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ब्रिटिश राज में किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि

लायलपुर में शहरी बस्ती विधेयक (Colonisation Bill) के विरुद्ध चलाये जानेवाले आन्दोलन के प्रमुख आर्यसमाजी ही थे। २१ अप्रैल १९०७ के अन्त में जब लाला लाजपतरायजी लायलपुर की एक सभा में भाषण देने पहुँचे तब वहाँ उस समय के प्रसिद्ध आर्यसमाजी नेता सरदार अजीतसिंह ( अमर शहीद भगतसिंह के चाचा) का भाषण हो रहा था। लाला लाजपतरायजी ने इस क़ानून के विरुद्ध भाषण देते हुए घोषणा की कि “भारतभूमि के स्वामी हमारे बाप-दादा थे और अब हम उसके स्वामी हैं। अंग्रेजों को हमें उससे वञ्चित करने का कोई अधिकार नहीं है।”

लालाजी के इस भाषण से बड़ा जोश फैल गया। लालाजी के बैठते ही बाँकेदयाल ने स्वरचित प्रसिद्ध गीत ‘पगड़ी संभाल जट्टा” गाया और जनता से गवाया। यह गीत शीघ्र ही ‘बन्देमातरम्’ की तरह पञ्जाब का राष्ट्रगीत बन गया। इस गीत में हिन्दू, मुसलमान तथा सिक्ख सबको मिलकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध करने की प्रेरणा देते हुए कहा गया कि इस नये कानून से जाटों की सारी इज्जत धूल में मिल रही है। उन्हें अपनी पगड़ी (इज्जत) की रक्षा के लिए एकजुट होकर सङ्घर्ष के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इस गीत के बाद चौधरी शहाबुद्दीन (१८८६ में लाहौर में स्थापित डी०ए०वी० स्कूल के और इस प्रकार स्कूल के प्रिंसिपल ला० हंसराजजी के भी प्रथम विद्यार्थी तथा कालान्तर में पञ्जाब असेम्बली के स्पीकर) रामभजदत्त चौधरी और सरदार अजीतसिंह के भाषण हुए।

अन्त में लाला लाजपतराय का अत्यन्त प्रभावशाली भाषण हुआ, परन्तु उस सभा में सबसे अधिक जोशीला भाषण अजीतसिंह का था जिसने श्रोताओं को अन्दर तक हिला दिया। उस जलसे में भारी संख्या में सरकारी अफ़सर तथा सिपाही उपस्थित थे, किन्तु किसी की भी हस्तक्षेप करने की हिम्मत नहीं पड़ी। पगड़ी सम्भाल जट्टा गीत का अविकल इस प्रकार है –
पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल ओए ।
लुट लित्ता माल तेरा, हालो बेहाल ओए ॥
फ़सलं नू खा गये किड़े , तन ते तेरे नही लीड़े।
भुक्खां ने खूब नपेड़े, रोंदे ने बाल ओए।
पगड़ी सम्भाल जट्टा। पगड़ी सम्भाल ओए।
हिन्द है मन्दिर तेरा, इसदा पुजारी तूं।
कद तक झल्लेगा तू, एहदी ख्वारी तूं।
लड़ण तै ते मैरण दी, करलैं तैयारी तूं।
पगड़ी सम्भाल जट्टा, पगड़ी संभाल ओए ।
गीत में ‘जटटा’ शब्द किसानमात्र अभ्यार्थी है।

दयानन्द जन्मजात क्रान्तिकारी था। स्वभावत: उसके अनुयायी भी उसी मार्ग के अनुगामी थे स्वामीजी ने सबसे पहले आर्यसमाज की स्थापना राजकोट में की थी। उसी समय ब्रिटिश सरकार ने बड़ौदा नरेश को गद्दी से उतार दिया। आर्यसमाजियों ने महाराजा का समर्थन किया। काठियावाड़ की रियासतों में ब्रिटिश हितों की रक्षा करना वहाँ पर नियुक्त वायसराय के प्रतिनिधि जेम्सपील का दायित्व था। वह आर्यसमाज के नाम से विदकता था। इसलिए वहाँ आर्यसमाजियों के साथ बड़ा क्रूर व्यवहार किया गया, फलतः राजकोट का आर्यसमाज छह मास से अधिक न ठहर सका ।

फ्रांस के विश्व विख्यात सन्त एवं विद्वान् रोम्यां रोलां ने स्वरचित रामकृष्ण परमहंस की जीवनी में १९०५ में बङ्गाल में हुए विद्रोह के लिए आर्यसमाज को ज़िम्मेदार ठहराते हुए लिखा है कि “चाहे दयानन्द चाहते थे या नहीं, उनकी आर्यसमाज ने १९०५ में बङ्गाल में हुई क्रान्ति के लिए मैदान तैयार कर दिया था।” (Whether he wished it or not, Swami Dayananda’s Arya Samaj prepared the way for the revolt in Bengal in 1905).
रोम्यां रोलां के कथन की पुष्टि करते हुए A. De. Reincourt ने लिखा है-
“There is little doubt today that the great revolt in Bengal in 1905 was largely the direct result of the religious nationalism of Arya Samaj. Dayananda’s organisation was certainly the first nucleus of political nationalism.”
– The Soul of India. P. 136
अर्थात् अव इसमें कोई सन्देह नहीं है कि बङ्गाल की १९०५ की बड़ी क्रान्ति बहुत हद तक आर्यसमाज के धार्मिक राष्ट्रवाद का प्रत्यक्ष परिणाम थी । दयानन्द का सङ्गठन निश्चय ही राजनैतिक राष्ट्रीयता का बीजरूप था ।
लेखक – स्वामी विद्यानन्द सरस्वती
पुस्तक – बागी दयानंद
प्रस्तुति – अमित सिवाहा

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