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पत्रकारिता के पुरोधा सप्रे जी पर डॉ. चन्द्रकुमार जैन के प्रेरक तथा प्रभावी वीडियो और व्याख्यान की धूम

राजनांदगांव। मध्यभारत और छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के प्रतिष्ठापक पंडित माधवराव सप्रे जयन्ती, अलंकरण समारोह तथा वेब कथा महोत्सव में दिग्विजय कालेज के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. चन्द्रकुमार जैन के प्रासंगिक वीडियो और व्याख्यान ने समां बाँध दिया। छत्तीसगढ़ मित्र और माधवराव सप्रे साहित्य एवं शोध केंद्र, रायपुर के दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय आयोजन के दोनों दिवस देश विदेश के विद्वान अतिथि वक्ताओं और प्रतिभागी प्राध्यापकों तथा शोधार्थियों ने पंद्रह मिनट के इस वीडियो के माध्यम से छत्तीसगढ़ मित्र के अतीत और वर्तमान का साक्षात्कार किया। इसके अतरिक्त डॉ. जैन ने प्रमुख सत्र में अतिथि व्याख्यान भी दिया। डॉ. जैन की ने इस प्रस्तुति के जरिए प्रदेश की पहचान को वाणी दी।

अतिथि वक्तव्य में डॉ. चंद्रकुमार जैन ने कहा कि स्वनामधन्य माधवराव सप्रे ने सन 1900 में बिलासपुर के पेंड्रारोड़ जैसे छोटे से गांव से छत्तीसगढ़ मित्र मासिक का प्रकाशन किया था। छत्तीसगढ़ में हिंदी और शिक्षा का प्रसार करना उनका मुख्य ध्येय था। आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसका प्रकाशन केवल तीन वर्ष तक संभव हो सका किन्तु इस अक्षर साधना ने सप्रे जी को छत्तीसगढ़ मित्र का पर्याय बना दिया।

डॉ. जैन ने कहा कि ऐसे दौर में जब छत्तीसगढ़ में कोई प्रिंटिंग प्रेस नहीं था, सप्रे जी ने छत्तीसगढ़ मित्र का प्रकाशन किया। वास्तव में यह उनकी साधना का विनम्र प्रकाशन था। उनकी कहानी एक टोकरी भर मिट्टी की तरह छत्तीसगढ़ मित्र भी मध्यभारत में पत्रकारीय मिट्टी की महक का का पर्याय बन गया । उन्होंने पत्रकारीय मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। यहाँ तक चतुर किन्तु ईमानदार संवादताओं की ज़रुरत हमेशा महसूस करते थे। इसके लिए बाकायदा अपनी पत्रिका में विज्ञापन भी प्रकाशित करते थे। सप्रे जी ने समाचारों के अंत में टिप्पणी देने की परंपरा भी अंत तक जीवंत बनाये रखी।

डॉ. जैन ने कहा कि सप्रे जी ने अत्यंत पिछड़े पेण्ड्रा जैसे इलाके से पत्रिका प्रकाशन की चुनौती को स्वीकार किया और पत्रकारिता के एक नये इतिहास की बुनियाद रखी। माधवराव सप्रे एक महान तपस्वी साहित्यकार और पत्रकार थे। छत्तीसगढ़ को अपनी कर्मभूमि बनाकर साहित्य और पत्रकारिता के इतिहास में इसे उच्च स्थान दिलाया। भारतीय स्वंतत्रता संग्राम में भी सप्रे जी का ऐतिहासिक योगदान रहा। उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से तत्कालीन भारतीय समाज में राष्ट्रीय चेतना जगाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डॉ. जैन ने कहा कि आज भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी तथा प्रतिष्ठित समालोचक डॉ. सुशील त्रिवेदी के सम्पादन और डॉ. प्रोफेसर डॉ. सुधीर शर्मा के कुशल प्रबंधन में उच्च आदर्शों के अनुरूप छत्तीसगढ़ मित्र का प्रकाशन निरंतर है। अब यह साहित्य और शोध की एक लोकप्रिय पत्रिका है जिसके कई विशेषांक मील के पत्थर के समान हैं।आयोजन के प्रमुख रूप से दुबई की सुश्री पूर्णिमा वर्मन, मास्को रूस के प्रोफेसर मैक्सिम दैमचेंको, श्रीलंका की सुश्री विलिनी रोड्रिगो, उज्जैन विश्वविद्यालय के कुलअनुशासक डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा सहित सम्पादक डॉ. सुशील त्रिवेदी, साहित्यकार गिरीश पंकज, संस्कृतिकर्मी राहुल सिंह के साथ डॉ. चंद्रकुमार जैन ने भागीदारी की। गरिमामय आयोजन का सरस संयोजन डॉ. सुधीर शर्मा ने किया। इस अवसर पर पत्रिका के कहानी विशेषांक का विमोचन भी किया गया। अनेक प्रतिभागियों ने लघुकथा पाठ किया। आयोजन यादगार बन गया।

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