कई सूक्त और ऋग्वेद व यजुर्वेद में व्यापार-वाणिज्य के साथ ही वस्तुओं के जल, थल व वायु मार्ग से परिवहन और अनेक उद्योगों व उद्योग वृत्तियों के विवेचन हैं।

अथर्ववेदीय वाणिज्य सूक्त
वाणिज्य सूक्त में व्यापार अर्थात क्रय-विक्रय और वाणिज्य से नियमित लाभ व उसके उचित परिरक्षण की कामना है। इसके ऋषि पण्यकाम हैं। पण्य बिक्री योग्य वस्तु होती है।

यथा: मेरी वाणिज्य के क्षेत्र में अबाधित प्रगति होवे, इन्द्र मुझे बिना हानि के व्यापार व वाणिज्य में अग्रसर करें और मुझे सभी प्रकार की वाणिज्यिक क्रियाओं से अनगिनत स्रोतों एवं विविध मार्गों से धन प्राप्त होवे। इस धन के नियोजन से क्रय-विक्रय करते हुए मैं अनवरत धन प्राप्त करता रहूं। मेरा यह धन शत्रुओं, लुटेरों, बटमारों व पाशविक वृत्तियों से उत्पीड़ित करने वाले व भयदोहनकर्ताओं से सुरक्षित रहे। अथर्ववेद-3/15/1

मन्त्र
इन्द्रमहं वणिजं चोदयामि स न ऐतु पुरएता नो अस्तु।
नुदन्नरातिं परिपन्थिनं मृगं स ईशानो धनदा अस्तु मह्यम्।। अथर्ववेद-3/15/1
द्यावा-पृथ्वी के बीच जो थल व आकाशीय मार्ग हैं, वे सभी हमें घृत तुल्य सभी सारवान वस्तुओं से तृप्त करें। जिन्हें खरीद व बेचकर हम जीवन में व्यवसाय के द्वारा प्रचुर धन-ऐश्वर्य प्राप्त कर सकें।।2।।

मन्त्र
ये पन्थानो बहवो देवयाना अन्तरा द्यावापृथिवी संचरन्ति।
ते मा जुषन्तां पयसा घृतेन यथा क्रीत्वा धनमाहराणि।। अथर्ववेद-3/15/2

अनेक व्यापारों से दूर-दूर तक व्यवसाय संचालन
वाणिज्य सूक्त के मन्त्र क्रमांक 3 में शताधिक अर्थात सैकड़ों वस्तुओं या प्रकार के व्यवसायों (—- शतसेयाय देवीम। अथर्ववेद 3-15-3) से लाभ की कामना की गई है। इसी सूक्त के मन्त्र क्रमांक 4 में अत्यन्त दूर-दूर से उक्त वर्णित सैकड़ों प्रकार के व्यवसायों एवं व्यापार से कड़ी स्पर्धा में प्रचुर लाभ कमाने की भी कामना की गयी है। (यं दूरं अहवानं अगाम्) इसी सूक्त के पांचवें मन्त्र में कामना की गई है कि व्यवसाय हेतु पूंजी की कमी नहीं आए और अपने मूलधन पर प्रचुर आय की इच्छा व्यक्त की गई है (धनेन धनं इच्छमान:)। अथर्ववेद के ये
मन्त्र हैं :-
इध्मेनाग्न इच्छमानो घृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय।
यावदीशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसेयाय देवीम्।। अथर्ववेद 3/15/3
इमामग्ने शरणि मीमृषो नो यमध्वानमगाम द्वरम्।
शुनं नो अस्तु प्रपणो विक्रयश्च प्रतिपण: फलिनं मा कृणोतु।
इदं हव्यं संविदानौ जुषेथां शुनं नो अस्तु चरितमुत्थितं च।। अथर्ववेद 3/15/4
येन धनेन प्रपणं चरामि धनेन देवा धनमिच्छमान:।
तन्मे भूयो भवतु मा कनीयोऽग्ने सातघ्नो देवान् हविषा निषेध।। अथर्ववेद 3/15/5

समुद्र पार नौवहन व व्यापार
जलमार्ग से व्यापार करने हेतु छोटी व बड़ी नौकाओं के साथ जलयानों के भी प्रचुर उपयोग के सन्दर्भ ऋग्वेद में हैं। शतरित्र अर्थात सौ अरित्र या सौ पाल वाले जलयान। ऐसे द्रुतगामी सौ पाल वाले, सौ तक चप्पू वाले जलयान एव सौ कल अर्थात नौवहन यन्त्र वाले यानों का भी वर्णन मिलता है (ऋग्वेद 5/59/2)

मन्त्र:
अमादेषां भियसा भूमिरेजति नौर्न पूर्णा क्षरति व्यथिर्यती।
दूरेदृशो ये चितयन्त एमभिरन्तर्महे विदथे येतिरे नर:।।२।।
ऋग्वेद में जल, थल व नभचारी यानों का वर्णन है। छह घोड़ों की शक्ति तुल्य कल (यन्त्रों) से युक्त जलयान और वैसे एक से अधिक कल अर्थात (यन्त्र) युक्त यानों के भी वर्णन है, जो बिना थके व बिना रुके 3 दिन व 3 रात्रि तक चल कर गंतव्य तक पहुंचते थे (ऋग्वेद1/116/4-5)।

मन्त्र
तिस्र: क्षपस्त्रिरहातिव्रजद्भिर्नासत्या भुज्युमूहथु: पतङ्गै:।
समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे त्रिभी रथैरू शतपद्भिरू बळष्वै:।। ऋग्वेद 1/116/4
अर्थ: हे सत्यप्रिय व्यापारी व नाविक! तुम दोनों तीन रात्रि व तीन दिन अतीव गति से चलते हुए इन पदार्थों के साथ छह घोड़ों के तुल्य बल व गति से युक्त जल्दी ले जाने में सक्षम हो छह कलों (यन्त्रों) के धारक विद्यमान उन (शतपद्भि:) सैकड़ों पग के समान या जल काटने में सक्षम वेगयुक्त पहियों के साथ (त्रिभि:) भूमि, अन्तरिक्ष और जल में चलनेवाले रमणीय सुन्दर मनोहर वाहनों सागर, अन्तरिक्ष बालुई भूमि वा कींच के सहित समुद्र के पार पहुंचाओ ।।4।।

अनारम्भणे तदवीरयेथामनास्थाने अग्रभणे समुद्रे।
यदष्विना ऊहथुर्भुज्युमस्तं शतारित्रां नावमातस्थिवांसम्।। 1/116/5
भावार्थ: व्यवसाय के लिए चतुर्दिक प्रवासरत अग्रचेता उद्यमी! तुम दोनों आने-जाने व ठहरने की जगह के ज्ञान के साथ अन्तरिक्ष व सागर में सौ वल्ली वा सौ पाल या नौवहन यन्त्र/चप्पू लगे हुए जलयान को बिजली और पवन के वेग के समान बहाओ और जिससे हम सभी धन व मूल्यवान वस्तुओं के अभाव को दूर करें। उससे हम अपने घर में प्रचुर धन व मूल्यवान सामग्री से युक्त सभी प्रकार के खाने-पीने के पदार्थ समूह को संजोएं। उन सामग्रियों को एक देश से दूसरे देश को ले जाएं और लोगों का हम सदा सत्कार करें।। 5।।

वेदों में शतपद्भि अर्थात पानी काटने के सौ पहिये या पंखे अर्थात प्रोपेलर होने के सन्दर्भों से यांत्रिक जलयान होने का भी प्रमाण मिलता है। ऋग्वेद में यह स्पष्ट उल्लेख है कि जलपोत द्वारा सामुद्रिक यात्राएं मनोरंजन के लिए नहीं की जाती थीं। वरन, धन प्रप्ति और व्यापार के लिए की जाती थी। यथा:

उवासोषा उच्छाच्च नु देवी जीरा रथानाम्।
ये अस्या आचरणेषु दध्रिरे समुद्रे न श्रवस्यव: । ऋग्वेद 1/48/3
तं गूर्तयो नेमन्निष: परीणस: समुद्रं न संचरणे सनिष्यव:।
पतिं दक्षस्य विदथस्य नू सहो गिरिं न वेना अधिरोह तेजसा।। ऋग्वेद 1/56/2
इस प्रकार कई सहस्राब्दी पूर्व वैदिक काल में आज जैसे व्यापार, वाणिज्य, उद्योग, यातायात आदि उन्नत अवस्था में रहे होंगे। तब ही वैदिक वाड्मय में इस प्रकार की शब्दावली युक्त व्यवसाय, वाणिज्य व यातायात के वर्णन मिलते हैं।

(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति रहे हैं)

साभार- https://www.panchjanya.com/i से

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