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जेटली की जिंदगी का राजनीतिक मायाजाल

अरुण जेटली का अतीत दुनियादारी के अंदाज में काफी सफल रहा है। दिल्ली युनिवर्सिटी में जब वे पढ़ते थे, तब भले ही बस के पैसे भी उनके पास नहीं हुआ करते थे, लेकिन आज सैकंड के हिसाब से वकालात की फीस की गणना करनेवाले देश के शिखर के वकीलों में जेटली नंबर वन पर हैं। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में दोस्ती हुई तो रजत शर्मा और प्रभु चावला तो पत्रकार बनकर निकल गए। मगर, जेटली जेपी के साथ सड़क पर उतरे तो पहले दिन से ही उन्होंने राजनीति की राह को समझ लिया था कि यही रास्ता उन्हें कभी देश के शिखर पर भी स्थापित करेगा। आज जेटली बीजेपी में सक्षम भी हैं, सत्ता के गलियारों में समर्थ भी हैं और देश की राजनीति के सबसे सबल लोगों में भी शामिल हैं। वकील तो वे असल में पेट पालने के लिए बने, क्योंकि राजनीति से जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने को अनैतिक माननेवाले जेटली जिंदगी की सफलता को बहुआयामी अंदाज में देखने के शौकीन हैं। जेटली 65 के हो गए हैं और 28 दिसंबर 1952 को जब वे जन्मे थे, तो कोई भूचाल नहीं आया था। मगर, आज वे दूसरों के भूकंप की हवा निकालने की ताकत दिखा रहे हैं।

शुरूआती दिन तो जेटली के भी वैसे ही थे, जैसे सभी के हुआ करते हैं। लेकिन राजनीति में अपने बाद के दिनों में वे कितने सफल हुए, उसकी बहुत बड़ी छवि आज हम देख ही रहे हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी की आंतरिक राजनीति में अरुण जेटली का कद उस दौर में सबसे ज्यादा बढ़ा जब देश भर में इस पूरी पार्टी की पहचान सिर्फ ‘अटल, आडवाणी और कमल निशान’ से ही थी। वह अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का दौर था। और जेटली तब की बीजेपी के सर्वशक्तिमान नेता प्रमोद महाजन से भी ज्यादा ताकतवर हुआ करते थे। बाद में तो खैर, महाजन कुछ ज्यादा ही ताकतवर होकर उनसे भी बहुत गए और वे आज दुनिया में नहीं है, फिर भी उनकी ताकत के किस्से राजनीति में उनके दुश्मनों के पास सबसे ज्यादा है। जेटली उन दिनों आडवाणी के लिए कवच का काम किया करते थे और जरूरत पड़ने पर अपनी ताकत और सक्रियता का अहसास भी, सामनेवाला जिंदगी भर याद रखे, उस अंदाज में कराया करते थे। जेटली ने पता नहीं बहुत पहले से ही जाने यह कहां से सीख लिया था कि राजनीति में आपकी प्रभावशाली उपस्थिति, आपके शब्दों का चयन और आपकी भाषा के साथ साथ आपका साहस, दूसरों के मुकाबले आपको अलग और ऊंची जगह बख्शता है। इसी कारण जेटली ने वही रास्ता अपनाया, जो आज तक उन्हें वहीं स्थिर किए हुए है।

राजनीतिक विमर्श में तर्क के तीर छोड़ने के लिए सबसे प्रभावी राजनेता के रूप में विख्यात जेटली आज की भाजपा की राजनीति में भले ही प्रधानमंत्री मोदी के बाद सरकार में थोड़े पीछे नजर आते हैं। लेकिन दिल्ली में होने के वजह से कभी वे मोदी से भी आगे हुआ करते थे। और तीसरे, वैंकैया नायड़ू भी इन दोनों के साथ पाए जाते थे। वैसे तो राजनीति में कौन किसके साथ रहता है। लेकिन ये तीनों सचमुच साथ थे। क्योंकि वह महाजन की ताकत का जमाना था और बाकी सभी की तरह ये तीनों भी पार्टी में महाजन के खौफ से वाकिफ थे। सो, जानते थे कि साथ – साथ रहेंगे, तो ही ताकत बनी रहेगी। और, कभी अगर हुआ, तो महाजन से मुकाबला भी, एक रहेंगे तो ही कर पाएंगे। बाद में तो खैर, खुद महाजन ने अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए आगे चलकर खुद ही मोदी से दोस्ती कर ली, जेटली से संबंध सुधार लिए और वैंकेया नायड़ू से भी रिश्ते निभा लिए। और तीनों की इस सियासी संगत का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि नरेंद्र मोदी पार्टी महासचिव बनकर दिल्ली आने के बाद सन 2001 में मुख्यमंत्री बनकर गुजरात भी लौट गए।

वैंकैया नायडू राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और जेटली को अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में जगह मिल गई। लेकिन महाजनी खौफ की राजनीति के उस अर्थशास्त्र को जेटली ने अपनी जिंदगी में कुछ इस तरह अपना लिया कि आज जेटली से खौफ खानेवालों की भी बीजेपी में कमी नहीं है। सूची बहुत लंबी है। कभी जरूरत पड़ेगी, तो सार्वजनिक भी करेंगे। लेकिन इतना जरूर है कि जेटली सब कुछ बहुत सरलता से सम्हाल लेते हैं। सो, सन 2006 में प्रमोद महाजन के दुनिया से जाने के बाद पार्टी में उनके हिस्से का ज्यादातर काम जेटली के जिम्मे आ गया। बस, वहीं से वे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में शामिल हो गए।

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अचानक बहुत आगे निकल जाना अपने आसपास के लोगों को राजनीति में बहुत खटकता है। यही वजह थी कि जेटली जब बहुत आगे निकल गए, तो पार्टी में कई पीछे छूट गए नेता उनके बारे में निजी बातचीत में अकसर शिकायत के अंदाज में करते रहे हैं कि जेटली मीडिया में अपने बेहतर संबंधों का इस्तेमाल पार्टी के लिए कम और पार्टी के दूसरे नेताओं के खिलाफ अकसर ज्यादा करते हैं। वैसे, यह ब्रह्मसत्य है कि मीडिया से जिस तरह के अंतरंग संबंध जेटली के हैं, वैसे किसी भी पार्टी के किसी और नेता के नहीं हैं। आडवाणी के जमाने में जेटली को मीडिया से बेहतर संबंध बनाने की जो जिम्मेदारी मिली थी उसका उन्होंने पार्टी को भरपूर फायदा दिया। संपर्क बनाना और बने हुए संपर्कों को साधने के लिए सही समय का चुनाव जेटली से ज्यादा शायद ही कोई जानता हो। वैसे, एक तथ्य यह भी है कि बीजेपी में जितने उनके दोस्त हैं, उसके मुकाबले बहुत ज्यादा दोस्त और संपर्क संबंध उनके दूसरी पार्टियों में हैं। राजनीति आखिर मायाजाल भी तो संपर्कों और संबंधों का ही है। बिना इनको साधे, कौन आगे बढ़ पाय़ा है।

अरुण जेटली ने जीवन के पता नहीं किस मोड़ पर इस सत्य को भी बहुत गहरे से समझ लिया था कि राजनीति में अपना विकास किसी और के सहयोग से नहीं बल्कि प्रतिद्वंदियों को कमजोर करके ही होता है। इसीलिए वे अपने सारे विरोधियों और प्रतिस्पर्धियों को हर मोड़ पर थकाकर बहुत आसानी से पीछे छोड़ देते हैं। भारतीय राजनीति में जेटली को अपने समर्थकों को सक्षम बनाने और विरोधियों के पर कतरने में सबसे माहिर खिलाड़ी कहा जाए, तो विश्वास कर लीजिए। भरोसा न हो तो जेटली पर क्रिकेट का कलंक मढ़ने की कोशिश करनेवाले कीर्ति आजाद और अमृतसर सीट से अपनी जगह जेटली के लड़ने से नाराज होनेवाले नवजोत सिंह सिद्धू की शक्ल याद कर लीजिए। जैसा कि राजनीति का चरित्र है, जेटली के भी राजनीति में विरोधी तो बहुत होंगे, लेकिन ज्यादातर अज्ञात। सिद्धू और किर्ति आजाद की शक्ल याद करके सामने आने की कोई हिम्मत भी नहीं करता।

जीवन में क्रिकेट से सीधा वास्ता कबी नहीं रहा, फिर भी दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष का सिंहासन जेटली ने अर्जित कर लिया। उनके उस चुनाव में और चुनाव के बाद लगातार दबा कर राजनीति हुई थी और फिर भी वे ठसके से उस पर काबिज रहे। क्योंकि शरद पवार के जीवन से उन्होंने इतना तो सीख ही लिया था कि क्रिकेट के जरिए राजनीति में जिंदा रहने का रास्ता कुछ ज्यादा ही आसान हो जाता है। आखिर क्रिकेट कभी राजा महाराजाओं का ही तो खेल हुआ करता था। यह बात अलग है कि जेटली राजनेता होने से बहुत पहले से ही बहुत बड़े वकील है और दक्षिण दिल्ली में रहने के अलावा शान से सूट पर टाई वगैरह भी पहनते हैं। राजनीति की स्थायी पोशाक कुर्ता पायजामा पहने हुए जेटली को देश कभी कभार ही देख पाता है। जिंदगी में जहां है, वहां से और आगे जाने की जरूरत को लक्ष्य बनाकर चलनेवाले जेटली, नरेंद्र मोदी के रहते अब और आगे कहां जाएंगे, इसका अंदाज लगाना बेवकूफी होगा। लेकिन उनका भविष्य उज्जवल ये, यह सबी जानते हैं। राजनीतिक पाखंड उन्हें पसंद नहीं आता फिर भी राजनीति उन्हें रास आ गई है और देश भी एक राजनेता के रूप में जेटली को पसंद करता है। क्या यह सच नहीं है ?

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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