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हाड़ोती : लोककलाकार : गुदड़ी का लाल जगदीश निराला

( राजस्थानी फिल्मों तक पहुंचा तेजाजी लोक कलाकार )

बारां जिले के मंगरोल का निवासी जगदीश निराला ऐसा निराला लोककलाकार है जो अभावों में पल कर भी अपने अभिनय और गीत लेखन के दम पर मुंबई तक जा पहुंचा।
1986 में विनस रिकॉर्डिंग कंपनी मुंबई में इनके गीतों को तेजकरण राव रेखा राव द्वारा गाया गया और “नखराली बंजारन” का विमोचन हुआ तथा सूचना केंद्र कोटा में सम्मानित किया गया। यही नहीं राजस्थानी भाषा की मुंबई स्थित सिनेमा निर्मात्री कुसुम जोशी की फिल्म “बालम थारी चुनरी में” मेहमान कलाकार के रूप में नीलू जी रवि झाँकल रमेश तिवारी अभय बाजपेई के साथ काम करने का मौका मिला। हाडोती भाषा के 10 गीतों का रिकॉर्डिंग दरियागंज नई दिल्ली के स्टूडियो में करवा कर वंदना जी बाजपेई सत्य अधिकारी अनुराधा शर्मा संगीतकार गोपाल खन्ना द्वारा गीतों का सीरियल बनाने के लिए तैयार किया !

निराला ने बताया कि कविता एवं अभिनय में रुचि होने के कारण लोक नाटकों एवं मंचीय कवि सम्मेलनों में भाग लिया। कोटा में डॉक्टर धन्ना लाल सुमन एवं साहित्य मनीषी प्रेम जी प्रेम से घनिष्ठ संपर्क में रहे और भरतेन्दू समिति के कई आयोजनों गोष्ठियो में भाग लिया। कोटा में आयोजित प्रथम हाडोती उत्सव में कई क्षेत्रीय कलाकारों का कोटा में अन्य स्थानों पर उच्च प्रदर्शन करवाने में मांगरोल क्षेत्र के संयोजक की भूमिका निभाई।

ये स्वयं लोक देवता तेजाजी, रामलीला में रावण और पन्द्रह बीस साल से माँगरोल की ढ़ाईकड़ी रामलीला में अभिनय कर रहे हैं। ये बताते हैं कि सामाजिक संस्कृति के द्वारा शुध्द जनता का मनोरंजन “माऴी मालण” को देखने हजारों की संख्या में लोग कुंज चौक पर रात के तीन बजे तक भी इक्कठा होते हैं जो शुध्द हास्य का खेल है। वही सुमतं, राजा दशरथ के मंत्री व दोस्त का राम जी को वन तक पहुँचाकर आने वाला पात्र है। “भील भीलणी” तथा “भाँड भाँडणी” शुध्द हास्य स्वाँग के साथ गीत नृत्य के प्रसंग है. लंकापति रावण का मेरा खास अभिनय दिलों छूता है मेरे निजी संवाद आमजनता को संदेश देते हैं।

 साहित्य : पूर्वी पाकिस्तान पर हुआ पाकिस्तान का हमला भारत का सहयोग से बांगलादेश का नामकरण ओर फतह पर पहला गीत आपने 13 वर्ष की उम्र में लिखा ..……..
” जीत्यो जीत्यो बंगळादेस ढ़ाका पे झँन्डो पहरा दियो।”
उसके बाद व्याप्त भ्रष्टाचार पर जो गीत लिखा जो बहुत लोकप्रिय हुआ……….
“आछी आजादी आई रे…
दूध की रुखाळी करबां बंल्याँ आई रे.”

इसी गीत को सुनकर उस वक्त के इनके पिता के साथी भैरुलाल काळाबादल, माधोलाल खानपुर्या और स्काउट मास्टर बिरधीलाल राठौर जो उनकी सिलाई की दुकान बैठते थे ने मिलकर इनके नाम के साथ “निराला” की उपाधी देकर इन्हें निराला बना दिया। तब से निराला की साहित्यिक यात्रा भी निरंतर निर्बाध रूप से जारी है। अब क्या था हाड़ोती में गीत लिखते रहे और मित्रों के सौजन्य से मंच साझा करते रहे और दशहरा मेले के राजस्थानी कवि सम्मेलन तक जा पहुंचे। रिकार्डिंग हुई, आकाशवाणी से प्रसारित हुए। इनके शुरुआती गीतों में ” नावं तो पूछ छ भरतार को..”, को भी श्रोता बार बार सुनने का आग्रह करते थे।
गीतों के साथ – साथ हास्य कवितायें भी लिखने लगे।

 इनके प्रकाशित प्रथम काव्य संकलन में इनके तीन उत्कृष्ट हाड़ौती के गीतों ने इन्हें ख्याती दिलाई। हिंदी साहित्य में “पतझड़ कली बसंत”” काव्य कथा का प्रकाशन भारतीय कला संस्कृति संस्थान मांगरोल के तत्वाधान में किया गया।”पहलवान मदनो” और “लछमी” आपकी मुख्य कहानियां रही। राजस्थानी फिल्म निर्माण के लिए कई कहानियां नाटक एकांकी तैयार किए।”जागती जोत” बीकानेर से प्रकाशित पत्रिका और समाचार पत्रों में आपकी कहानियांऔर गीत प्रकाशित हुए।

नाट्य अभिनय , कला मँडल के नाटकों के मुख्य पात्र भी रहे। हरिश्चन्द्र तारामति के रोहिताश, सत्यवान सावित्री के सत्यवान, भाई बहिन के भाई डाकू दयाराम गूजर की भूमिका ये दमदार रूप से निभाते हैं। अमरसिंह राठौर के ये राम सिंह रहे, श्रीमति मंजरी, ढाला मारु, गुलेबक़ावली, स्याहपोश, काला डाकू ,लेला मजनू ,सति वृन्दा के जलन्धर, भक्त प्रह्लाद, बालक ध्रुव के अलावा दर्जनों नाटको के मुख्यपात्र रहे।

सम्मान : आपको 5 दिसंबर 1992 को ताल कटोरा स्टेडियम में ज्ञानी जैल सिंह जी द्वारा”अंबेडकर फेलोशिप” प्रदान की गई। भारतीय ज्ञान विज्ञान परिषद ,जयपुर द्वारा विज्ञान कला जत्था के माध्यम से 60 दिनों तक हाड़ौती अंचल में लोक नाटकों का मंचन करने पर सम्मानित किया गया। स्थानीय रामलीला मंच पर करीब 20 सालों से श्रेष्ठ अभिनेता के रूप में चयनित होते रहे हैं। इन्हें सारंग साहित्य संस्था ने “सारंग साहित्य रत्न” व “ओमप्रकाश दोस्त अलंकरण” प्रदान कर सम्मानित किया। करसो खेत खलाण संस्था लुहावद शाखा द्वारा श्रैष्ठ साहित्यकार का सम्मान भी आपको प्रदान किया गया।

 परिचय : लोककला, अभिनय और साहित्य को समर्पित इस शख्शियत का जन्म 13 जुलाई 1957 को मंगरोल में स्वतंत्रा सेनानी मेहर रत्न स्व. कल्याण मल टेलर के परिवार में हुआ। आपकी माता मोतिया बाई भी लोक गायिका थी। परिस्थितियों वश आप मेट्रिक तक ही शिक्षा प्राप्त कर सके। पिता की स्मृति में प्रतिवर्ष साहित्य एवं संस्कृति के आयोजन करते हैं। गांवों में नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन पर प्रभावी संदेश दिए। आपने करीब 16 सौ पौधे लगाकर वृक्ष बनाएं और आपको वृक्ष मित्र के नाम से सम्मानित किया गया। वर्तमान में भजन , गज़ल, गीत, कहनी और अभिनय लेखन में रत हैं और नाटकों में अभिनय जारी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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