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राम शास्त्रीः जिन्होंने अपने राजा पेशवा को ही फाँसी की सजा दे दी थी

हमारे देश में हजारों सालों में ऐसे ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनके बारे में जानकर हम हैरत में पड़ जाते हैं। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि कोई न्यायाधीश जिस राजा के अधीन काम करता हो उसे ही हत्या के आरोप में फाँसी की सजा सुना दे। लेकिन ज से 400 साल पहले राम शास्त्री जैसा एक महानायक हुआ है जिसने ये साहसपूर्ण फैसला देकर भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में एक सुनहरा अध्याय लिख दिया है।

राम शास्त्री ने अपने ही राजा पेशवा, रघुनाथ राव को उनके भतीजे पेशवा नारायण राव की हत्या के लिए मौत की सजा देकर न्याय की ऐसी मिसाल कायम की थी जो किस्सों या कहानियों में ही पढ़ी या सुनी जा सकती है।

किस्सा यों है कि 1772 में, पेशवा माधवराव प्रथम की मृत्यु हुई, उनके वारिस के रूप में उनके नाबालिग भाई नारायण राव को छोड़ गए थे। माधवराव के ताऊ पेशवा रघुनाथ राव को उनके भतीजे नारायण राव के नाबालिग होने पर राज्य का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया था। इसके बाद मराठा राज्य में एक अनहोनी घटना हुई। नाबालिग नारायण राव की हत्या हो गई। इस हत्या का शक राज्य प्रतिनिधि रघुनाथ राव और उनकी पत्नी आनंदी बाई पर था।

राघोवा ने अपने भतीजे का खून किया, जो पेशवा था। रामशास्त्री पेशवाओं के न्यायाधीश थे। रघुनाथ राव पेशवा ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया। पेशवा की रानी ने उनसे कहा कि ये खून पेशवा ने ही किया है , अब तुम क्या करना चाहते हो? रामशास्त्री ने कहा कि न्यायासन पर बैठ कर मैं एक ही चीज सीखा हूँ कि इस राज्य में जो कोई दूसरे का खून करेगा, मृत्युदंड मिलना चाहिए। रानी ने बार बार ये सवाल पूछा और हर बार राम शास्त्री ने यही कहा कि मृत्युदंड के अलावा कोई सजा नहीं है। रानी ने कहा कि क्या तुम जानते हो कि हम तुम्हारी जीभ काट सकते हैं, तुम्हारे शरीर की बोटी-बोटी काट सकते हैं, तुम्हें काल-कोठरी में बन्द कर सकते हैं। राम शास्त्री ने जवाब दिया कि प्राणों के मोह के कारण मेरे मुँह से न्याय विरुद्ध कोई कमजोरी का शब्द निकलने से पहले अच्छा होगा कि आप इस जीभ को कटवा लें।

इस मामले में चले मुकदमें में ये बात सामने आई कि 17 दिसंबर 1772 को जब हत्या हुई तब ठंड से कड़कड़ाती उस रात में हथियारबंद हत्यारे नारायण राव के कक्ष में घुस गए और वो अपनी जान बचाने के लिए वो पेशवा रघुनाथ राव के कक्ष में घुस गए थे। वहाँ उस बालक को संरक्ष देने की बजाय पेशवा नेन ही उसकी हत्या कर दी थी। इस मामले का मुकदमा राम शास्त्री के न्यायालय में चला और राम शास्त्री ने अपने ही राजा नारायण राव को हत्या का दोषी मानते हुए उन्हें फाँसी की सजा दे दी। राम शास्त्री पर इस मुकदमें में निर्णय बदलने को लेकर कई तरह के दबाव थे, मगर वो टस से मस नहीं हुए।

राम शास्त्री के पिता बहुत बड़े पंडित थे। वह बहुत दिन जीवित नहीं रहे। उनके निधन के बाद राम की माँ अपने भाई के पास आकर रहने लगी। वह एकदम अनपढ़ थे। ऐसे ही पूजा-पाठ का ढोंग करके जीविका चलाते थे। वह झूठ बोलने से भी नहीं हिचकते थे। पेशवा विद्वानों का आदर करते थे। उन्हें वे दक्षिणा देते थे। वे विद्यार्थियों को भी पढ़ाई के लिए दक्षिणा देते थे। एक दिन बहुत से विद्वान पंडित और विद्यार्थी दक्षिणा लेने महल में पहुँचे। बड़े आदर से सूबेदार ने उन्हें बैठाया। उन्हीं में राम और उसके मामा भी थे। लेकिन वे न तो एक अक्षर पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे। राम बार-बार धीरे-धीरे मामा से कहता, ”मामा ! मैं तो घर जा रहा हूँ, क्योंकि मैं तो पढ़ता ही नहूं हूँ तो फिर दक्षिणा कैसे लूंगा।।” लेकिन मामा अड़े थे कि वो दक्षिणा लेकर ही जाए। तभी पेशवा के प्रतिनिधि आ पहुँचे। एक एक कर विद्वानों और पंडितों को दक्षिणा देने के बाद जब बालक राम और उनके मामा का नंबर आया तो पेशवा के प्रतिनिधि ने उनसे पूछा, मामा अपना रटारटाया पाठ भूल चुके थे। ‘मैं’ ‘मैं’ करने लगे। प्रतिनिधि ने बेचैन होकर पूछा, ”आपका क्या आप पढ़ाते हैं? लेकिन उनके मामा कुछ नहीं बोल पाए। ये देखकर राज प्रतिनिधि भड़क गया और कहा आप झूठ बोलकर दक्षिणा लेते हैं। आप ब्राह्मण हैं। आपको झूठ बोलना शोभा नहीं देता। आपको राजकोष से दक्षिणा नहीं मिल सकती पर जो माँगने आया है उसे निराश लौटाना भी अच्छा नहीं लगता। इसलिए मैं आपको अपने पास से भीख देता हूँ। जाईए।”

इस घटना ने बालक को राम को अंदर तक हिला दिया था।

राम शास्त्री सातारा के साहूकार देवराव अनगढ़ के यहां नौकरी करने लगे थे। एक दिन साहूकार ने राम से अपने हाथों पर पानी डालने के लिए कहा। राम पानी डालने लगा तो उसकी नजर साहूकार के कानों पर चली गई और पानी इधर-उधर गिरने लगा। यह देखकर साहूकार चिल्लाकर बोले, ‘किधर देख रहे हो? पानी मेरे हाथों पर क्यों नहीं डालते?’ राम बोला, ‘क्षमा कीजिएगा महाराज, आपके कान की बाली के तेजस्वी मोतियों में मेरी नजर अटक गई थी।’ साहूकार उसका मजाक उड़ाते हुए बोले, ‘मूर्ख कहीं का, एक-एक मोती हजारों रुपये का है। तुझ जैसे दरिद्र को सपने में भी ये नहीं मिल सकते। कभी तुम्हारे बाप-दादाओं ने…।’ तभी बात काटकर बाल राम बोला, ‘देखिए महाराज, मेरे बाप-दादाओं पर मत जाइए। मैं आपकी नौकरी छोड़ता हूं, जिस दिन आपके जैसी बाली पहनने लायक हो जाऊंगा उसी दिन आपको अपना मुंह दिखाऊंगा।’ यह कहकर वह वहां से निकल गया। चार महीने इधर-उधर भटकता हुआ राम काशी पहुंचा। वहां न उसके रहने का ठिकाना था और न ही भोजन का। पर उसे इसकी परवाह नहीं थी। उसे तो विद्वान बनना था, चाहे कितने ही कष्ट क्यों न आएं।

काशी के एक गुरूकुल में रहकर राम शास्त्री ने वर्षों तक वेद-पुराण और उपनिषदों का अध्ययन किया। राम शास्त्री व्याकरण, तर्कशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा न्याय शास्त्र में पारंगत हो चुके थे। अपनी विद्वता की वजह से राम शास्त्री की ख्याति चारों ओर फैलने लगी।

राम शास्त्री के पूना पहुँचने पर नाना साहब पेशवा ने उन्हें अपने दरबार में प्रधान न्यायाधीश नियुक्त किया। सतारा का वह सेठ देवराव भी उसका सम्मान करने आया। उसने राम शास्त्री से अपने द्वारा किए गए दुव्र्यवहार पर क्षमा मांगी। सेठ ने देखा कि अब राम शास्त्री के कानों में जो मूल्यवान मोती जगमगा रहे हैं, वे उसके मोतियों से कहीं अधिक कीमती हैं। किन्तु विनम्र राम शास्त्री ने सेठ से कहा, “सेठ जी! मैं आज जो भी कुछ हूँ वह आपकी वजह से हूँ ना तो आप मुझे ताना मारते न मैं उस अपमान का बदला लेने के लिए विद्या अध्ययन करने काशी जाता।

राम शास्‍त्री पेशवा के गुरू और राज्‍य के प्रधान न्‍यायाधीश थे। इतनी प्रतिष्ठित हस्‍ती होने के बावजूद वे सामान्‍य व्‍यक्ति की भांति एक मामूली घर में रहते थे। उनके पास न रेशमी वस्‍त्र थे और न उनकी पत्‍नी आभूषणों से लदकर रहती थी।

एक बार किसी पर्व के अवसर पर रानी ने उनकी पत्‍नी को राजभवन आमंत्रित किया। वह साधारण वस्‍त्र में ही पैदल राजभ्‍वन पहुंचीं। रानी ने उनका भव्‍य सत्‍कार किया। पूजा-पाठ तथा अन्‍य औपचारिकताएं रानी ने शास्‍त्रीजी की पत्‍नी के साथ संपन्‍न की। तत्‍पश्‍चात रानी ने उन्‍हें अत्‍यंत कीमती वस्‍त्र और रत्‍नजङित आभूषण धारण करवाए। रानी का विचार था। कि राज्‍य की इतनी बड़ी शख्सियत की पत्‍नी को ऐसे ठाठ से ही रहना चाहिए। जब शास्‍त्रीजी की पत्‍नी जाने लगी, तो रानी ने उन्‍हें पालकी में बिठाकर रवाना किया। पालकी राम शास्‍त्री के घर पहुंची तो कहारों ने द्वार खटखटाया।

लेकिन द्वार खुला और तत्‍काल ही बंद हो गया। कहार बोले-शास्‍त्रीजी, आपकी धर्मपत्‍नी आई है। द्वार खोलिए। शास्‍त्रीजी ने कहा-आभूषणों से सजी ये कोई और देवी हैं, मेरी पत्‍नी नहीं। तुम लोग भूल से यहां चले आए हो। शास्‍त्रीजी की पत्‍नी पति के स्‍वभाव को जानती थी। उन्‍होंने कहारों से लौटने को कहा। रनिवास पहुंचकर उन्‍होंने रानी द्वारा दिए गए आभूषण वापस किए और अपनी साधारण वेशभूषा धारण कर घर लौटी। इस बार उनके लिए द्वार खुला था।

एक दिन राम शास्त्री अपनी कुटिया में बैठे थे। तभी राजसी वस्त्रों में एक व्यक्ति वहाँ आया। उसने कहा, ‘शास्त्री जी, आपका घर ऐसा संपत्ति-विहीन तो नहीं रहना चाहिए। दान-पुण्य, धर्म कर्म सब रुपये पैसे से ही होते हैं।’ शास्त्री ने आश्चर्य प्रकट किया, ‘यही सब कहने आए हो क्या तुम मेरे पास आये हो, तुम कहना क्या चाहते हो?’ स्पष्ट कहो, क्या चाहते हो? तब उसने कहा, ‘शास्त्री जी, सिंधिया सरकार राणोजी के देहांत होने पर जागीर अब केदारजी को मिलनी चाहिए। यह महादजी के बड़े भाई का पुत्र है।’ शास्त्री ने मुस्कराते हुए सम्मति दी, ‘जागीर और निजी संपत्ति में भेद है। जागीर तो कर्तव्य का भार मात्र है। जो उसका वहन कर सके, उसी के कंधे पर जाना चाहिए। निजी घरू संपत्ति की बात और है। जितनी जिसकी हो, वह उतनी अपने अपने अधिकार में रक्खे।’

राणोजी सिंधिया के देहांत पर यह समस्या पैदा हो गई थी। जागीर महादजी (माधवजी) सिंधिया को सौंपी गई थी। वह आगंतुक बोला, ‘शास्त्री जी, आपके घर में ढेरों सोना आज ही रख जाउँगा। आप ‘हाँ’ भर कर दें कि जागीर केदारजी को मिलेगी और उसकी अल्पवयस्कता के काल में रानोजी की विधवा उसकी अभिभावक रहेंगी।’

इस पर राम शास्त्री ने कहा ‘पूरी जागीर का प्रबंध माधवजी के हाथ में देने की आज ही लिखित व्यवस्था कर दूँगा। रह गया तुम्हारा सोना, सो यदि तुम उसका टट्टीघर बनवा दो तो उसमें टट्टी फिरने भी न जाऊँगा। मैं, जो अपने घर में एक दिन से आगे का भोजन तक नहीं रखता, तुम्हारे इस अपवित्र, निकृष्ट सोने का क्या करूँगा। जाओ निकलो यहाँ से ।’

इसके बाद राम शास्त्री ने अपनी पत्नी को बुलाकर हँसते-हँसते पूछा, ‘सोना चाहिए, सोना तुमको?’ उसने भी हँसकर उत्तर दिया, ‘भाड़ में जाय सोना। मैं सब सुन रही थी।’

राम शास्त्री पर प्रभात फिल्म कंपनी ने 1944 में मराठी में फिल्म भी बनाई थी।

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