Tuesday, April 16, 2024
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मध्य भारत में बढ़ रहा है संघ कार्य

शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में चलनेवाली शाखाओं की संख्या में वृद्धि, 2756 शाखाएं हो रही है संचालित 

भोपाल। नागपुर में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में संपूर्ण देश के संघकार्य का वृत्त प्रस्तुत किया गया, जिसके अनुसार देश के विभिन्न भागों सहित मध्यभारत प्रांत में भी तेजी से संघकार्य बढ़ रहा है। शताब्दी वर्ष को ध्यान में रखकर मध्यभारत प्रांत में सभी इकाईयों तक संघकार्य को पहुँचाने के प्रयास चल रहे हैं। इस समय मध्यभारत प्रान्त में संघ की रचना से महानगरीय एवं ग्रामीण जिलों के 1763 स्थानों पर 2756 शाखाएं चल रही हैं। जिनमें महानगर में 37 स्थानों पर 432 शाखाएं एवं ग्रामीण जिलों में 1726 स्थानों पर 2324 शाखाएं चल रही हैं। इसके साथ ही 513 स्थानों पर 528 साप्ताहिक मिलन के रूप में संघकार्य चल रहा है। आगामी एक वर्ष में प्रान्त की प्रत्येक बस्ती और गांव तक संघ के कार्यविस्तार का लक्ष्य है। इसके अलावा संघ के स्वयंसेवकों द्वारा समाज के साथ मिलकर सेवा बस्तियों में सेवाकार्य भी चलाये जा रहे हैं।

संघ ने प्रतिनिधि सभा में राम मंदिर के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया है। ‘श्रीराममन्दिर से राष्ट्रीय पुनरुत्थान की ओर’ शीर्षक से पारित प्रस्ताव में प्रतिनिधि सभा ने आग्रह किया है कि ‘रामराज्य’ की संकल्पना को साकार करने के लिए नागरिकों के जीवन एवं उनके सामाजिक दायित्व में प्रतिबद्धता दिखनी चाहिए। श्रीराम के आदर्शों के अनुरूप समरस, सुगठित राष्ट्रजीवन खड़ा करने में नागरिकों को अपना योगदान देना चाहिए। संघ का मानना है कि श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की घटना भारत के पुनरुत्थान के गौरवशाली अध्याय के प्रारंभ होने का संकेत है। श्रीरामजन्मभूमि पर श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा से भारत के स्वदेशी समाज में आत्मगौरव की भावना का संचार हुआ है, वह आत्मविस्मृति की स्थिति से बाहर निकला है। संघ ने स्मरण कराया है कि राम मंदिर के पुनर्निर्माण का उद्देश्य तभी सार्थक होगा, जब सम्पूर्ण समाज अपने जीवन में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों को प्रतिष्ठित करने का संकल्प ले। श्रीराम के जीवन मे परिलक्षित त्याग, प्रेम, न्याय, शौर्य, सद्भाव एवं निष्पक्षता आदि धर्म के शाश्वत मूल्यों को आज समाज में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्यक है। सभी प्रकार के परस्पर वैमनस्य और भेदों को समाप्त कर समरसता से युक्त पुरुषार्थी समाज का निर्माण करना ही श्रीराम की वास्तविक आराधना होगी।

स्वयंसेवकों द्वारा किए जा रहे उल्लेखनीय प्रयास
मध्यभारत प्रांत में संघ के कार्यकर्ताओं के द्वारा सामाजिक समरसता के विशेष प्रयास किए गए हैं। विशेषकर राजगढ़ जिले में स्वयंसेवकों ने सामाजिक सर्वेक्षण, संवेदनशील स्थानों को चिह्नित करके, वहाँ सामाजिक समरसता को बढ़ानेवाली गतिविधियों का संचालन किया। ब्यावरा में महामंडलेश्वर महाराज परमानंद और खिलचीपुर में पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के माध्यम से समाज प्रमुखों का मार्गदर्शन कराया गया। संतों की पदयात्रा भी निकाली गईं। गाँव एवं नगरों में रक्षाबंधन उत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें एक-दूसरे को रक्षासूत्र बांधकर सामाजिक समरसता का संकल्प लिया गया।

राजगढ़ के बाबल्दा गाँव में स्वयंसेवकों ने न केवल मुक्तिधाम पर सेवाकार्य के माध्यम से समाज परिवर्तन के प्रयास किए हैं। बाबल्दा गाँव में 9 मुक्तिधाम हैं, जिनमें से केवल एक ही सरकारी जमीन पर है, जो सार्वजनिक है। बाकि के मुक्तिधाम जाति-बिरादरी के आधार पर बँटे हुए हैं। सभी मुक्तिधामों में गंदगी का अंबार था और बारिश के दिनों में वहाँ तक पहुँचना भी कठिन था। स्वयंसेवकों ने सबसे पहले ग्राम समिति बनाकर, गाँव के नवयुवकों को साथ लेकर यहाँ स्वच्छता अभियान चलाया। उसके बाद सबके सहयोग से बोरवेल और बाउंड्रीवॉल बनवायी। सामाजिक समरसता को बढ़ाने के लिए सबके लिए एक ही मुक्तिधाम परिसर के विचार को भी साकार करने में बहुत हद तक स्वयंसेवक सफल हुए हैं।

विदिशा जिले में खामखेड़ा में स्वयंसेवकों ने नशामुक्ति के लिए विशेष अभियान चलाया। शाखा टोली ने उन घरों की पहचान की, जहाँ कोई न कोई व्यक्ति नशा की गिरफ्त में था। इसके बाद उनसे मित्रता की और उन्हें नशा छोड़ने के लिए प्रेरित किया, जिसके सुखद परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।

समाज के लोगों का साथ लेकर स्वयंसेवक विमुक्त, घुमंतु और अर्ध घुमंतु समाज के उत्थान के लिए भी कार्य कर रहे हैं। स्वयंसेवकों ने इस वर्ग के बंधुओं को नागरिक सुविधाएं दिलानेवाले प्रमाण-पत्र बनवाने में सहयोग किया है। कौशल उन्नयन के लिए प्रशिक्षण दिया है। बच्चों की शिक्षा हो सके, इसलिए उनको स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित किया। व्यसन मुक्ति के लिए भी जागरूकता अभियान चलाए हैं।

सामाजिक समरसता संघ के लिए निष्ठा का विषय
अपने उद्बोधन में सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाने ने कहा कि सामाजिक समरसता यह संघ की रणनीति का हिस्सा नहीं है, वरन यह निष्ठा का विषय है। सामाजिक परिवर्तन समाज की सज्जन-शक्तियों के एकत्रीकरण और सामूहिक प्रयास से होगा। सम्पूर्ण समाज को जोड़कर सामाजिक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ने का संघ का संकल्प है। संघ का कार्य देशव्यापी राष्ट्रीय अभियान है। हम सब एक समाज, एक राष्ट्र के लोग हैं। उन्होंने कहा कि आगामी 2025 विजयादशमी से पूर्ण नगर, पूर्ण मंडल तथा पूर्ण खण्डों में दैनिक शाखा तथा साप्ताहिक मिलन का लक्ष्य पूरा होगा। मध्य भारत प्रांत ने भी अपनी आगामी योजना इसी के अनुरूप बनायी है।

पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर का 300वाँ जयंती वर्ष
प्रतिनिधि सभा में सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि 31 मई, 2024 से देवी अहिल्याबाई होलकर का 300वाँ जयंती वर्ष प्रारंभ हो रहा है। उनका जीवन भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम पर्व है। ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले सामान्य परिवार की बालिका से एक असाधारण शासनकर्ता तक की उनकी जीवनयात्रा आज भी प्रेरणा का महान स्रोत है। वे कर्तृत्व, सादगी, धर्म के प्रति समर्पण, प्रशासनिक कुशलता, दूरदृष्टि एवं उज्ज्वल चारित्र्य का अद्वितीय आदर्श थीं। ‘श्री शंकर आज्ञेवरुन’ (श्री शंकर जी की आज्ञानुसार) इस राजमुद्रा से चलने वाला उनका शासन हमेशा भगवान् शंकर के प्रतिनिधि के रूप में ही काम करता रहा। उनका लोक कल्याणकारी शासन भूमिहीन किसानों, भीलों जैसे जनजाति समूहों तथा विधवाओं के हितों की रक्षा करनेवाला एक आदर्श शासन था। समाजसुधार, कृषिसुधार, जल प्रबंधन, पर्यावरण रक्षा, जनकल्याण और शिक्षा के प्रति समर्पित होने के साथ साथ उनका शासन न्यायप्रिय भी था। समाज के सभी वर्गों का सम्मान, सुरक्षा, प्रगति के अवसर देने वाली समरसता की दृष्टि उनके प्रशासन का आधार रही।

केवल अपने राज्य में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण देश के मंदिरों की पूजन-व्यवस्था और उनके आर्थिक प्रबंधन पर भी उन्होंने विशेष ध्यान दिया। बद्रीनाथ से रामेश्वरम तक और द्वारिका से लेकर पुरी तक आक्रमणकारियों द्वारा क्षतिग्रस्त मंदिरों का उन्होंने पुनर्निर्माण करवाया। प्राचीन काल से चलती आयी और आक्रमण काल में खंडित हुई तीर्थयात्राओं में उनके कामों से नवीन चेतना आयी। इन बृहद कार्यों के कारण उन्हें ‘पुण्यश्लोक’ की उपाधि मिली। संपूर्ण भारतवर्ष में फैले हुए इन पवित्र स्थानों का विकास वास्तव में उनकी राष्ट्रीय दृष्टि का परिचायक है।

पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई की जयंती के 300 वें वर्ष के पावन अवसर पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए समस्त स्वयंसेवक एवं समाज बंधु-भगिनी इस पर्व पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में मनोयोग से सहभाग करें। उनके दिखाये गए सादगी, चारित्र्य, धर्मनिष्ठा और राष्ट्रीय स्वाभिमान के मार्ग पर अग्रसर होना ही उन्हें सच्ची श्रध्दांजलि होगी।

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