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हिंदुओं के हितैषी तबलीगियों जैसों के खिलाफ खुलकर सामने क्यों नहीं आते?

हाल में एक बड़े हिन्दू राष्ट्रवादी नेता का बयान छपा कि ‘कुछ तबलीगियों के काम को पूरे समुदाय का प्रतिबिंब नहीं मानना चाहिए।’ जब अनुयायियों से पूछा गया कि आशय पूरी तबलीगी जमात से है या पूरा मुस्लिम समुदाय? तो चुप्पी रही। किसी ने कहा कि अखबार ने बयान विकृत करके छापा है। लेकिन जमात पर उन का आधिकारिक मूल्यांकन क्या है – इस का जवाब नहीं मिला।

यही स्थिति इस्लाम, गाँधीवाद, समाजवाद, देवबंदी आंदोलन, आदि अनेक विषयों पर है। ये सब गंभीर मुद्दे हैं जिन से भारत लंबे समय से अत्यंत प्रभावित हो रहा है। मुख्यतः हानिकारक प्रभाव। लेकिन राष्ट्रवादी सोचने की परवाह नहीं करते। तबलीगी जमात पर आज तक उन का कोई प्रस्ताव या किसी बड़े नेता का कोई लेख खोजना कठिन है। जबकि जमात सौ साल से सक्रिय है, जिस ने भारतीय मुसलमानों को घोर अलगाववाद और हिन्दू-विरोध की सीख दी है। जो दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है, जिस के कारनामे दर्जनों देशों में कुख्यात हैं, जिसे सऊदी अरब समेत कई देशों ने ‘मुस्लिम ब्रदरहुड से भी अधिक खतरनाक’ कहकर प्रतिबंधित कर रखा है, और जिस का मुख्यालय भारत में है – उस पर हिन्दू नेताओं का कोई विचार ही नहीं है!

इस से भी दु:खद उन के द्वारा दोहरी नैतिकता अपना लेना है। किसी घटना, संस्था या मतवाद पर वे कभी एक, कभी दूसरी, गोल-मोल टिप्पणी करते हैं। फलतः अधिकांश नेताओं, कार्यकर्ताओं में नासमझी या खालीपन रहता है। यह नेतृत्व के नाम पर नेतृत्वहीनता है जिस से किसी कठिन क्षण में हिन्दू समाज मारा जा सकता है। पश्चिमी पंजाब, सिंध, पूर्वी बंगाल और कश्मीर में यही हुआ था।

हमारे दोस्त-दुश्मन इन संगठनों को ‘हिन्दू’ संगठन मानते हैं। जबकि ये अपने को ‘राष्ट्रीय’ कहते हैं। उसी सेक्यूलरिज्म की दुहाई देते हैं जिसे नेहरूवाद, वामपंथ, इस्लामियों ने मिलकर गढ़ा है। इसलिए भी हिन्दू धर्म-समाज की रक्षा में खुल कर आने में हिचकते हैं। कोई विकट स्थिति उभरने पर उस का प्रतिकार करना संबंधित क्षेत्रीय आम हिन्दुओं का कर्तव्य मानते हैं। भाव कुछ यह लगता है कि हिन्दू-विरोधियों को रोकना, समझाना-बुझाना सरकार या स्थानीय हिन्दुओं का सिरदर्द है। यह हिन्दू समुदाय का नेतृत्वहीन, असहाय होना ही हुआ!

इसीलिए ऐसे संगठनों द्वारा प्राकृतिक विपदाओं में राहत कार्य करना और स्वयं प्रसन्न होना विचित्र है। क्या वे इसीलिए बने थे? उन का मूल लक्ष्य व स्वरूप राजनीतिक है। फिर उस राहत हेतु सरकार, कारपोरेट, व्यापारी, मठ-मंदिर, रेड-क्रॉस, आदि अनेक संस्थाएं पहले से हैं। वे इन राष्ट्रवादियों से सैकड़ों गुनी अधिक मात्रा में सहायता करती हैं। अकेले हजारों गुरुद्वारे सालो भर लोगों को निःशुल्क भोजन कराते हैं। पर कभी इस की फोटो दिखाते हुए आत्म-मुग्ध नहीं होते। अतः ‘मानवतावादी’ कार्य से राष्ट्रवादी संगठन अपना खालीपन ही छिपातेलगते हैं।

यह भी दोहरापन है कि संगठन के सत्ताधारी कोई नीति बनाकर लागू करते हैं, तो उसी समय सत्ता से बाहर दूसरे नेता उस की आलोचना में बोलते हैं। परन्तु संगठन कोई आधिकारिक स्टैंड नहीं लेता। जैसे, क्या राजा पृथ्वीराज चौहान की हत्या कराने वाले सूफी की कब्र पर चादर चढ़ाना हिन्दू संगठनों की नीति है? क्या ‘प्रोफेट मुहम्मद के रास्ते पर चलने’ की सीख, एवं ‘एक हाथ में कुरान औ दूसरे में कंप्यूटर’ देना उन की नीति है? क्या हिन्दू-निंदकों को शक्ति-सम्मान देना, तथा दुर्लभ हिन्दू मनीषियों, योद्धाओं को भी उपेक्षित बल्कि निंदित तक करना राष्ट्रवादी नीति है? शिक्षा-संस्कृति में ज्ञान का लोप और राजनीतिक दुष्प्रचार को बढ़-चढ़ सहयोग देना उन की नीति है? नए-नए मुस्लिम संस्थान बनाना, बनवाना, परन्तु कोई हिन्दू संस्थान न बनाना, क्या उन की नीति है? ऐसे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं मिलता। विभिन्न राष्ट्रवादी इस पर ‘व्यक्तिगत’ विचार देते रहते हैं, जिस पर सिर मारना बेमतलब है!

हरेक कार्यकर्ता किसी विषय को जानने-समझने, सोचने-विचारने के बदले मुख्यतः अपने संगठन का बचाव करते हैं। इस के लिए अंतर्विरोधी, अनुमानित बातें बोलते हैं। किन्तु ऐसे दोहरेपन और गलत नीतियों से धर्म, समाज, देश की क्या हानि हुई? इस पर ध्यान नहीं देते। यदि संगठन से बाहर कोई दे, तो उस से भी अपेक्षा मात्र यह रहती है कि राष्ट्रवादी संगठनों, नेताओं की बड़ाई करे। यानी वही दोहरापन अपना ले। जीती मक्खी निगल ले। चाहे समाज-देश चोट खाता रहे! इस से देश का मार्गदर्शन होगा, या वह बिन पतवार नाव की तरह हिचकोले खाता रहेगा?

अधिकांश राष्ट्रवादी अपने संगठन की प्रशंसा/ निंदा के सिवा दूसरों की किसी बात से स्पंदित नहीं होते। लोगों द्वारा हिन्दू धर्म, समाज, महापुरुषों पर चोट करने, या कोई मूल्यवान कार्य करने पर भी निर्विकार रहते हैं। मानो उस के प्रतिकार या प्रसार के लिए उन्हें कुछ करने की आवश्यकता नहीं! किन्तु जैसे ही किसी ने उन के संगठन की प्रशंसा/निंदा की, सभी उठ कर खड़े हो जाते हैं। यह तो केवल अपना नेतृत्व करना हुआ! अपने संगठन का, संगठन के द्वारा, संगठन के लिए। इति। बाकी समाज अपनी परवाह खुद करे। स्पष्टतः यह समाज और संगठन का बुनियादी विलगाव है! चाहे संगठन कितना भी फैलता जाए। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की तरह।

यहाँ राष्ट्रवादियों ने मान रखा है कि केवल संगठन फैलाते जाना अपने-आप में संपूर्ण काम है। देश-समाज के लिए सोच-विचार, किसी स्थिति, समस्या का अध्ययन विश्लेषण कर सुविचारित नीति बनाना, उसे प्रकाशित कर समाज को जाग्रत करना, समाज की रक्षा हेतु सन्नद्ध रहना, संकट में आगे खड़े होना, आदि उन का काम नहीं है।

ऐसी प्रवृत्ति इस्लामी चुनौती के सामने और घातक है। क्योंकि दोहरी नैतिकता पर इस्लाम का कॉपी-राइट है। यह उस का मूल सिद्धांत है! काफिरों के लिए एक, मोमिनों के लिए दूसरी नीति। कहीं मिथ्याचार, कहीं तलवार। कभी एक बात, कभी दूसरी। इस तरह, काफिरों को गफलत में रख, उन से छूट और सहायता ले-लेकर अंततः उन का विनाश कर देना। ऐसा दोहरापन हिन्दू नहीं अपना सकता। हिन्दू धर्म-दर्शन की मूल शक्ति सत्यनिष्ठा है। अपने धर्म-स्वभाव पर टिक कर ही हिन्दू इस्लाम को हरा सकते हैं। पारंपरिक हिन्दू समाज इस्लाम का मर्म जानता है। उस में कहावत है: ‘मुसलमान बढ़े कुनेम से’। यह तो गत सौ साल से हिन्दू नेता हैं जिन्होंने गाँधीजी से मिथ्याचार, दोहरापन सीख कर हिन्दुओं को भ्रमित करने की जी-तोड़ कोशिशें कर रहे हैं। इसी से इस्लामी तबलीग को फैलने में आसानी हुई।

जबकि हिन्दू अपने नियम, सत्यनिष्ठा पर दृढ़ होकर, आम मुसलमानों को उन के मतवाद के दोहरेपन से दूर कर मानवीय नैतिकता में बनाए रख सकते थे। किन्तु उलटे हिन्दू नेताओं, बौद्धिकों ने दोहरापन अपना लिया। फलतः इस खेल में हिन्दू बुरी तरह पिट रहे हैं। क्योंकि उन के नेताओं ने स्वधर्म छोड़ कर परधर्म ओढ़ लिया। सत्यनिष्ठा के बदले दोहरापन। यह राष्ट्रवादी संगठनों की मुस्लिम नीति में साफ दिखता है। इन के बनाए ‘सर्वपंथ समादर मंच’ और ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ केवल इस्लाम की चापलूसी करने वाले बन कर रह गए। इस्लामी नेताओं ने अपनी दोमुँही बातों से सहज ही उन्हें इस्लाम का आदर-प्रचार करने को विवश किया! जबकि अपना काफिर-विरोधी अभियान चालू रखा। इसीलिए राष्ट्रीय मुस्लिम मंच प्रोफेट मुहम्मद का जयंती-समारोह मनाता है। किन्तु श्रीनगर, मालदा, या शाहीनबाग जाकर मुसलमानों को ‘ला इलाहा इलल्लाह …’ की कट्टरता और हिन्दू-विरोध से दूर करने को एक तिनका नहीं उठाता। भारत में कहीं भी हिन्दू जब अपने मुस्लिम पड़ोसियों के कारण संकट में फँसते हैं, तो राष्ट्रीय मुस्लिम महानुभाव वहाँ नजर नहीं आते।

राष्ट्रवादी हिन्दू संगठन अपनी ही बनाई कैद में बंदी लगते हैं। इस कैद का विस्तार कितना भी हो जाए, वह हिन्दू समाज से अलग ही रहेगा। क्योंकि दोहरापन और एकात्मता दो विपरीत स्थितियाँ हैं।

साभार https://www.nayaindia.com/ से

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