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अतीत के सच का सामना

आज रश्मि को आफिस से जल्दी घर जाना था लेकिन हमेशा की तरह ऐन वक्त पर जरूरी काम आ गया, उसे पूरा कर के बेल् बजाई, तुरंत राकेश आ गया। रश्मि ने उससे कहा कंप्यूटर, एसी सब बन्द कर के कमरे को ताला लगा दे।

जैसे ही रश्मि कमरे से बाहर जाने को हुई, राकेश ने कहा “मैडम कुछ कहना था…” रश्मि ने कहा “जल्दी बोलो मुझे घर पर काम है। जल्दी जाना है”।

वह बोला “मैडम मुझे पांच हजार की जरूरत थी यदि पैसे मिल जाते तो धीरे धीरे कर के चुका दूंगा ….” आगे वह कुछ बोलता इसके पहले ही रश्मि ने कहा “अभी पिछले महीने भी पैसे लिए थे वही अभी पूरा नहीं हुआ और तुम और पैसे मांग रहे हो, यह तो ठीक नहीं है”।

रश्मि की बात सुन कर रमेश गर्दन झुका कर बोला “वो मैडम बिटिया को इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिल किया है, फीस के लिए तो लोन ले लिया है जिसे उसकी नौकरी लगने के बाद ही चुकाना है पर उसके अलावा भी बहुत सारि चीजें उसे पढ़ाई के लिए चाहिए इसीलिए पैसे की जरूरत थी। महीने की पगार तो ऐसे ही खर्च हो जाती है क्योंकि आपको तो पता ही है पिताजी की दवाई का खर्च ही बहुत….”

चूंकि रश्मि बहुत जल्दी में थी तो उसकी बात को बीच में ही काटते हुए बोली “अच्छा ठीक है कल देखती हूँ” , कह कर निकाल गई और गाड़ी में बैठ कर गाड़ी स्टार्ट कर चल पड़ी।

गाड़ी के साथ ही रश्मि के दिमाग में विचारों का दौर भी चल पड़ा….आज से ठीक पन्द्रह दिन बाद रश्मि का बेटा विदेश पढ़ाई के लिए जाने वाला है उसी की तैयारी में वह लगी हुई है। बेटे की पूरी पढ़ाई यहां तक कि विदेश की पढ़ाई भी रश्मि और उसके पति के लिए किसी भी प्रकार से भारी नहीं है, वे उसे अपने ही खर्चे पर भेज रहे हैं। उधर रमेश की बेटी , जिसे उसने जैसे तैसे अभी तक पढ़ाया, इंजीनियरिंग में दाखिल कराया, वो हमेशा अच्छे नंबरों से पास भी होती रही, उसकी पढ़ाई के लिए रमेश को कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

यही सब सोचते सोचते रश्मि अपने अतीत में चली गई जब इसी तरह की परेशानी में उसके माता पिता भी थे। आज से 35 साल पहले रश्मि को कंप्यूटर कोर्स करना था , जो उन दिनों बिल्कुल ही नया फील्ड था। कोर्स में दाखिल करने के लिए 1000 रुपये की फीस, जो उस जमाने के हिसाब से काफी मोटी रकम थी, के लिए उसके पिता ने अपने आफिस में एडवांस सैलरी मांगी थी।

रश्मि के पिता एक प्राइवेट फर्म में काम करते थे। एडवांस सैलरी मांगने पर उनके बॉस ने कहा था “क्या फायदा इतने रुपये खर्च कर के बेटी को ये कोर्स कराओगे, इससे कौनसी उसे नौकरी लग जाएगी, इससे तो अच्छा उसकी शादी कर के छुट्टी पाओ क्यो बेवजह इतना खर्च करना।”

काफी ना नुकर के बाद बड़ा एहसान जताते हुए रश्मि के पापा को पैसे मिल पाए थे।

शायद भगवान ने उसी दिन रश्मि की नियति लिख दी थी। उसी कंप्यूटर कोर्स की बदौलत रश्मि को एक साल बाद ही अच्छी नौकरी मिल गई। बाद में आफिस की परीक्षाएँ पास कर जल्दी ही वह एक अच्छे पद पर पहुंच गई।

आज जब भी रश्मि सोचती है कि उस दिन पापा के बॉस ने जो कहा उसे ही शायद ईश्वर ने पलट कर उसकी झोली में प्रसाद के रूप में डाल दिया और अपने होने का एहसास करा दिया साथ ही यह भी जता दिया कि ईश्वर हमेशा सच्चे और मेहनती लोगों के साथ होता है। मानो पापा के बॉस के मुँह से निकले शब्द ही उसकी किस्मत के पन्नों में लिख दिए गए थे ।

यही सोचते हुए रश्मि को उस दिन चोरी से सुनी हुई पापा मम्मी की सारी बातें भी याद आ गई क्योकि पापा ने तो उसे आफिस से आते ही खुशी खुशी एक हज़ार रुपये दे कर कहा था “बेटा कल जा कर कंप्यूटर क्लास की फीस भर देना।” ये पैसे कैसे आये यह बात तो रश्मि को अगले दिन पापा मम्मी की बातें सुनने के बाद पता चली थी। पापा की काँपती आवाज और मम्मी की आँखों के आँसूं रश्मि ने दरवाजे की ओट से देखे थे। आज रश्मि उस आवाज का दर्द और आँसूओं का मतलब भलीभांति समझती थी।

यही सोचते सोचते रश्मि ने अपने मन में ही एक प्रण कर लिया कि जो दुख, दर्द और अपमान उसके पापा मम्मी ने सहा है उसकी पुनरावृत्ति वह रमेश और उसकी बेटी के जीवन में नहीं होने देगी। रमेश ही क्यों इस तरह की समस्या में जो भी उसे मिलेगा उसकी हरसंभव सहायता करेगी जिससे कोई शिक्षा के अधिकार से पैसे की कमी के कारण वंचित न रहे।

अपनी विचार श्रृंखला में निर्णय पर पहुँचते हुए यंत्रवत गाड़ी चला कर रश्मि अपने घर पहुंची और गाड़ी से उतरने के पहले ही उसने रमेश को फ़ोन लगा कर कहा कि कल उसे पैसे मिल जाएंगे और यह भी कहा कि ये पैसे उसे वापस करने की भी जरूरत नहीं है।

इसके बाद रश्मि को इतना सुकून मिला जिसकी कोई सीमा नहीं।एकदम हल्के और प्रसन्न चित्त से उसने घर में प्रवेश किया और पुनः वर्तमान में आ गई और सोफे पर बैठते हुए पापा को फ़ोन लगाया और ढेर सारी बातें की, यह बात अलग है कि आज तक न तो रश्मि के पापा मम्मी ने उसे यह बात बताई और न रश्मि ने उन्हें यह जताया कि यह बात उसे मालूम है। कुछ बातें बिन कही ही अच्छी होती हैं।

वाकई शायद मनुष्य का प्रत्येक कर्म जैसे उसके अतीत से प्रेरणा लेता हुआ होना चाहिए। जीवन के कटु अनुभव उसे कुछ अच्छा करने के लिए सीख दें तो वहीं अच्छे अनुभव उसे इस प्रकार की अच्छाई को सर्वत्र फैलाने के लिए प्रेरित करें, इसी आशा के साथ रश्मि दुगने उत्साह से अपने कामों में लग गई।

( श्रुतिका राजावत बैंक नोट प्रेस देवास में वरिष्ठ लेखा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं)

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