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अंडमान और निकोबार में सैन्य क्षमता है अपार

भारत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाकर इसे इस क्षेत्र में अपनी क्षमताओं के प्रदर्शन का केंद्र बना सकता है।

बीते कुछ दिनों में सशस्त्र बलों ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के निकट त्रिपक्षीय संयुक्त सैन्य अभ्यास किया। देश के इस हिस्से की रक्षा के लिए ऐसी कवायद नयी नहीं हैं। बीते कई दशकों से इनका आयोजन किया जा रहा है। परंतु इनके दायरे में अवश्य बदलाव आया है। कमांडो द्वारा रात को सरकने की कवायद और आधुनिक विमानों और युद्धपोतों को इसमें शामिल करने का क्रम बढ़ रहा है।

बहरहाल इस क्षेत्र को अज्ञात चुनौतियों से बचाना अभी भी इन कवायदों की घोषित वजह है। उदाहरण के लिए एक कवायद इस पर आधारित थी कि अगर शत्रु इस क्षेत्र के किसी द्वीप पर कब्जा कर ले तो उसे वापस कैसे हासिल किया जाए। अपनी सामरिक मजबूती के प्रति यह रक्षात्मक रुख पुनरावलोकन की मांग करता है।

बंगाल की खाड़ी में उत्तर से दक्षिण तक 550 मील तक विस्तारित और कोलकाता, विशाखापत्तनम और चेन्नई जैसे प्रमुख बंदरगाहों से 700 मील की दूरी पर स्थित सैकड़ों छोटे-छोटे द्वीपों से बना अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एक ऐसी संपत्ति की तरह है जिसे महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला कोई भी देश खूब मान देगा। इसके दक्षिण में महज 90 मील की दूरी पर इंडोनेशिया है जबकि बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड और मलेशिया जैसे देश उत्तर और पूर्व में 300 मील के दायरे में हैं।

जाहिर है यह द्वीप समूह न केवल हमारी पहुंच बढ़ाता है बल्कि हिंद महासागर के प्रमुख पूर्व-पश्चिम नौवहन मार्ग को भी विस्तारित करता है। यह हिंद महासागर क्षेत्र को पश्चिमी प्रशांत सागर से जोडऩे वाली मलक्का की खाड़ी की भी निगरानी करता है। इसके अतिरिक्त यह उत्तर से दक्षिण तक विस्तृत छह बंदरगाहों की निगरानी, वायु सेना की तैनाती, और इस क्षेत्र की सुरक्षा की दृष्टि से सामरिक क्षमता भी रखता है। ऐसे में भारत द्वारा इन तमाम क्षेत्रों का पूरा लाभ न ले पाना निराश करता है।

उत्तर में पोर्ट कॉर्नवालिस/दिगलीपुर, मध्य में पोर्ट ब्लेयर और दक्षिण में नानकॉवरी और कैंपबेल बे आदि हमारी नौसेना के विशाल पोतों की संभाल कर सकते हैं। पुराना विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत सन 1971 के युद्ध के समय उस वक्त भी उत्तरी बंदरगाहों से तैनात किया गया था जबकि पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी चेन्नई और विशाखापत्तनम के निकट इसे तलाश करते हुए डूब गई थी।

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापानियों ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था और पोर्ट ब्लेयर, कार निकोबार और नानकॉवरी से उनकी सेनाएं अपनी गतिविधियां चलाती थीं। उस वक्त केवल कार निकोबार में एक ही भरोसेमंद हवाई पट्टी थी जिसकी लंबाई 7,000 फुट थी। पोर्ट ब्लेयर की हवाई पट्टी बहुत छोटी थी।

अब हालात सुधर चुके हैं। पोर्ट ब्लेयर में अब 10,000 फुट लंबी हवाई पट्टी है जिससे क्षमता में काफी सुधार हुआ है। पोर्ट ब्लेयर और कार निकोबार से अब अपेक्षाकृत बड़े विमान और भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान संचालित हो सकते हैं। हालांकि अंडमान निकोबार द्वीप समूह में इनकी तैनाती नहीं है।

देश के प्रमुख भूभाग से सी 130जे, सी 17 और पी81 विमानों को अंडमान और निकोबार पहुंचने और वहां से वापस आने में तीन घंटे का समय लगता है। इससे उनकी मजबूती प्रभावित होती है। इस देरी की वजह से उनकी काम पर तैनाती में भी देरी होती है। विमान यहां उतरकर ईंधन भर सकते हैं लेकिन वे जल्दी काम पर तभी लग सकते हैं जब उन्हें यहां खड़ा रखने की व्यवस्था हो। यह कहा जा सकता है कि हमारी मौजूदा क्षमताओं को देखते हुए बड़े और प्रमुख विमानों को अंडमान और निकोबार में नहीं तैनात किया जा सकता है। परंतु आज नहीं तो कल हमें चुनौतियों का आकलन करते हुए इस पर विचार करना ही होगा।

इन तमाम बातों के बावजूद ऐसी कोई वजह नहीं है कि पोर्ट ब्लेयर और कार निकोबार में जमीनी उपकरणों को क्यों नहीं स्थापित किया जाए। ऐसा करने से ये हवाई क्षेत्र तत्काल सेवा देने के लिए उपलब्ध होंगे।

कैंपबेल बे की मौजूदा हवाई पट्टी जो अभी 2,700 फुट लंबी है उसे बढ़ाकर कम से कम 8,000 फुट करने की आवश्यकता है ताकि यहां से बड़े विमानों का परिचालन आरंभ हो सके। इससे मलक्का की खाड़ी और आसपास के इलाकों की व्यापक निगरानी संभव हो सकेगी। यह वह इलाका है जहां से पानी के जहाज अनिवार्य तौर पर निकलते हैं। उत्तर में दिगलीपुर स्थित 3,000 फुट की हवाई पट्टी को बढ़ाकर 6,000 फुट किए जाने की जरूरत है ताकि मझोले आकार के विमानों का परिचालन शुरू किया जा सके।

सेना ने यहां एक ब्रिगेड की तैनाती की है। एक कंपनी कैंपबेल बे में तैनात है। निकटस्थ प्रतिबद्धताओं को देखते हुए यह तैनाती पर्याप्त है। बहरहाल, नौसैनिक तैनाती के लिए कुछ व्यवस्था करनी होगी। फिलहाल पोर्ट ब्लेयर में केवल ऐसे जहाज तैनात हैं जो तट तक जा सकते हैं। कोस्ट गार्ड निगरानी जहाज के साथ इतनी तैनाती पर्याप्त है, लेकिन इनके साथ कुछ मझोले आकार के युद्ध पोत तैनात किए जाने चाहिए ताकि लड़ाकू क्षमता में इजाफा हो सके, तटवर्ती मालवहन और रखरखाव की क्षमता बढ़ाई जा सके।

क्षमता बढ़ाने की इस दलील की काट के रूप में ढु़लाई क्षमता की कमी से लेकर पर्यावरण तक के मुद्दों को प्रस्तुत किया जाता है। यह सच है कि यहां लगभग हर वस्तु देश के अन्य इलाकों से ढोकर पहुंचानी होती है ताकि यहां रहने वाले तकरीबन 3.50 लाख लोग उनका इस्तेमाल कर सकें। ऐसे में इसके अलावा किसी भी तरह के भार को नकारात्मक रूप से देखा जाता है। बहरहाल अगर हम आधुनिक तकनीक की मदद से वहां की मौजूदा कृषि और समुद्री संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर काम करें तो बात बन सकती है। उदाहरण के लिए इस क्षेत्र में सालाना पकड़ी जाने वाली मछलियों की तादाद और इस काम में लगे जहाजों की तादाद निहायत कम है। घनी आबादी वाले पोर्ट ब्लेयर में पानी का मसला है। लेकिन पश्चिम एशिया के कई देशों में ऐसे उदाहरण हैं जहां कुछ खास किस्म के पौधों का इस्तेमाल किया जाता है जो समुद्री पानी को मीठे पानी में बदलते हैं। समस्याएं हैं लेकिन ऐसी भी नहीं हैं कि उनसे निजात न पाई जा सके। द्वीप विकास प्राधिकरण (आईडीए) लंबे समय से है लेकिन वह बहुत प्रयास करता नहीं दिखता।

अगर भारत को अहम एशियाई शक्ति बनना है तो उसे हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी प्रदर्शित करनी होगी। बंगाल की खाड़ी उसका अहम हिस्सा है। इस लिहाज से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की भूमिका बेहद खास है। यह केवल बचाया जाने वाला क्षेत्र नहीं बल्कि देश का वह इलाका है जहां से वह अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सकता है।

साभार-http://hindi.business-standard.com/ से

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