Thursday, April 25, 2024
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बढ़ते तापमान और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता के खतरे

भौतिक और आर्थिक प्रगति के भौकाली संस्कृति ने वैकासिक आयाम का कारक पारंपरिक ऊर्जा के स्रोत कोयला, पेट्रोलियम पदार्थों के उत्सर्जन से निकलीत ग्रीनहाउस गैसों के उन्नयन और बढ़ते सांद्रता ने मानवीय समाज, नागरिक समाज, जैविक समुदाय और वनस्पति परिवेश को खतरे में डाल दिया है। वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैस कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मेथेन (CH4), ओजोन(O3), नाइट्रस ऑक्साइड (NO2), क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC ) और जलवाष्प की मात्रा में विषाक्तमात्रात्मक वृद्धि किया है, जिससे हमारा वायुमंडल अरास्यनीकृत (वायुमंडल में गैसों के असंतुलित संगठन) हो चुका है। इन गैसों के असामान्य सघनता से पार्थिव संगठन के तापमान में निरंतर वृद्धि हो रहा है। इससे पर्यावरणविद, भूग्रववेता, मौसम वैज्ञानिक, चिकित्सक, अर्थशास्त्री और राजनीतिक नेतृत्व (व्यवहारवादी आंदोलन और उत्तर व्यवहारवादी आंदोलन के पश्चात नीति-निर्माण में नेताओं को भी सम्मिलित किया जाने लगा है) सभी चिंता कर रहे हैं। इससे संपूर्ण पार्थिव संरचना और इसके संघटकों के समक्ष भू-तापन और जलवायु परिवर्तन के समक्ष उत्पन्न संकट, चुनौती और अभिशाप के लिए इन विशेषज्ञों के दिव्य दृष्टि अवलोकन और उनके निष्कर्ष चिंता का विषय है; क्योंकि सभी मानव को उच्चीकृत सभ्यताओं और मानवीय संस्कृति के विषय में चिंतित होना आवश्यक है।

ऐसा गुण/शील होने पर वह जंगली जानवर एवं देवता के श्रेणी में आ जाते हैं, क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वैश्विक तापन और जलवायु परिवर्तन की वायुमंडलीय बीमारी दिन-प्रतिदिन गंभीर, समस्या मूलक और ज्वलंत होती जा रही है। वैश्विक स्तर की संस्थाएं स्टेट ऑफ जलवायु प्रतिवेदन, 2023 के अनुसार पृथ्वी के औसत तापमान में हो रही निरंतर वृद्धि इस तथ्य का संकेत है कि पृथ्वी और प्रकृति की प्रणालियां खतरनाक रूप से मौसमी और स्थिरता की ओर बढ़ रही है। जलवायु आपात संस्था की अद्यतन प्रतिवेदन के अनुसार, गोलार्ध में जाड़े के मौसम में बढ़ता तापमान गर्मियों की तुलना में अधिक है। वर्ष 2023 विगत 125000 वर्षों में सर्वाधिक गर्म वर्ष रही है। इस वर्ष में वैश्विक औसत तापमान 1.32 सेल्सियस से अधिक रही है। भूग्रभवेत्तवो,मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों का एकमत से मानना है कि वर्ष 2023 तुलनात्मक स्तर पर सर्वाधिक गर्म और असहनीय वर्ष रहा है।

वैश्विक तापन और जलवायु परिवर्तन के लिए उत्तरदाई कारणों में मूलत हमारे जीवन शैली भी उत्तरदाई है। उत्पादन से जुड़े और भौतिक सुविधाओं के विस्तार से जुड़ी जीवन शैली के कारण कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य ग्रीन हाउस गैसों की बहुत बड़ी मात्रा वायुमंडल में छोड़ी गई है। इसने पृथ्वी की जलवायु को बुरी तरह से प्रभावित किया है। प्रचुर मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन एवं सूर्य की अपार ऊर्जा का अवशोषण एवं प्रवर्तकता के माध्यम से मानव गतिविधियों ने भूमंडलीय तापन और जलवायु परिवर्तन में अत्यधिक सीमा तक महत्वपूर्ण योगदान किया है। भूमंडलीय तापन एवं जलवायु में अत्यधिक परिवर्तन के लिए उत्तरदाई कारणों से वायुमंडलीय स्थिति अरास्यनिक हो जाती है। वायुमंडल में गैसों का असंतुलित संरचना बढ़ जाने के कारण भूमंडलीय तापन और जलवायु परिवर्तन की घटनाओं में वृद्धि होती है।

कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मेथेन (CH4),नाइट्रस ऑक्साइड (NO2), हाइड्रोक्लोरो कार्बन (HCCS), सल्फर हेक्सा क्लोराइड (SF6), नाइट्रोजन ट्राई फ्लोराइड (NF3), परफ्लोर कार्बन (PFCs), फ्लोरिनाइटेड गैसेस इत्यादि के उत्सर्जन से भूमंडलीय तापन और जलवायु परिवर्तन पर नकारात्मक वृद्धि होती है। कृषि, सड़क निर्माण, पुल निर्माण, बड़े इमारत का निर्माण, औद्योगिक कॉरिडोर की स्थापना, ग्रामीण क्षेत्रों में भवन निर्माण के लिए चिमनियों का निर्माण, पराली का जलाया जाना, गंगा के किनारे और घाटों पर गंदगी इत्यादि ऐसे कारण है जिससे पृथ्वी की परावर्तकता में तीव्र स्तर पर परिवर्तन ला देती है। यह गैसीय प्रभाव उष्ण महाद्वीपों और शहरी क्षेत्र में बहुतायत मात्रा में दिखने को मिलता है। कई महाद्वीपों में ज्वालामुखी का फटना तथा इन ज्वालामुखी का भूपरपट्टी (Crust) पर लावा के प्रभाव के कारण धधकते रहना भी कार्बन डाइऑक्साइड गैसेस और कार्बन के मुक्त कण वायुमंडल में अभिसरण करते हैं। जलवायु परिवर्तन और भूमंडलीय तापन पर भारत का सशक्त नेतृत्व की दृष्टि के साथ महान व्यवहारिकता के अव्यय को समाहित करते हुए जलवायु परिवर्तन और भूमंडलीय तापन के क्षेत्र में अगुआ करने वाला भारत राष्ट्र है।

विदेश नीति के विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक ऐसे मार्ग की ओर महत्वपूर्ण परिवर्तन के लिए अग्रसर है जो इस धरती पर सभी व्यक्तियों, वनस्पतियों एवं प्राणी जगत के लिए बेहतर जीवन एवं गुणात्मक जीवन सुनिश्चित करेगा। प्राकृतिक आपदा, प्राकृतिक कारण एवं मानव निर्मित कारण से पृथ्वी के वायुमंडल में तापमान में निरंतर वृद्धि हो रहा है। इन तपांतरण के कारण मानवीय समुदाय, जीव जंतुओं तथा वनस्पतियों के समक्ष संकट उत्पन्न कर दिया है। औद्योगीकरण के कारण और सेवा क्षेत्र में भारत की अग्रणी भूमिका के कारण पृथ्वी का तापमान बहुत तेज गति से बढ़ रही है, जिससे वैश्विक स्तर पर मौसमी दशाएं प्रतिकूल होते जा रहे हैं।

लगातार भीषण गर्मी, लू, बेमौसम वर्षा, बर्फबारी और हिमशीतों के पिघलने से किसी न किसी रूप में संकट आसन्न है। कॉप 28 का मौलिक उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस की सांद्रता को “उस स्तर पर स्थित करना है जो जलवायु परिवर्तन में खतरनाक मानव जनित (मानव प्रेरित) हस्तक्षेप को रोक सके”। इस तरह के स्तर को समय-सीमा के भीतर हासिल किया जाना चाहिए जिससे पारिस्थितिकी तंत्र प्राकृतिक रूप से जलवायु परिवर्तन और भूमंडलीय तापन के अनुकूल हो सके। इससे खाद्य सुरक्षा प्राप्त हो सके एवं आर्थिक विकास को सतत विकास के साथ जोड़कर टिकाऊ विकास की दिशा में वृद्धि किया जा सके। विश्व के निर्धन देश, विकासशील देशों, विज्ञान और तकनीकी में पिछड़े देशों को अपने देश से गरीबी, बेरोजगारी, वेश्यावृति, महंगाई और विकास के पथ पर अग्रसर होने के लिए आर्थिक विकास महत्वपूर्ण तत्व है।

जलवायु परिवर्तन से जुड़ी जटिलताओं के बिना ऐसी प्रगति असंभव है। पिछड़े और विकासशील राष्ट्र-राज्यों को आर्थिक प्रगति के लिए जलवायु परिवर्तन और भूमंडलीय तापन पर नियंत्रण करना आवश्यक है। विकासशील राष्ट्र-राज्य अपने देश के में वैकासिक आयामों को बढ़ाएंगे तो इन राष्ट्र- राज्यों के द्वारा अपने देश में उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों के मात्रात्मक अधिभार वैश्विक हिस्सेदारी में बढ़ेगा। इसके अतिरिक्त विकसित राष्ट्र राज्यों के द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों के परिमाण में कोई मूल्यात्मक कमी नहीं आएगी, क्योंकि जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोतों की खपत उनके राष्ट्र राज्यों में अधिक है।

जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव, औद्योगिक विकास, तकनीकी विकास और आधारभूत संरचना के विकास में सर्वाधिक रहा है। इन विकास अवयवों की सहभागिता से जलवायु परिवर्तन और भूमंडलीय तापन में भी निरंतर वृद्धि हुआ है। मौसमी परिवर्तनों के वैकासिक इतिहास में वर्ष 2023 सर्वाधिक गर्म वर्ष रहा है। कॉप 28 के शिखर सम्मेलन में लगभग लगभग 200 सभ्य राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने 14 दिसंबर को जलवायु वार्ता में जीवाश्म इंधनों की खपत कम करने पर सहमति व्यक्त किए हैं। जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव से सुरक्षित, संरक्षित एवं बचाव के लिए यह महत्वपूर्ण आशावादी और ऊर्जावान कदम है। इस सामूहिक प्रयास से भविष्य में जीवाश्म ईंधन की समाप्ति का सकारात्मक एवं गतिशील कदम होगा।

मौसम वैज्ञानिक, भू-वैज्ञानिक और जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी दुष्प्रभाव से जीवाश्म ईंधन का प्रयोग बंद करना मानवीय हित में है। सामूहिक प्रयासों से वैश्विक स्तर पर एक सकारात्मक औरआशावादी दृष्टिकोण की भावना प्रकट हुआ है कि संसार पेरिस में तय किए गए तापमान के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अत्यधिक मजबूती से काम कर रहा है। इस प्रयोजन के लिए कार्य योजना, सहभागिता और न्याय पर आधारित होना चाहिए। भारत कॉप 28 में “वसुधेय कुटुंबकम” में निहित सार/निचोड़ को आगे बढ़ा रहा है। तेल उत्पादक देशों के संगठन “ओपेक” (OPEC) के सम्मानित सदस्य 80 फ़ीसदी तेल भंडार और वैश्विक तेल उत्पादन का लगभग लगभग एक- तिहाई भाग नियंत्रित करते हैं और इन देशों की निर्वाचित सरकार/लोकप्रिय सरकार राजस्व के लिए तेल पर निर्भर है।

इस समझौते में ऊर्जा तंत्र के व्यवस्थित और न्याय पूर्ण तरीके से जीवाश्म ईंधन की खपत से दूर हटने की बात कही गई है, जिससे 2050 तक शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके। इस दिशा में सहयोगी पहल करते हुए यूरोप महाद्वीप के कुछ सब राष्ट्र-राज्य और उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के संयुक्त राज्य अमेरिका अपने ऊर्जा संयंत्र को कोयले की अपेक्षा वैकल्पिक स्रोतों से प्रारंभ कर दिया है। कॉप 28 के समझौते के अनुसार, सहभागी राज्यों की सरकारें 2030 तक वैश्विक नवीनीकरण ऊर्जा क्षमता तीन गुनी करने, कोयले के उपयोग को कम करने के प्रयासों को तीर्व करने और कार्बन कैप्चर एवं स्टोरेज तकनीक को उन्नयन करने को कहा गया है।कार्बन कैप्चर कार्बन उत्सर्जन को कम करने की एक नवीनतम तकनीक है।

इस प्रक्रिया में औद्योगिक स्रोतों से अपेक्षाकृत शुद्ध कार्बन डाइऑक्साइड को अलग करके, ट्रीट करके अलग किया जाता है। सऊदी अरब का मानना है कि इस समझौते में सभी देशों को उत्सर्जन कम करने का विकल्प दिया गया है। प्रत्येक देश सतत विकास और वैश्विक तापमान को 1.5 सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य को ध्यान में रखकर काम करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक कार्बन का उत्सर्जन करने वाला देश चीन है। अमेरिका का कहना है कि अमेरिका और चीन मिलकर 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन (जेरी Nett Carbon) को प्राप्त करने की रणनीति में साझा कार्य कर रहे हैं।

वैश्विक स्तर की प्रतिवेदन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई पर राष्ट्र- राज्यों द्वारा अब तक व्यक्त की गई सहमति के सकारात्मक एवं आशाजनक तथ्य हैं। इसके आधार पर 2019 के स्तर से 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में दो प्रतिशत की कमी आ सकती है। अंतर सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल का अनुमान है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 सेल्सियस तक सीमित रखना है तो उत्सर्जन की मात्रा में 43 फ़ीसदी की कमी लानी होगी। संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के अद्यतन प्रतिवेदन में कहा गया है कि विकासशील देशों को मौजूदा राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान को पूर्ति करने के लिए 2030 तक कम से कम 6 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता है।

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) द्वारा प्रकाशित एक प्रतिवेदन के अनुसार आर्थिक रूप से विकसित देश 2021 में विकासशील देशों की जलवायु शमन और अनुकूलन आवश्यकताओं के लिए संयुक्त रूप से प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर एकत्र करने के अपने वादे से मुकर गए है। विकसित राष्ट्र- राज्यों द्वारा वर्ष 2021 में 89.6 बिलियन डॉलर की राशि एकत्र किए गए। कॉप 28 शिखर सम्मेलन में निम्न विषयों पर मंथन हुआ और उस मंथन से निम्न बातें उभर कर आई है:
1. संपोषणीय भविष्य हेतु जेंडर एवं पर्यावरण आंकड़े;
2. विद्यार्थियों एवं युवाओं को ऊर्जा संबंधित मुद्दों से जोड़ना;
3. जलवायु वित्त रूपांतरण;
4. जलवायु नवोन्मेषी फोरम;
5. जलवायु परिवर्तन के संबंध में खाद्य प्रणालियों का रूपांतरण;
6. समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सुनिश्चित करना;
7. शून्य उत्सर्जन और
8. ऊर्जा दक्षता।

कॉप 28 से विश्व के विकसित और विकासशील देशों की अपेक्षाएं हैं। ये देश विकासोन्मुख हैं और अपनी ऊर्जा, जो आर्थिक विकास का एक प्रमुख संसाधन है की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जीवाश्म इंधनों पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करेंगे। विकसित और विकासशील देशों को नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के विकास का उन्नयन करना होगा।

(लेखक गंगा समग्र दिल्ली प्रांत के प्रचार प्रमुख हैं)

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