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अहमद खान सहित उसकी सेना का सफाया करने वाली वीरांगना तुलसीबाई

भारत प्राचीन काल से ही वीरो वीरांगनाओं की धरती रहा है| इस धरती पर करने और मरने की प्राचीन परम्परा आज तक निरंतर चली आ रही है| विदेशी आतताई को मार भगाना यहाँ के महावीर अपने कर्तव्य समझते थे और समझते हैं| देश की सुरक्षा के कार्यों में केवल पुरुषों ने ही नहीं अपितु महिलाओं ने भी अपना खुल कर योगदान दिया है और शत्रु के दांत खट्टे किये है| जिन नारियों ने अपनी वीरता और योग्यता दिखाते हुए विदेशी आक्रमण कारियों को मार भगाने में सफलता प्राप्त की, उनमें वीरांगणा तुलसीबाई का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है| इस महिला का सम्बन्ध महाराष्ट्र से था और महाराष्ट्र में इस की वीरता की कहानियां आज भी बड़े चाव से पढ़ी जातीं हैं| इतनी वीरता दिखाने वाली, शत्रु को मार भगाने वाली इस वीर महिला का जन्म कब और कहाँ हुआ, इसका आज तक किसी को पता नहीं चल सका| इस प्रकार इस का विगतˎ जीवन अपरिचित ही रहा|

जिन दिनों महाराष्ट्र के देशभक्त वीरों ने वहां आक्रमण करके आपने पाँव ज़माने का प्रयास कर रहे मुगलों पर निरंतर आक्रमण करते रहने के कारण उनकी नाक में दम कर रखा था, यह तुलसीबाई की कथा भी उन्हीं दिनों से ही सम्बंधित है| वह अपने निरंतर संघर्ष के कारण मुगालों को महाराष्ट्र में पाँव नहीं जमाने दे रहे थे| यदि कभी कहीं मुगलों ने कोई विजय प्राप्त कर अपनी सत्ता स्थापित की भी तो वहां के शूरवीरों ने इसे कुछ ही दिनों में उखाड़ बाहर कर दिया|

इन्हीं दिनों हो रहे देश के इस संघर्ष में तुलसीबाई ने भी भाग लेकर अपना अंशदान करने का संकल्प ले लिया| महाराष्ट्र में आज भी यह कहा जाता है कि “चल मावेली कहीं का|” इससे स्पष्ट होता है कि महाराष्ट्र में एक मावली नाम की जाती थी| समभवतया यह जाति जंगली आदिवासियों से सम्बन्ध रखती रही होगी| इस कारण इसका इस प्रकार नाम लिया जाता है| हमारी कथा नायिका इस जाति के लोगों की ही सरदार थी| इस वीर महिला ने अत्यंत परिश्रम करते हुए कई हजार मावली लोगों को एकत्र कर, इन्हें युद्धाभ्यास करवाय और इनकी एक सुदृढ़ सेना तैयार कर ली|

जिन दिनों तुलसी बाई इस सेना को तैयार कर रही थी, उन्ही˙ दिनों बुरहानपुर(जो आजकल मध्य प्रदेश का एक भाग है), इस नगर से लगभग सात कोस की दूरी पर स्थित नगर रणवीरपुर पर कब्जा किया और इस नगर का सूबेदार इन दिनों अहमद खान को बनाया गया| तुलसीबाई अत्यंत वीर और देशभक्त महिला थी| इसके अतिरिक्त वह एक संगठित सेना को भी सुसज्जित कर चुकी थी| इस कारण रणवीरपुर पर मलेच्छों का झंडा देखना उसे सहन नहीं हो पा रहा था| उसने इस मुगल सत्ता के वर्त्तमान सूबेदार से दो दो हाथ कर इस नगर को स्वाधीन करने की एक योजना तैयार की और इस योजना के अंतर्गत उसने सूबेदार अहमद खान को सन्देश भेजा कि या तो वह इस मावल सेना के लिए चौथ देना आरम्भ करे या फिर युद्ध के लिए तैयार हो जावे| इसके साथ ही उसने अपने सन्देश में यह भी कहला भेजा कि यदि युद्ध की स्थिति आई तो स्मरण रखना कि मावलों के हाथों तेरी सेना सहित तुझे समाप्त कर दिया जावेगा|

सन्देश सुनकर तथा यह जानकार कि एक महिला उसे चेतावनी दे रही है, वह हंस हंस कर लौट पौट होने लगा और कहने लगा देखो एक महिला आज इतना साहस कर रही है कि वह मुझे ललकारते हुए कर देने के लिए कह रही है| क्या महिलायें भी कभी युद्ध कर सकती है? क्या युद्ध में आकर कोई महिला कभी जीत भी सकती है| मुझे तो लगता है कि यह महिला पागल है या कुछ मजाक कर रही है क्योंकि चौथ तो मुग़ल लिया करते हैं, दिया नहीं करते| इस प्रकार इस चेतावनी को उसने हँसी मजाक में उड़ा दिया और संदेशवाहक को लापरवाही से उत्तर देते हुए कहा कि क्या महाराष्ट्र में वीरों की समाप्ति हो गई है जो यहाँ की ओरतें चौथ माँगने लागी हैं| जाओ उसे कह दो कि हम उसके स्वागत के लिए तैयार हैं, चाहे तो हमारे महल में आकर रह ले|

तुलसीबाई तो पहले से ही युद्ध की तैयारी में बैठी थी ऊपर से सन्देशवाहक के द्वारा लौटाए गए सन्देश ने जले पर नमक का कार्य किया| सन्देश सुनते ही तुलसीबाई की आँखों से अंगार निकलने लगे, भुजाएं फड़फडाने लगीं और उसके पूरे तन बदन में आग सी लग गई| अत: उसने झटपट युद्द की तैयारी कर डाली|

युद्ध कौशल में प्रवीण वीर तुलसीबाई ने अपनी सेना को तीन भागों में बाँट दिया| इनमें से एक भाग को सामने से युद्द करने के लिए कहा गया| दूसरे को बगल से जा कर नगर पर आधिपत्य स्थापित करना था और तीसरे दल को रसद की रक्षा के साथ ही साथ पीछे से यथावश्यक सहायता का कार्य सौंप दिया गया|

एक महिला की ललकार सुनकर भी अहमद खान अब तक भी निश्चिंत था क्योंकि उसे विशवास ही नहीं हो पा रहा था कि महाराष्ट्र की एक महिला ने उसे ललकारा है और उस की आधीनता स्वीकार करने को कहा है, जिसे नहीं मानने पर भीषण युद्ध की चेतावनी भी दी है| इस कारण अब तक भी वह राग रंग और भोग विलास में ही डूबा हुआ था| अकस्मात् दूतों ने उसे सूचना दी कि तुलसीबाई की सेना उस पर आक्रमण करने के लिए निरंतर आगे बढती चली आ रही है तो वह घबरा उठा| उसे यह आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी था कि महाराष्ट्र की किसी महिला ने युद्ध की चेतावनी देकर उसके साथ एक भद्दा मजाक किया था किन्तु यह क्या यह चेतावनी तो शीघ्र ही सत्य सिद्ध होने जा रही है| उसने भी भोग विलास को त्याग तत्काल अपनी सेना को तैयार किया और आने वाली मावालियों की सेना का प्रतिरोध करने चल पड़ा

मावालियों की सेना छोटी सी ही थी जबकि उसकी विशाल सेना के साथ भयंकर शस्त्रों का भी भंडार था| शीघ्र ही दोनों सेनाओं का समना हुआ और भयंकर मारका मच गई| इस भयंकर युद्ध में एक और विशाल सेना तथा दूसरी ओपर मावलों की मुट्ठी बहर सेना में भयंकर मारकाट मच रही थी और इस मार काट में कभी इस सेना का पलड़ा भारी दिखाई देता और कभी उस सेना का| पूरा दिन इस प्रकर दोनों सेनाओं के मध्य युद्ध चलता रहा, जो रात्रिकाल को जाकर रुका|

अब दोनों सेनाएँ विश्राम और आगामी योजना बनाने के लिए अपने अपने शिविर में लौट गईं| शिविर में आने पर वीर तुलसीबाई ने अपनी सेना के सब घायलों के पास जा कर उनका पता लिया, कष्ट में दिलासा डदी और उनका उपचार करवा कर, उन्हें दूसरे दिन के युद्ध के लिए प्रेरित किया| स्वस्थ, थके हुए तथा घायल, सब सैनिकों में नए उत्साह की लहर दौड़ गई| अब तुलसीबाई ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए नई योजना बनाई| इस बार भी उसने अपनी सेना को तीन भागों में बाँटा| जिस सेना को उसने विगतˎ समय में रसद के लिए सुरक्षित रखा था, उस सेना को बगल से निकलकर पीछे से आक्रमण करने का निर्देश दिया| दूसरी टुकड़ी को नगर पर आक्रमण कर किले पर अधिआकार करने का आदेश दिया और तीसरी दुकड़ी ने उसके अपने ही नेतृत्व में पूर्ववत ही युद्ध में भाग लेने के लिए कहा गया|

एक दिन पहले के युद्ध में अहमद खान को यह भ्रम था कि आक्रमण करने वाली सेना की नायक एक महिला है, जो उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती और फिर उसके साथ मुट्ठी भर सेनिक ही है, जिन्हें वह शीघ्र ही परास्त कर देगा किन्तु उनका कौशल देखकर उसे निश्चय हो गया था कि इस सेना से मुकाबला करना कोई साधारण खेल नहीं है| उसे अब भी विश्वास था कि इधर उधर से एकत्र कर तैयार की गई सेना उसके सामने कब तक टिकेगी, इस कारण उसकी विजय निश्चित है| इस प्रकार अब तक भी उसका भ्रम बना ही हुआ था|

यह सोचते सोचते नया सवेरा आया| दिन निकलते ही दोनों सेनायें एक बार फिर आमने सामने थीं| जब मुग़ल सेना ने मावली सेना पर आक्रमण किया तो मावली सेना ने मुग़ल सेना को आगे बढ़ने के लिए कुछ ढील दे दी ताकि वह बगल से घूम कर पीछे को जा सके| मुग़ल सेना ने इस ढील को कुछ और ही ढंग से लिया| उन्हो˙ने समझा कि आज मावली सेना युद्ध नहीं करना चाहती, उसका साहस समाप्त हो चुका है, इस कारण कुछ ही समय में बड़ी सरलता से उसे विजय कर लिया जावेगा| यह विचार करते हुए कुछ समय के लिए मुगल सेना ने प्रतिरोध के लिए प्रतीक्षा की किंतु जब वह टुकड़ी कुछ भी प्रतिरोध किये बिना बगल से होते हुए पीछे को निकल गई तो मुग़ल सेना ने तुलसीबाई के साथ रह गई मुट्ठी भर से भी कम सेना पर आक्रमण कर दिया|

दोनों सेनाओं के बीच एक बार फिर से भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया और खूब मारकाट होने लगी| दोनों और के सैनिक कट कर या घायल होकर युद्ध भूमि में गिरने लगे| तुलसीबाई अत्यधिक चुस्त और फुर्तीले घोड़े पर सवार होकर इस युद्ध में उतरी थी| जहाँ उसने मारकाट मचा रखी थी, वहां वह घूम घूम कर अपने मवाली सैनिकों का उत्साह भी बढ़ा रही थी| इस प्रकार युद्ध लड़ते लड़ते दोपहर का समय आ गया| अब तक तुलसीबाई की सेना की पीछे से आक्रमण करने के लिए निर्धारित सैन्य टुकड़ी पीछे पहुँच चुकी थी| पीछे पहुँचते ही इस टकडीने मुगल सेना पर पीछे से भी भयंकर आक्रमण कर दिया| यह अवस्था मुग़ल सेना के लिए अप्रत्याशित थी| इसी समय मावलों की सेना की एक अन्य टुकड़ी ने नगर में प्रवेश किया और जाकर रणवीरपुर के किले को भी घेर लिया| मुग़ल सेना तथा उनके सेनापति को इस बात का पता ही नहीं था कि उनका किला भी घेरा जा चुका है और उस पर थोड़ी ही देर में भगवा लहराने वाला है|

आगे और पीछे दोनों और से भयंकर आक्रमण होने से मुग़ल सैनिक बुरी प्रकार से घिरे हुए थे और इस अवस्था में घबरा गए थे| इस अप्रत्याशित युद्ध से घबरा कर मुग़ल सैनिक भागने लगे| घबराए हुए यह सैनिक अपनी जान को बचाने के लिए रणभूमि से भागने लगे| अहमद खान कुछ सोच पाता इससे पूर्व ही तुलसीबाई ने बड़ी तीव्र गति से उस पर भी आक्रमण कर दिया| उसने अपने भालों और तलवार का मुंह उसकी और कर दिया था| मुग़ल सेना भागते हुए भी पीछे से हुए आक्रमण से निरंतर घायल हो रही थी और मारी भी जा रही थी|

इधर अहमदशाह भी तुलसीबाई के आक्रमण से बुरी तरह से घायल हो गया तथा घायल अवस्था में ही वहाँ से भाग पाने में सफल हो गया| वह बुरी तरह से घायल अवस्था में अपने किले की और भाग रहा था कि अकस्मात् उसे पता चला कि उसका किला उसके हाथ से पहले ही निकल चुका है और अब उस पर भगवा लहरा रहा है, इस कारण स्वयं को सुरक्षित करने के लिए उसने बुरहानपुर की और रुख किया| इस समय वह बुरी तरह से घायल था और उसके घावों से लगातार रक्त बह रहा था| किले में जाकर उसने अपना उपचार करवाना था किन्तु यह भी हाथ से निकल चुका था इसलिए ही उसे बुरहानपुर का रुख करना पडा था| उसके शरीर में इतनी शक्ति शेष नहीं रही थी कि वह बुरहानपुर तक की यात्रा कर पाटा| खून अब भी बह रहा था| अत: घायल अवस्था में बुरहानपुर के मार्ग में ही वह दम तोड़ गया|

इस प्रकार इस वीरांगना तुलसी बाई ने ना केवल रणवीर पुर से मुग़ल सत्ता को उखाड़ फैंका अपितु जो अपमान जनक शब्द अपने सन्देश में उसने भेजे थे, तुलसीबाई ने विजयी होकर तथा से समाप्त करके इस का भी बदला ले लिया|

भारतीय वीरांगनाओं ने अपनी अप्रत्याशित वीरता दिखाते हुए सदा ही या तो शत्रु का नाश किया है, या फिर जोहर करके स्वयं को अग्नि के हवाले किया है किन्तु शत्रु के हाथों कभी भी स्वयंको नहीं आने दिया| इन नारियों की वीरता, त्याग, तप, जौहर के किस्से आज देश के विभिन्न भागों में निरंतर गाये जा रहे हैं| धन्य हैं हमारी यह माताएं जिन्होंने अपने शरीर के रक्त की अंतिम बूंद तक भी देश के हित को जानेनाहीं दिहा और देश के, धर्म के हित के लिए अपना बलिदान दे दिया|

डॉ. अशोक आर्य
पॉकेट १/ ६१ रामप्रस्थ ग्रीन से, ७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ. प्र. भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६ e mail [email protected]

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