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अविस्मरणीय आर्य शहीद नाथूराम जी

आर्य समाज की एक न समाप्त होने वाली बलिदानी परम्परा की एक बहुत लम्बी श्रृंखला है| इस श्रृंखला का प्रथम मोती तो आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने अपना बलिदान देकर इसकी माला में पिरोया| स्वामी जी को जीवन में सत्रह बार विषपान करना पडा और अंत में इस विष ने ही स्वामी जी के जीवन की आहुति ले ली| यह अंतिम विषपान जो हुआ वह उनके अपने ही रसोइये के द्वारा(जिसे शाहपुर नरेश ने स्वामी जी के लिए खाना बनाने के लिए उनके साथ किया था ताकि कहीं जोधपुर नरेश की कुटिलता से स्वामी जी की कुछ हानि न हो) दूध में विष देकर किया| यह घुडमिश्र नाम का रसोइया (इस रसोइये का नाम साधारणतया जगन्नाथ लिया जाता है, जो कि गलत है|) भी जोधपुर नरेश की कुटिल चाल का एक भाग बन गया था| इस के पश्चात् तो मानो आर्य समाजियों के बलिदानियों की बाढ़ सी ही आ गई| जिस प्रकार कहा जाता है कि अग्नि को अग्नि आगे बढाती है| ठीक इस प्रकार ही बलिदानियों को देख और अधिक बलिदानी वीर तैयार होते चले गए| कहने वालों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि स्वामी दयानंद सरस्वती जी की धरोहर स्वरूप प्राप्त यह बलिदानी परम्परा एक इस प्रकार की अग्नि है, जिसे बुझाने का जितना प्रयास किया गया, यह उतनी ही तीव्र होकर धधकी| वेद धर्म के दीवानों ने इसे प्रचंड रखने के लिए अपने आप को इस यज्ञाग्नि की समिधा बना अपने आप को इस बलिदानी यज्ञ कुण्ड में झोंक दिया| आर्य वीरों की इसी बलिदानी परम्परा रूपी माला का एक मोती सिंध प्रांत के नाथू राम जी(जो इस समय हैदराबाद में रहते थे|) के रूप में उभरे| इस मोती का बलिदानियों की इस माला में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है जो रोकने पर, मिटाने पर भी नहीं समाप्त होगा|

सिंध प्रांत के एक संभ्रांत ब्राहमण परिवार के पंडित कीमत राय जी इन दिनों हैदराबाद में निवास करते थे| इनके ही यहाँ दिनांक १ अप्रैल १९०४ ईस्वी को एक बालक ने जन्म लिया| उनके इस इकलौते पुत्र का नाम नाथूराम रखा गया| इनका पालन पौषण बड़े लाड प्यार से किया गया| नाथूराम जी बाल्यकाल से ही अत्यंत गंभीर प्रकृति के थे| जब गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद जी सरस्वती जी का बलिदान हुआ तो इस समाचार को सुनकर नाथूराम जी अत्यंत प्रभावित हुए| स्वामी जी के बलिदान का ही यह प्रभाव था कि नाथूराम जी को उठती जवानी के दिनों में अयंत आकर्षण अनुभव होने लगा और इस का परिणाम यह हुआ कि सन १९२७ ईस्वी में जब वह मात्र २३ वर्ष की आयु में ही पहुंचे थे, आपने अपने सगे सम्बन्धियों की चिंता को छोड़ते हुए आर्य समाज में प्रवेश ले लिया| इस प्रकार आप आर्य समाज के सक्रिय सदस्य बन गए|

नाथूराम जी ने आर्य समाज में मात्र प्रवेश ही नहीं लिया, मात्र आर्य समाज के सदस्य ही नहीं बने अपितु पूर्ण तन्मयता से,पूरी श्रद्धा और लगन के साथ आप आर्य समाज के प्रचार तथा प्रसार के कार्यों में जुट गए| जब आपके गृह नगर हैदराबाद में सन् १९२९ ईस्वी में आर्य युवक समाज की स्थापना हुई तो आपने आर्य युवक समाज की सदस्यता भी ले ली| आपने स्वयं को वाद विवाद अथवा शास्त्रार्थ के लिए तैयार किया और अनेक प्रकार के लोगों से सैद्धांतिक वाद विवाद आरम्भ कर दिया| आप को पौराणिक भाइयों से वाद वविवाद करने में अत्यधिक आनंद का अनुभव होता था|

सन १९३३ ईस्वी में मिर्जाई मुसलामानों द्वारा हिन्दू देवी देवताओं का अभद्र स्वरूप प्रस्तुत किया जाने लगा| मिर्जाई मुसलमानों के इस कृत्य से नाथूराम जी कुपित हो उठे| अत: इस अवस्था में आप मिर्जाइयों को उत्तर देने के लिए आगे आये| इन दिनों एक पुस्तक मिलती थी, जिसका नाम था, “तारीखे इस्लाम|” आप ने इस पुस्तक का सिन्धी भाषा में अनुवाद करके इस पुस्तक को सिन्धी में प्रकाशित भी करवा दिया| यह पुस्तक मूल रूप में किसी ईसाई की लिखी हुई थी| इस सन्दर्भ को लेते हुए आप ने मुसलमान मौलवियों से कुछ प्रश्न भी पूछे| जब मिर्जाई मौलवियों से नाथूराम जी के प्रश्नों का कोई उत्तर न बन सका तो उन्होंने मुसलमानों को नाथूराम जी के विरोध में उकसाना आरम्भ कर दिया| इस प्रकार मौलवियों ने एक घृणा भरा वातावरण तैयार कर दिया|

मौलवियों के कुटिलता पूर्ण व्यवहार से प्रेरित उस समय के वहां के मुसलमान खूब उत्तेजित हो गए तो इन मौलवी लोगों ने सन् १९३३ ईस्वी में नाथूराम जी के विरोध में न्यायालय में एक अभियोग दर्ज करवा दिया| इस अभियोग की पेशी के पश्चात् यह सिद्ध हो गया कि यह पुस्तक मूल रूप में नाथूराम जी की नहीं लिखी है अपितु यह तो केवल अनुवाद मात्र ही था| यह सब होने के पश्चात् भी नाथूराम जी को सैशन के सुपुर्द कर दिया गया| इस अन्याय से भरे निर्णय को सुनते ही सिंध के प्रत्येक परिवार में शोक की लहर सी दौड़ गई|यह सब सिद्ध होने के पश्चात् भी कि मूल पुस्तक नाथूराम जी की नहीं किसी ईसाई की लिखी है, मुसलमान लोगों ने मूल ईसाई लेखक के विरोध में एक शब्द तक भी बोल पाने की हिम्मत नहीं जूटा पाई|

सैशन के इस अन्याय के विरोध में चीफ कोर्ट में अपील दायर की गई| इस कोर्ट में सुनवाई हुई और लगता था कि इस बार निर्णय नाथूराम जी के पक्ष में ही होगा| अंत में निर्णय की घड़ी आई| २० दिसंबर १९३४ ईस्वी को न्यायाधीशों की बैंच ने इस केस पर अपना निर्णय सुनाना था| इस दिन न्यायालय का हाल खचा खच भरा हुआ था| आर्य और मुसलमान दोनों प्रकार के लोग हाल में उपस्थित थे| अभी न्यायाधीषों ने अपना निर्णय सुनाना ही था कि अकस्मात् न्यायालय के इस हाल में एक भयंकार चीत्कार सुनाई दिया| यहाँ उपस्थित अब्दुल कयूम नाम के एक मतान्ध पठान ने अवसर मिलते ही नाथूराम जी के पेट में इस प्रकार छुरा भोंक दिया, जिस प्रकार आर्य बलिदानी पंडित लेखराम जी आर्य मुसाफिर जी के पेट में एक धर्मांध मुसलमान ने छुरा घौम्पा था| अत: जिस प्रकार पंडित जी की अंतड़ियां बाहर आ गईं थीं, उस प्रकार ही नाथूराम जी के पेट से भी उनकी अंतड़ियां बाहर आ गईं| इस कारण न्यायालय परिसर में ही आर्यवीर नाथूराम जी ने अपना बलिदान दे दिया|

न्यायालय परिसर से हत्यारा भाग पाने में सफल हो पाता, इससे पूर्व ही इस धर्मांध हत्यारे को आर्यों ने पकड़ लिया तथा उसे पुलिस को सौंप दिया गया| न्यायिक प्रक्रिया के पश्चात् इस हत्यारे को फांसी का दंड दिया गया| जहाँ तक नाथूराम जी का सम्बन्ध है, वह न्यायालय परिसर में ही बलि के पथ पर आगे बढ़ गए, उनके पार्थिव शरीर के दर्शन के लिए हैदराबाद की भारी भीड़ उमड़ आई| यह भारी भीड़ बलिदानी वीर को अंतिम विदाई देने के लिए बलिदानी नाथूराम जी की नगरयात्रा में भी पूरा साथ देते हुए अंतिम स्थल तक पहुंची| यहाँ पहुँचने पर बलिदानी वीर के पार्थिव शरीर का पूर्ण वैदिक रीति से अंतिम संस्कार किया गया| उनके बलिदान से आर्यों में ही नहीं पूरे हिन्दू समुदाय में भी एक नया जोश आया और नई उमंगों को संजोये अनेक नौजवान बली के इस मार्ग पर आगे बढ़ गए|

डॉ. अशोक आर्य
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