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रामानुजन मानते थे कि गणित से ही ईश्वर का सही स्वरूप स्पष्ट हो सकता है

सिर्फ 32 साल जिए श्रीनिवास रामानुजन की प्रतिभा का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि उनके काम के कई हिस्से दुनिया उनकी मौत के एक सदी बाद आज समझ पा रही है

श्रीनिवास रामानुजन भारत में गणित की दुनिया के शायद सबसे चमकीले सितारे हैं. सिर्फ 32 साल जिए इस गणितज्ञ की प्रतिभा का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि उसके काम के कई हिस्सों को दुनिया आज समझ रही है. यानी जब रामानुजन को गए करीब एक सदी गुजर चुकी है. बहुत से लोग मानते हैं कि अगर वे 100 साल बाद पैदा हुए होते तो शायद आधुनिक दौर के महानतम गणितज्ञ के रूप में जाने जाते.

लेकिन वे तब हुए थे जब ब्रिटिश साम्राज्य के उपनिवेश भारत में शिक्षा का पारंपरिक ढांचा खत्म हो रहा था और उसकी जगह अंग्रेजी हुकूमत द्वारा बनाई गई व्यवस्था ले रही थी. इसलिए एक वर्ग का मानना है कि भारत में रामानुजन की गणितीय योग्यता उस तरह उभर नहीं सकी जैसी वह किसी और देशकाल में उभर सकती थी. यूरोप में रामानुजन जैसी प्रतिभा वाले किसी छात्र को आसानी से एक मार्गदर्शक मिल जाता. उन्हें 19वीं सदी के कई महान गणितज्ञों के काम से सीधे जुड़ने का का मौका मिलता. लेकिन गुलाम भारत में यह बहुत मुश्किल था. हालांकि हो सकता है तब रामानुजन भारत से ज्यादा यूरोप के होते.

रामानुजन की जीवनी लिखने वाले रॉबर्ट कैनिगल के मुताबिक 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के इरोड शहर में जन्मी यह प्रतिभा कम उम्र में ही अपने दोस्तों को पढ़ाने लगी थी. कहा यह भी जाता है कि सातवीं में आते-आते वे बीए के छात्रों को गणित पढ़ाने लगे थे. अक्सर ही उनके शिक्षकों के पास उनके सवालों का कोई जवाब नहीं होता था. शायद इसीलिए उनके स्कूल के हेडमास्टर ने कह दिया था कि विद्यालय में होने वाली परीक्षाओं के पैमाने रामानुजन के लिए लागू नहीं होते. विशुद्ध गणित में रामानुजन की गहरी रुचि थी. उनका मानना था कि गणित में कोई खोज करना ईश्वर की खोज करने जैसा है. उन्हें विश्वास था कि गणित से ही ईश्वर का सही स्वरूप स्पष्ट हो सकता है. वे रात दिन संख्याओं के गुणधर्मों के बारे में सोचते और अक्सर सुबह उठकर कागज पर सूत्र लिख लिया करते. उनकी स्मृति और गणना शक्ति असाधारण थी.

1898 में रामानुजन ने हाईस्कूल में दाखिला लिया. इसी दौरान उन्हें गणितज्ञ जीएस कार की लिखी किताब ‘ए सिनोप्सिस आफ एलीमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स’ पढ़ने का मौका मिला. इसमें उच्च गणित के कुल 5000 फार्मूले दिये गये थे. रामानुजन के लिए यह किताब किसी खजाने जैसी थी. उन्होंने इसके सूत्रों पर काम करना शुरू किया और जल्द ही सारे सूत्र हल कर लिए. कहा जाता है कि यह कोई बहुत उत्कृष्ट कृति नहीं थी लेकिन, रामानुजन के काम ने इसे मशहूर कर दिया.

हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद रामानुजन को गणित और अंग्रेजी में अच्छे अंक लाने के कारण आगे की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति मिली. लेकिन दूसरे विषयों को छोड़कर रामानुजन गणित में ही डूबे रहते थे जिसके चलते यह छात्रवृत्ति बंद कर दी गई. 1905 में रामानुजन मद्रास विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में शामिल हुए लेकिन, गणित को छोड़कर बाकी विषयों में फेल हो गए.1906 और 1907 की प्रवेश परीक्षा का भी यही परिणाम रहा. लेकिन गणित से उनकी व्यस्तता में कोई कमी नहीं आई.

विशुद्ध गणित में रामानुजन की गहरी रुचि थी. उनका मानना था कि गणित में कोई खोज करना ईश्वर की खोज करने जैसा है. उन्हें विश्वास था कि गणित से ही ईश्वर का सही स्वरूप स्पष्ट हो सकता है.

1909 में रामानुजन की शादी हो गई थी. इसके बाद घर चलाने के लिए वे नौकरी ढूंढ़ने लगे. इसी दौरान रामानुजन कई प्रभावशाली व्यक्तियों के सम्पर्क में आए. नेल्लोर के कलेक्टर और ‘इंडियन मैथमैटिकल सोसायटी’ के संस्थापकों में से एक रामचंद्र राव भी उनमें से एक थे. राव के साथ उन्होंने एक साल तक काम किया. इसके लिए उन्हें 25 रुपये महीना मिलता था. इस दौरान रामानुजन ने ‘इंडियन मैथमैटिकल सोसायटी’ के जर्नल के लिए प्रश्न और उनके हल तैयार करने का काम किया. 1911 में बर्नोली संख्याओं पर प्रस्तुत शोधपत्र से उन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली. मद्रास में वे गणित के विद्वान के रूप में पहचाने जाने लगे. 1912 में रामचंद्र राव की मदद से उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के लेखा विभाग में क्लर्क की नौकरी मिल गई.

नौकरी के साथ गणित के साथ भी रामानुजन की व्यस्तता जारी रही. 1913 में उन्होंने कैंब्रिज के प्रोफेसर और गणितज्ञ जीएच हार्डी अपनी प्रमेयों की एक लंबी सूची के साथ एक चिट्ठी भेजी. पहली नजर में हार्डी को यह चिट्ठी किसी शेखचिल्ली की गप्प लगी. लेकिन जब उन्होंने गौर से इसे देखा तो इनमें बहुत से प्रमेय ऐसे थे जो उन्होंने न कभी देखे थे और न सोचे थे. हार्डी को समझ में आ गया कि यह कोई शेखचिल्ली नहीं बल्कि गणित का बहुत बड़ा विद्वान है जिसकी प्रतिभा को दुनिया के सामने लाना आवश्यक है. इसके बाद हार्डी ने उन्हें क्रैंब्रिज बुलाने का फैसला किया. यह फैसला रामानुजन के लिए ही नहीं गणित की दुनिया के लिए भी ऐतिहासिक साबित होने वाला था.

1913 में हार्डी के एक पत्र के आधार पर रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय से छात्रवृत्ति मिलने लगी. अगले साल ही हार्डी ने रामानुजन के लिए कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज आने की व्यवस्था कर दी. रामानुजन ने गणित में जो कुछ भी किया था वह सब अपने बलबूते किया था. उन्हें गणित की कुछ शाखाओं का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था. इसलिए हार्डी ने रामानुजन को पढ़ाने का जिम्मा अपने सिर पर लिया. हालांकि बाद में उन्होंने कहा कि जितना उन्होंने रामानुजन को सिखाया, उससे कहीं ज्यादा रामानुजन ने उन्हें सिखाया. 1916 में रामानुजन ने कैम्ब्रिज से बीएससी की डिग्री ली. इसी दौरान रामानुजन और हार्डी का काम गणित की दुनिया की सुर्खियां बनने लगा था.

लेकिन इंग्लैंड रामानुजन के शरीर को ज्यादा रास नहीं आ रहा था. इसकी एक वजह तो ठंडा मौसम था और दूसरी खानपान. गर्म जलवायु वाले इलाके और ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले रामानुजन शाकाहारी थे और इसके चलते उन्हें इंग्लैंड में बहुत दिक्कत हो रही थी. 1917 से वे बीमार रहने लगे. बाद में टीबी के लक्षण दिखने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. तब तक उनके लेख मशहूर पत्रिकाओं में छपने लगे थे. 1918 में रामानुजन को कैम्ब्रिज फिलोसॉफिकल सोसायटी, रॉयल सोसायटी तथा ट्रिनिटी कॉलेज, तीनों का फेलो चुना गया.

हार्डी ने रामानुजन को पढ़ाने का जिम्मा अपने सिर पर लिया. हालांकि बाद में उन्होंने कहा कि जितना उन्होंने रामानुजन को सिखाया, उससे कहीं ज्यादा रामानुजन ने उन्हें सिखाया

लेकिन उनका स्वास्थ्य दिन ब दिन गिरता जा रहा था. 1919 में उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा. अब रामानुजन वापस कुंभकोणम में थे. उनका अंतिम समय चारपाई पर ही बीता. इस दौरान वे पेट के बल लेटे-लेटे काग़ज पर तेजी से लिखते रहते. काफी उपचार के बावजूद उनके स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आती गई. 26 अप्रैल 1920 को महज 32 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

तब उनकी ‘नोटबुक’ मद्रास विश्वविद्यालय में जमा थी. बाद में यह प्रोफेसर हार्डी के जरिए ट्रिनिटी कालेज के ग्रंथालय पहुंची. इस ‘नोटबुक’ में रामानुजन ने जल्दी-जल्दी में लगभग 600 परिणाम प्रस्तुत किए थे लेकिन उनकी उपपत्ति नहीं दी थी. विस्कोन्सिन विश्वविद्यालय के गणितज्ञ डॉ रिचर्ड आस्की के मुताबिक मृत्युशैय्या पर लेटे-लेटे साल भर में किया गया रामानुजन का यह कार्य बड़े-बड़े गणितज्ञों के जीवनभर के कार्य के बराबर है.

इंग्लैंड जाने से पहले भी 1903 से 1914 के बीच रामानुजन गणित के 3,542 प्रमेय लिख चुके थे. इन्हें बाद में मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च ने प्रकाशित किया. इन पर इलिनॉय विश्वविद्यालय के गणितज्ञ प्रोफेसर ब्रूस सी ब्रेंड्ट ने 20 वर्षों तक शोध किया और अपने शोध पत्र को पांच खण्डों में प्रकाशित कराया.

रामानुजन के सामने दुष्कर परिस्थितियां थीं. लेकिन वे खुद अपनी प्रतिभा के बल पर गणित के विभिन्न सत्यों तक पहुंचे. कल्पना की जा सकती है कि अगर शिक्षा से लेकर मार्गदर्शन तक उनकी राह आसान रही होती तो उन्होंने गणित की दुनिया में क्या किया होता. चर्चित अर्थशास्त्री अजय शाह एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘रामानुजन ने दिखाया कि आप मुख्यधारा से दूर रहकर भी असाधारण प्रतिभाशाली हो सकते हैं. जब भी कोई छात्र कहता है कि इंटरनेट डाउन है और इसलिए वह वेक्टर स्पेस की पढ़ाई नहीं कर पा रहा तो मैं उसे रामानुजन का उदाहरण देता हूं.’

साभार- https://satyagrah.scroll.in/ से



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