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हमारी सनातन संस्कृति और वेदों में गाय का महत्त्व

इन्द्रेण युजा निःसृजन्त वाघतो व्रजं गोमन्तमश्विनम्।
सहस्त्रं मे ददतो अष्टकण्र्य: श्रवो देवेष्वक्रत।। -ऋ० १०/६२/७

“राष्ट्रयज्ञ के ऋत्विज् मेधावी वे अङ्गिरस ऋषिगण राष्ट्रयज्ञ के ब्रह्मा राजा (इन्द्र) को सहायक पाकर पणियों द्वारा कैद किये हुए गौओं और अश्वों के समूह को छुड़ा लाते हैं तथा अष्टकर्णी गौएँ जनता को प्रदान कर देते हैं। इस प्रकार देवजनों में वे कीर्ति को प्राप्त करते हैं।”

जब राष्ट्र गो-हीन और अश्वहीन हो जाता है, शत्रुओं द्वारा उसकी सम्पत्ति अपहृत कर ली जाती है, तब अङ्गिरस् ऋषि ही उस सम्पत्ति को वापिस लाते हैं। उदाहरणार्थ, अपने ही देश को लें। यहां किसी समय दुधारू गौएँ होती थीं, घी-दूध-दही की इस देश में नदियां बहती थीं। आज अच्छी नस्ल की गौएँ दुर्लभ हैं। किसी समय हवा से बातें करने वाले, सधे हुए, उत्कृष्ट कोटि के घोड़े होते थे। आज वैसे घोड़े भी दुर्लभ हैं। देश के अङ्गिरस् ऋषियों के गोरक्षा और पशुरक्षा क अभियान से ही देश अपनी पुरानी स्थिति को पा सकता है, किन्तु देश के इन्द्र, अर्थात् राजा या सरकार का समर्थन मिलना भी आवश्यक है।

पर वेद के गौ और अश्व केवल गाय और घोड़ों के ही वाची नहीं हैं। गौ का अर्थ है गव्य पदार्थ घी, दूध, दही आदि, जो कि समग्र भोज्य सम्पत्ति का प्रतीक है; अश्व उपलक्षण है इतर उपयोग में आने वाली वस्तुओं का। गौ के अर्थ वाणी, भूमि, ज्ञानकिरण आदि भी होते हैं। शत्रु ने हम पर अधिकार करके हमारी वाणी की स्वतन्त्रता को हर लिया है, या वेदवाणियाँ अन्धकारावृत हो गयी हैं, या शत्रु ने हमारी भूमियों को हस्तगत करके सीमा पर अपनी रक्षक-सेना नियुक्त कर दी है, जिसे उन्हें पुनः पाना कठिन हो गया है, अथवा ज्ञानकिरणें अज्ञानरूप पर्वत की गुफाओं में बन्द हो गयी हैं; इन सभी स्थितियों में राष्ट्र के अङ्गिरस् ऋषि आगे आते हैं और उनका उद्धार करते हैं। अश्व बल का भी प्रतीक है। जब राष्ट्र का बल छिन जाता है, राष्ट्रवासी निर्बल हो जाते हैं, तब भी अङ्गिरस् ऋषि उठकर निर्बलों में बल का सञ्चार करते हैं। अश्व शरीर की इन्द्रियों का भी नाम है। जैसे घोड़े घुड़साल में रहते हैं, वैसे ही इन्द्रियां शरीर में अवस्थित हैं।

कभी-कभी इन इन्द्रियरूपी घोड़ों को कामक्रोधादि रिपु घेर कर अपनी पर्वतगुफा में बन्द कर लेते हैं, जिससे ये सत्कर्मों में प्रवृत नहीं हो पातीं। अङ्गिरस ऋषि सदुपदेश द्वारा मानवों की इन इन्द्रियों को भी उन्मुक्त करा देते हैं।

अङ्गिरस् ऋषि जिन गौओं का उद्धार करते हैं, वे अष्टकर्णी गौएँ है। साधारण गौओं के तो दो ही कान होते हैं, पर ये आठ कानों वाली है। वेदवाक्रूपी गौ अष्टकर्णी होती है, क्योंकि उसके गायत्री, अनुष्टुप् आदि कई छन्दों में प्रत्येक पाद में आठ-आठ अक्षर होते हैं। सामान्य वाणी भी अष्टकर्णी होती है, क्योंकि सुबन्त शब्दों की सम्बोधन को मिलाकर आठ कणियाँ हो जाती हैं। अन्यत्र वाणी को अष्टापदी कहा भी है। भूमिरूपी गौ भी अष्टकर्णीं है, क्योंकि वह चार वेदों और चार उपवेदों में व्याप्त है अङ्गिरस् ऋषियों की कीर्ति इन गौओं का उद्धार करने के कारण चारों ओर फैल जाती है।

ऋग्वेद के १० वें मण्डल का ६२ वां सूक्त, जिसके तीन मन्त्रों की अभी व्याख्या की गयी है, वैदिक अङ्गिरस् ऋषियों के प्रति भावभीनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने वाला सुन्दर सूक्त है। इसका ऋषि है नाभा नेदिष्ठ। इस सूक्त तथा इससे पूर्ववर्ती ६१ वें सूक्त दोनों पर ऐतरेय ब्राह्मण में निम्नलिखित कथानक आता है- “मनुपुत्र नाभानेदिष्ठ आचार्यकुल में ब्रह्मचर्यवास कर रहा था। उसके पीछे उसके भाइयों ने दायभाग का बंटवारा कर लिया, उसे कुछ नहीं दिया। नाभानेदिष्ठ को जब यह पता लगा, उसने आकर पिता से कहा कि मुझे दायभाग से वञ्चित क्यों रखा? पिता ने कहा कि यह भाग तुझे न सही न मिला; अङ्गिरस् ऋषि स्वर्गप्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे हैं, उन्होंने षष्ठाह: पर्यन्त तो यज्ञ कर लिया है, आगे भूल गये हैं, तू जाकर उन्हें इन दोनों सूक्तों का शंसन करवा दे; वे स्वर्ग जाते हुए तुझे सहस्त्र गौएँ दे जायेंगे। पिता से प्रेरित नाभानेदिष्ठ ने ऐसा ही किया तथा एक सहस्त्र गौएँ पा लीं। इतने में ही किसी कृष्णशवासी पुरुष का रूप धारण किये हुए रुद्र ने आकर कहा कि इन गौओं को तू कहाँ ले जा रहा है? यह तो यज्ञशेष होने से रुद्र का भाग होता है, अतः मेरा है। जब नाभानेदिष्ठ ने कहा कि यह भाग तो स्वयं अङ्गिरसों ने मुझे दिया है, तब वह पुरुष बोला कि तू अपने पिता से ही जाकर पूछ लें, वे ही इसका निर्णय कर देंगे। पिता ने भी कहा कि यह भाग तो रुद्र का ही है। पुत्र ने आकर पिता का निर्णय पुरुष को सुना दिया। उसके सत्य कथन से प्रसन्न होकर उस पुरुष ने वे एक सहस्त्र गौएँ उसे ही दे दीं।”

वस्तुतः अङ्गिरस्-गण गौएँ प्रदान करते हैं, इस मन्त्रोक्त तथ्य को लेकर ही यह कथा रची गयी है। ६१ वें सूक्त के चौथे मन्त्र में केवल नाभा नाम है। भा का अर्थ दीप्ति है, ‘अभा’ का अर्थ हुआ ‘दीप्ति का अभाव’, ‘न अभा नाभा’ इस विग्रह से नाभा का अर्थ हुआ दीप्ति के अभाव का अभाव, अर्थात् अतिशयदीप्तियुक्तता, उसके नेदिष्ठ, अर्थात् अति समीप जो होना चाहता है वह नाभानेदिष्ठ है। ऐसा मनुष्य अङ्गिरसों की स्तुति कर रहा है तथा उनसे प्रार्थना कर रहा है कि तुम मानवजाति का उद्धार करो। सूक्त के प्रथम चार मन्त्र यहां दिये जा रहे हैं।

ये यज्ञेन दक्षिणया समक्ता इन्द्रस्य सख्यममृतत्वमाशत।
तेभ्यो भद्रमङ्गिरसो वो अस्तु प्रतिगुभ्णीत मानवं सुमेधस:।।१।।

“जो यज्ञ और दक्षिणा से संयुक्त हुए हैं, जिन्होंने इन्द्र का सख्य और अमृतत्व प्राप्त कर लिया है, ऐसे तुमको हे अङ्गिरसो, कल्याण प्राप्त हो। हे उत्कृष्ट मेधा वाले, तुम मानवजाति को अपना आश्रय दो।”

अङ्गिरस् ऋषि यज्ञ से संयुक्त होते हैं। यज्ञ शब्द यज धातु से बनता है, जिनके तीन अर्थ हैं- देवपूजा, संगतिकरण और दान। देवाधिदेव परमात्मा की पूजा करना प्रथम यज्ञ है। छोटे बड़े सबलोगों से जाकर मिलना, उनके दुःख दर्द को, उनकी समस्याओं को सुनना और उसके प्रतीकार के लिए सङ्गठन बनाना दूसरे प्रकार का यज्ञ है। दुःखियों के कष्टों का निवारणार्थ अथवा किसी महान् कार्य के लिए अपने तन-मन-धन को समर्पित कर देना तीसरा यज्ञ है। अङ्गिरस् ऋषि इन तीनों प्रकार के यज्ञों को करते हैं। अतएव महान् कार्य में सहायता के लिए उन्हें दूसरों से दक्षिणा, धनादि का दान भी प्राप्त होता है। वे सम्राटों के सम्राट् राजराजेश्वर प्रभु की मित्रता को प्राप्त कर लेते हैं, इसीलिए अमृतत्व, अर्थात् जीवन्मुक्ति की स्थिति को पहुंच जाते हैं। मानव उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं कि तुम्हें भद्र प्राप्त हो और अपने लिए यह याचना कर रहे हैं कि मानव जाति को अवलम्ब दो।

य उदाजन् पितरो गोमयं वस्तु-ऋतेनाभिन्दन् परिवत्सरे वलम्।
दीर्घायुत्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधस:।।२।।

“जिन्होंने पिता बनकर हमें गो-धन प्राप्त कराया, जिन्होंने वर्ष भर निरन्तर संघर्ष करके अपने सत्य के अस्त्र से पाप अन्याय-अत्याचार के वलासुर को छिन्न-भिन्न कर दिया, ऐसे हे अङ्गिरस् ऋषियों, तुम्हें दीर्घायुष्य प्राप्त हो। हे उत्कृष्ट मेधा वालों, तुम मानवजाति को अपना आश्रय दो।”
अयं नाभा वदति वल्गु वो गृहे देवपुत्रा ऋषयस्तच्छृणोतन।
सुब्रह्यण्यमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधस:।।३।।

“यह नाभानेदिष्ठ तुम्हारे गृहद्वार पर आकर रमणीय वचन बोल रहा है। हे परमात्मदेव के सच्चे पुत्र ऋषियो, उस वचन को सुनो। हे अङ्गिरस् ऋषियों, तुम्हें सुब्रह्मण्य प्राप्त हो। हे उत्कृष्ट मेधा वालों, मानवजाति को अपना आश्रय दो।” सभी राष्ट्रों में सदा अङ्गिरस् ऋषियों की पुकार होती है। आज भी विश्व अङ्गिरस् ऋषियों को पुकार रहा है और कह रहा है- प्रतिगृभ्णीत मानवं सुमेधस:।

[स्त्रोत- नूतन निष्काम पत्रिका : आर्यसमाज सांताक्रुज, मुम्बई का मासिक मुखपत्र का मई २०१९ का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

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